मंगलमय शुद्धात्म, जब तक न होवे प्राप्त।
पंच प्रभु ही शरणभूत हैं मंत्र जपो नवकार।।
निश्चय से आत्म ही सार जिसमें तन्मय सिद्ध समाज।
वैभव जो दिखता अरहंतों, भिन्न है उससे शुद्धात्म सार।।
मुनिराजों के रहता उस चेतन का ही ध्यान।।1।।
पंच प्रभु ही शरण भूत हैं…
शरण तुम्हें प्रभु तुमको माना जो तुमने माना ना माना
जिन मंदिर के नाथ बताएं तन मंदिर का देव सहारा।।
अप्पा सो परमप्पा का गाते जो गान।।2।।
पंच प्रभु ही शरण भूत हैं…
रचनाकार: अम्बर जैन (Ambar Jain), बलेह