पंचम काल रूपी | Pancham Kal Rupi

:folded_hands:श्रुत पंचमी : अमृत मेघोत्सर्ग :folded_hands:

पंचम काल रूपी
ज्येष्ठ की तपती दोपहर में,
दो बूँद मीठे जल सी।

भटके पथिक के जीवन में,
शीतलता के संबल सी।

आई श्रुत पंचमी ।

आई श्रुत पंचमी
जैसे —
दहकती दोपहर में
अचानक उमड़े बादल।

कषायों की गरम हवाओं के बीच
श्रुत की पहली बूँद,
जब परिणति रूपी धरा से मिली,
तो विशुद्धि की सौंधी सुगंध ने
सारे वातावरण को महका दिया।

झुलसती पर्यायों ने राहत की साँस ली,
अनंत गुण रूप कोयल के स्वर फिर चहक उठे,
और तपन से व्याकुल चेतन
अनायास ही प्रसन्न हो गया।

शीतल बयार छू गई
चेतन उपवन के कोने कोने को।

वह पंचमी को हुई वर्षा अपने पीछे
तृप्ति, शीतलता और अमर जीवन का
मधुर संदेश छोड़ गई।

वह केवल एक वर्षा नहीं थी,
युगों को तृप्त करने वाला मेघोत्सर्ग था।

गिरनार की गुफाओं में
धरसेनाचार्य के अंतर्मन में संचित
श्रुत-जल का अमूल्य संचय,

पुष्पदंत और भूतबली रूपी
दो पावन धाराओं में प्रवाहित हुआ।

और फिर—
अंकलेश्वर की पुण्यभूमि पर
ज्येष्ठ शुक्ल पंचमी के शुभ दिवस,
वह ज्ञान-मेघ बरसा इस प्रकार
कि —
षट्खण्डागम रूपी सरिता बह निकली।

णमोकार की मंगलध्वनि संग
गिरी प्रत्येक बूँद ने
असंख्य चेतनों के हृदय में
सम्यग्ज्ञान के बीज बो दिए।

जब भूमि तृप्त हो चुकी,
तब नभ ने अपना अगला संदेश सुनाया—

"चेतन,
अपने श्रुत ज्ञान को श्रुत से जोड़ना,
श्रुत से जुड़ निज ज्ञान करना। " —
हुई तीव्रतर गर्जना
ज्ञान-विद्युत् चमकी,
सत्य की गर्जना गूँजी;
और मिथ्यात्व के दुर्ग
थर्रा उठे।

पंचमी की उस अमृत-वर्षा में
पंचम लब्धि जागी,
चेतन पंचम भाव से मिला,
ज्ञान-कमल खिल उठा,
सम्यक्त्व का इन्द्रधनुष छा गया—
और फिर
अनन्त काल तक
आनंद की वर्षा होती रही।

:writing_hand: ऋचा जैन
19 जून 2026

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