पंचाध्यायी में सत्ता का स्वरूप
-प्रो. वीरसागर
जैन
पांडे राजमल कृत ‘पंचाध्यायी’ में तत्त्व का स्वरूप प्रतिपादित करनेवाला एक अत्यंत सारग्राही श्लोक प्राप्त होता है, जो इसप्रकार है-
तत्त्वं सल्लाक्षणिकं सन्मात्रं वा यतः स्वतःसिद्धम् ।
तस्मादनादिनिधनं स्वसहायं निर्विकल्पं च ॥ 8 ॥
इस श्लोक में बडी ही कुशलता से तत्त्व का समीचीन स्वरूप प्रतिपादित कर दिया गया है और साथ ही तत्सम्बन्धी समस्त मिथ्या मान्यताओं का निराकरण भी कर दिया गया है। तत्त्व के स्वरूप को समझने के लिए यह श्लोक बहुत ही उपयोगी है। स्वयं पंचाध्यायीकार ने इस श्लोक का आगे चलकर बहुत विस्तार किया है।
जैनदर्शन के मंडन व अन्य दर्शनों के खंडन के लिए ही नहीं, तत्त्व के सम्बन्ध में अपनी स्वयं की मिथ्या मान्यताओं को छोड़ने और उसका समीचीन स्वरूप समझने के लिए यह श्लोक बहुत ही उपयोगी है। हमें इस श्लोक के एक-एक शब्द पर बारम्बार गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन करना चाहिए। इसमें पूरी सत्ता-मीमांसा [Ontology] आ गई है। सत् क्या है और उसका क्या स्वरूप है - यह दर्शनशास्त्रियों के बीच एक बड़ा ही ज्वलंत प्रश्न रहा है। यहाँ उसीका सयुक्तिक समाधान किया गया है। प्रस्तुत आलेख में उसी को संक्षेप में लिखने का प्रयास किया जा रहा है।
ज्ञातव्य है कि यहां तत्त्व, द्रव्य, वस्तु, अर्थ, पदार्थ, सत्, सत्ता आदि सभी शब्द पर्यायवाची हैं।
पंचाध्यायी के उक्त श्लोक में तत्त्व के सम्बन्ध में पांच बातें मुख्य रूप से कही गयी हैं -
- तत्त्व सत् लक्षण वाला है।
- तत्त्व स्वतःसिद्ध है।
- तत्त्व अनादिनिधन है।
- तत्त्व स्वसहाय है।
- तत्त्व निर्विकल्प है।
अब इन पांचों का किंचित् विशेष विचार करते हैं।
- तत्त्व सत् लक्षण वाला है -
इस प्रथम विशेषण के द्वारा यह कहा गया है कि तत्त्व सत् है, सत्ता वाला है, विद्यमान है; अविद्यमान, भ्रमात्मक या काल्पनिक नहीं है।
इस विशेषण के द्वारा सभी तत्त्वोपप्लववादियों, उच्छेदवादियों और शून्यवादियों का निराकरण हो जाता है । तत्त्वोपप्लववादियों का कहना है कि तत्त्व कहीं कुछ भी नहीं है । परन्तु इस प्रकार तो उनकी अपनी स्वयं की ही सत्ता सिद्ध नहीं होती और ऐसी स्थिति में उनकी बात पर कैसे विश्वास किया जा सकता है ?
इसी प्रकार शून्यवादियों का कहना है कि तत्त्व कुछ भी नहीं है, केवल शून्य तत्त्व है, परंतु यह मत भी समीचीन नहीं है, क्योंकि इसमें भी उक्त दोष ही आता है | कहने वाला स्वयं ही शून्यरूप सिद्ध होता है |
विचारणीय है कि तत्त्वोपप्लव या शून्यतत्त्व का साधन कौन करेगा, कैसे करेगा ? तथा जो सिद्ध ही न हो सके, उस असिद्ध वस्तु को स्वीकार कैसे किया जा सकता है ?
तत्त्वोपप्लववादियों के विषय में कार्तिकेयानुप्रेक्षा में इसप्रकार लिखा है-
अच्छीहि पिच्छमाणो जीवाजीवादि-बहुविहं अत्थं |
जो भणदि णत्थि किंचि वि सो झुट्ठाणं महाझुट्ठो || 250 ||
अर्थात् जो जीवाजीवादि अनेक पदार्थों को आँखों से दिखाई देते हुए भी कुछ नहीं है- ऐसा कहता है, वह झूठों में भी झूठा महाझूठा है ।
अतः तत्त्व को सत् लक्षण वाला ही मानना योग्य है।
2. तत्त्व स्वतःसिद्ध है -
इस विशेषण के द्वारा जो लोग तत्त्व को सत् मानकर भी उसे ईश्वरादि किसी अन्य के द्वारा उत्पन्न हुआ अथवा युतसिद्ध आदि मानते हैं, उनका निराकरण हो जाता है । यथा -
यदि तत्त्व ईश्वरादि किसी अन्य के द्वारा उत्पन्न किया हुआ हो तो वह अन्य के द्वारा नष्ट भी किया जा सकेगा। वह अपने स्वभाव से सत् सिद्ध नहीं होगा। वह पराधीन भी सिद्ध होगा। स्वाधीन या स्वसहाय सिद्ध नहीं होगा। तथा ऐसा मानने पर असत् की उत्पत्ति और सत् के नाश का प्रसंग भी उत्पन्न होगा । यथा -
इत्थं नो चेदसतः प्रादुर्भूतिर्निरंकुशा भवति ।
परतः प्रादुर्भावो युतसिद्धत्वं सतो विनाशो वा ॥ 9 ॥ -पंचाध्यायी
तथा असत् की उत्पत्ति मानने पर द्रव्यों की जाति-अपेक्षा भी अनंतता सिद्ध होगी, कभी भी कोई भी अनोखा द्रव्य उत्पन्न हो जायेगा । तथा मिट्टी आदि के बिना ही घट आदि की उत्पत्ति हो जाएगी । यथा - असतः प्रादुर्भावे द्रव्याणामिह भवेदनन्तत्वम् ।
को वारयितुं शक्तः कुंभोत्पत्ति मृदाद्यभावेऽपि ॥ 10 ॥ -पंचाध्यायी
तत्त्व को स्वतः सिद्ध न माना जाये तो वह परतः सिद्ध होगा और इससे अनवस्था नाम का भी महादोष उत्पन्न होगा; क्योंकि वह पर भी पर से और फिर वह पर भी अन्य पर से उत्पन्न होगा - इस प्रकार कहीं भी अवस्थान नहीं हो सकेगा । यथा -
परतः सिद्धत्वे स्यादनवस्थालक्षणो महान् दोषः ।
सोपि परः परतः स्यादन्यस्मादिति यतश्च सोपि परः ॥ 11 ॥ -पंचाध्यायी
इस प्रकार जो लोग तत्त्व को सत् मानते हुए भी उसे स्वतः सिद्ध नहीं मानते, ईश्वरादि किसी अन्यतः सिद्ध अथवा युतसिद्ध मानते हैं, उनका निराकरण हो जाता है |
युतसिद्ध का मतलब है- दो वस्तुओं के संयोग से एक वस्तु बनना, जैसे कि दंड के संयोग से दंडी बनना | वस्तु को युतसिद्ध मानने पर भी वह स्वतःसिद्ध नहीं रहती, खंडित हो जाती है | युतसिद्ध वस्तु में यह गुण है और यह गुणी - ऐसा कथन नहीं बन सकेगा, गुण और गुणी दोनों के प्रदेश भिन्न - भिन्न सिद्ध होंगे | यथा -
“युतसिद्धत्वेऽप्येवं गुणगुणिनोः स्यात् पृथक्प्रदेशत्वं |
उभयोरात्मसमत्वाल्लक्षणभेदः कथं तयोर्भवति ॥12 ॥” -पंचाध्यायी
तत्त्व को स्वतःसिद्ध बताते हुए आचार्य अमृतचन्द्र ने भी बहुत अच्छा कहा है | यथा -
“अस्तित्वं हि किल द्रव्यस्य स्वभावः तत्पुनरन्यसाधननिरपेक्षत्वादनाद्यनंततया हेतुकयैकरूपया वृत्या…” -आचार्य अमृतचंद्र, प्रवचनसार-टीका, गाथा 9
अस्तित्व वास्तव में वस्तु का स्वभाव है और वह अनादि-अनंत अहेतुक पर-निरपेक्ष ही सिद्ध होता है |
स्वतः सिद्ध होने के कारण ही तत्त्व को आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने समयसार में अकार्यकारण भी कहा है | यथा -
“ण कुदोचि वि उप्पणो जम्हा कज्जं ण ते ण सो आदा |
उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण स होदि ॥" -आचार्य कुन्दकुन्द, समयसार, गाथा 310
अर्थ- आत्मा किसी से उत्पन्न नहीं है अतः किसी का कार्य नहीं है और किसी को उत्पन्न नहीं करता है अतः किसी का कारण भी नहीं है।
इसी प्रकार स्वतःसिद्ध वस्तु कभी किसी का ग्रहण-त्याग भी नहीं करती, जैसा कि समयसार की ही 410वीं गाथा में भलीभांति स्पष्ट किया गया है।
इस प्रकार तत्त्व को स्वतःसिद्ध कहकर पंचाध्यायीकार ने बहुत कुछ कह दिया है, आवश्यकता सिर्फ उस पर गंभीरतापूर्वक चिन्तन करने की है |
3. तत्त्व अनादिनिधन है -
वस्तु को सत् मानने पर उसे अनादि-अनिधन ही माना जा सकेगा, अन्यथा वह सत् भी सिद्ध नहीं होगी | जो सत् है उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती और उसका नाश भी नहीं हो सकता | वह अनादि से है और अनंत काल तक रहेगा | उसकी अवस्था बदलती है, पर वह सर्वथा क्षणिक या नष्ट नहीं हो सकता, जैसा कि आचार्य कुन्दकुन्द ने ‘पंचास्तिकाय’ में भी कहा है -
“भावस्स णत्थि णासो णत्थि अभावस्स चेव उप्पादो |
गुणपज्जएसु भावा उप्पादवये पकुव्वंति ||15 ||”
अर्थात् भाव [ सत् ] का कभी नाश नहीं होता और अभाव [असत् ] का कभी उत्पाद नहीं होता | सभी पदार्थ अपने गुण-पर्यायों में उत्पाद-नाश करते हैं ।
तत्त्व की यह बात तो आधुनिक विज्ञान द्वारा भी अनेक तर्कों और उदाहरणों द्वारा भलीभाँति सिद्ध की जा चुकी है | उसकी स्थापना है कि - nothing can be created nor be destroyed, it’s form only changes.
4. तत्त्व स्वसहाय है-
तत्त्व को सत्, स्वतःसिद्ध और अनादिनिधन मानने पर यह सिद्ध करने की आवश्यकता नही होनी चाहिए कि वह स्वसहाय भी अवश्य है, क्योंकि परसहाय वस्तु सत्, स्वतःसिद्ध और अनादिनिधन भी सिद्ध नही हो सकती | प्रत्येक वस्तु अपना सम्पूर्ण कार्य स्वयं करने में पूर्ण समर्थ है | वह अपना कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान, अधिकरण स्वयं है | यही कारण है कि आचार्य कुन्दकुन्ददेव ने प्रवचनसार गाथा 16 में आत्मा को [प्रकारांतर से प्रत्येक पदार्थ को ] ‘स्वयंभू’ कहा है | यथा -
"स्वयमेव षट्कारकीरूपेणोपजायमानः उत्पत्तिव्यपेक्षया द्रव्यभावभेदभिन्न-घातिकर्माण्यपास्य स्वयमेवाविर्भूतत्वाद्वा स्वयंभूरिति निर्दिश्यते ।”
यदि वस्तु परसहाय हो तो वह परतंत्र, पराधीन सिद्ध हो जाये, जो अनेक दोषों की उत्पत्ति का हेतु बने, अतः वस्तु को स्वसहाय ही मानना योग्य है |
तत्त्व को स्वसहाय कहने से एक ही तत्त्व मानने वाले अद्वैतवादियों का भी निराकरण हो जाता है | तत्त्व स्वसहाय है अर्थात् लोक में अनेक तत्त्व हैं और सभी अपने-अपने सहाय रहते हैं, स्वाधीन हैं, कोई किसी अन्य के अधीन नहीं है ।
तत्त्व निर्विकल्प है -
यहाँ ‘निर्विकल्प’ का अभिप्राय है - अभेद, अखंड, अविभाज्य | प्रत्येक वस्तु यद्यपि अपने अन्दर अनंत गुण-पर्यायों को धारण करती है, परन्तु वह कभी विभाजित या खंडित नही होती | यदि खंडित हो जाए तो वह सत् ही सिद्ध नही हो सकती | उसमें गुण-पर्याय आदि की भेद-कल्पना तो उसे समझने-समझाने के लिए की गई है, परन्तु वस्तु तो अभेद-अखंड ही है | उसे किसी भी तरह से द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव किसी से भी खंडित नहीं किया जा सकता | जैसा कि आचार्य अमृतचन्द्र स्वामी ने भी कहा है -
“ न द्रव्येण खंडयामि, न क्षेत्रेण खंडयामि, न कालेन खंडयामि, न भावेन खंडयामि | "
- समयसार-टीका, कलश 270-271
अनेक लोग गुण-गुणी में सर्वथा भेद मानते हैं अथवा उनमें समवाय संबंध अथवा युतसिद्ध सम्बन्ध आदि कुछ मानते हैं, परन्तु जैसा कि ऊपर तत्त्व को स्वतःसिद्ध सिद्ध करते समय स्पष्ट किया जा चुका है कि ऐसा मानना समीचीन सिद्ध नहीं होता, उसमें अनेक दोष आते हैं, अतः तत्त्व को परमार्थ से निर्विकल्प ही मानना योग्य है |
इस प्रकार तत्त्व को उक्त लक्षण वाला ही मानना उचित है |
इसके अतिरिक्त यहाँ तत्त्व का लक्षण बताकर अवक्तव्यवादियों का निराकरण कर दिया गया समझना चाहिए | कुछ लोग तत्त्व को सर्वथा अवक्तव्य मानते हैं | उनका कहना है कि तत्त्व सर्वथा अवक्तव्य है, उसे कहा ही नहीं जा सकता, परन्तु उनका मत भी समीचीन नहीं है । जैनाचार्यों का कहना है कि यदि तत्त्व सर्वथा अवक्तव्य हो तो उसे ‘अवक्तव्य’ पद से भी नहीं कहा जा सकता | यदि हम उसे ‘अवक्तव्य’ पद से भी कह रहे हैं तो वह वक्तव्य तो हो ही गया न, सर्वथा अवक्तव्य कहाँ रहा ?
इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘पंचाध्यायी’ में एक ही श्लोक के द्वारा सम्पूर्ण सत्मीमांसा / तत्त्वमीमांसा को सारग्राही शैली में प्रस्तुत कर दिया गया है, अतः इससे यह भी सिद्ध होता है कि यह ग्रन्थ ‘गागर में सागर’ की उक्ति को चरितार्थ करता है | काश, यह ग्रन्थ पूर्ण हो जाता