पंच परमेष्ठी — जैन स्वाध्याय सामग्री | Panch Parmeshthi

पंच परमेष्ठी

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पंच परमेष्ठी

परमेष्ठी किसे कहते हैं?

  • जो परम पद में स्थित हो
  • जो परम अर्थात् सबसे ज्यादा इष्ट अर्थात् प्यारा हो

परमेष्ठी कितने हैं?

पाँच

कौन-कौन से?

  • अरहंत
  • सिद्ध
  • आचार्य
  • उपाध्याय
  • साधु

  • ये पाँचों ही वीतरागी और ज्ञानी हैं
  • अरहंत-सिद्ध पूर्ण वीतरागी और ज्ञानी हैं
  • आचार्य, उपाध्याय, साधु एकदेश वीतरागी और ज्ञानी हैं
  • वीतराग मार्ग पर चलने वाले हैं

देव और गुरु

सिद्ध देव हैं
आचार्य, उपाध्याय, साधु गुरु हैं
अरहंत देव भी हैं और गुरु भी हैं

अरहंत किसे कहते हैं?

  • जो गृहस्थपना त्याग कर
  • मुनि-धर्म अंगीकार कर
  • निज स्वभाव - साधन द्वारा
  • चार घाति कर्म का क्षयकर
  • अनंत चतुष्टयरूप विराजमान हुए, वे अरहंत है।

चार घाति कर्म

ज्ञानावरण,
दर्शनावरण,
मोहनीय
और
अंतराय

अनंत चतुष्टय

अनंत ज्ञान
अनंत दर्शन
अनंत सुख और
अनंत वीर्य

किस घाति कर्म के अभाव से क्या प्रकट हुआ

  • ज्ञानावरण के अभाव से अनंत ज्ञान
  • दर्शनावरण के अभाव से अनंत दर्शन
  • मोहनीय के अभाव से अनंत सुख और
  • अंतराय के अभाव से अनंत वीर्य

अरहंत के
कितने
मूलगुण हैं?

46 मूलगुण

4
आत्माश्रित

42
शरीराश्रित

4 आत्माश्रित

अनंत ज्ञान
अनंत सुख
अनंत दर्शन
अनंत वीर्य

सभी अरहंतों के होते हैं

42 शरीराश्रित

केवलज्ञान के 10
अतिशय

8 प्रातिहार्य

जन्म के 10
अतिशय

देवकृत
14 अतिशय

ये सब तीर्थंकर अरहंतों के ही होते है, सभी अरहंतों के नहीं

सिद्ध किसे कहते हैं?

★ अरहंत होने के कुछ काल बाद

अघाति कर्मों के नाश होने पर
अघाति कर्म =
वेदनीय, आयु, नाम, गोत्र

पूर्ण मुक्त हो गये हैं

लोक के अग्र
भाग में

★ लोक के शिखर पर

अंतिम शरीर से कुछ
कम पुरुषाकार
विराजमान हो गए

जिनके द्रव्य कर्म, भाव कर्म,
नोकर्म का अभाव होने से

3 प्रकार के कर्म

द्रव्यकर्म - ज्ञानावरणादि आठ कर्म
भावकर्म - मोह, राग-द्वेष भाव
नोकर्म - शरीर

समस्त आत्मिक गुण
प्रकट हो गए

अनंत गुण
पर मुख्य आठ

सिद्धों के 8 मूल गुण

अनंत ज्ञान
अनंत दर्शन
अनंत वीर्य
क्षायिक सम्यक्त्व
अरुगुलघुत्व
अवगाहनत्व
सूक्ष्मत्व
अव्याबाधत्व

8 कर्मों के अभाव से प्रकट 8 गुण

अनंत ज्ञान - ज्ञानावरणीय
अनंत दर्शन - दर्शनावरणीय
अनंत वीर्य - अंतराय
क्षायिक सम्यक्त्व - मोहनीय
अव्याबाधत्व - वेदनीय
अवगाहनत्व - आयु
सूक्ष्मत्व - नाम
अरुगुलघुत्व - गोत्र
वे सिद्ध हैं

सिद्ध

★ अरहंत बनने के
★ कुछ समय बाद
★ समस्त अन्य द्रव्य का संबंध छूट जाने पर
★ पूर्ण मुक्त हो गये हैं
★ लोक के अग्र भाग में
★ किंचित् न्यून पुरुषाकार विराजमान हो गए
★ जिनके द्रव्य कर्म, भाव कर्म, नोकर्म का अभाव होने से
★ समस्त आत्मिक गुण प्रकट हो गए
★ वे सिद्ध हैं।

आचार्य, उपाध्याय, साधु परमेष्ठी का सामान्य स्वरूप

सामान्य से तीनों ही साधु हैं

पहले जानें

3 प्रकार का उपयोग

  • शुभोपयोग
    • देव, शास्त्र, गुरु की भक्ति आदि
  • अशुभोपयोग
    • 5 पाप, 4 कषाय, 5 इन्द्रिय विषय में प्रवृत्ति
  • शुद्धोपयोग
    • शुभ और अशुभ उपयोग से रहित वीतराग भाव

साधु के जीवन में उपयोग

शुद्धोपयोग
यही मुनिधर्म है, इसी की मुख्यता रहती

शुभोपयोग
होता है, शुभोपयोग का साधन है

अशुभोपयोग
अस्तित्व ही नहीं होता

आचार्य किसे कहते हैं?

जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र (रत्नत्रय) की अधिकता से

प्रधान पद प्राप्त करके

मुनि संघ के नायक हुए हैं

मुख्यपने शुद्धोपयोग को
साधते हैं

और

  1. धर्मोपदेश
  2. दीक्षा
  3. प्रायश्चित देते हैं

प्रश्नोत्तरी

उपदेशादि किन्हें
देते?

करुणा बुद्धि से

  1. धर्म के लोभी अन्य जीवों को
    धर्मोपदेश देते

  2. दीक्षा लेने वाले को योग्य जान दीक्षा
    देते

  3. अपने दोष प्रकट करने वाले को
    प्रायश्चित विधि से शुद्ध करते

परिभाषा

ऐसा आचरण करने और कराने वाले आचार्य कहलाते हैं।

प्रश्नोत्तरी

आचार्य किसे कहते हैं?

  • जो सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र (रत्नत्रय) की अधिकता से
  • प्रधान पद प्राप्त करके
  • मुनि संघ के नायक हुए हैं
  • मुख्यपने शुद्धोपयोग को साधते हैं
  • करुणा बुद्धि से
    • धर्म के लोभी अन्य जीवों को धर्मोपदेश देते
    • दीक्षा लेने वाले को योग्य जान दीक्षा देते
    • अपने दोष प्रकट करने वाले को प्रायश्चित्त विधि से शुद्ध करते हैं
  • ऐसा आचरण करने और कराने वाले आचार्य कहलाते हैं

आचार्य परमेष्ठी के कितने मूलगुण हैं?
36

आचार्यों के 36 मूल गुण

6 आवश्यक
3 गुप्ति
5 आचार
12 तप
10 धर्म

उपाध्याय किसे कहते हैं?

जो बहुत जैनशास्त्रों के ज्ञाता होकर
संघ में पठन-पाठन के अधिकारी हुए हैं

उपाधयाय किसे कहते हैं?

  • जो बहुत जैनशास्त्रों के ज्ञाता होकर
  • संघ में पठन-पाठन के अधिकारी हुए हैं
  • तथा जो समस्त शास्त्रों का सार
  • मुख्यपने शुद्धोपयोग को साधते हैं
  • और उन शास्त्रों को स्वयं पढ़ते हैं, औरों को पढ़ाते हैं, वे
    उपाध्याय हैं।
  • ये मुख्यतः द्वादशाङ्ग के पाठी होते हैं।

मुख्यपने शुद्धोपयोग को साधते हैं

  • और शास्त्रों को स्वयं पढ़ते हैं
  • औरों को पढ़ाते हैं

वे
उपाध्याय
हैं

शीर्षक

द्वादशाङ्ग

= सम्पूर्ण जिनवाणी

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 661.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

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