पं. दौलतराम कासलीवाल कृत ‘चौबीस दण्डक’ : एक परिचय
-डॉ. वीरसागर जैन
मध्यकालीन हिन्दी-जैन-साहित्य के श्रेष्ठ कवियों में पं. दौलतराम कासलीवाल का नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। वे आगरा की ‘अध्यातम सैली’ में विधिवत् शिक्षाप्राप्त करने वाले कुशल कवि थे। उनका जन्म वि.सं. 1749 में राजस्थान के बसवा (जिला-दौसा) नामक ग्राम में हुआ था। वे जयपुर-राजदरबार में वकील या मंत्री के पद पर कार्यरत थे। अपने 80 वर्ष के जीवन-काल में उन्होंने विविध उल्लेखनीय राजकार्यों के अतिरिक्त समाज-सेवा एवं साहित्य-साधना के भी अनेक उत्तम कार्य सम्पन्न किये। वर्तमान में उनके द्वारा लिखित छोटी-बड़ी 20 कृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनमें 10 गद्यात्मक हैं और 10 पद्यात्मक। यथा-
गद्यात्मक रचनाएँ:- पुण्यास्रवकथाकोश-भाषा, आदिपुराण-वचनिका, पद्मपुराण-वचनिका, हरिवंशपुराण-वचनिका, परमात्मप्रकाश-भाषा, पुरुषार्थसिद्धि-उपाय-टीका, तत्त्वार्थसूत्र-टव्वाटीका, समयसार- कलश-टव्वाटीका, कार्तिकेयानुप्रेक्षा-टव्वाटीका, वसुनन्दिश्रावकचार-टव्वाटीका।
पद्यात्मक रचनाएँ:- क्रियाकोष, जीवन्धरस्वामिचरित, श्रीपाल-चरित, श्रेणिक-चरित, चतुर-चितारणी, विवेक विलास, चौबीस दण्डक, सार-समुच्चय, सिद्धपूजाष्टक, अध्यात्मबारहखडी।
प्रस्तुत आलेख में उनकी पद्यात्मक लघु कृति ‘चौबीस दण्डक’ का सामान्य परिचय किया जा रहा है।
‘चौबीस दण्डक’ में 10 दोहे और 47 चौपाइयाँ- इसप्रकार कुल 57 छन्द हैं । इस कृति में यथानाम 24 दण्डकों का वर्णन किया गया है। 24 दण्डकों में 13 दण्डक देव के हैं, 9 तिर्यञ्च के हैं, 1 नरक का है और 1 मनुष्य का है, जैसा कि कवि के निम्नलिखित छन्दों से स्पष्ट है:-
“पहलो दण्डक नारक तनो, भवनपति दस दंडक भनो।
जोतिष व्यंतर स्वर्गनिवास, थावर पंचमहौ दुख रास॥
विकलत्रय अरु नर तिर्यञ्च, पंचेन्द्री धारक परपंच।
ए चौबीसों दंडक कहें, अब सुनि इसमें भेद जु लहे।।”
कृति के प्रारंभ में एक श्रेष्ठ मंगलाचरण है, जो नमस्कारात्मक ही नहीं, वस्तुनिर्देशात्मक भी है। यहाँ उसका एक छन्द अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-
"गत्यागत्य प्रकाश जौ, गत्यागत्य वितीत।
अद्भुत अति गति सुगति ज्यों, जैनेश्वर जगजीत।।
मंगलाचरणोपरान्त क्रमशः नरक, देव, मनुष्य और तिर्यञ्चों के चौबीस दण्डकों का विवेचन किया गया है।
नरकगति के दण्डक का विवेचन करते हुए कहा गया है कि असैनी जीव पहले नरक तक, सरीसृप प्राणी दूसरे नरक तक, पक्षी तीसरे नरक तक, सर्प चौथे नरक तक, नाहर पाँचवें नरक तक, नारी छठवें नरक तक और नर एवं मच्छ सातवें नरक तक जा सकते हैं। सातवें नरक से निकला हुआ जीव पशुगति ही प्राप्त करता है, छठवें नरक से निकला हुआ जीव सम्यक्त्व और श्रावकव्रत धारण कर सकता है, पाँचवें नरक से निकला हुआ जीव केवली भी हो सकता है, तीसरे नरक से निकला हुआ जीव तीर्थंकर भी हो सकता है।
देवगति के तेरह दण्डकों का विवेचन करते हुए कहा गया है कि देवगति की प्राप्ति मनुष्य और पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं हो सकती। देव मरकर पृथ्वी, जल, वनस्पति, मनुष्य और तिर्यञ्च -इन पाँचों में से कुछ भी बन सकता है। दूसरे स्वर्ग से ऊपर के देव मरकर स्थावर नहीं होते। सहस्रार से ऊपर के देव मरकर नियम से मनुष्य ही बनते हैं। भोगभूमि के मनुष्य और तिर्यञ्च दूसरे स्वर्ग से ऊपर नहीं जाते। देव कभी भोगभूमि में नहीं जन्मते। भोगभूमि तो कर्मभूमि के मनुष्य और पशुओं को ही प्राप्त हो सकती है। तिर्यञ्च कभी सहस्रार से ऊपर नहीं जा सकते। अविरत सम्याद्रष्टि मनुष्य बारहवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जा सकता। पंचाग्नि तप तपनेवाले अन्यमती भुवनत्रक से ऊपर नहीं जा सकते। परमहंस नामक अन्यमती सहस्रार तक जा सकते है। मोक्ष कभी अन्यमती को नहीं मिलता। अणुव्रतधारी श्रावक, श्राविका और आर्यिका सोलहवें स्वर्ग से ऊपर नहीं जा सकते। द्रव्यालिंगी मुनि नववें ग्रैवेयक तक जा सकता है, इसके आगे नहीं। नौ अनुत्तर और पाँच अनुदिश में केवल महामुनि जा सकते हैं। इन्द्र, इन्द्राणी, लोकपाल, लोकान्तिक और अनुत्तर के देव अल्पकाल में मोक्षपद प्राप्त करते हैं, उनके अधिक भव नहीं होते।
नरगति के दण्डक का विवेचन करते हुए बताया गया है कि मनुष्य चौबीसों दण्डकों में जा सकता है। मनुष्य मुनि बनकर मोक्ष भी पा सकता है। मनुष्य की गति 25 बताई गई है और आगति 22। कोई भी मनुष्य अपने सिद्धसमान शुद्धात्मा का ध्यान कर परमात्मा बन सकता है | तीर्थकर की आगति दो हैं- देव और नरक, परन्तु गति एक भी नहीं है, क्योंकि वे नियम से संसार का अभाव कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। चक्रवर्ती, अर्धचक्रवर्ती और बलभद्र की आगति स्वर्ग ही है, अन्य कुछ नहीं। चक्रवर्ती की गति तीन है- स्वर्ग, नरक और मोक्ष। यदि वह तप करे तो मोक्ष या स्वर्ग प्राप्त करता है और यदि राजावस्था में ही मरते हैं तो नरक प्राप्त करता है | अर्धचक्रवर्ती नियम से राजावस्था में ही मरते हैं और नरक में ही जाते हैं। उन्हें तद्भव मोक्ष नहीं मिलता है। बलभद्र स्वर्ग या मोक्ष ही जाते हैं, अन्यत्र नहीं। किन्तु ध्यान रहे- ये सभी पदवीधारी आगे-पीछे मोक्ष अवश्य प्राप्त करते हैं। त्रेसठ शलाका के पुरुष, कुलकर, नारद, रुद्र, कामदेव, जिनमाता और जिनदेव- ये सभी शीघ्र मोक्ष प्राप्त करते हैं, अधिक भव धारण कर संसार में भ्रमण नहीं करते। कुलकर स्वर्ग ही जाते हैं। कामदेव काम का नाश कर ऊर्ध्वलोक ही जाते हैं तथा नारद एवं रुद्र अधोलोक ही जाते हैं और जन्मान्तर में मोक्ष प्राप्त करते हैं। तीर्थकर के पिता स्वर्ग या मोक्ष में जाते हैं और माता स्वर्ग प्राप्त कर शीघ्र मोक्ष में जाती है।
तिर्यञ्चगति के नौ दण्डकों को समझाते हुए कहा गया है कि पञ्चेन्द्रिय पशु मरकर चौबीसों दण्डकों में जा सकता है। विकलत्रय की गति और आगति- दोनों ही अग्रलिखित दस हैं:- 5 स्थावर, 3 विकलत्रय, मनुष्य और पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्च।
अंत में कहा गया है कि मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय, योग और और पंचेन्द्रिय के विषयभोगों का त्याग करने से संसार-परिभ्रमण दूर होता है। इस जीव ने जिनेन्द्र भगवान् द्वारा प्ररुपित मार्ग को नहीं समझकर ही चतुर्गतियों में भ्रमण किया है, अतः अब जिनमार्ग को हृदय में अवधारण कर भवोदधि से पार उतरना चाहिए।
‘चौबीस दण्डक’ की रचना का उद्देश्य उसके निम्नांकित छन्दों से भलीभांति समझा जा सकता है-
“जिनवाणी परकाश तैं, लहि निज आतमज्ञान।
दहिए गत्यागति सबै, गहिए पद निरवान।।
चौबीसों दण्डक तनी, गत्यागत्य सुनेह।
सुनकरि विरकत भाव धरि, चहुंगति पानी देह।।”
इस महान् उद्देश्य की ओर कवि ने 24 दण्डकों का विवेचन करते समय बीच-बीच में भी दो-तीन बार ध्यान आकर्षित किया है। यथा-
“गति आगति कही चौबीस, पंचेन्द्री पशु की जो ईश।
परमेश्वर को पन्थ गंहै, चौबीसों दण्डक नहिं लहै॥”
‘चौबीस दण्डक’ की भाषा ब्रज है जिसमें तत्सम शब्दों का प्रयोगबाहुल्य है और राजस्थानी बोली का भी पर्याप्त मिश्रण है, तथापि वह सरल, सशक्त और सुस्पष्ट है। कहीं-कहीं मुहावरों के सुष्ठु प्रयोग से अभिव्यक्ति में चार-चाँद लग गये हैं:-
“जिन भज सब परपंच तज, बड़ी बात है येह।”
पंच महाव्रत धार कैं, भवजल को जल देह॥"
इसप्रकार यह स्पष्ट है कि ‘चौबीस दण्डक’ रचना चतुर्गतियों के 24 दण्डकों का विवेचन करने वाली एक उत्तम रचना है। हिन्दी-साहित्य एवं जैन-साहित्य के अनुरागी पाठकों को मनोयोगपूर्वक इसका अध्ययन करना चाहिए।
यह कृति कुछ ही वर्षों पहले तक हर जिनवाणी-संग्रह में मिलती थी और खूब पढ़ी-पढाई जाती थी, किन्तु इन दिनों में इसका प्रचलन कम हो गया है, जो ठीक नही है। हमें इसका अध्ययन-अध्यापन करना चाहिए, ताकि जन्म-मरण के अभाव की गहरी प्रेरणा मिले ।