पं. दौलतराम कासलीवाल की एक महत्त्वपूर्ण कृति 'विवेक-विलास' | Pan Daulataram Kasalival Ki Ek Mahattvapurn Kriti Vivek Vilas

पं. दौलतराम कासलीवाल की एक महत्त्वपूर्ण कृति ‘विवेक-विलास’

-डॉ. वीरसागर जैन

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जैसे विद्वान् इतिहास-लेखक ने पं. दौलतराम कासलीवाल का उल्लेख आज से लगभग १०० वर्ष पूर्व ही कर दिया था और खड़ी बोली गद्य के विकास में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान भी स्वीकार किया था, किन्तु यह विडंबना ही है कि हिन्दी-साहित्य के पाठकों को अद्यावधि पं. दौलतराम कासलीवाल के जीवन एवं साहित्य के विषय में कोई प्रामाणिक परिचय प्राप्त नहीं है।

पं. दौलतराम कासलीवाल का जन्म वि.स. १७४९ में जयपुर स्टेट के बसवा नामक ग्राम में हुआ था, जो वर्तमान में भी बसवा नाम से ही जाना जाता है और राजस्थान के दौसा जिले में स्थित है। पं. दौलतराम के पितामह का नाम घासीराम और पिता का नाम आनन्दराम था। उनके दो भाई थे- बख्तावरलाल और निर्भयराम तथा ६ पुत्र थे- अजीतदास, शंभुनाथ, जादूराम, शीतलदास, जोधराज और गुलाबदास।

पं. दौलतराम जयपुर-नरेश राजा जयसिंह के अनुचर/मंत्री/वकील थे, जो उन्हीं के आदेश से मथुरा, उदयपुर और जयपुर में लम्बे-लम्बे समय तक रहे। उत्कृष्ट राजसेवा के लिए आप अनेक बार सम्मानित भी किए गए। उनका निधन भाद्रपद शुक्ला द्वितीया वि.सं. १८२९ में हुआ।

पं. दौलतराम को साहित्य-रचना की शिक्षा और प्रेरणा आगरा की ‘अध्यात्म सैली’ से प्राप्त हुई। उन्होंने अपने ७९वर्ष के जीवनकाल में निम्नलिखित २० रचनाएँ लिखी, जिनमें से १० गद्य हैं और १० पद्यः-

पद्य रचनाएँ

  1. क्रियाकोश
  2. जीवन्धरस्वामिचरित
  3. अध्यात्मबारहखड़ी
  4. विवेक-विलास
  5. श्रेणिकचरित
  6. श्रीपालचरित
  7. चौबीस दण्डक
  8. सिद्धपूजाष्टक
  9. चतुर-चितारणी
  10. सार-समुच्चय

गद्य रचनाएँ

  1. पुण्यास्रवकथाकोश-भाषा
  2. आदिपुराण-वचनिका
  3. पुरुषार्थसिद्ध्युपाय-भाषाटीका
  4. हरिवंशपुराण-वचनिका
  5. पद्मपुराण-वचनिका
  6. परमात्मप्रकाश-भाषा
  7. तत्त्वार्थसूत्र टव्वाटीका
  8. वसुनन्दि-श्रावकाचार-टव्वाटीका
  9. कार्तिकेयानुप्रेक्षा-टव्वाटीका
  10. समयसारकलश-टव्वाटीका इनमें से कतिपय रचनाएं अद्यावधि अप्रकाशित हैं ।

विशेष ध्यान देने की बात यह है कि दौलतराम राजदरबार से जुड़े हुए थे और उनका समय भी हिन्दी- साहित्य का रीतिकाल है, तथापि उनका साहित्य रीतिकालीन प्रवृत्तियों से बहुत दूर है। वह न तो किसी की चाटुकारिता के लिए लिखा गया है और ना ही नायक-नायिका के माध्यम से शृंगारादि का कुत्सित वर्णन करता है। पं. दौलतराम की साहित्य-साधना उनकी निःस्वार्थ परोपकार वृत्ति का परिणाम था। ये साहित्य के माध्यम से जनकल्याण का संकल्प पूर्ण कर रहे थे। जिस समय अन्य कविगण शृंगारादिपरक सतसइयाँ आदि लिख रहे थे, उसी समय ये जल में कमल की भाँति उससे निर्लिप्त रहकर जनकल्याणकारी साहित्य के लेखन में लीन थे। प्रस्तुत लेख में उनकी जिस ‘विवेक-विलास’ नामक कृति का परिचय दिया जा रहा है, वह उक्त कथन का प्रबल प्रमाण है।

‘विवेक-विलास’ की रचना पं. दौलतराम ने पौष शुक्ला तृतीया, गुरुवार, विक्रम संवत् 1827 में जयपुर में रहते हुए की थी, जैसा कि उसकी अंतिम ग्रन्थ-प्रशस्ति के निम्न वाक्य से स्पष्ट होता हैः-

“इति श्री विवेक विलास संपूर्ण । लिखी सवाई जैपुर में मिति पोस सुदी 3 व्रीसपतवार संवत् 1827 वांचे जीने श्री स्वद वंचना ।। श्री ।।”

‘विवेक-विलास’ में एक ही प्रवाह में लिखे गये 924 दोहे हैं। इनकी विषयवस्तु मुख्यतः भक्ति, नीति और अध्यात्म है। सम्पूर्ण कृति में विराग भाव तिल में तेल की भांति व्याप्त है, जो तत्कालीन युगधारा से सर्वथा विपरीत था। उस समय के कवि जनता को रागभाव की ओर प्रेरित कर रहे थे और पं. दौलतराम उससे अलग हटकर जनकल्याण की बात कर रहे थे। अपनी इस रचना में उन्होंने अनेक स्थलों पर काम भाव की कड़े शब्दों में निन्दा की है। यथा :-

"काम नाम ठग अति प्रबल, ता सम नांहि कुचील।
करे फैल वद फैल बहु, हरै जगत् को सील।।120।।

नहि विश्वासघाती अवर, मदन सारिखौ कोय।
रंचक भोग दिखाय खल, दे अनंत दुख सोय।।76।।"

‘विवेक-विलास’ की विषयवस्तु पूर्णतः आध्यात्मिक है जिसका अनुमान उसके इन 8 शीर्षकों द्वारा भली प्रकार लगाया जा सकता है:-

  1. निजधामवर्णन 2. ठगग्रामवर्णन 3. निजभवननिरूपण 4. भववनवर्णन
  2. भावसमुद्रवर्णन 6. भवसमुद्रवर्णन
  3. ज्ञानगिरिवर्णन 8. गर्वगिरिवर्णन
  4. निजगंगावर्णन 10. आशावैतरिणीविषनदीवर्णन
  5. भावसरोवरवर्णन 12. विभावसरवर्णन
  6. अध्यात्मवापिकावर्णन 14. विषयवापिकावर्णन
  7. रसकूपवर्णन 16. भवकूपवर्णन
  8. अंतरात्माज्ञानराजवर्णन 18. बहिरात्मदशावर्णन।

उक्त सभी को दो-दो के जोड़े बनाकर ही देखना चाहिए। उक्त सभी वर्णनों के प्रारंभ में एक सहेतुक मंगलाचरण है जिसमें इष्टस्मरण के साथ ही परोक्षतः वस्तुनिर्देश भी है और अन्त में एक लघु पुष्पिका-सी है जिसमें वर्णन-समाप्ति की सूचना और कवि का नाम है। इन सब वर्णनों की विषयवस्तु अति-संक्षेप में इस प्रकार है:-

  1. निजधामवर्णनः- निजधाम ही वास्तविक और उत्तम धाम है। दुनिया में अन्य कोई धाम निजधाम के समान श्रेष्ठ धाम नहीं है। निजधाम ही निजपुर है। निजपुर अभयपुर है। इस अभयपुर में चिद्रूप ही राजा है, सत्ता पटरानी है, अनन्तानन्त शक्तियाँ अन्तःपुर हैं, ज्ञान प्रधानमंत्री है, आनन्द पुरोहित है, अनन्तवीर्य सेनापति है और प्रबल आत्मस्वभाव ही कोतवाल है। निजधाम में शुद्ध परिणमनरूपी व्यापार होता है। निजधाम में कभी कोई चोरी-चारी नहीं होती। निजधाम में अनन्त अतीन्द्रिय सुख भरा हुआ है। निजधाम में ईति-भीति आदि किसी प्रकार का कोई दुःख नहीं है। क्षुधा, तृषा, जन्म जरा, मरण, मोह, काम, क्रोध, लोभ, माया, दुराचार, इष्टवियोग, अनिष्टसयोग, त्रिविध ताप, पाप आदि का भी निजधाम में अत्यन्त अभाव है। निजधाम में कोई भी रागी नहीं है, सभी वीतरागी हैं, कोई भी मूर्तिक नहीं है, सभी अमूर्तिक हैं।

निजधाम में एक सहजरस-जल से भरा हुआ सरोवर है जिसमें निरंतर शुद्धस्वभाव की तरंगें उठती रहती हैं, एक अमरवन है जिसमें शुद्धात्मानुभूतिरूपी सुन्दर सुगन्धित अनेक लताएँ हैं तथा एक स्थिरभावरूपी पर्वत है जो अचल और अति ऊँचा है। निजधाम का राजा चिदानन्द इन सरोवर, वन और पहाड़ों पर क्रीडाएँ करता रहता है। ऐसे निजधाम को अनन्त सिद्धों ने प्राप्त कर लिया है। वे सभी अनन्त सिद्ध अब अपने-अपने भावों की प्रजा सहित अविनाशी राज्य कर रहे हैं।

  1. ठगग्रामवर्णनः- निजधाम अभयपुर में पहुंचने में सबसे बड़ी बाधा ठगग्राम है। ठगग्राम में सबसे बड़ा ठग मोह या मिथ्यात्व है। वही सर्व ठगों का राजा है। ठगग्राम में राग और द्वेष नाम के दो अन्य बड़े ठग है, जिन्होंने मिलकर इस दुनिया के सभी प्राणियों को वश में कर रखा है, कोई विरले प्राणी ही इनकी पकड से बचकर निकल पाते है। इनके अतिरिक्त यहाँ काम, क्रोध, मान, कपट, लोभ, सोच (चिंता), भय, रोग, शोक आदि अनेक ठग हैं जो अपनी पत्नियों (क्रमशः रति, हिंसा, अहंता (अहंकार), कालिमा, तृष्णा, अरति, व्याकुलता, आधि-व्याधि, संतप्तता आदि) सहित इस सारे जगत् में छाये हुए हैं। ठगपति मोह के अनेक मंत्री हैं, यथा- अव्रत, असंयम, विकथावाद, विवाद, हर्ष, विषाद, प्रमाद आदि। इन ठगों से बचने के लिए सम्यक्त्व, विराग और संतभाव की प्राप्ति करना ही एकमात्र उपाय है।

  2. निजभवननिरूपण:- निजवन ही वास्तविक आनन्ददायी वन है। दुनिया में कोई दूसरा वन निजवन के समान हितकारी और उत्कृष्ट नहीं है। निजवन में शांतरसधारी चिद्रूप रमण करते हैं। निजवन में आत्मकलारूपी अनुपम कोयल है, ज्ञानीजीवरूपी अनुपम विहग है, अलिप्तभावरूपी प्रफुल्लित कमलों से युक्त समभावरूपी सरोवर है। निजवन में राक्षस, किरात, असुर, चोर, धूर्त, पाखण्डी, लुटेरे, भूत-पिशाच आदि कोई नहीं हैं। कोई अहितकारी विषवेल, विषवृक्ष या विषफल भी निजवन में नहीं है। निजवन बिल्कुल निष्कंटक है। निजवन में निर्मल निजरस से भरे हुए अनेक कूप और वापी हैं। विवेकियों के विलास के योग्य यह निजवन ही है, अन्य कुछ नहीं।

  3. भववननिरूपण:- घोर संसाररूपी जंगल ही भववन है। इस भववन के समान विषम, गहन, विरूप और अघरूप वन दुनिया में अन्य कोई नहीं है। भववन में मिथ्यात्व, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, दुराचार आदि रूपी अनेक भयानक लुटेरे, डाकू, चोर, निशावर आदि भरे हैं, विषय-वासना के विषैले जल से भरे अनेक जलाशय हैं, भ्रान्तिरूपी प्रबल मृगतृष्णा है, कठोरस्वभावरूपी महाकष्टकारी पर्वत हैं, मूर्खजीवरूपी अनेक हिरण हैं, अहंकार-ममकाररूपी शिकारी हैं, दुर्नयवादीजीवरूपी भूत हैं, अष्टमदरूपी अष्टापद हैं, अज्ञानरूपी अजगर हैं, मिथ्यात्वरूपी उल्लू हैं, शिथिलभावरूपी गैंडे हैं, अंधेरभावरूपी खरगोश हैं, बाधकभावरूपी बघेरे हैं, हठभावरूपी सुअर हैं और अविवेकभावरूपी अरण्यमहिष (जंगली भैंसे) हैं। भववन में मुनिराजरूपी उत्कृष्ट हंस, शुद्धात्मानुभूतिरूपी अमृतलता, शुद्धोपयोगरूपी घने अमृतवृक्ष, समरसजलभरपूर सरोवर, दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूपी सत्य मार्ग और संयम-तप-वैराग्य-संवर-निर्जरारूपी प्रबल योद्धाओं का नितान्त अभाव है। भववन में बड़ी विकराल अग्नि लगी हुई है जिसमें सारे जीव जल रहे हैं, परन्तु क्या करें- इस दावानल को बुझानेवाला शान्तरसरूपी नीर यहाँ अत्यन्त दुर्लभ है जो किसी विरले प्राणी को ही प्रबल आत्मपुरुषार्थ के द्वारा प्राप्त हो पाता है।

  4. भावसमुद्रवर्णनः- अनन्तभावों वाले चेतनसागर अथवा आत्मसरोवर का ही नाम भावसमुद्र है। इस भावसमुद्र में विमलभावरूपी जल है, परमानन्दरूपी अनन्त लहरें हैं, ज्ञान-दर्शनरूपी रत्न हैं, उज्ज्वलभावरूपी परमहंस हैं, मग्नभावरूपी किनारे हैं और निजानुभूतिरूपी अमृतलताएँ हैं। ऐसे भावसमुद्र में जडभावरूपी जलचर, मोह-मान-मदन-छलभावरूपी मगर, मिथ्यात्वभावरूपी कुपक्षी, जिह्वालोलुपरूपी मछलियाँ, निष्ठुरभावरूपी कछुआ, विवादभावरूपी मेंढक, तुच्छभावरूपी झींगुर, कालिमाभावरूपी कीट, जगभावरूपी जलसर्प, मलिनभावरूपी जलकाग, मद-मत्सरभावरूपी मच्छर, परपीड़ाकरभावरूपी डांस, राग-द्वेषरूपी विषवृक्ष, कृपणभावरूपी कौड़ी, मिथ्यात्वभावरूपी शंख, द्विविधारूपी सीप, वांछारूपी बड़वानल तथा शीत-ग्रीष्म-वर्षा, दिन-रात आदि का नितान्त अभाव है। वस्तुतः आतमभाव ही नगर है, आतमभाव ही समुद्र है और आतमभाव ही राजा है- “आतमभाव हि नगर है, आतमभाव पयोधि। आतमराम हि राव है, यह निजघट में सोधि।।308।।"

  5. भवसमुद्रवर्णनः- यह असार संसार ही भवसमुद्र है। दुनिया में इस भवसमुद्र के समान विरूप, विषैला और भयंकर समुद्र अन्य कोई नहीं है। इस भवसमुद्र में विषय-कषायरूपी अपार खारा पानी है जिससे भोगभावना की प्यास कभी नहीं बुझ पाती, मोहममतारूपी मल है, लम्पटभावरूपी मछलियाँ हैं, दुर्बुद्धिरूपी मेंढक हैं और निष्ठुरभावरूपी कछुवे हैं । भवसमुद्र के किनारे पर विषमभाव अर्थात् पापभावरूपी विषवृक्ष हैं। भवसमुद्र में आकुलतारूपी जल से भरी हुई आशा जैसी अनेक नदियाँ आकर मिलती हैं । इस भवसमुद्र में मात्र मरण ही मरण है, अमरफलों का तो नाम भी नहीं है। भवसमुद्र बहुत गम्भीर है, उसका कोई आदि, मध्य या अन्त नहीं है। भवसमुद्र में जगत् के सब प्राणी डूब रहे हैं, कोई विरले जीव ही उसमें से मुश्किल से निकल पाते हैं। भवसमुद्र में त्रिविधतापरूपी आग लगी हुई है। इस भवसमुद्र से तिरने के लिए मुनिव्रत या विरक्तभाव ही नाव है तथा जिनेन्द्र भगवान् और वीतराग गुरु ही नाविक हैं। जो जीव इस भवसमुद्र को पार कर लेता है, वही निजपुर में पहुंचकर आनन्द प्राप्त करता है। निर्वाण, मोक्ष, अभयपुर, भवपुर, शिवपुर- ये सभी निजपुर के नाम हैं।

  6. निजक्रीडागिरिनिरूपण:- निजानुभूति ही निजक्रीडा है तथा आत्मा के अचल-स्थिर भाव ही रम्य और उत्कृष्ट पहाड़ हैं। इस निजक्रीडागिरि पर अस्तिस्वभाव आदि अनन्त रत्न हैं, समरसरूपी सरोवर है, ज्ञान- ध्यानरूपी निर्धूम अग्नि प्रज्वलित है, कृपणता-अधमता-याचकतारूपी कंकरों का नितान्त अभाव है, सत्संगतिरूपी उत्तम वायु बहती है, आत्मानुभवरूपी अनेक कोयल कुहुक रही हैं तथा प्रमोदभावरूपी मयूर नाच रहे हैं। निजक्रीड़ागिरि की तलहटी है शुभाचार और शिखर है शान्त-सुधाभाव। ऐसे निजक्रीडागिरि पर अनेक महामुनीन्द्र शान्तस्वरूप विराज रहे हैं।

  7. गर्वगिरिवर्णनः- अभिमान अथवा मान कषाय का नाम ही गर्वगिरि है। इस गर्वगिरि के समान विषैला और नीच पहाड़ अन्य कोई नहीं है:- “नहीं मान गिरि सारिखौ, और विष गिरि कोय। महानीच यह गर्यगिरि नीचन को घर होय।।427।।” इस गर्वगिरि पर क्रोधादिरूपी सिंह है, विभावरूपी हिंसक पक्षी हैं, कायर व चंचलभावरूपी मृगादि पशु हैं, कठिन-कठोरस्वभावरूपी पत्थर है, क्रोधादिक कंटक हैं, भयानक पशु-पक्षियों का शोरगुल है, विषैले वृक्ष और फल हैं, मिथ्यासूत्ररूपी प्रबल वायु है, अशुभाचाररूपी राक्षस हैं, भ्रमरूपी भूत हैं और काम-क्रोधरूपी विकराल अग्नि है। अलिप्तभावरूपी कमल, भावरसज्ञ भ्रमर, मनभावरूपी मोर, ज्ञानामृतपरिपूर्ण नदी एवं अमृतफल यहाँ बिल्कुल नहीं हैं । यह गर्वगिरि निजपुर या शिवपुर से बहुत दूर है। मुनिवर इस गर्वगिरि को लाँघकर शीघ्र निजपुर पहुँचते हैं ।

  8. निजगंगावर्णनः- जिसमें नित्य निरन्तर निज निर्मल परिणतिरूपी धारा अखण्डरूप से बहती रहती है उस अविकार और अपार निज नदी के समान उत्तम नदी दुनिया में अन्य कोई नहीं है। इस निजगंगानदी के दो अदभुत तट हैं- एकता और अनेकता। निजगंगानदी अमूल्य रत्नों की खानि है और जन्म-मरणादि को हरकर परम-पवित्रता प्रदान करने वाली है। निजगंगा में पापरूपी पंक, रंकभावरूपी झींगर, विकल्परूपी वृश्चिक-मच्छ, जड़भावरूपी जलचर, मोहरूपी मगरमच्छ, मिथ्यामार्गी क्रूर कुपक्षी, कठोर भावरूपी कंकर, कुभावनारूपी कृमि, लोलुपतारूपी मीन, दुर्वादी दादुर, आशारूपी राक्षसी, वांछारूपी व्यंतरी, पापरूपी पिशाचिनी आदि का नितान्त अभाव है। इस अमूर्तिक निजगंगा में आत्माराम सदा रमण करता रहता है।

  9. आशावैतरणीविषनदीवर्णन :- विषयविकाररूपी हालाहल विष से भरी हुई आशानदी के समान भव-भव में दुःख देने वाली नदी विश्व में अन्य कोई नहीं है। इस आशानदी में तृषारूपी तरंगें हैं, कपटकालिमारूपी कामक्रोधरूपी धीवर हैं, मृत्युरूपी मगर है, कंदर्पादिरूपी सर्प हैं, राग-द्वेषरूपी मल हैं और संकल्प- विकल्परूपी दो विषम तट हैं और उन तटों पर भयानक विषवन है। आशानदी अभिलाषारूपी पहाड़ से निकलती है और चिन्तारूपी सागर में गिरती है, संसाररूपी वन में बहती है और शिवपुर की राह को रोकती है। आशानदी से पार उतारने वाली नाव मात्र अध्यात्मविद्या है, जिस पर बैठकर बहुत-से मुनिवर निजपुर या शिवपुर को पहुंच चुके हैं।

  10. भावसरोवरवर्णनः- भावसरोवर त्रिविधतापहर है, अशुचिताविनाशक है, परममनोहर है, रत्नराजों से भरपूर है, क्रीड़ा-योग्य है, अभयपुर के पास स्थित है अतः सर्वविध भयों से रहित है- अभयसरोवर है। भावसरोवर कभी सूखता नहीं। भावसरोवर का जल पीनेवाला कभी मरता नहीं। भावसरोवर में कर्मकलंकरूपी कीच नहीं है, काम-क्रोधमय काई नहीं है, मद-मत्सरभावरूपी विच्छ्र और मगर भी नहीं हैं। इसके विपरीत उसमें निर्मलभावरूपी तृप्तिप्रदायक जल हैं, निजलक्षणरूपी सुखदायी शाश्वत लक्ष्मी है, उज्ज्वलभावरूपी स्व-पर-विवेकी हंस हैं, चेतनभावरूपी चकवा है और निजशक्तिरूपी चकवी है। भावसरोवर के इन चकवा-चकवी का कभी वियोग नहीं होता, क्योंकि वहाँ भ्रान्तिरूपी रात्रि कभी नहीं होती। इस प्रकार भावसरोवर में सर्व तरह का आनन्द है और सर्वविध दुःख का नितान्त अभाव है।

  11. विभावसरवर्णनः- विभावसर के समान विषैला, विषम और मलिन सरोवर दुनिया में अन्य कोई सरोवर नहीं है। विभावसर पाप की पाल से बँधा हुआ है। उसमें कामरूपी कीच, अशुभकर्मरूपी विषवृक्ष, विषयबुद्धिरूपी विषलताएँ, पाखण्डी पुरुषरूपी बगुले, मिथ्यात्वरूपी मगरमच्छ, विभावरूपी व्यन्तर, लोभादिक लुटेरे और क्षुद्रभावरूपी ढेरों कंकर भरे पड़े हैं। कोई विरले जिनेन्द्र-भक्त मुनिराज ही इस विभावसर से पार उतर पाते हैं, अन्य सारे जीव तो इसी में अनन्त कष्ट भोग रहे हैं।

  12. अध्यात्मवापिकावर्णनः- अध्यात्म-अमृत से भरी हुई अध्यात्मवापिका इस विश्व की सर्वोत्तम वापिका है। यह अध्यात्मवापिका पापरूपी पंक, संशयरूपी शैवाल, व्याकुलतारूपी कीटाणुओं, मोहादिरूपी भूत-प्रेतों और भोगादि भुजंगों से बिल्कुल रहित है। अध्यात्मवापिका विविध ताप को दूर कर परमपवित्रता प्रदान करती हैं। अध्यात्मवापिका में प्रमाणरुपी अगणित सीढियाँ हैं, जिन पर अज्ञानी नहीं जा पाते। अध्यात्मवापिका के ऊपर अछेद्य-अभेद्य भावों रूपी अमृतवृक्षों की शीतल सघन छाया हो रही है। जो जीव इस अध्यात्मवापिका में स्नान करता है वह संसारताप का निवारण कर निर्वाणपद की प्राप्ति करता है।

  13. विषयवापीवर्णनः- भव-भव में मरण करानेवाला विषयविकार ही वास्तविक विष है और जिस बुद्धि या ज्ञान या जीव में यह विषयविकाररूपी विष पाया जाता है, वही विषयवापी है। इस विषयवापी में प्रबल कर्मकलंकरूपी कीचड है, सन्देहरूपी शैवाल है, चपल रसनेन्द्रियरूपी मीन हैं, कठोरभावरूपी कछुए है, न्यूनभावरूपी झीगर है, मत्सरभावरूपी मच्छर है और ममतारूपी खतरनाक विषवेलें छाई हुई हैं। यह विषयवापी मोहरूपी निशाचरों, पापरूपी पिशाचों, दोषरूपी दैत्यों, लोभरूपी लुटेरों और कपटरूपी ठगों का निवासस्थान बनी हुई है। विषयवापी में मनोज्ञता तो नाममात्र की भी नहीं है। विषयवापी के अन्दर हिंसक झूठे, चोर, व्यभिचारी, जुआरी, शिकारी आदि खोटे जीव ही जाते हैं, सदबुद्धि वाले तो उससे कोसों दूर रहते है। यह विकराल विषयवापी निजपुर से अत्यधिक दूर है। जो जीव वहाँ जाते हैं, वे उसमें डूबकर अनन्त कष्ट भोगते हैं तथा जो भव्यजीव विषय-कषायों से प्रीति छोड़कर निजपुर की राह पकड़ लेते हैं वे शीघ्र ही परमात्मपद प्राप्त करते हैं।

  14. रसकूपवर्णनः- परम-अमृतरस से भरपूर अमूर्तिक निजरूप ही वास्तविक रसकूप है। ज्ञान ही अनुपम परम-अमृत है, क्योंकि वही अमरता प्रदान करता है। यह रसकूप भ्रान्तिहर, शान्तिकर, तापहर और गुणभूप है। रसकूप में अद्भुत गुणरूप मणियाँ भरी हुई हैं। रसकूप में मुनिराज रमण करते हैं। रसकूप के किनारे एक चिद्यन आनन्दरूप सघन वन है, जहाँ का राजा चिद्रूप है। रसकूप में सुख की बातें तो अनन्त हैं, पर दुःख की बात एक भी नहीं है। इस रसकूप में अपनी सत्तारूपी रमा के साथ आत्माराम नित्य रमण करता है।

  15. भवकूपवर्णनः- भवकूप के समान विषैला, दुःख दायी, विरूप और अंधकारमय कूप इस विश्व में अन्य कोई नहीं है। भवकूप अविद्या और वासना की महादुर्गन्ध से भरा हुआ है। भवकूप में कुभावरूपी कीच है, लोभरूपी पिशाच है, विभ्रमरूपी भूत है, दोषरूपी दैत्य है, रागादिरूपी रजनीचर है, संशयरूपी शैवाल है, लोलुपतारूपी मीन है और कठोरतारूपी कछुए हैं। भवकूप में सभी प्रकार की अशुचिता है, शुचिता का तो नाम भी नहीं है। इस भवकूप से वही पुरुषार्थी निकल सकता है जो नय-प्रमाणरूपी पनघट और निश्चयनयरूपी रस्सी का आश्रय लेता है। जो पुरुषार्थी एक बार इस भवकूप से निकल जाता है वह पुनः लौटकर नहीं आता, वह सदा शाश्वतरूप से लोकशिखर पर पहुंचकर निजपुर में निवास करता है।

  16. अन्तरात्माज्ञानराजवर्णनः- अनन्त अज्ञानी जीव अनादि काल से संसार में भ्रमण कर रहे हैं। उनमें से कोई विरला जीव स्वतः या गुरूपदेश से अनादि-अज्ञान और मिथ्यात्व को छोड़कर सर्वज्ञ की श्रद्धा करता है तथा क्रोध-मान-माया-लोभ की प्रथम कषाय-चौकड़ी को मारकर सम्यक्त्व की प्राप्ति करता है। इसके बाद दो कषाय-चौकड़ी का नाश कर देशव्रत धारण करता है, तीन कषाय-चौकडी का नाश कर अप्रमत्त गुणस्थान की प्राप्ति कर क्षीणकषाय गुणस्थान तक पहुँचता है। यही अन्तरात्मा है। अन्तरात्मा इस विश्व का अनुपम राजा है। उसके समान समझदार और प्रसन्नचित्त राजा पूरे विश्व में अन्य कोई नहीं है। इस अन्तरात्मारूपी राजा के पास सुबुद्धिरूपी प्रवीण पटरानी है, सम्यक्त्वरूपी निश्चल गढ़ है, ज्ञानरूपी मंत्री है, विवेकरूपी गुरु हैं, धर्मरूपी पुरोहित है, दर्शन और चारित्ररूपी दो प्रतिष्ठित सरदार हैं, वीर्यरूपी सेनापति है, स्वविचाररूपी भंडारी है, संयम-तपादिरूपी सुभट है, अनन्तगुणरूपी सेना है, संवररूपी द्वारपाल है, ध्यानरूपी तलवार है, व्रतरूपी कवच है, शीलरूपी बाग है, धैर्यरूपी धनुष है, शुभाचाररूपी कोतवाल है, मूलोत्तर गुणरूपी प्रजा है, पावन पुण्यस्वभावरूपी प्रवीण चौकीदार है जो सदा स्वामी के अधीन रहकर पापभावों को रोकता है और वैराग्यरूपी हितकारी महामित्र है। इस प्रकार अन्तरात्मा रूपी राजा के पास सर्वसामग्री है जिससे वह मोह को मार कर विजयी हो जाता है, जीवनमुक्त दशा प्राप्त कर केवलज्ञानी बन जाता है। उसके दिव्य प्रवचनों की श्रद्धा कर कितने ही जीव साक्षात् या परम्परा से निजपुर की प्राप्ति करते हैं।

  17. बहिरात्मदशावर्णनः- बहिरात्मदशा एकान्ततः दोषरूप है। बहिरात्मा महामूढ होता है। वह बहिर्दृष्टिवाला रहता हुआ शरीर को ही आत्मा मानता है। बहिरात्मा के समान मूर्ख राजा इस विश्व में अन्य नहीं है। बहिरात्मारूपी राजा सदा कुबुद्धिरूपी कलहकारिणी, पापारंभप्ररूपिणी व घरविनाशिनी पटरानी के साथ रहता है और मोहराजा के फंदे में फंसकर पराधीनतापूर्वक घोर दुःख सहता है, उसका स्वयं का कहीं कोई वश नहीं चलता। बहिरात्मारूपी राजा का राज्य निश्चल नहीं है। उसे बार-बार नर, नरक, पशु, देव में जा-जाकर अपना राज्य बदलना पड़ता है। बहिरात्मारूपी राजा के कुभावरूपी कुटिल मंत्री है, मिथ्यात्वरूपी गुरु है, पापरूपी पुरोहित है, कायर-कृपण भावरूपी सेनापति है, प्रमादरूपी द्वारपाल है, जो अपराध को तो नहीं रोकता अपितु पुण्य को रोकता है, दुराचाररूपी कोतवाल है, शठभावरूपी सेठ है, कुव्यसनरूपी सेना है और विभावरूपी बस्ती है। बहिरात्मारूपी राजा के यहाँ सब लोग अपने-अपने स्वार्थ के हिसाब से चलते हैं, राजा के हिताहित की चिन्ता किसी को नहीं है। बहिरात्मारूपी राजा के निकटस्थ लोगों में आठ कर्म, चार कषायें और नौ नोकषायें हैं जो उसे भव-भव में अपार दुःख दे रहे हैं। बड़े भाग्योदय से किसी बहिरात्मा जीव को जय सद्‌गुरु का समागम प्राप्त होता है तब वह उनसे विनयपूर्वक अपने हित का उपाय पूछता है। सद्‌गुरु उसे करुणापूर्वक परमसत्य मार्ग दिखलाते हैं जिस पर चलकर वह बहिरात्मदशा छोड़ देता है और हेयोपादेय का सम्यक् विचार कर आत्मज्ञान की प्राप्ति कर लेता है।

इस प्रकार यह अत्यन्त स्पष्ट है कि विषयवस्तु की दृष्टि से ‘विवेक-विलास’ एक अत्यन्त प्रौढ़ और उत्तम कृति है, जिसे महाकवि पण्डित दौलतराम कासलीवाल ने अपने साहित्यिक जीवन के 50 वर्ष व्यतीत होने तथा आचार्यकल्प पण्डित टोडरमल जैसे मर्मवेत्ता विद्वान् के लगभग 15 वर्षों के निकट सान्निध्य के उपरान्त बनाया था। यही कारण है कि ‘विवेक-विलास’ मोक्षमार्ग में सर्वाधिक प्रयोजनभूत जिन-अध्यात्म को ही अनेक रूपकों के माध्यम से समझाने वाला एक परम आध्यात्मिक ग्रन्थ है जिसका स्वाध्याय प्रत्येक आत्मार्थी को पुनः पुनः अवश्य करना चाहिए।

‘विवेक-विलास’ काव्यसौन्दर्य की दृष्टि से भी एक उत्कृष्ट कृति है। विविध भावों का कलात्मक वर्णन इसकी अनूठी विशेषता है। रचना का प्रवाह भी देखते ही बनता है। प्रतिपादन में सरलता इतनी है कि अर्थ लगाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है। उदाहरणार्थ उपरि-उधृत छन्दों को भी देखा जा सकता है और निम्नोद्धृत छन्द में द्रष्टव्य है:-

“नहीं ब्रह्म विद्या जिसी, वापी अमृत रूप।
वापी मैं पापी नहीं, मोह पिसाच विरूप।।1669।।
अध्यातम-सो लोक में, अमृत और न कोय।
अध्यातम की वापिका, त्रिविध तापहर होय।।1670।।”

वस्तुतः 'विवेक-विलास एक उत्कृष्ट रूपक काव्य है, अतः उसमें विविध प्रतीकों, रूपकों का भी सुन्दर प्रयोग हुआ है, जिनमें वन, सरोवर, नदी, कूप, हंस आदि प्रमुख हैं। अतः रूपकों एवं प्रतीकों की दृष्टि से भी विवेक-विलास एक स्वतंत्रतया अध्ययन करने योग्य कृत्ति है।

‘विवेक-विलास’ में अनुप्रास, उपमा, श्लेष, यमक, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टान्त, उदाहरण, विरोधाभास आदि अनेक अलंकारों का भी सहज सुन्दर प्रयोग हुआ है। सांगरूपक को तो ‘विवेक-विलास’ का प्राण ही समझना चाहिए, क्योंकि उसके जैसे उदाहरण अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। प्रमाणस्वरूप दोहा संख्या 10 से 82 तक द्रष्टव्य है, जिनमें एक नगर का सांगरूपक विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया गया है। यहाँ केवल चार दोहे अवलोकनार्थ प्रस्तुत हैं:-

"पुर न अभैपुर सारिखौ, जहाँ काल भै नाहि।
निराकार निजरूप सौ, नृप घर नाहि कहांहि।।14।।

पुरपति निज चिद्रूप सौ, और न दूजो भूप।
पुरपति पटरानी महा, सत्तासीन सुरूप।।15।।

नहिं गम्भीर स्वभाव सी, खाई अति गम्भीर।
निश्चल अजित स्वभाव से, दुर्गपाल नहिं वीर।।22।।

द्वार न आतम ध्यान सौ, अध्यातम कौ सार।
निरव्रति रूप अनूप है, जग परव्रति के पार।।23।।

अन्य अलंकारों के कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं -

  1. अनुप्रास:- "परम पुरुष परवान ते, परम जान भगवान्।
    महादेव महिपाल ते, महाराज गुणवान ।।89।।

  2. श्लेष:- “निज दौलति विलसै महा, रमै सदा निज माहि।।66।।”

  3. रूपकः- "नहीं मोह निद्रा जिसी, दीरघ निद्रा कोई।।109।।

  4. विरोधाभासः- “वस्तु अरूप समान को, और न रूप अनूप ।।32।।”

  5. उदाहरण:- "जैसे चेतन राव सो, और न दूजो राव।

तैसे व्रत में सील सो, और न कोई कहाव।।104।।"

‘विवेक-विलास’ की भाषा ब्रजभाषा है, किन्तु उस पर राजस्थानी का भी प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। कहीं-कहीं उर्दू के भी शब्दों का प्रयोग हुआ है। यथाः- तहकीक, पासीगरा, उमराव, कोटवाल, पेसगार, पासवान, गरीब आदि। सारे ठाठ का बाराबार होना, जलांजलि देना आदि मुहावरों के प्रयोग से भी कथन में चार चाँद लग गये है।

‘विवेक-विलास’ का उद्देश्य है- अविवेक का नाश हो और विवेक प्रकट हो:-

"पढ़े सुनै अर सरदहै, इह जु विवेक विलास।
सो अविवेक निवारिकै, पावै निजपुर वास।।923।।

विवेक के विषय में कवि का कहना है कि हेय और उपादेय की निर्मल पहचान को ही ज्ञानीजन विवेक कहते हैं-

"हेय उपादेयानि की, जो विचार अविकार।
सो विवेक भासै बुधा, ता सम और न सार।।922।।

इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘विवेक-विलास’ हिन्दी काव्य की एक ऐसी अमूल्य निधि है जो न केवल रीतिकाल के अपितु समूचे हिन्दी साहित्य के मान में अपूर्व वृद्धि करती है। हमारा मानना है कि ‘विवेक-विलास’ की भाँति पं. दौलतराम की बीसों रचनाओं से हिन्दी पाठकों को परिचित होना चाहिए, ताकि रीतिकाल का समीचीन मूल्यांकन हो सके और कोई भी समालोचक उसे हेय या उपेक्षणीय कहने का साहस न कर सके।