पखवाड़ा भाषाटीका (तिथि षोडशी) | Pakhwada Bhashatika (Tithi Shodashi)

पखवाड़ा भाषाटीका (तिथि षोडशी)

दोहा

वानी एक नमो सदा। एक दरव आकाश।
एक धर्म अधर्म दरव। पड़िवा शुद्धिप्रकाश॥

चौपाई

दोज दुभेद सिद्ध संसार, संसारी त्रस थावर धार।
स्व-पर दया दोनों मन धरो,राग दोष तजि समता करो।२॥
तीज त्रिपात्र दान नित भजो, तीन काल सामायिक सजो।
व्यय उत्पाद ध्रौव्य पद साध, मन वच तन थिर होय समाध।३
चौथ चार विधि दान विचार, चारधो आराधना संभार।
मैत्री आदि भावना चार, चार वंधसो भिन्न निहार॥४॥

पांचें पंच लब्धि लहि जीव, भज परमेष्ठी पंच सदीव।
पांच भेद स्वाध्याय वखान, पांचों पैंताले पहचान॥५॥

छठ छ लेश्याके परिनाम, पूजा आदि करो षट् काम।
पुद्गलके जानो षट् भेद, छहों काल लखिकै सुख वेद॥६॥

सातें सात नरकतें डरो, सातों खेत धन जन सो भरो।
सातों नय समझो गुणवंत, सात सत्त्व सरधा करि संत॥७॥

आठें आठ दरसके अंग, ज्ञान आठ विधि गहो अभंग।
आठ भेद पूजा जिनराय, आठ योग कीजै मन लाय॥८॥

नौमी शील वाड़ि नौ पाल, प्रायश्चित नौ भेद समाल।
नौ क्षायिक गुण मनमें राख,नौ कषाय की तज अभिलाख॥९॥
दशमी दश पुद्गल परजाय, दशों वध हर चेतन राय।
जनमत दश अतिशयजिनराज,दशविध परिग्रहसोक्या काज १०
ग्यारस ग्यारह भाव समाज, सव अहमिंदर ग्यारह राज।
ग्यारह लोक सुर लोक मझार,ग्यारह अंग पढ़ै मुनि सार॥११॥
बारस बारह विधि उपयोग, बारह प्रकृति दोषका रोग।
बारह चक्रवर्ति लख लेहु, बारह अविरतको तजि देहु॥१२॥
तेरस तेरह श्रावक थान, तेरह भेद मनुष पहचान।
तेरह राग प्रकृति सव निंद, तेरह भाव अयोग जिनन्द॥१३॥
चौदश चौदह पूरव जान, चौदश वाहिज अंग वखान।
चौदह अन्तर परिग्रह डार, चौदह जीवसमास विचार॥१४॥
मावस सम पन्द्रह परमाद, करम भूमि पंदरह अनाद।
पंच शरीर पंदरह रूप, पंदरह प्रकृति हरै मुनि भूप॥१५॥

पूरनमासी सोलह ध्यान, सोलह स्वर्ग कहे भगवान्।
सोलह कषाय राहु घटाय,सोलह कला सम भावना भाय॥१६॥
सब चर्चाकी चर्चा एक, आतम आतम पर पर टेक।
लाख कोटि ग्रन्थनको सार,भेदज्ञान अरु दया विचार॥१७॥

गुण विलास सब तिथि कही, है परमारथ रूप।
पढ़ैं सुनैं जो मन धरैं, उपजै ज्ञान अनूप॥


Artist: कविवर द्यानतराय
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३७७ से ३७८

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