नित उठ ध्याऊं, गुण गाऊं, परम दिगम्बर साधु ।
महाव्रतधारी-२, महाव्रतधारी ।।टेक ।।
रागद्वेष नहीं लेश जिन्हों के मन में है, मन में हैं ।
कनककामिनी मोह काम नहीं, तन में है, तन में हैं ।
परिग्रह रहित निरारंभी, ज्ञानी व ध्यानी तपसी,
नमों हितकारी- कारी , नमों हितकारी ।।१ ।।
शीतकाल सरिता के तट पर, जो रहते, जो रहते ।
ग्रीष्मऋतु गिरिराज शिखर चढ़ अघ दहते, अघ दहते ।
तरूतल रहकर वर्षा में, विचलित ना होते लखभय,
वन अंधियारी, भारी वन अंधियारी ।।२ ।।
कंचन काँच मसान महल सम, जिनके है जिनके हैं ।
अरि अपमान मान मित्र सम, तिनके है तिनके हैं ।
समदर्शी समता धारी, नग्न दिगम्बर मुनिवर,
भवजल तारी- तारी, भवजल तारी ।।३ ।।
ऐसे परम तपोनिधि जहाँ-जहाँ, जाते हैं जाते हैं ।
परम शांति सुख लाभ जीव सब, पाते हैं पाते हैं ।
भव-भव में `सौभाग्य’ मिले, गुरू पद पूजूं ध्याऊं,
वरूं शिवनारी- नारी, वरूं शिवनारी ।।४ ।।
Artist: श्री सौभाग्यमल जी