तर्ज : रे जीव तू अपना स्वरूप…
भव-भोगों की तो कामना अति दूर ही रहो।
नहीं मुक्ति की भी कामना सम्यक् ज्ञानी को हो।।
निष्काम मुक्त रूप निज को अनुभवते सदा ।
निर्मान ज्ञान रूप निज में वर्तते सदा।। 1।।
निर्द्वन्द्व पर से भिन्न, निज में ही मगन रहें।
धनि ज्ञान-ज्ञाता-ज्ञेय तीनों ही अभिन्न हैं।।
परिग्रह प्रपंच कुछ नहीं, निर्ग्रन्थ हैं सहज ।
आनन्दमय जीवन अहो, निःशल्य हैं सहज ।। 2 ।।
अध्रुव की चिन्ता क्या ? सहज भजते सदा ध्रुव पद।
चैतन्य पद से भिन्न सब ही भासते अपद।।
जानें निःकेवल आत्मा, निर्मूढ़ हैं अहो।
न्यारा झलके सब लोक, निज में तृप्त हैं अहो ।। 3 ।।
वर्ते समाधि रूप, ना विकल्प हो कोई।
निष्पाप सहज रूप, प्रगट दोष ना कोई ।।
पावन सहज सदा रहें, वे धन्य आत्मा।
होवें सहज ज्ञातार, परम मुक्त आत्मा।। 4।।
उनको नमन करते, सहज निज भाव में नमूँ।
निश्चिंत उपादेय, शुद्धातम हूँ अनुभवँ ।।
चैतन्य रस में लीन, नित संतुष्ट मैं रहूँ।
निर्भेद जाननहार, जाननहार ही रहूँ ।। 5।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह