नहीं कुछ भी मुझे करना, सहज निष्काम ज्ञायक हूँ ।। टेक ॥
नहीं सुनना-सुनाना कुछ नहीं पढ़ना- पढ़ाना कुछ।
नहीं लखना–लखाना कुछ, सदा निष्काम चेतन हूँ ।। 1।।
नहीं लेना- नहीं देना, नहीं करना - कराना कुछ।
नहीं चिन्ता- नहीं चिन्तन, सदा निष्क्रिय चेतन हूँ ।। 2 ।।
स्वयं में पूर्ण पारिणामिक, नहीं कुछ भी कमी दीखे ।
अपेक्षा कुछ नहीं पर से, सहज सुखकन्द चेतन हूँ ।। 3 ।।
नहीं निंदा से कुछ हानि, लाभ कुछ ना प्रशंसा से ।
नहीं हानि-नहीं वृद्धि, अगुरुलघु रूप चेतन हूँ ।। 4 ।।
नहीं अच्छा-बुरा कोई, नहीं रिपु - मित्र भी कोई ।
सदा पर से रहूँ न्यारा, स्वयं में पूर्ण चेतन हूँ।। 5 ।।
नहीं स्वामी कोई मेरा, किसी का मैं भी नहीं स्वामी।
नहीं कर्त्ता, नहीं भोक्ता, सहज ही तृप्त चेतन हूँ ।। 6 ।।
द्रव्य षट् तत्त्व नौ न्यारे, भाव पाँचों सदा न्यारे ।
नहीं उत्पाद-व्यय मुझमें, प्रभु ध्रुव रूप चेतन हूँ ।। 7 ।।
नहीं आधि नहीं व्याधि, उपाधि कुछ नहीं मुझमें ।
अहो! शाश्वत समाधिमय, निरंजन नित्य चेतन हूँ ।। 8 ।।
नहीं जाना मुझे तीरथ, तीर्थ शुद्धात्मा मैं हूँ ।
किसे पूजूँ, किसे ध्याऊँ, सहज ही पूज्य चेतन हूँ ।। 9 ।।
नहीं व्रत शील तप संयम, समिति गुप्ति और दशलक्षण ।
नहीं रत्नत्रय चाहूँ, प्रभु परिपूर्ण चेतन हूँ ।। 10 ।।
नहीं अब धर्म करना है, धर्म मुझसे सहज प्रगटे ।
अहो ! चिन्मय परमधर्मी, धर्म की खान चेतन हूँ ।। 11।।
नहीं संसार हरना है, नहीं मुक्ति को करना है।
नहीं श्रद्धा, नहीं ध्यान, ध्येय श्रद्धेय चेतन हूँ ।। 12।।
अरे! करना तो मरना है, अनादर प्रभु का है इसमें ।
दिखे अन्तर में प्रभु मेरा, स्वयं सिद्ध रूप चेतन हूँ ।। 13 ।।
रचियता - आदरणीय बाल ब्रह्मचारी पंडित श्री रवीन्द्र जी आत्मन्
Source - सहज पाठ संग्रह