निर्विकल्प-भावना | Nirvikalp-Bhavana

दोहा

निर्विकल्प मम तत्त्व है, निर्विकल्प हुई दृष्टि ।
निर्विकल्प आनंदमय, आज दिखे सब सृष्टि ।। 1।।

परिवर्तनमय जगत् में, ध्रुव ज्ञायक ही सार।
अध्रुव की चिंता नहीं, मैं तो ध्रुव अविकार।। 2।।

तुमको ज्ञायक देखकर, निज ज्ञायक सुधि आय।
यही भावना आप सम, स्थिरता प्रगटाय।। 3।।

आता-जाता कुछ नहीं, किंचित् हो न विकार।
स्वयं सिद्ध चैतन्य प्रभु, अन्तर माँहि निहार।। 4।।

ज्यों निर्मल है स्फटिक, सहज स्वभाव हि जान।
निरुपराग निरुपाधि प्रभु, आत्मा त्यों पहिचान।। 5।।

सहज तृप्त भगवान् निज दृष्टि माँहि जब आय।
सर्व विकल्प विलय हुए, सहज तृप्ति प्रकटाय ।। 6।।

अहो ! प्रभो आदर्श हो, निज प्रभुता दर्शाय।
आत्म लीन होकर प्रभो, मुक्तिमार्ग प्रकटाय।। 7।।

सहज पूर्ण प्रभु हूँ स्वयं, अहो स्वयं भगवान्।
परमानंद प्रकट हुआ, प्रगट्यो सम्यग्ज्ञान।। 8।।

हूँ परिपूर्ण सदा प्रभु, भ्रम से पामर मान।
भ्रमत अनादि से फिर्यो, भयो न निज का भान।।9।।

धन्य घड़ी मैंने लखा, निज ज्ञायक भगवान्।
ज्ञानमूर्ति शुद्धात्मा, गुण अनंत की खान।। 10।।

तृप्तिमय सागर अहो, उछले अपरम्पार।
हुआ निमग्न सु सहज ही, उपजे हर्ष अपार।। 11।।

चाह दाह प्रभु मिट गई, चिन्ता सर्व पलाय।
चैतन्य चिन्तामणि लखो, आनंद उर न समाय।। 12।।

एक अखण्डित ज्ञानमय, चिन्मूरति भगवान्।
जाके आश्रय पूर्वक, सहज होय निर्वाण।। 13।।

वंद्य अरु वंद्यक भाव भी, अहो नहीं उपजाय।
एक रूप चैतन्य प्रभु, द्वैत नजर नहीं आय।। 14।।

दृष्टि में बस एक है, ज्ञायक प्रभु अभिराम।
अहो! लीनता हो स्वयं, सहज पूर्ण निष्काम।। 15।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह