निर्ग्रन्थता की दीक्षा का उत्सव हो आनन्दमय।
निर्ग्रन्थरूप चित्स्वरूप सहज आनन्दमय।।
स्वाभाविक आनन्दमय, निरपेक्ष आनन्दमय।। टेक।।
स्वाधीन ज्ञायक भाव है, अतीन्द्रिय आनन्दमय।
अविनाशी आनन्दमय, उत्कृष्ट आनन्दमय।।
है अगुरुलघु भगवान्, नित्य ज्ञान आनन्दमय।। 1।।
जब ही अनुभव रस चाख्यो, कुछ नहिं और सुहावे।
चैतन्य स्वरूप ही, अपना मोहि सार दिखावे।।
परिग्रह का बोझा छूटे, हो मुनिधर्म मंगलमय।। 2।।
नहीं विषयों की कुछ आशा, आरम्भ रहित हो जीवन।
उपजे ही नहीं कषायें, निष्पाप शुद्ध हो जीवन।।
उपसर्गों में भी सदा रहे, परिणाम समतामय।। 3।।
निशल्य हो, निर्द्वन्द्व हो, ध्याऊँ मैं शुद्धातम।
जितेन्द्रिय बनूँ, भाऊँ अविरल सहज परमातम।।
आराधना चिद्रूप की हो, परम मंगलमय।। 4।।
ज्ञाता हूँ, ज्ञाता ही रहूँ, नहीं क्षोभ उर आवे।
निज में निज रस पीते-पीते, नित तृप्ति रहावे।।
भव-बन्धन झड़ जावे सब ही, मुक्ति पद हो अक्षय।। 5।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह