निक्षेप-विमर्श | Nikshep Vimarsh

निक्षेप-विमर्श

-प्रो. वीरसागर जैन

जैन न्याय के दो अंग प्रसिद्ध हैं- प्रमाण और नय, जैसा कि स्पष्ट कहा गया है- ‘प्रमाणनयात्मको न्यायः’, अतः निक्षेप की चर्चा अन्यत्र तो क्या, जैन-न्याय-ग्रन्थों में भी प्रायः नहीं हुई है । परीक्षामुख, न्यायदीपिका आदि किसी भी प्राथमिक ग्रन्थ में निक्षेप की चर्चा देखने को नहीं मिलती ।

यदि कदाचित् किसी प्रश्नकर्ता ने पूछा भी कि निक्षेप की चर्चा क्यों नहीं की जा रही है तो उसे उत्तर दिया गया कि निक्षेप नयों में गर्भित हो जाते हैं, अतः उनकी पृथक् चर्चा आवश्यक नहीं है ।

यह बात एक अपेक्षा से सत्य भी है, किन्तु विस्तारबुद्धि जीवों को स्पष्ट बोध कराने के लिए निक्षेप की पृथक् से चर्चा करना अत्यन्त आवश्यक है ।

अथवा- वास्तव में देखा जाए तो निक्षेप नय नहीं हैं और नयों में गर्भित भी नहीं होते हैं, वे नय से पृथक् ही वस्तु हैं, अतः उन्हें पृथक् से ही भलीभांति समझना आवश्यक है ।

यही कारण है कि यतिवृषभ, वीरसेन, अकलंक आदि अनेक आचार्यों ने निक्षेप की चर्चा पृथक् से प्रस्तुत की है । आचार्य अकलंक ने तो विशेष रूप से ही एक न्याय-ग्रन्थ लिखा है, जिसका नाम है- लघीयस्त्रय । इसमें उन्होंने तीन लघु प्रकरणों की रचना की है- 1. प्रमाण-प्रवेश, 2. नय-प्रवेश, 3. निक्षेप-प्रवेश । इससे स्पष्ट ज्ञात होता है कि ये तीनों पृथक्-पृथक् हैं और समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं । तथा इस आधार पर हम कह सकते हैं कि वास्तव में देखा जाए तो जैन-न्याय के तीन अंग हैं- प्रमाण, नय और निक्षेप ।

इस प्रकार जैन न्याय के तीन अंग होने पर भी निक्षेप की चर्चा प्रायः उपेक्षित रहती है, अतः आज हम इसी विषय को संक्षेप में समझने का प्रयास करते हैं । निक्षेप की यह चर्चा सभी को सरलतापूर्वक समझ में आ सके, अतः प्रश्नोत्तर-शैली का आश्रय लेना विशेष लाभप्रद रहेगा ।

प्रश्न-1. निक्षेप किसे कहते हैं ?

उत्तर- ‘निक्षेप’ शब्द ‘नि’ उपसर्ग पूर्वक ‘क्षिप्’ धातु से बना है । इसका अर्थ है- निश्चित अर्थ में क्षेपण करना, फेंकना, आरोपित करना, न्यास करना, व्यवहार करना आदि । तात्पर्य यह हुआ कि जो शब्दों को विभिन्न अर्थों में क्षेपित करते हुए उसके एक निश्चित अर्थ का अवधारण कराता है, उसे निक्षेप कहते हैं | ‘तत्त्वार्थवार्तिक’ में आचार्य अकलंक देव ने निक्षेप की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है- “न्यसनं न्यस्यते इति वा न्यासो निक्षेप इत्यर्थः ।” आचार्य देवसेन ने भी निक्षेप के सम्बन्ध में ऐसा ही कहा है कि- "वस्तु नामादिषु क्षिपति निक्षेपः ।”

प्रश्न-2. निक्षेप को न्यास क्यों कहते हैं ?

उत्तर- निक्षेप, न्यास, आरोप, व्यवहार, उपाय आदि सब एकार्थक हैं | निक्षेप या न्यास शब्द का सरल अर्थ होता है- रखना, जैसे कि हम सब बोलते हैं- शिलान्यास, अंकन्यास, आदाननिक्षेपण आदि |

प्रश्न-3. निक्षेप की आवश्यकता, उद्देश्य या प्रयोजन क्या है ?

उत्तर- अप्रकृत अर्थ का निवारण करके प्रकृत अर्थ का ग्रहण कराने के लिए निक्षेप का कथन किया गया है | यदि निक्षेप नहीं कहे जाएँगे तो अप्रकृत अर्थ का निवारण और प्रकृत अर्थ का ग्रहण नहीं होगा तथा संशय का निवारण भी नहीं होगा | ‘धवला’ में आचार्य वीरसेन स्वामी ने बहुत अच्छा कहा है-

“अवगयणिवारटुं पयदस्स परूवणाणिमित्तं च |
संशयविणासणटुं तच्चत्थवधारणटुं च || - धवला 1/1/15

अर्थ- अप्रकृत का निराकरण करने के लिए, प्रकृत की प्ररूपणा करने के लिए, संशय का विनाश करने के लिए और तत्त्वार्थ के अवधारण के लिए निक्षेप का कथन किया गया है ।

आचार्य पूज्यपादस्वामी कहते हैं- निक्षेपविधिना शब्दार्थः प्रस्तीर्यते | -सर्वार्थसिद्धि 1/5

अर्थप्रकाशिका, परिच्छेद 4, पृष्ठ 55 पर भी लिखते हैं कि- “तत्त्वों की स्थापना में व्यवहार का व्यभिचार दूर करने के लिए स्थापनादि चार निक्षेप कहे ।”

निक्षेप का वर्णन ‘तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक’ में 62 पृष्ठों में विस्तारपूर्वक आया है | वहाँ उत्थानिका में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात लिखी है | यथा- कुछ लोग केवल नामरूप वस्तु मानते हैं, कुछ लोग केवल स्थापनारूप वस्तु मानते हैं, कुछ लोग केवल द्रव्यरूप वस्तु मानते हैं, कुछ लोग केवल भावरूप वस्तु मानते हैं, अतः उनका निराकरण करके लोक-समय-व्यवहार की समीचीन प्रसिद्धि हेतु निक्षेप को कहते हैं ।

निक्षेप का सन्देश है कि एक भाव ही असली होता है, शेष सब नकली और व्यर्थ हैं -ऐसा आग्रह मत करो | सर्वत्र विवक्षा समझो और आगे बढो, विवाद में मत उलझो |

प्रश्न-4. यदि निक्षेप को नहीं माना जाए तो क्या हानि है ?

उत्तर- यदि निक्षेप को नहीं माना जाए तो क्या हानि है -इसे समझने के लिए हमें निम्नलिखित कथनों पर गम्भीरता से चिन्तन करना होगा-

१. निक्षेपविस्पृष्टः सिद्धान्तो वर्ण्यमानो वक्तुः श्रोतुश्चोत्थानं कुर्यादिति वा | - धवला
अर्थ- निक्षेप-रहित वर्णन वक्ता और श्रोता दोनों को कुमार्ग पर ले जा सकता है |

२. जो ण पमाणणएहिं णिक्खेवेण णिरक्खदे अट्ठं ।
तस्साजुत्तं जुत्तं जुत्तमजुत्तं च पडिहादि || -तिलोयपण्णत्ति, 82

३. जो निक्षेपपूर्वक तत्त्व को भाते हैं, वे ही तथ्य तत्त्व को प्राप्त करते हैं, भटकते नहीं हैं । - आचार्य देवसेन, नयचक्र, 281

दरअसल निक्षेप को न मानने से बहुत बड़ी अव्यवस्था होगी, सारा लोकव्यवहार बाधित या मिथ्या सिद्ध होगा | मन्दिर में पूजा तक में कही गई बहुत सारी बातें झूठी सिद्ध होंगी | ये भगवान् हैं, ये इन्द्र हैं, ये पुष्प हैं, इत्यादि |

तथा किसी भी विषय या ग्रन्थ को समझने के लिए उसकी सर्वप्रथम उसकी भाषा-शैली समझना अनिवार्य होता है, अन्यथा समीचीन अर्थबोध नहीं हो सकता | निक्षेप की यही सबसे बड़ी उपयोगिता है |

प्रश्न-5. निक्षेप का प्रथम वर्णन कहाँ आया है ?

उत्तर- नयों की भांति निक्षेप का भी प्रथम वर्णन मुख्यतः ‘तत्त्वार्थसूत्र’ से ही प्रारम्भ होता है | प्रमाण-नय-निक्षेपात्मक न्याय की चर्चा के मूल उद्गमस्रोत वास्तव में ‘तत्त्वार्थसूत्र’ के निम्नलिखित दो सूत्र ही हैं-

नामस्थापनाद्रव्यभावतस्तन्यासः | -तत्त्वार्थसूत्र, 1/5

प्रमाणनयैरधिगमः । -तत्त्वार्थसूत्र, 1/6

किन्तु जिसप्रकार प्रमाण-नय की चर्चा अत्यन्त प्राचीन भी सिद्ध होती है, उसके उल्लेख अन्य ग्रन्थों या वेदों तक में पाए जाते हैं, उसीप्रकार निक्षेप की चर्चा भी अत्यन्त प्राचीन भी सिद्ध होती है |

प्रश्न-6. तत्त्वार्थसूत्र में तो निक्षेप की चर्चा पहले आई है और प्रमाण-नय की उसके बाद, किन्तु हम लोग आज ‘प्रमाण-नय-निक्षेप’ -इसप्रकार से प्रमाण-नय को पहले और निक्षेप को बाद में क्यों बोलते हैं ?

उत्तर- बहुत अच्छा प्रश्न है । प्रमाण-नय की चर्चा न्यायविद्या में प्रधानता से सर्वत्र चलती है, अतः उसे पहले बोला जाता है अथवा उसके अन्य भी कुछ कारण हैं, किन्तु तत्त्वार्थसूत्र में जो निक्षेप की चर्चा पहले आई है, उसका कारण यह प्रतीत होता है कि निक्षेपपूर्वक ही प्रमाण-नय का जन्म होता है । पहले निक्षेप के द्वारा अप्रकृत वस्तु का निराकरण करके प्रकृत वस्तु का ग्रहण किया जाता है और उसके बाद ही उस प्रकृत वस्तु पर प्रमाण-नय घटित किये जाते हैं ।

प्रश्न-7. प्रमाण, नय और निक्षेप में क्या अन्तर है ?

उत्तर- प्रमाण, नय और निक्षेप में अन्तर बताते हुए तिलोयपण्णत्ति, प्रथम अधिकार, गाथा 83 में इस प्रकार कहा है कि-

णाणं होदि पमाणं णओ वि णादुस्स हिदयभावत्थो ।
णिक्खेवो वि उवाओ जुत्तीए अत्थपडिगहणं ।। -तिलोयपण्णत्ति, 1/83

अर्थ- ज्ञान प्रमाण है, ज्ञानी के हृदय का भाव नय है और उसे समझने का उपाय निक्षेप है । इन तीनों को ही युक्ति (न्याय/परीक्षा) कहते हैं, इसी से अर्थ का प्रतिग्रहण होता है ।

प्रश्न-8. नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव -ये चार नय भी हैं और निक्षेप भी; इनमें क्या अंतर है ?

उत्तर- नय तो विषय करनेवाला ज्ञान है, किंतु निक्षेप उस ज्ञान का विषय है ।

प्रश्न-9. नय और निक्षेप में क्या अन्तर हुआ, फिर से स्पष्ट कीजिए ।

उत्तर- दरअसल, निक्षेप विषय है और नय विषयी अर्थात् विषय करनेवाला है ।

प्रश्न-10. समझ में नहीं आया, निक्षेप वस्तु है या ज्ञान ?

उत्तर-11. ज्ञानात्मक वस्तु है । अतः इसे वस्तु में भी गिनते हैं और ज्ञान में भी ।

दरअसल वस्तु तीन प्रकार की कही गई हैं- शब्दात्मक, अर्थात्मक और ज्ञानात्मक । निक्षेप शब्दात्मक और ज्ञानात्मक वस्तुओं का नाम है ।

विचारणीय है कि स्थापना क्या है- मूर्ति या अपना ज्ञान ? इससे सिद्ध होता है कि निक्षेप ज्ञानात्मक वस्तु है । (पदिट्ठा बुद्धिवाचको); ठवणासद्दो बुद्धिवचओ (स्थापना शब्द बुद्धिवाचक है) -धवला, खंड 5, पृष्ठ 6

प्रश्न-12. क्या निक्षेप ज्ञानात्मक वस्तु ही है या शब्दात्मक वस्तु भी है ?

उत्तर- जिसप्रकार नय, आगम आदि दो प्रकार के माने गये हैं- ज्ञानात्मक भी और शब्दात्मक भी, उसीप्रकार निक्षेप भी दो प्रकार के माने गये हैं- ज्ञानात्मक भी और शब्दात्मक भी ।

प्रश्न-13. शब्दात्मक निक्षेप कैसा होता है ?

उत्तर- वह अक्षरात्मक, चित्रात्मक या शब्दात्मक होता है । जैसे- ‘हिमालय’ ऐसा शब्द या नक्शे का हिमालय ।

प्रश्न-14. निक्षेप के कितने भेद होते हैं ?

उत्तर- निक्षेप के भेद अनेक प्रकार से किये गये हैं । सामान्य से निक्षेप एक ही प्रकार का होता है । द्रव्य और पर्याय के भेद से निक्षेप दो प्रकार का होता है । नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव के भेद से निक्षेप चार प्रकार का होता है । नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के भेद से निक्षेप छह प्रकार का होता है । निक्षेप के अन्य भी संख्यात, असंख्यात एवं अनन्त भेद हो सकते हैं, जिन्हें सामान्य अपेक्षा से नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव -इन्हीं चार में गर्भित कह सकते हैं और भेदविवक्षा से स्पष्ट बोधार्थ पृथक् भी कह सकते हैं । -तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, भाग २, पृष्ठ १४६

प्रश्न-15. निक्षेप के वे अन्य भेद कौन से हो सकते हैं, कुछ बताइए ?

उत्तर- भगवती आराधना, गोम्मटसार, मूलाचार, तत्त्वार्थवार्तिक आदि अनेक ग्रन्थों में सत्य के दस भेद कहे हैं- जनपद, सम्मति, स्थापना, नाम, रूप, प्रतीति, संभावना, व्यवहार, भाव, उपमा । ये सब मुझे एक प्रकार से निक्षेप ही प्रतीत होते हैं, यदि कुछ भूल हो तो विद्वज्जन सुधार करें । इनका स्वरूप संक्षेप में इस प्रकार है-

जो शब्द जिस देश में जिस अर्थ में प्रचलित है, उसे उसी अर्थ में समझना जनपद सत्य है | जैसे- ‘मीठा’ शब्द का अर्थ राजस्थान में मीठा होता है और गुजरात में नमक | जिस शब्द का जो अर्थ बहुत लोगों द्वारा सम्मत, स्वीकृत हो उसे सम्मति सत्य कहते हैं | जैसे- राजा की पटरानी या किसी स्त्री विशेष को ‘देवी’ कहना | एक वस्तु में अन्य वस्तु की स्थापना करके कहना स्थापना सत्य है | जैसे- मूर्ति को ‘भगवान्’ कहना | मात्र व्यवहार के लिए किसी भी वस्तु की कोई संज्ञा रखना नाम सत्य है | जैसे- यह ‘जिनदत्त’ है | वस्तु को उसके अन्य गुणों को गौण करके मात्र रूप की मुख्यता से कहना रूप सत्य है | जैसे- यह गोरा है, यह सफेदा है, यह हरियाली है, आदि | अन्य वस्तु की अपेक्षा से छोटा, बड़ा आदि कहना प्रतीति सत्य है | जैसे- यह भारी है या यह हल्का है | इस सत्य का दूसरा नाम आपेक्षिक सत्य भी है | लोकव्यवहार की मुख्यता से कथन करना व्यवहार सत्य है | जैसे- आटा पीस रहा हूँ अथवा यह घट मेरा है | संभावना की मुख्यता से कथन करना सम्भावना सत्य है | जैसे- इन्द्र जंबूद्वीप को पलट सकता है | भावों की मुख्यता से कथन करना भाव सत्य है | जैसे- यह वस्तु अब प्रासुक हो गई है | किसी अन्य पदार्थ की समानता की मुख्यता से कथन करना उपमा सत्य है | जैसे- यह तो चन्द्रमा है | (-गोम्मटसार जीवकांड, गाथा 222 )

प्रश्न-16. निक्षेप के असंख्य-अनन्त भेद हो सकते हैं, फिर भी चार ही क्यों कहे जाते हैं ?

उत्तर- असंख्य-अनन्त भेदों को कहा नहीं जा सकता | तथा वे सभी सामान्य अपेक्षा से नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव -इन चार में गर्भित हो जाते हैं | अतः चार ही मुख्य रूप से कहे जाते हैं | यही आचार्य विद्यानंद स्वामी ने भी कहा है | यथा-
नन्वनंतः पदार्थानां निक्षेपो वाच्य इत्यसन् |
नामादिष्वेव तस्यान्तर्भावात्संक्षेपरूपतः || -तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, 2/1/5/71

प्रश्न-17. नाम निक्षेप किसे कहते हैं ?

उत्तर- तत्त्वार्थसूत्र की टीका ‘सर्वार्थसिद्धि’ में नाम निक्षेप का लक्षण इस प्रकार आया है-
अतद्गुणे वस्तुनि संव्यवहारार्थं पुरुषकारान्नियोज्यमानं संज्ञाकर्म नाम | -सर्वार्थसिद्धि 1/5

अर्थात् गुण की अपेक्षा रखे बिना, संव्यवहार के लिए, अपनी इच्छा से वस्तु की संज्ञा रखना नाम निक्षेप है | नाम निक्षेप में गुणों की अपेक्षा नहीं होती है, वह स्वेच्छाधारित ही होता है, परन्तु उसमें भी भावना तो अच्छी हो सकती है नाम रखने वाले की । जैसे कि ज्ञानचंद ज्ञानी हो -यह आवश्यक नहीं है, पर नाम रखनेवाले माता-पिता की भावना तो उसे ज्ञानी बनाने की होती है ।

प्रश्न-18. क्या नाम निक्षेप में वैसे गुण नहीं हो सकते ?

उत्तर- हो भी सकते हैं, पर उन गुणों के कारण नाम नहीं रखा जाता है । यदि गुणों के कारण ही वैसा नाम कहें तो वह भाव निक्षेप कहलाएगा । जैसे- तीर्थंकर, नर्तक, पुजारी, धनीराम । यद्यपि यदि उसका संव्यवहार नाम की तरह लोक में चलता हो तो वह नाम निक्षेप ही है ।

प्रश्न-19. स्थापना निक्षेप किसे कहते हैं ?

उत्तर- तत्त्वार्थसूत्र की टीका ‘सर्वार्थसिद्धि’ में स्थापना निक्षेप का लक्षण इस प्रकार आया है-

काष्ठपुस्तचित्रकर्माक्षनिक्षेपादिषु सोऽयमिति स्थाप्यमाना स्थापना । -सर्वार्थसिद्धि 1/5

अर्थात् काष्ठकर्म, पुस्तकर्म, चित्रकर्म और अक्षनिक्षेपादि में ‘यह वह है’ -ऐसा स्थापित करने को स्थापना निक्षेप कहते हैं । जैसे कि किसी मूर्ति, चित्र या गोटी आदि को ‘यह महावीर है’ -ऐसा कहना स्थापना निक्षेप है । स्थापना को धारणा, प्रतिष्ठा आदि भी कहते हैं ।

प्रश्न-20. स्थापना निक्षेप के कितने भेद हैं ?

उत्तर- स्थापना निक्षेप के दो भेद हैं- तदाकार स्थापना और अतदाकार स्थापना । इन्हें क्रमशः साकार स्थापना और अनाकार स्थापना अथवा सद्भाव स्थापना और असद्भाव स्थापना भी कहते हैं । उसी आकार में की गई स्थापना को तदाकार स्थापना कहते हैं और उस आकार के बिना ही की गई स्थापना को अतदाकार स्थापना कहते हैं । जैसे कि राजा के आकार वाली मूर्ति या चित्र में की गई स्थापना तदाकार स्थापना है और उस आकार के बिना ही शतरंज की गोटी आदि में की गई राजा की स्थापना अतदाकार स्थापना है ।

अतदाकार स्थापना में परोपदेश की आवश्यकता होती है, जैसा कि आचार्य विद्यानन्द स्वामी ने ‘तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक’ में कहा है-

मुख्याकारशून्या वस्तुमात्रा पुनरसद्भावस्थापना परोपदेशादेव तत्र सोऽति संप्रत्ययात् ।

प्रश्न-21. क्या सजीव वस्तु में भी राजा, मुनिराज या देवादि की स्थापना हो सकती है ?
उत्तर- नहीं, क्योंकि इससे संव्यवहार खराब होता है | कल्पना कीजिए- क्या किसी मुनि या गृहस्थ को स्थापना-कुन्दकुन्द बनाकर पूज सकते हैं ? नहीं | क्या किसी जीवित व्यक्ति को स्थापना-नेता बनाकर जला सकते हैं ? नहीं ।

प्रश्न-22. तो फिर पंचकल्याणक आदि के अवसर पर मनुष्यों में इन्द्र आदि की स्थापना कैसे करते हैं ? क्या वह स्थापना निक्षेप नहीं है ?
उत्तर- नहीं, वह केवल नाम निक्षेप है | अथवा- वह केवल नाटक, अनुकृति या अनुकरण मात्र है | यही कारण है कि उसमें सबको बनाते हैं, पर ऋषभदेव को नहीं बनाते | यदि जीवित व्यक्ति में स्थापना हो सकती होती तो ऋषभदेव भी बनाते |

प्रश्न-23. लोग तो उसे स्थापना ही समझते हैं, तभी तो नाटक के राम, इन्द्र आदि की पूजा करने लगते हैं ?
उत्तर- नहीं करना चाहिए, वह अज्ञानता है अथवा बचपना है |

प्रश्न-24. क्या कलेण्डर का चित्र स्थापना-महावीर है ?
उत्तर- देखिए, स्थापना के विषय में जैन आचार्यों ने एक विशेष संविधान भी बनाया है, जिसे प्रतिष्ठाशास्त्र भी कहते हैं | स्थापना निक्षेप सम्बन्धी ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर के लिए उसका भी पर्याप्त ज्ञान अपेक्षित है | स्थापना निक्षेप के सामान्य सिद्धान्त की अपेक्षा तो कलेण्डर का चित्र भी स्थापना-महावीर ही है, किन्तु जैन प्रतिष्ठाशास्त्र के अनुसार उसे स्थापना-महावीर नहीं कहते, क्योंकि ऐसा मानने से संव्यवहार खराब होता है ।

प्रश्न-25. क्या अप्रतिष्ठित मूर्ति स्थापना-महावीर है ?
उत्तर- फिर वही बात आ गई | स्थापना निक्षेप के सामान्य सिद्धान्त की अपेक्षा तो अप्रतिष्ठित मूर्ति भी स्थापना-महावीर है, किन्तु जैन प्रतिष्ठाशास्त्र के अनुसार उसे स्थापना-महावीर नहीं कहते, क्योंकि ऐसा मानने से संव्यवहार खराब होता है |

प्रश्न-26. क्या मोबाईल फोन, श्यामपट्ट, स्लेट या कागज पर बनी हुई फोटो या लिप्यात्मक महावीर को स्थापना-महावीर कह सकते हैं ?
उत्तर- यह भी वैसी ही बात है | स्थापना निक्षेप के सामान्य सिद्धान्त की अपेक्षा तो मोबाईल फोन, श्यामपट्ट, स्लेट या कागज पर बनी हुई फोटो या लिप्यात्मक महावीर को स्थापना-महावीर कह सकते हैं, किन्तु जैन प्रतिष्ठाशास्त्र के स्वीकृत संविधान के अनुसार उन्हें स्थापना-महावीर नहीं कह सकते, क्योंकि ऐसा मानने से संव्यवहार खराब होता है |

प्रश्न-27. क्या स्थापनारूप पुष्प, फल आदि के समर्पण का भी वही फल मिलता है, जो वास्तविक पुष्प, फल आदि के समर्पण का मिलता है ?
उत्तर- जिनशासन स्याद्वादरूप है | एक अपेक्षा से देखा जाए तो स्थापनारूप पुष्प, फल आदि के समर्पण का भी वही फल मिलता है, जो वास्तविक पुष्प, फल आदि के समर्पण का मिलता है | जैसे कि आटे के मुर्गे की बलि देने का भी वही फल मिला, जो वास्तविक मुर्गे की बलि देने का मिलता |

किन्तु यदि सर्वथा वही फल मिलता हो तो हिंसाभीरू श्रावक चावल आदि में उनकी स्थापना क्यों करे ? वास्तविक ही क्यों न चढाए ? इससे ज्ञात होता है कि सर्वथा वही फल नहीं मिलता है ।

इस प्रश्न के उत्तर के लिए भी वस्तुतः जैन प्रतिष्ठाशास्त्र का ज्ञान अपेक्षित है | उसमें जैन आचार्यों ने स्थापना निक्षेप की ऐसी बातों पर बहुत विस्तार से चर्चा की है ।

प्रश्न-28. क्या चावल या लोंग में भगवान् की स्थापना हो सकती है, जैसा कि कुछ लोग ठोने में करते हैं ?
उत्तर- इस प्रश्न के उत्तर के लिए भी जैन प्रतिष्ठाशास्त्र का ज्ञान अपेक्षित है, जिसमें जैन आचार्यों ने स्थापना निक्षेप के विविध नियम-उपनियम निर्धारित किये हैं | स्थापना निक्षेप के सामान्य सिद्धान्त की अपेक्षा से तो चावल या लोंग में भी भगवान् की स्थापना हो सकती है, जिसे अतदाकार स्थापना कहेंगे | किन्तु जैन प्रतिष्ठाशास्त्र के अनुसार, जहाँ तक मैं जानता हूँ, ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि इससे संव्यवहार खराब होता है | पंडित सदासुखदासजी ने भी रत्नकरंड-श्रावकाचार-वचनिका में इसका निषेध किया है ।

तथापि मैं यहाँ यह विशेष कहना चाहता हूँ कि यदि कोई ऐसा करता हो तो विवाद न करें, क्योंकि वे पूजा के अन्त में उसका विसर्जन भी कर देते हैं, अतः दोष नहीं प्रतीत होता है। आचार्य वीरसेन स्वामी ने ‘जयधवला’ में ऐसे विषयों में एकान्ताग्रह नहीं करने का उपदेश दिया है, क्योंकि उससे दुर्नय का प्रसंग उपस्थित होता है। यथा-

ण एसो वि एयंतग्गहो कायव्वो, एयंतवहारणस्स सव्वहा दुण्णत्तपसंगादो। -जयधवला

प्रश्न-29. क्या एक बार स्थापना करने के बाद उसका विसर्जन भी किया जा सकता है ?

उत्तर- क्यों नहीं, जब स्थापना की जा सकती है तो उस स्थापना का विसर्जन भी किया जा सकता है। सब हमारी मान्यता पर ही तो आधारित है। यही कारण है कि स्थापना दो प्रकार की भी कही गई है- नित्य और अल्पकालिक।

प्रश्न-30. कागज के पुष्प को क्या कहेंगे- नामपुष्प, स्थापनापुष्प, द्रव्यपुष्प या भावपुष्प ?

उत्तर- चार निक्षेपों में से उसे स्थापना निक्षेप ही कहेंगे, क्योंकि वह चित्रात्मक/शिल्पात्मक पुष्प है। नाम मात्र नहीं है, भावी योग्यता धारण करने रूप द्रव्य भी नहीं है और भाव भी नहीं है।

प्रश्न-31. किसी के हाथों को पुष्प कहना क्या है- नामपुष्प, स्थापनापुष्प, द्रव्यपुष्प या भावपुष्प ?

उत्तर- इसे भी चार निक्षेपों में से स्थापना निक्षेप ही कहेंगे, क्योंकि हाथों में पुष्प की स्थापना की गई है। अथवा- इसे हम उपमानिक्षेप मानकर उपमापुष्प भी कह सकते हैं, जैसा कि ऊपर प्रश्न-15 के उत्तर में सत्य के दस भेद बताते हुए कहा था।

प्रश्न-32. किसी मिठाई आदि भोज्य वस्तुओं में ‘यह मछली है’ या ‘यह तितली है’ -ऐसी कल्पना करने को क्या कहेंगे ?

उत्तर- यह भी स्थापना निक्षेप ही है और इसलिए ऐसी वस्तुओं को खाने में मछली या तितली को खाने का ही दोष लगता है। स्थापना निक्षेप को समझने से हमें यह भी बड़ा लाभ होता है कि हम लोग जीवन में जाने-अनजाने में ऐसा जो घोर पाप करते रहते हैं, उससे बच जाते हैं। हमें समझ में आता है कि चित्रात्मक जीवों के साथ किया गया दुर्व्यवहार भी हिंसा ही है, पापबन्ध का कारण ही है।

प्रश्न-33. द्रव्य निक्षेप किसे कहते हैं ?
उत्तर- तत्त्वार्थसूत्र की टीका ‘तत्त्वार्थवार्तिक’ में द्रव्य निक्षेप का लक्षण इस प्रकार आया है-
यद्भाविपरिणामप्राप्तिं प्रति योग्यतामादधानं तद्द्रव्यमित्युच्यते | -1/5/3
अर्थात् भावी योग्यता को धारण करनेवाले को अभी वैसा कहना द्रव्य निक्षेप है | जैसे कि राजकुमार को राजा कहना अथवा भगवान् बननेवाली पाषाणशिला को ही भगवान् कहना |

प्रश्न-34. द्रव्य निक्षेप के कितने भेद हैं ?
उत्तर- उनकी चर्चा बाद में अलग से करेंगे, क्योंकि अभी उसे करने से विषय कठिन हो जाएगा |

प्रश्न-35. भाव निक्षेप किसे कहते हैं ?
उत्तर- तत्त्वार्थसूत्र की टीका ‘तत्त्वार्थवार्तिक’ में भाव निक्षेप का लक्षण इस प्रकार आया है-
वर्तमानतत्पर्यायोपलक्षितं द्रव्यं भावः | -1/5/8
अर्थात् वर्तमान में उस पर्याय से सहित होनेवाले को ही वैसा कहना भाव निक्षेप है | जैसे कि- वर्तमान में राज करते हुए व्यक्ति को ही राजा कहना |

प्रश्न-36. भाव निक्षेप के कितने भेद हैं ?
उत्तर- उनकी भी चर्चा बाद में अलग से करेंगे, क्योंकि अभी उसे करने से विषय कठिन हो जाएगा
|

प्रश्न-37. क्या क्षेत्र निक्षेप एवं काल निक्षेप भी कुछ होते हैं, उनका क्या स्वरूप है ?
उत्तर- हाँ, क्षेत्र निक्षेप एवं काल निक्षेप की भी शास्त्रों में चर्चा आई है | षट्खंडागम में तो स्थान-स्थान पर 6 निक्षेप ही बताये गये हैं- नाम, स्थापना, द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव | परन्तु इनमें से क्षेत्र निक्षेप और काल निक्षेप का क्या स्वरूप है -यह मुझे ज्ञात नहीं हो सका है | तथापि मेरी समझ से इनका स्वरूप कुछ ऐसा हो सकता है- जैसे कि क्षेत्र की मुख्यता से वस्तु का कथन करना क्षेत्र निक्षेप है | जैसे कि- बनारसी मिठाई या बनारसी साड़ी | तथा काल की मुख्यता से वस्तु का कथन करना काल निक्षेप है | जैसे कि- बरसाती मच्छर या बरसाती बुखार | यदि इसमें कुछ भूल हो तो विद्वज्जन सुधार करें |

प्रश्न-38. नाम निक्षेप को सर्वप्रथम क्यों कहा गया है ?

उत्तर- नाम निक्षेप को सर्वप्रथम इसलिए रखा गया है, क्योंकि वही सारे व्यवहार का मूल आधार है | नाम के बाद ही अन्य कुछ बात होती है | लोक में प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक भवन, प्रत्येक क्रिया आदि का नाम है | नाम के बाद ही उसका परिचय, विश्लेषण आदि सम्भव होता है । यही कारण है कि ‘न्यायदीपिका’ में भी प्रकरण-प्रवृत्ति हेतु सर्वप्रथम उसका नाम बताना अनिवार्य कहा है | यथा- ‘नाममात्रकथनमुद्देशः’ - न्यायदीपिका, 1/3

प्रश्न-39. नाम निक्षेप और स्थापना निक्षेप में क्या अंतर है ?

उत्तर- नाम निक्षेप मात्र सम्बोधन आदि रूप व्यवहार का हेतु होता है, किन्तु स्थापना निक्षेप में उसके पूज्यत्व आदि का भी व्यवहार होता है | जैसा कि आचार्य अकलंकदेव ने भी तत्त्वार्थवार्तिक 1/5/13 में स्पष्ट किया है | यथा- नामस्थापनयोरेकत्वं संज्ञाकर्माविशेषादिति चेत्, न, आदरानुग्रहाकांक्षित्वात् स्थापनायाम् … यथार्हदिन्द्रस्कंदेश्वरादिप्रतिमासु आदरानुग्रहाकांक्षित्वं जनस्य, न तथा परिभाषते वर्तते । ततोऽन्यत्वमनयोः | अर्थात् यद्यपि नाम और स्थापना दोनों में संज्ञा रखी जाती है, बिना नाम रखे स्थापना नहीं हो सकती, तो भी स्थापित अरिहंत, इन्द्र, स्कन्द और ईश्वर आदि की प्रतिमाओं में मनुष्य को जिस प्रकार पूजा, आदर और अनुग्रह की अभिलाषा होती है, वैसी नाम में नहीं होती |

प्रश्न-40. नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव-इन चारों निक्षेपों को एक ही उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट कीजिए |

उत्तर- बहुत सरल है, क्योंकि सभी वस्तुएं निक्षेप की दृष्टि से चार प्रकार की होती हैं | जैसे कि- राजा भी चार प्रकार का है- नाम राजा, स्थापना राजा, द्रव्य राजा और भाव राजा | इसी प्रकार प्रत्येक वस्तु चार प्रकार की है- घट, पट, मनुष्य, देव आदि सब | ‘आलाप-पद्धति’ में ‘जिन’ पर चारों निक्षेप इस प्रकार घटित किए हैं | यथा-

णामजिणा जिणणामा ठवणजिणा जिणिंदपडिमाओ |
दव्वजिणा जिणजीवा भावजिणा समवसरणत्था || अर्थात् जिन नाम की वस्तु या व्यक्ति नामजिन है, जिनेन्द्र की प्रतिमा स्थापनाजिन है, भविष्य में जिन बनने वाले जीव द्रव्यजिन हैं और समवशरण में विराजमान जिन भावजिन हैं ।

इसी प्रकार अनेक वस्तुओं पर चारों निक्षेप घटित करने का अभ्यास करना चाहिए ।

प्रश्न-41. किन्तु प्रतीत होता है कि एक भावनिक्षेप में ही अर्थक्रियाकारित्व है, अन्य तीन निक्षेपों में अर्थक्रियाकारित्व नहीं है ?

उत्तर- नहीं, ऐसा नहीं है, अन्य तीन निक्षेपों में भी अर्थक्रियाकारित्व है । यथा- नाम निक्षेप में अर्थक्रियाकारित्व है, क्योंकि उससे सारा लोक-व्यवहार होता देखा जाता है । स्थापना निक्षेप में भी अर्थक्रियाकारित्व है, क्योंकि जिनबिम्ब से सम्यग्दर्शन तक होता देखा जाता है । द्रव्य निक्षेप में भी अर्थक्रियाकारित्व है, क्योंकि घृत के लिए दुग्ध का ग्रहण होता देखा जाता है ।

यदि नाम निक्षेप को न माना जाए तो वाच्य-वाचक के सर्व व्यवहार का अभाव हो जाएगा । यदि स्थापना निक्षेप को न माना जाए तो मूर्तिदर्शन, राजकीय मुद्रा का व्यवहार, सभापतित्व आदि के सर्व व्यवहार का अभाव हो जाएगा । यदि द्रव्य निक्षेप को न माना जाए तो घृत के लिए दुग्ध, मूर्ति के लिए पाषाण, पलंग के लिए लकड़ी आदि के ग्रहण का जो व्यवहार देखा जाता है, उस सबका अभाव हो जाएगा । -तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, भाग २, पृष्ठ १६३

प्रश्न-42. प्रमाण और नय की भांति क्या निक्षेप भी दो प्रकार का होता है- सम्यक् एवं मिथ्या ?

उत्तर- हाँ, जो संव्यवहार का हेतु है, वह सम्यक् निक्षेप है और जो उसे खराब करता है अथवा जो निक्षेप नहीं है पर निक्षेप जैसा लगता है, वह मिथ्या निक्षेप है, निक्षेपाभास है ।