निज पद की भावना | Nij Pad ki Bhavana

शुद्धातम हूँ आप निहारो, कर्मादिक को भिन्न विचारो।
पर का दोष लखो मत भाई, निज अज्ञान ही है दुखदाई॥1॥

‘जड़ तन मैं हूँ’ जिसे दिखाता, पर द्रव्यों से जोड़े नाता।
सब ही अपना उसे दिखाता, इष्ट-अनिष्ट कल्पना लाता॥2॥

होवे मिथ्या मोह कषायें, व्यर्थ जगत् में वे भरमायें।
क्षण-क्षण कर्म बन्ध हो भारी, पावें दुर्गति अति दुखकारी॥3॥

महाभाग्य जिनशासन पावें, जिन उपदेश हृदय में लावें।
तत्त्वज्ञान हो मंगलकारी, हो रत्नत्रय धर्म का धारी॥4॥

भेदज्ञान को भावे पल-पल, होवे नहीं कभी वह आकुल।
निर्विकल्प हो निजपद ध्यावे, परमातम खुद ही बन जावे॥5॥

सम्यक् श्रद्धा-ज्ञान सु करना, साम्यभावमय चारित धरना।
मार्ग परम निर्ग्रन्थ रूप है, ध्रुव आतम तो चित्स्वरूप है॥6॥


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह