तर्ज : अपनी सुधि भूल आप…
धन्य-धन्य अपनी सुधि पाई आनंद भयो,
अस्थिरता वश ऐसी भावना जगाई है।
भावना विकल्प रूप मेरो स्वरूप नाहीं,
निर्विकल्प पूर्ण प्रभु, दीखे सदा ही है।। टेक।।
निज में मगन होऊँ, बाहर नगन होऊँ,
अंतर में मंगल हो, जंगल गवाही हो।
आत्मीक वैभव में मग्न रहूँ आठों याम,
देह दशा माहीं भी उदासी ही छाई हो।। अस्थिरता. ।।1।।
जगत् से निरपेक्ष ध्याऊँ स्वभाव निज,
आत्मीक आनंद की, धारा-प्रवाही हो।
चाहे जो परिस्थिति, उदय भी हो चाहे जो,
सहज ज्ञानधारा ही वर्ते सदा ही हो।। अस्थिरता. ।।2।।
ज्ञायक में अहंपना, ज्ञेयों में समता हो,
किंचित् न मोह-क्षोभ रूप विकलताई हो।
ज्ञायक ही सहज ज्ञेय होवे अभेदपने,
अपनी निधि अपने में सहजपने पाई हो।। अस्थिरता. ।।3।।
सहज तृप्त, सहज पूर्ण, निर्विकल्प अनुभव हो,
पक्ष भेद की भी नहीं, कल्पना रहाई हो।
वांछा न मुक्ति की भी, सहज मुक्त जीवन हो,
धन्य-धन्य साधु दशा, सहजपने आई हो।। अस्थिरता. ।।4।।
ध्येय रूप का ही ध्यान, चिन्ता निरोध जहाँ,
वैभाविक परिणति न देती दिखाई हो।
प्रगटे अरहन्त दशा कैवल्य लक्ष्मी हो,
अविनाशी अनुपम निज प्रभुता प्रगटाई हो।।अस्थिरता.।।5।।
योग का निरोध होवे, देह का वियोग होवे,
कर्मों की सेना समूल ही भगाई हो।
व्यवहारे सिद्धालय, निश्चय से ज्ञानालय,
होवे निवास ध्रुव, अचल गति पाई हो।।अस्थिरता.।।6।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह