नयचक्र (श्री माइल्ल धवल), आलापपद्धति सहित | Nayachakra (Mailla Dhavala)

नयचक्र (श्री माइल्ल धवल), आलापपद्धति सहित

रचयिता: श्री माइल्ल धवल
सम्पादन एवं अनुवाद: सिद्धान्ताचार्य पं॰ कैलाशचन्द्र शास्त्री
प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ (मूर्तिदेवी ग्रन्थमाला, प्राकृत ग्रन्थांक १२)
संस्करण: प्रथम, १९७१

द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र: द्रव्य, गुण, पर्याय और नयों का विवेचन। साथ में आचार्य देवसेन कृत आलापपद्धति (अनुवाद सहित) और आचार्य विद्यानन्द कृत नयविवरण।

Nayachakra (Dravyasvabhavaprakashak) of Mailla Dhavala on dravya, gun, paryay and the nayas, with Alappaddhati of Acharya Devsen and the Nayavivaran of Acharya Vidyanand, edited and translated by Pt. Kailashchandra Shastri.


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF):


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हर गाथा अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

श्री-माइल्लधवल-कृत द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र (भाग 1/3)

दव्वा विस्ससहावा लोयागासे सुसंठिया जेहिं ।
दिट्ठा तियालविसया वंदेहं ते जिणे सिद्धे ॥१॥

अर्थ: लोकाकाशमे सम्यक् रूपसे स्थित विश्वस्वरूप त्रिकालवर्ती द्रव्योको जिन्होने देखा उन जिनों और सिद्धोको मै नमस्कार करता हूँ ॥१॥


जं जह’ जिणेहिं दिट्ठं जैह दिट्ठं सव्वदव्वसब्भावं ।
पुव्वावरअविरुद्धं तं तह संखेवदो वोच्छं ॥ २ ॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने जो सब द्रव्योका सद्भाव जैसा देखा और पूर्वापरविरोध रहित जैसा कहा वह वैसा ही मै सक्षेपसे कहूँगा ॥ २ ॥


जीवा पुग्गलकालो धम्माधम्मा तहेव आयासं ।
णियणियसहावजुत्ता दट्ठव्वा णयपमाणणयणेहिं ॥३॥

अर्थ: अपने-अपने स्वभावसे युक्त जीव पुद्गल, काल, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य तथा आकाशको नय और प्रमाणरूपी आंखोसे देखना चाहिए ॥ ३ ॥


तच्चं तह परमट्ठे दव्वसहावं तहेव परमपरं ।
धेयं सुद्धं परमं एयट्ठा हूँ 'ति अभिहाणा ॥४॥

अर्थ: तत्त्व, परमार्थ, द्रव्यस्वभाव, पर अपर ध्येय, शुद्ध, परम, ये सब एकार्थवाची हैं ॥ ४ ॥


एंदेहि तिविहलोगं णिप्पण्णं खलु णहेण तमलोयं ।
तेणेदे परमट्ठा भणिया सब्भावदरसीहि ॥५॥

ते पुण कारणभूदा लोयं कज्जं वियाण णिच्छयदो ।
अण्णो को वि ण भणिओ तेसि इह कारणं कज्जं ॥६॥

अर्थ (गाथा 5 से 6): इन्हीं छहों द्रव्योंसे तीनों लोक बने हुए हैं । तथा आकाश द्रव्यसे अलोक बना हुआ है । इसीसे सर्वदर्शी जिनेन्द्रदेवने इन्हें परम अर्थ कहा है । वे सब द्रव्य कारणरूप हैं और लोक उनका कार्य है । निश्चय नयसे न तो उनका कोई अन्य कारण ही है और न कार्य ही है ॥ ५-६ ॥


'अवरोप्परं विमिस्सा तह अण्णोण्णावगासदा णिच्चं ।
संता वि एयखेत्ते ण परसहावे हि गच्छंति ॥७॥

अर्थ: वे सब द्रव्य परस्पर मे मिले-जुले हुए है और एक-दूसरेको अवकाश दिये हुए है । तथा सदा एक क्षेत्रमे रहते है, फिर भी अपने-अपने स्वभावको छोडकर अन्य स्वभावरूप नही होते ॥ ७ ॥


गुणपज्जाया दवियं काया पंचत्थि सत्त तच्चाणि ।
अण्णे वि णव पयत्था पमाण णय तह य णिक्खेवं ॥८॥

दंसणणाणचरित्ते कमसो उवयारभेदइदरेंहिं ।
दव्वसहावपयासे अहियारा बारसवियप्पा ॥९॥

अर्थ (गाथा 8 से 9): द्रव्यस्वभावप्रकाश नामक इस ग्रन्थमे बारह अधिकार है-गुण, पर्याय, द्रव्य, पञ्चास्तिकाय, सात तत्त्व, नौ पदार्थ, प्रमाण, नय, निक्षेप और उपचार तथा निश्चयके भेदसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ॥ ८-९ ॥


णायव्वं दवियाणं लक्खणसंसिद्धिहेउगुणणियरं ।
तह पज्जयसहावं एयंतविणासणट्ठा वि ॥१०॥

अर्थ: एकान्तका विनाश करनेके लिए द्रव्योंका लक्षण, उनकी सम्यक् सिद्धिमे कारणभूत गुणोंका समुदाय तथा पर्यायका स्वभाव भी जानना चाहिए ॥ १० ॥


दव्वाणं सहभूदा सामण्णविसेसदो गुणा णेया ।
सव्वेसिं सामण्णा दह भणिया सोलस विसेसा ॥११॥

अर्थ: जो द्रव्यके सहभावी हो उन्हे गुण कहते है । वे गुण दो प्रकारके होते हैं-एक सामान्य गुण और एक विशेष गुण । जो सब द्रव्योमे पाये जाये ऐसे सामान्य गुण दस कहे है और विशेष गुण सोलह कहे है ॥ ११ ॥


अत्थित्तं वत्थुत्तं दव्वत्तं पमेयत्त अगुरुलहुगत्तं ।
देसत्त चेदणिदरं मुत्तममुत्तं वियाणेह ॥१२॥

अर्थ: अस्तित्व, वस्तुत्व, द्रव्यत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व, प्रदेशवत्त्व, चेतनत्व, अचेतनत्व, मूर्तत्व, अमूर्तत्व ये दस सामान्य गुण जानो ॥ १२ ॥


जोणं दंसण सुह सत्ति रूवरस गंध फास गमणठिदी ।
वट्टणगाहमहेउमुत्तममुत्तं खु चेदणिदरं च ॥१३॥

अर्थ: ज्ञान, दर्शन, सुख, वीर्य, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, गमनहेतुत्व, स्थितिहेतुत्व, वर्त्तनाहेतुत्व, अवगाहनहेतुत्व, मूर्तत्व, अमूर्तत्व, चेतनत्व, अचेतनत्व ये द्रव्योके विशेष गुण है ॥ १३ ॥


अट्ठ चदु णाणदंसणभेया सत्तिसुहस्स इह दो दो ।
वण्ण रस पंच गंधा दो फासा अट्ठ णायव्वा ॥१४॥

अर्थ: ज्ञानगुणके आठ भेद हैं, दर्शनगुणके चार भेद हैं। वीर्य और सुखके दो-दो भेद हैं। रूप या वर्णके पाँच भेद हैं, रसके भी पाँच भेद हैं, गन्धके दो भेद हैं और स्पर्शके आठ भेद जानने चाहिए ॥१४॥


एक्केक्के अट्ठट्ठा सामण्णा हुंति सव्वदव्वाणं ।
छज्जीवपोग्गलाणं इयराणं विसेस तित्तिभेया ॥१५॥

अर्थ: सब द्रव्योमे-से प्रत्येक द्रव्यमे आठ-आठ सामान्य गुण होते हैं तथा विशेष गुणोमे-से जीव और पुद्गल द्रव्यमे छह-छह और शेष द्रव्योमे तीन-तीन विशेष गुण होते हैं ॥ १५ ॥


चेदणमच्चेदणा तह मुत्तममुत्तावि चरिम जे भणिया ।
सामण्ण सजाईणं ते वि विसेसा विजाईणं ॥१६॥

अर्थ: अन्तमे जो चेतन, अचेतन, मूर्तत्व और अमूर्तत्व गुण कहे है वे सजातिकी अपेक्षा सामान्य गुण है और विजातिकी अपेक्षा विशेष गुण है ॥ १६ ॥


सामण्णविसेसा वि य जे थक्का एयदवियमासेज्ज ।
परिणाम अह वियारं ताणं तं पज्जयं दुविहं ॥१७॥

अर्थ: प्रत्येक द्रव्यमें जो सामान्य और विशेष गुण वर्तमान है उनके परिणमन या विकारको पर्याय कहते है। वह पर्याय दो प्रकारकी है ॥ १७ ॥


सब्भावं खु विहावं दव्वाणं पज्जयं जिणुद्दिद्वं ।
सव्वेसि च सहावं विब्भावं जीवपोग्गलाणं च ॥१८॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने द्रव्योंकी पर्याय स्वभाव और विभाव रूप कही है। सब द्रव्योंमें स्वभाव पर्याय होती है। केवल जीव और पुद्गल द्रव्यमे विभाव पर्याय होती है ॥ १८ ॥


दव्वगुणाण सहावं पज्जायं तह विहावदो णेयं ।
जीवे जे वि सहावा ते वि विहावा हु कम्मकदा ॥१९॥

अर्थ: द्रव्य और गुणोंमें स्वभाव पर्याय और विभाव पर्याय जाननी चाहिए । जीवमे जो स्वभाव है कर्मकृत होने से वे भी विभाव हो जाते हैं ॥ १९ ॥


दव्वाणं खु पएसा जे जे ससहावसंठिया लोए ।
ते ते पुण पज्जाया जाण तुमं दव्वाणं सहावं ॥२०॥

अर्थ: लोकमे द्रव्योंके जो जो प्रदेश स्वस्वभाव रूपसे स्थित हैं उन्हें द्रव्योंकी स्वभाव पर्याय जानो ॥ २० ॥


अगुरुगलहुगाणंता समयं समयं समुब्भवा जे वि ।
दव्वाणं ते भणिया सहावगुणपज्जया जाण ॥२१॥

अर्थ: द्रव्योंके अनन्त अगुरुलघु गुण जो प्रति समय हानि-वृद्धि रूप परिणमन करते हैं उसे स्वभाव गुणपर्याय जानो ॥ २१ ॥


जं चदुगदिदेहीणं देहायारं पवेसपरिणामं ।
अह विग्गहगइजीवे तं दव्वविहावपज्जायं ॥२२॥

अर्थ: चारों गतिके प्राणियोंके तथा विग्रह गतिवाले जीवके आत्मप्रदेशोका परिणाम जो शरीराकार है वह जीव द्रव्यकी विभावपर्याय है ॥ २२ ॥


मदिसुदओहीमणपज्जयं च अण्णाण तिण्णि जे भणिया ।
एवं जीवस्स इमे विभावगुणपज्जया सव्वे ॥२३॥

अर्थ: मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्ययज्ञान और तीन अज्ञान-कुमतिज्ञान, कुश्रुतज्ञान, कुअवधिज्ञान ये सब जीवकी विभाव गुणपर्याय हैं ॥ २३ ॥


देहायारपएसा जे थक्का उहयकम्मणिम्मुक्का १ ।
जीवस्स णिच्चला खलु ते सुद्धा दव्वपज्जाया ॥२४॥

अर्थ: जीवके द्रव्य भावकर्मोंसे मुक्त हुए जो प्रदेश शरीराकार रूपसे स्थित होकर निश्चल हैं वे शुद्ध द्रव्यपर्याय हैं ॥ २४ ॥


२णाणं दंसण सुह वीरियं च जं उहयकम्मपरिहीणं ।
तं सुद्धं जाण तुमं जीवे गुणपज्जयं सव्वं ॥२५॥

अर्थ: जीवमें जो द्रव्यकर्म और भावकर्मसे रहित ज्ञान दर्शन सुख और वीर्यगुण होते है उन्हे तुम जीवकी शुद्ध गुणपर्याय जानो ॥ २५ ॥


१मुत्ते परिणामादो परिणामो णिद्धरुक्खगुणरूवो ।
एउत्तरमेगादी वड्ढदि२ अवरादु उक्कस्सं ॥२६॥

अर्थ: पुद्गलद्रव्यमें परिणमनके कारण एकसे लेकर एक-एक बढ़ते हुए जघन्यसे उत्कृष्ट पर्यन्त स्निग्ध और रूक्ष गुण रूप परिणाम होता है ॥ २६ ॥


३णिद्धादो णिद्धेण तहेव रुक्खेण सरिस विसमे वा ।
बज्झदि दोगुणमहिओ परमाणु जहण्णगुणरहिओ ॥२७॥

अर्थ: स्निग्धका स्निग्धके साथ तथा रूक्षके साथ बन्ध होता है किन्तु सम हो या विषम हो एकसे दूसरेमे दो गुण अधिक होनेपर ही बन्ध होता है। और जघन्य गुणवाले परमाणुका बन्ध नही होता ॥२७॥


संखाऽसंखाऽणंता बादरसुहुमा य हूँ’ति ते खंधा ।
परिणविदा बहुभेया पुढवीआदीहि णायव्वा ॥२८॥

अर्थ: संख्यात प्रदेशी असंख्यात प्रदेशो और अनन्तप्रदेशो बादर और सूक्ष्म स्कन्ध बनते है। वे पृथिवी आदि रूपसे परिणत स्कन्ध अनेक प्रकारके जानने चाहिए ॥२८॥


जो खलु अणाइणिहणो कारणरूवो हु कज्जरूवो वा ।
परमाणुपोग्गलाणं सो दव्वसहावपज्जाओ ॥२९॥

अर्थ: जो अनादि निधन कारणरूप अथवा कार्यरूप परमाणु है वह पुद्गलोकी स्वभावपर्याय है ॥२९॥


रूवरसगंधफासा जे थक्का तेसु अणुयदव्वेसु ।
ते चेव पोग्गलाणं सहावगुणपज्जया णेया ॥३०॥

अर्थ: उन अणुरूप पुद्गलद्रव्योमे जो रूप रस गन्ध और स्पर्श गुण पाये जाते हैं वे ही पुद्गलद्रव्योकी स्वभाव गुणपर्याय हैं । अर्थात् परमाणु पुद्गलद्रव्यकी स्वभावपर्याय है और परमाणुमें पाये जानेवाले गुणोकी अवस्था पुद्गल द्रव्यके गुणोकी स्वभाव पर्याय है ॥३०॥


१पुढवी जलं च छाया चउरिंदियविसयकम्मपरमाणू ।
अइथूलथूलथूला सुहमं सुहमं च अइसुहमं ॥३१॥

अर्थ: पृथिवी, जल, छाया, चक्षुके सिवाय शेष चार इन्द्रियोंका विषय, कर्मवर्गणाके योग्य स्कन्ध और कर्मवर्गणाके अयोग्य स्कन्ध, ये पुद्गलकी विभाव पर्यायें हैं । इन्हें क्रमसे अतिस्थूल, स्थूल, स्थूलसूक्ष्म, सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म कहते है ॥३१॥


जे संखाई खंधा परिणमिया दुअणुआदिखंधेहिं ।
ते चिय दव्वविहावा जाण तुमं पोग्गलाणं च ॥३२॥

अर्थ: जो संख्यात प्रदेशी आदि स्कन्ध द्वयणुक आदि स्कन्ध रूपसे परिणमित होते हैं उन्हे भी तुम पुद्गल द्रव्योंकी विभाव पर्याय जानो ॥३२॥


रूवाइया य उत्ता जे दिट्ठा दुअणुआइखंधम्मि ।
ते पुग्गलाण भणिया विहावगुणपज्जया सव्वे ॥३३॥

अर्थ: द्वयणुक आदि स्कन्धों में जो रूपादि गुण देखे जाते हैं वे सब पुद्गलों की विभावगुणपर्याय जानना चाहिए ॥३३॥


गदिठिदिगाहणवट्टण धम्माधम्मेसु गगणकालेसु ।
गुणसम्भावो पज्जय दव्वियसभावो दु पुव्वुत्तो ॥३४॥

अर्थ: धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य और कालद्रव्यमें क्रमसे गतिरूप, स्थितिरूप, अवगाहनरूप और वर्तना रूप जो गुण पाये जाते हैं वह उनकी स्वभावगुणपर्याय है। और इन द्रव्योंका स्वभाव, तो पूर्वोक्त हे ॥३४॥


दवदि दविस्सदि दविदं जं सम्भावेहि विविहपज्जाए ।
तं णह जीवो पोग्गल धम्माधम्मं च कालं च ॥३५॥

अर्थ: जो गुणो और पर्यायोके द्वारा प्राप्त किया जाता है, प्राप्त किया जायेगा और प्राप्त किया गया है वह द्रव्य है। अथवा जो अपने गुणों और पर्यायोंको प्राप्त करता है, प्राप्त करेगा और प्राप्त कर चुका है वह द्रव्य है। वह द्रव्य छह प्रकारका है-आकाश, जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और काल ॥३५॥


१तिक्काले जं सत्तं वट्टदि उप्पादवयधुवत्तेहिं ।
गुणपज्जायसहावं अणाइसिद्धं खु तं हवे दव्वं ॥३६॥

अर्थ: ‘तीनो कालोमे जो उत्पाद व्यय और ध्रौव्यरूपसे सत् रहता है अथवा जो गुणपर्यायस्वभाववाला है वह द्रव्य है वह द्रव्य अनादिसिद्ध है ॥३६॥’


जम्हा एक्कसहावं तम्हा तिदयदोसहावं खु ।
जम्हा तिदयसहावं तम्हा दोएक्कसब्भावं ॥३७॥

दोसब्भावं जम्हा तम्हा तिण्णेक्क होइ सब्भावं ।
दव्वत्थिएण एक्कं भिण्णं ववहारदो तियदं ॥३८॥

अर्थ (गाथा 37 से 38): चूंकि द्रव्य एक स्वभाववाला है इसलिए तीसरे और दूसरे स्वभाववाला है, यतः तीसरे स्वभाववाला है इसलिए दो और एक स्वभाववाला है। यतः दो स्वभाववाला है इसलिए तीन और एक स्वभाववाला है। द्रव्यार्थिक नयसे द्रव्य एक रूप है, व्यवहारनयसे भिन्न तीन रूप है ॥३७-३८॥


”जत्थ ण अविणाभावो तिण्हं दोसाण संभवो तत्थ ।
अहु उवयारा तं इह कह उवयारा हवे णियमो ॥३९॥

अर्थ: ”जहाँ इन तीनोंमें अविनाभाव नहीं है वहाँ अनेक दोष आते हैं। यदि कहा जाय कि उपचारसे ऐसा है तो उपचारसे नियम कैसे हो सकता ॥३९॥”


ण समुब्भवइ ण णस्सइ दव्वं सत्तं वियाण णिच्छयदो ।
उप्पादवयधुवेहिं तस्स य ते हुंति पज्जाया ॥४०॥

अर्थ: परमार्थसे द्रव्य न उत्पन्न होता है और न नष्ट होता है । उसे सत्स्वरूप जानो । उत्पाद व्यय और ध्रौव्यके द्वारा द्रव्यका उत्पाद व्यय होता है और वे पर्यायरूप हैं ॥४०॥


गुणपज्जएदो दव्वं दव्वादो ण गुणपज्जया भिण्णा ।
जम्हा तम्हा भणियं दव्वं गुणपज्जयमएण्णं ॥४१॥

अर्थ: चूँकि गुण और पर्यायसे द्रव्य भिन्न नही है और द्रव्यसे गुण और पर्याय भिन्न नही है इसलिए द्रव्यको गुण और पर्यायोंसे अभिन्न कहा है ॥४१॥


ण विणासियं ण णिच्चं ण हु भेयं णो अभेय णो भावं ।
ण विसत्तं सव्वगयं दव्वं णो इक्कस्वभावं ॥४२॥

अर्थ: द्रव्य न विनाशीक है, न नित्य है, न भेदरूप है, न अभेद रूप है, न असत् है, न व्यापक है और न एक स्वभाव है ॥ ४२ ॥


संतं इह जइ णसइ किह तस्स पुणो वि सोयमिदि णाणं ।
अह व असंतं होदि हु दुमरहियं किं ण फलफुल्लं ॥४३॥

अर्थ: यदि संसारमे सत्‌का विनाश होता तो पुन: उसीमें ‘यह वही है’ ऐसा ज्ञान कैसे होता । तथा यदि असत् की भी उत्पत्ति होती तो बिना वृक्षके भी फल फूल क्यों न होते ॥४३॥


अहवा वासणदो यं पडिअहिणाणे वियप्पविण्णाणं ।
ता सा पंचह भिण्णा खंधाणं वासणा णिच्चं ॥४४॥

अर्थ: यदि वासनासे प्रत्यभिज्ञान रूप विकल्प ज्ञान होता है तो वह वासना पांचो स्कन्धोसे भिन्न नित्य हुई ॥४४॥


जो णिच्चमेव मण्णदि तस्स ण किरिया हु अत्थकारित्तं ।
ण हु तं वत्थु भणियं जं रहियं अत्थकिरियाहि ॥४५॥

अर्थ: जो वस्तुको सर्वथा नित्य मानता है उसके मतमें सर्वथा नित्य वस्तुमें अर्थक्रिया नही हो सकती । और जो अर्थक्रियासे रहित है वह वस्तु नही है ॥४५॥


“प्रत्यभिज्ञा पुनर्दत्तं भोगोपार्जितेनसाम् ।
बन्धमोक्षादिकं सर्वं क्षणभङ्गाद् विरुध्यते ॥”


णिच्चे दव्वे१ ण गमणट्ठाणं पुण किह सुहासुहा किरिया ।
अह उवयारा२ किरिया कह उवयारो हवे३ णिच्चे ॥४६॥

अर्थ: नित्य द्रव्यमे गमन और स्थिति ही सम्भव नही है तब शुभ और अशुभ क्रियाका तो कहना ही क्या है ? यदि नित्य द्रव्यमें उपचारसे क्रिया मानते हैं तो नित्यमे उपचार कैसे हो सकता है ॥४६॥


णिच्चं १गुणगुणिभेये दव्वाभावं अणंतियं अहवा ।
अणवत्था समवाए किह एयत्तं पसाहेदि ॥४७॥

अर्थ: गुण और गुणीमे सर्वथा भेद माननेपर द्रव्यका अभाव हो जायगा अथवा अनन्त द्रव्य हो जायेगे । समवाय सम्बन्धसे गुण और गुणीमे अभेद माननेपर अनवस्था दोष आता है ऐसी स्थितिमे समवाय सम्बन्धसे कैसे अभेद हो सकता है ॥४७॥


जाणं दो वि य भिण्णं ताणं पि य जुत्तिवज्जियं सुत्तं ।
ण हु तं तच्चं परमं जुत्तीदो जं ण इह सिद्धं ॥४८॥

अर्थ: जो गुण गुणीको अभिन्न मानते हैं उनका कथन युक्ति रहित है । जो यहाँ युक्तिसे सिद्ध नहीं होता वह परमतत्त्व नहीं है ॥४८॥


संतं जो ण हु मण्णइ पच्चक्खविरोहियं हि तस्स मयं ।
णो णेयं ण हिं णाणं ण संसयं णिच्छयं जम्हा ॥४९॥

अर्थ: जो कुछ भी सत् नहीं मानता उसका मत प्रत्यक्ष विरुद्ध है । क्योकि उसका यह निश्चय है कि न ज्ञेय है, न ज्ञान है और न संशय है ॥४९॥


सव्वं जइ सव्वगयं विज्जदि इह अत्थि कोइ ण दरिद्दो ।
सेवावणिज्जकज्जं ण कारणं किं पि कस्सेव ॥५०॥

णेयं णाणं उभयं तिरोहितं तं च जाणणमसक्कं ।
अहवाविरभावगयं सव्वत्थ वियाणए सव्वं ॥५१॥

अर्थ (गाथा 50 से 51): यदि सब वस्तुएँ सब जगह विद्यमान हैं तो संसारमें कोई दरिद्र नहीं होना चाहिए । तथा सेवा व्यापार आदि कार्य और किसीका भी कोई कारण नहीं होना चाहिए ॥ ज्ञेय और ज्ञान यदि दोनों तिरोहित हैं तो उनको जानना शक्य नहीं है । और यदि उनका आविर्भाव है तो सर्वत्र सबको जानना चाहिए ॥५०-५१॥


'जइ सव्वं बंभमयं तो किह विविहसहावगं दव्वं ।
एक्कविणासे णासइ सुहासुहं सव्वलोयाणं ॥५२॥

अर्थ: यदि सब ब्रह्ममय है तो नाना स्वभाववाले द्रव्य कैसे हैं? तथा एकके नष्ट होनेपर सब लोकोंका शुभाशुभ नष्ट हो जाना चाहिए ॥५२॥


बंभसहावेभिण्णा जइ हु अविज्जा वियप्पसे कह वा ।
ता तं जदा सहावं अह पुव्वुत्तं पलोएज्जा ॥५३॥

अर्थ: यदि ब्रह्मस्वरूपसे अविद्याको भिन्न मानते हो तो ब्रह्म अद्वैत रूप न होकर द्वैतरूप हो जाता है और यदि अभिन्न मानते हो तो पूर्वोक्त भेद कैसे बन सकता है इसका विचार करो ॥५३॥


वत्थू हवेइ तच्चं वत्थंसा पुण हवंति भयणिज्जा ।
सिय साविक्खा वत्थू भणंति इयरा दु णो जम्हा ॥५४॥

अर्थ: वस्तु तत्त्व है किन्तु वस्तुके अंश भजनीय हैं । यदि वे अंश स्यात् सापेक्ष होते हैं तो वस्तुरूप हैं और यदि निरपेक्ष हैं तो वस्तुरूप नहीं हैं ॥५४॥


सव्वे वि य एयंते दव्वसहावा विदूसिया होंति ।
दुट्ठे ताण ण हेऊ सिज्झइ संसार मोक्खं वा ॥५५॥

अर्थ: सभी एकान्त मतोंमें द्रव्यका स्वभाव दूषित सिद्ध होता है । और उसके दूषित होनेपर संसार और मोक्ष और उनके कारणोंकी प्रक्रिया नहीं बनती ॥५५॥


दव्वं विस्ससहावं एक्कसहावं कयं कुदिट्ठीहिं ।
लद्धूण एयदेसं तह करिणो जाइअंधेहिं ॥५६॥

अर्थ: द्रव्य विश्व स्वभाव है-अनेक रूप है उसके एकदेशको ही देखकर मिथ्यादृष्टियोंने एक स्वभाव मान लिया है जैसे कुछ जन्मान्धोने हाथीको मान लिया था ॥५६॥


“नित्यैकान्तमतं यस्य तस्यानेकान्तता कथम् ।
'अथानेकान्तता यस्य तस्यैकान्तमतं स्फुटम् ॥५७॥”

अर्थ: प्रमाणके द्वारा ग्रहण किये जानेपर पदार्थ अनेक स्वभाववाले सिद्ध होते हैं । और प्रमाणके भेद नयोंके द्वारा ग्रहण किये जानेपर वे ही पदार्थ एक स्वभाववाले प्रतीत होते हैं ॥५७॥


अत्थि त्ति णत्थि णिच्चं अणिच्चमेगं अणेग भेदिदरं ।
भव्वाभव्वं परमं सामण्णं सव्वदव्वाणं ॥५८॥

अर्थ: अस्ति, नास्ति, नित्य-अनित्य, एक-अनेक, भेद-अभेद, भव्य-अभव्य और परमभाव ये ग्यारह सामान्य स्वभाव है जो सब द्रव्योंमे पाये जाते हैं ॥५८॥


चेदणमचेदणं पि हु मुत्तममुत्तं च एगबहुदेसं ।
सुद्धासुद्धविभावं उवयरियं होइ कस्सेव ॥५९॥

अर्थ: चेतन, अचेतन, मूर्त, अमूर्त, एकप्रदेशी, बहुप्रदेशी, शुद्ध, अशुद्ध, विभाव और उपचरित, ये दस विशेष स्वभाव हैं, क्योंकि ये सभी द्रव्योंमें नहीं पाये जाते, किसी-किसीमे ही पाये जाते हैं ॥५९॥


अत्थिसहावे सत्ता असंतरूवा हु अण्णमण्णेण ।
सोयं इदि तं णिच्चा अणिच्चरूवा हु पज्जाया ॥६०॥

अर्थ: सभी द्रव्य अपने अस्तित्व स्वभावमें स्थित होनेसे सत् हैं । तथा एक दूसरेकी अपेक्षा असत्स्वरूप है । ‘यह वही है’ इस प्रकारका बोध होनेसे नित्य हैं और पर्यायरूपसे अनित्य हैं ॥६०॥


एक्को अजुदसहावो अणेक्करूवा हु विविहभावत्था ।
भिण्णा हु वयणभेदे ण हु ते भिण्णा अभेदादो ॥६१॥

अर्थ: अयुतस्वभाव होनेसे प्रत्येक द्रव्य एक स्वभाववाला है । अनेक स्वभाववाला होनेसे प्रत्येक द्रव्य अनेक स्वभाववाला है। वचन भेदसे भिन्न स्वभाववाला है और अभेदरूप होनेसे अभिन्न स्वभाववाला है ॥६१॥


भव्वगुणादो भव्वं तव्विवरीएण होंति विवरीयं ।
सब्भावेण सहावा सामण्णसहावदो सव्वे ॥६२॥

अर्थ: भव्यगुणके कारण सब द्रव्य भव्यस्वभाव है । अभव्यगुणके कारण सब द्रव्य अभव्य स्वभाव हैं । और अपने स्वभावसे परमस्वभाव रूप है । इस प्रकार ये सब द्रव्योंके सामान्य स्वभाव हैं ॥६२॥


अणुहवभावो चेयणमचेयणं होइ तस्स विवरीयं ।
रूवाइपिंड मुत्तं विवरोए ताण विवरीयं ॥६३॥

अर्थ: अनुभवनरूप भावको चेतन कहते है और उससे विपरीत भावको अचेतन कहते है । रूप रस आदि गुणोके पिण्डको मूर्तिक कहते है और उससे विपरोतको अमूत्तिक कहते हैं ॥६३॥


खेत्तं पएसणाणं एक्काणेक्कं च दव्वदो णेयं ।
सहजादो रूवंतरगहणं जो सो हु विब्भावो ॥६४॥

अर्थ: क्षेत्रको प्रदेश कहते हैं । द्रव्यकी अपेक्षा एकप्रदेशित्व और बहुप्रदेशित्व स्वभाव जानना चाहिए । यथाजात स्वाभाविक रूपसे रूपान्तर होनेको विभाव कहते है ॥६४॥


कम्मक्खयदो सुद्धो मिस्सो पुण होइ इयरजो भावो ।
जं चिय दव्वसहावं उवयारं तं पि ववहारं ॥६५॥

अर्थ: कर्मोंके क्षयसे प्रकट हुए स्वभावको शुद्ध स्वभाव कहते हैं। और कर्मोंके संयोगसे उत्पन्न हुए भावको अशुद्ध स्वभाव कहते हैं। व्यवहार नयसे जो द्रव्यका स्वभाव होती है उसे उपचरित कहा जाता है ॥६५॥


णिरवेक्खे एयंते संकरआईंहि दूसिया भावा ।
णो णियकज्जे अरिहा विवरीए ते वि खलु अरिहा ॥६६॥

अर्थ: निरपेक्ष एकान्तवादमे भाव संकर आदि दोषोसे दूषित होनेसे अपना-अपना कार्य करनेमें असमर्थ होते हैं किन्तु विपरीत स्थितिमे अर्थात् सापेक्ष एकान्तवादमें या अनेकान्तवादमें वे भाव अपना-अपना कार्य करनेमे समर्थ होते हैं ॥६६॥


गुणपज्जायसहावा दव्वत्तमुवगया हु ते जम्हा ।
पिच्छह अंतरभावं अण्णगुणाईण भावाणं ॥६७॥

अर्थ: चूँकि गुण पर्याय और स्वभाव द्रव्यरूप ही होते हैं अतः अन्य गुण आदिका उन्हीमे अन्तर्भाव जानना चाहिए ॥६७॥


इगवीसं तु सहावा दोण्हं तिण्हं तु सोलसा भणिया ।
पंचदसा पुण काले दव्वसहावा मुणेयव्वो ॥६८॥

इगॅवीसं तु सहावा जीवे तह जाण पोग्गले णयदो ।
इयराणं संभवदो णायव्वा णाणवंतेहिं ॥६९॥

अर्थ (गाथा 68 से 69): दो द्रव्योंमें से प्रत्येकमे इक्कीस-इक्कीस स्वभाव होते हैं। तीन द्रव्योमे सोलह-सोलह स्वभाव होते हैं। कालद्रव्यमे पन्द्रह स्वभाव जानने चाहिए। जीव और पुद्गल द्रव्यमे इक्कीस स्वभाव जानो। शेष द्रव्योमे नय दृष्टिसे ज्ञानियोंको यथासम्भव स्वभाव जानने चाहिए ॥६८-६९॥ कर्मबन्धन अहेतुक हो जायेगा और अहेतुक होनेसे उसका विनाश सम्भव नही होगा । यदि कदाचित् सम्भव भी हो तो शुद्ध होनेपर वह पुन कर्ममलसे लिप्त हो जायेगा । यदि आत्माको सर्वथा अशुद्ध माना जायेगा तो उसे कभी भी शुद्धता प्राप्त नही हो सकेगी क्योकि वह तो सर्वथा अशुद्ध है । आत्माको सर्वथा उपचरितस्वभाव मानने पर आत्मामे आत्मज्ञता नही बनेगी और सर्वथा अनुपचरित स्वभाव माननेपर परज्ञता आदि नही बनेगी । इसका आशय यह है कि स्वभावका अन्यत्र उपचार करनेको उपचरित स्वभाव कहते है तो अनुपचरित स्वभावसे तो आत्मा आत्मज्ञ है और उपचरित स्वभावसे परवस्तुका ज्ञाता है । इन दोनोंमें-से किसी एक स्वभावको एकान्त रूपसे मानने पर दूसरा नही बनेगा । अतः या तो आत्मा केवल आत्मज्ञ ही बन सकेगा या केवल परज्ञाता ही हो सकता है । दोनो एकान्तोको एक साथ माननेमें भी विरोध आता है क्योकि दो एकान्तोका एक साथ रहना सम्भव नही है अर्थात् एक ही वस्तु सर्वथा नित्य भी हो और सर्वथा अनित्य भी हो यह कैसे सम्भव हो सकता है । एकान्त रूपसे या तो नित्यता ही सम्भव है या अनित्यता ही सम्भव है । हाँ, अनेकान्तवादमें दो परस्पर विरोधी प्रतीत होनेवाले धर्म अपेक्षा भेदसे एक साथ एक वस्तुमें रह सकते है । उसमें कोई विरोध नही है । विरोध तीन प्रकारका होता है-सहानवस्थान रूप, परस्पर परिहार स्थितिरूप और वध्यघातक रूप । सहानवस्थानरूप विरोध तो सम्भव नही है क्योकि एक ही वस्तुमें भेद अभेद, सत्त्व असत्त्व आदि धर्म अपेक्षा भेदसे देखे जाते है । परस्पर परिहारस्थिति रूप विरोध तो एक आम्रफलमें रूप और रसकी तरह एक साथ रहनेवाले दो धर्मोमें ही सम्भव होता है । वध्यघातक भावरूप विरोध भी सर्प और नेवलेकी तरह बलवान् और कमजोरमें ही होता है । किन्तु एक ही वस्तुमें रहनेवाले सत्त्व असत्त्व, भेद अभेद, नित्य अनित्य आदि धर्म तो समान बलशाली है अतः उनमें यह विरोध भी सम्भव नही है । हाँ, एकान्तवादमें ही संकर, व्यतिकर, अनवस्था, अभाव, अदृष्टकल्पना, दृष्टहानि, विरोध और वैयधिकरण नामक आठ दोष आते हैं ।


[ सर्वथैकान्तेन सद्रूपस्य न नियतार्थव्यवस्था संकरादिदोषत्वात् तथासद्रूपस्य सकलशून्यता-
प्रसंगात् । नित्यस्यैकस्वरूपत्वात् एकरूपस्यार्थक्रियाकारित्वाभावः, अर्थक्रियाकारित्वाभावे द्रव्यस्याप्य-

अर्थ: वस्तुको सर्वथा एकान्तसे सद्रूप माननेपर नियत अर्थव्यवस्था नही हो सकती, क्योकि एक वस्तु अन्य वस्तु स्वरूप हो जानेसे संकर आदि दोषोका प्रसंग आता है। जब वस्तु सर्वथा सत् है तो जैसे वह स्वरूपकी अपेक्षा सत् है वैसे ही पर रूपकी अपेक्षा भी सत् हो जायेगी और तब घट घट ही है पट नही है तथा पट पट ही है घट नही है इस प्रकारकी प्रतिनियत अर्थव्यवस्था नही बन सकेगी क्योकि प्रत्येक वस्तु स्वरूपकी तरह पररूपसे भी सत् माननी होगी उसके माने बिना सर्वथा सत्पना नही बन सकता। तथा वस्तुको सर्वथा असत् मानने पर सकल शून्यताका प्रसग आता है क्योकि वैसा माननेपर संसारमे कुछ भी सत् नही हो सकता। वस्तुको सर्वथा नित्य माननेपर उसमे कोई भी परिवर्तन नही हो सकता अतः उसे सर्वथा एकरूप मानना होगा। सर्वथा एकरूप वस्तु कुछ भी कार्य नही कर सकती। अतः उसमे अर्थक्रिया नही हो सकती। अर्थक्रिया ही सत्का लक्षण है। अतः अर्थक्रियाके अभावमे द्रव्यका भी अभाव हो जायेगा। सर्वथा अनित्य ( क्षणिक ) मानने पर भी वस्तु उत्पन्न होते ही सर्वथा नष्ट हो जायेगी तब वह अर्थक्रियाकारी कैसे हो सकती है और अर्थक्रियाकारित्वके अभावमें द्रव्यका भी अभाव हो जायेगा। वस्तुको सर्वथा एकरूप माननेपर विशेषका अभाव हो जायेगा। और विशेषके अभावमें सामान्यका भी अभाव हो जायेगा क्योकि विशेषके बिना अकेला सामान्य नही रहता। वस्तुको सर्वथा अनेक माननेपर द्रव्यका अभाव हो जायेगा। तथा द्रव्यके अभावमे आधारके बिना अनेक रूप कहाँ रहेंगे अतः उनका भी अभाव हो जायेगा। सर्वथा भेद पक्षमे भी गुण गुणीसे सर्वथा भिन्न होनेपर निराधार हो जायेंगे और निराधार होनेसे उनमें अर्थक्रिया नही हो सकेगी, वे कुछ कार्य नही कर सकेंगे। और ऐसी स्थितिमे गुणी द्रव्यका भी अभाव हो जायेगा। सर्वथा अभेद पक्षमे भी नित्यपक्षकी तरह वस्तु सर्वथा एकरूप होनेसे अर्थक्रिया नही कर सकती और अर्थक्रियाके अभावमे द्रव्यका अभाव सुनिश्चित है !

यदि एकान्तसे वस्तुको भव्यस्वभाव माना जायेगा तो उसके पररूप परिणमन करनेसे संकर आदि दोष सम्भव है। और सर्वथा अभव्य स्वभाव माननेपर वस्तुकी शून्यताका प्रसंग आता है क्योकि वस्तु स्वरूपसे भी परिणमन नही कर सकेगी। सर्वथा स्वभाव रूप माननेपर जीव और पुद्गलका कभी मेल ही नही होगा और तब ससारका ही अभाव हो जायेगा क्योकि संसार तो स्वभावदशामें नही होता विभावदशा में होता है। इसी तरह सर्वथा विभावरूप माननेपर कभी किसी जीवका संसारके बन्धनसे छुटकारा नही होगा। अतः मोक्षका अभाव हो जायेगा। यदि सबको केवल चैतन्य स्वरूप ही माना जायेगा तो सभी शुद्ध ज्ञान चैतन्यमय हो जायेंगे। इसी तरह केवल अचैतन्य स्वभावको ही स्वीकार करनेपर समस्त चैतन्य स्वभावका उच्छेद हो जायेगा। यदि आत्माको एकान्तरूपसे मूर्त माना जायेगा तो उसे कभी मोक्षकी प्राप्ति नही हो सकेगी। इसी तरह आत्माको सर्वथा अमूर्त माननेपर ससारका ही लोप हो जायेगा क्योकि सर्वथा अमूर्त आत्मा कर्मबन्धनसे बद्ध नही हो सकता और कर्मबन्धनसे बद्ध हुए बिना संसारका प्रवर्तन नही हो सकता। यदि आत्माको सर्वथा एकप्रदेशी माना जायेगा तो वह अनेक प्रकारकी क्रियाएँ नही कर सकेगा। इसी तरह सर्वथा अनेकप्रदेशी माननेपर भी आत्मा अर्थक्रियाकारी नही हो सकता क्योकि स्वभावशून्यताका प्रसंग आता है।

आत्माको एकान्तसे शुद्ध माननेपर उसपर कर्ममल रूपी कलंकका लेप नही चढ सकता; क्योकि वह सर्वथा निर्मल है। यदि सर्वथा निर्मल आत्माके भी कर्ममल रूपी कलंकका अवलेप सम्भव हो तो एक तो


भावः स्यादस्ति नास्तीति कुर्यान्निर्वाधमेव तम् ।
फलेन चास्य संबन्धो नित्यानित्यादिक तथा ॥७०॥

अर्थ: अस्तित्व आदि धर्म तो स्वभाव है । और अस्तित्व आदि स्वभाववाले द्रव्य स्वभाववान् हैं । जो इन दोनोंको युगपत् ग्रहण करता है वह प्रमाण है और जो दोनोमे-से एकको गौण और एकको मुख्य करके ग्रहण करता है वह नय है ॥७०॥


सियसद्देण विणा इह विसयं दोण्हं पि जे वि गिण्हंति ।
मोत्तूण अमियभोज्जं विसभोज्जं ते विभुंजंति ॥७१॥

सियसद्देण य पुट्ठा बेंति णयत्था हु वत्थुसब्भावं ।
वत्थू जुत्तीसिद्धं जुत्ती पुण णयपमाणादो ॥७२॥

अर्थ (गाथा 71 से 72): जो ‘स्यात्’ शब्दके बिना प्रमाण और नयके विषयको ग्रहण करते हैं वे अमृतमय भोजनको छोड़कर विषमय भोजन करते हैं । ‘स्यात्’ शब्दसे युक्त नयार्थ-नयके विषयभूत पदार्थ वस्तुके स्वभावको कहते हैं । वस्तु युक्तिसिद्ध है और युक्ति नय और प्रमाणसे सम्बद्ध है ॥७१-७२॥


इय पुव्वुत्ता धम्मा सियसावेक्खा ण गिण्हए जो हु।
सो इह मिच्छादिट्ठी णायव्वो पवयणे भणिओ ॥७३॥

अर्थ: इस प्रकार जो पूर्वोक्त धर्मोको ‘स्यात्’ सापेक्ष ग्रहण नही करता है उसे मिथ्यादृष्टि जानना चाहिए, ऐसा आगममे कहा है ॥७३॥


चारिवि कम्मे जणिया एक्को खाईय इयर परिणामी ।
भावा जीवे भणिया णयेण सव्वेवि णायव्वा ॥७४॥

ओदयिओ उवसमिओ खओवसमिओ वि ताण खलु भेओ ।
तेसिं खयादु खाई परिणामी उदयपरिचत्तो ॥७५॥

अर्थ (गाथा 74 से 75): जीवमें चार भाव कर्मजन्य कहे है, एक भाव क्षायिक है, एक पारिणामिक है। ये सभी भाव नयके द्वारा जानने चाहिए ॥७४॥ औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक ये उन भावोके भेद हैं। कर्मोंके क्षयसे क्षायिकभाव होता है और जो भाव न तो कर्मजन्य है और न कर्मोंके क्षयसे होता है वह पारिणामिक है ॥७५॥


हेया कम्मे जणिया भावा खयजा हु मुणसु फलरूवा ।
झेओ ताणं भणिओ परमसहावो हु जीवस्से ॥७६॥

अर्थ: कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाले भाव हेय हैं-छोड़ने योग्य है । कर्मोंके क्षयसे होनेवाले भाव फल रूप जानने चाहिए । उन सब भावामेसे जीवका परम स्वभाव ही ध्यान करनेके योग्य है ॥७६॥


भणिया जे विब्भावा जीवाणं तहय पोग्गलाणं च ।
कम्मेण य जीवाणं कालादो पोग्गले णेया ॥७७॥

अर्थ: जीवो तथा पुद्गलोमे जो विभाव कहे हैं उनमेंसे जीवमें विभाव कर्मके निमित्तसे और पुद्गलमे कालके निमित्तसे जानने चाहिए ॥७७॥


मुत्ते खंधविहावो खंधो गुणणिद्धरुक्खजो भणिओ ।
तं पि य पडुच्च कालं तम्हा कालेण तस्स तं भणियं ॥७८॥

अर्थ: पुद्गलका स्कन्धरूप परिणमन उसका विभाव है । और स्कन्धरूप परिणमन पुद्गलमे पाये जानेवाले स्निग्ध और रूक्ष गुणके कारण कहा है । तथा वह परिणमन कालका निमित्त पाकर होता है इसलिए कालके द्वारा पुद्गलका विभावरूप परिणाम कहा है ॥७८॥


जह जीवत्तमणाई जीवे बंधो तहेव कम्माणं ।
तं पि य दव्वं भावं जाव सजोगिस्स चरिमंतं ॥७९॥

अर्थ: जैसे जीवमे जीवपना अनादि है वैसे ही उसके साथ कर्मोंका बन्ध भी अनादि है । कर्मके दो भेद है-द्रव्यकर्म और भावकर्म । यह कर्मबन्ध सयोगकेवली नामक तेरहवें गुणस्थानके अन्त तक होता रहता है ॥७९॥


मूलुत्तर तह इयरा भेया पयडीण होंति उभयाणं ।
हेउ दो पुण पुट्ठा हेऊ चत्तारि णायव्वा ॥८०॥

अर्थ: द्रव्यकर्म और भावकर्मके भेद मूलप्रकृति रूप और उत्तरप्रकृति रूप हैं। उनके द्रव्यप्रत्यय रूप और भावप्रत्यय रूप दो कारण हैं जो चारभेद रूप जानने चाहिए ॥८०॥


मिच्छत्तं अविरमणं कसाय जोगा य जीवभावा हु ।
दव्वं मिच्छत्ताइ य पोग्गलदव्वाण ओवरणा ॥८१॥

अर्थ: मिथ्यात्व, अविरति, कषाय और योगरूप जीवके भाव भावप्रत्यय हैं। और मिथ्यात्व आदि रूप पुद्गलद्रव्यकर्म द्रव्यप्रत्यय हैं ॥८१॥


भावो दव्वणिमित्तं दव्वं पि य भावकारणं भणियं ।
अण्णोण्णेहेदुभूदा कुणंति३ पुट्ठो हु कम्मांणं ॥८२॥

अर्थ: भाव द्रव्यमे निमित्त है और द्रव्यको भावका कारण कहा है। दोनो परस्परमे एक दूसरेके हेतु होकर कर्मोंकी पुष्टि करते हैं ॥८२॥


दंसणणाणावरणं वेदो मोहं तु आउ णामं च ।
गोदंतराय मूला पयंडी जीवाण णायव्वा ॥८३॥

अर्थ: ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये जीवोंके मूलकर्म जानने चाहिए ॥८३॥


णेव पण दो अडवीसा चउ तेणउदी तहेव दो पंच ।
एदे उत्तरभेया एयाणं उत्तरोत्तरा हुंति ॥८४॥

अर्थ: पाँच, नौ, दो, अट्ठाईस, चार, तिरानवे, दो और पाँच ये उत्तर प्रकृतियाँ हैं । इनकी भी उत्तरोत्तर प्रकृतियाँ होती हैं ॥८४॥ होती है वह रति कर्म है। जिस कर्मके उदयसे जीवोको द्रव्य क्षेत्र काल और भावमें अरति उत्पन्न होती है वह अरति कर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीवोको शोक उत्पन्न होता है वह शोक कर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीवके सात प्रकारका भय उत्पन्न होता है वह भय कर्म है । जिस कर्मके उदयसे द्रव्य क्षेत्र काल भावमें ग्लानि उत्पन्न होती है वह जुगुप्सा कर्म है । इस तरह नोकषाय वेदनीयकी नौ प्रकृतियाँ हैं । आयुकर्मकी चार प्रकृतियाँ हैं-नरकायु, तिर्यञ्चायु, मनुष्यायु और देवायु । जो कर्म नरक भवको धारण कराता है वह नरकायुकर्म है । जो कर्म तिर्यञ्च भवको धारण कराता है वह तिर्यञ्चायु कर्म है । जो कर्म मनुष्य भवको धारण कराता है वह मनुष्यायुकर्म है । जो कर्म देव भव को धारण कराता है वह देवायु कर्म है । इस प्रकार आयु कर्मकी चार ही उत्तर प्रकृतियाँ हैं । नाम कर्मकी ९३ प्रकृतियाँ है । जो नरक तिर्यञ्च मनुष्य और देवपर्यायका बनानेवाला कर्म है वह गतिनाम कर्म है । वह गतिनाम कर्म चार प्रकारका है-नरकगति नाम कर्म, तिर्यञ्चगति नाम कर्म, मनुष्यगतिनामकर्म, देवगतिनामकर्म । जो कर्म एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पञ्चेन्द्रियभावका बनानेवाला है वह जातिनामकर्म है । वह पाँच प्रकारका है-एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रिय जाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति और पञ्चेन्द्रियजाति नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण शरीरके परमाणु जीवके साथ बन्धको प्राप्त होते हैं वह शरीर नाम कर्म है । वह पाँच प्रकारका है-औदारिक शरीर, वैक्रियिक शरीर, आहारक शरीर तैजस शरीर और कार्मण शरीर नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे परस्पर सम्बन्धको प्राप्त हुई वर्गणाओका परस्पर सम्बन्ध होता है वह शरीरबन्धन नामकर्म है । वह भी पाँच प्रकारका है-औदारिकशरीर बन्धन, वैक्रियिक शरीर बन्धन, आहारक शरीर बन्धन, तैजस शरीरबन्धन और कार्मण शरीर बन्धन । जिस कर्मके उदयसे परस्पर सम्बन्धको प्राप्त हुई वर्गणाओमें चिकणता उत्पन्न हो वह शरीर संघात नाम कर्म है । उसके भी पाँच भेद हैं-औदारिक शरीर संघात, वैक्रियिक शरीर संघात, आहारकशरीर संघात, तैजसशरीर संघात और कार्मणशरीर संघातनामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीरोकी आकार रचना होती है उसे संस्थान नामकर्म कहते हैं। वह छह प्रकारका है-समचतुरस्र शरीर संस्थान, न्यग्रोधपरिमण्डल शरीरसंस्थान, स्वाति शरीरसंस्थान, कुब्जशरीरसंस्थान, वामन शरीरसंस्थान और हुण्ड शरीरसंस्थान नाम कर्म । समचतुरस्र अर्थात् समान मान और उन्मानवाला शरीरसस्थान जिस कर्मके उदयसे बनता है वह समचतुरस्र शरीरसस्थान नाम कर्म है । जिस शरीरका परिमण्डल न्यग्रोध अर्थात् वटवृक्षके परिमण्डलके समान होता है वह न्यग्रोधपरिमण्डल संस्थान है उसका निवर्तक नाम कर्म उसी संज्ञावाला है। अर्थात् इस संस्थान वाला शरीर नीचे सूक्ष्म ऊपर विशाल होता है । स्वाति वामीको कहते हैं । स्वातिके समान आकारवाला शरीर जिस कर्मके उदयसे बनता है वह स्वाति शरीर संस्थान नाम कर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीरका आकार कुबड़ा होता है वह कुब्ज शरीर संस्थान नामकर्म है । वामन अर्थात् बौना शरीर जिस कर्मके उदयसे बनता है वह वामन शरीर नामकर्म है । हुण्ड अर्थात् सब ओर से विषम आकार वाला शरीर जिस नाम कर्मके उदयसे बनता है वह हुण्डक शरीर संस्थाननामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे आठो अंगो और उपांगोकी रचना होती है वह अंगोपांग नामकर्म है । वह तीन प्रकारका है-औदारिक अंगोपांग, वैक्रियिक शरीर अंगोपांग और आहारक शरीर अंगोपांग नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें हड्डियोंकी निष्पत्ति होती है वह शरीर संहनन नामकर्म है । वह छः प्रकारका है । वज्ररूपसे स्थित हड्डी और ऋषम अर्थात् वेष्टन इन दोनो के साथ जिसमें वज्रमय कीलें हों वह वज्र ऋषभ नाराच शरीर संहनन है । जिसमें हड्डी और कीलें तो वज्ररूप हो परन्तु ऋषभ वज्रमय न हो वह वज्रनाराच शरीर संहनन है । जिसमे हाड़ कीले सहित हो किन्तु वज्ररूप न हो, वह नाराच संहनन है । कीलसे आधा भिदा हुआ सहनन अर्धनाराच शरीर संहनन है । परस्परमें कीलित संहनन कीलित शरीर संहनन है । जिसमें हड्डियां स्नायुओसे बँधी होती है वह असंप्राप्त सरीसृपादि शरीर संहनन है । इनके कारण जो कर्म हैं उनके भी ये ही नाम हैं। जिस कर्मके उदयसे शरीरमें वर्णकी उत्पत्ति होती है वह वर्णनाम कर्म है । वह पाँच प्रकारका है- कृष्णवर्ण, नीलवर्ण, रुधिर- वर्ण, शुक्लवर्ण और हरित वर्ण नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें गन्धकी उत्पत्ति होती है वह गन्ध नामकर्म है । वह दो प्रकारका है सुगन्ध और दुर्गन्ध नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें रसकी निष्पत्ति होती है वह रस नामकर्म है । वह पांच प्रकारका हैं-तिक्त, कटुक, कषाय, आम्ल और मधुर नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें स्पर्शकी उत्पत्ति होती है वह स्पर्श नामकर्म है । वह आठ प्रकारका है-कर्कश, मृदु, गुरु, लघु, स्निग्ध, रूक्ष, शीत और उष्ण नामकर्म । जिस जीवने पूर्व शरीरको तो छोड़ दिया है किन्तु उत्तर शरीरको अभी ग्रहण नही किया है उसके आत्म प्रदेशोकी रचनापरिपाटी जिस कर्मके उदयसे होती है वह आनुपूर्वी नामकर्म है । वह चार प्रकारका है-नरक गति प्रायोग्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगति प्रायोग्यानुपूर्वी, मनुष्यगति प्रायोग्यानुपूर्वी और देवगति प्रायोग्यानुपूर्वी नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे जीवका शरीर न अति गुरु और न अति लघु होता है वह अगुरुलघु नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीर अपनेको ही पीडाकारी होता है वह उपघात नामकर्म है, जैसे लम्बे सींग आदिका होना । जिस कर्मके उदयसे शरीर दूसरोको पीड़ा करनेवाला होता है वह परघात नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे उच्छ्वास और नि.श्वासकी उत्पत्ति होती है वह उच्छ्वास नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें आताप होता है वह आताप नामकर्म है । उष्णता सहित प्रभाका नाम आताप है । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें उद्योत होता है वह उद्योत नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे भूमिका आश्रय लेकर या बिना उसका आश्रय लिये भी जीवोका आकाशमे गमन होता है वह विहायोगति नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीवोके स्थावरपना होता है वह स्थावर नामकर्म है । जल, अग्नि और वायुकायिक जीवोंमें जो संचरण देखा जाता है उससे उन्हें त्रस नही समझ लेना चाहिए क्योंकि उनका गमनरूप परिणाम पारिणामिक है । जिस कर्मके उदयसे जीव बादर होते हैं वह बादर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीव सूक्ष्म एकेन्द्रिय होते हैं वह सूक्ष्म नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे जीव पर्याप्त होते हैं वह पर्याप्तिनाम कर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीव अपर्याप्त होते हैं वह अपर्याप्ति नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे एक शरीरमे एक ही जीव रहता है वह प्रत्येक शरीर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे अनन्तजीव एक ही शरीरवाले होकर रहते हैं वह साधारण शरीर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें रसादिक धातुओका अपने रूपमें कितने ही काल तक अवस्थान होता है वह स्थिर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे रसादिकका आगेकी धातुरूपसे परिणाम होता है वह अस्थिर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे चक्रवर्तित्व, बलदेवत्व और वासुदेवत्व आदि ऋद्धियो के सूचक शंख, कमल आदि चिह्न अंग-प्रत्यंगोमे हो वह शुभ नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे अशुभ चिह्न हो वह अशुभ नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीवके सौभाग्य होता है वह सुभग नामकर्म है जिस कर्मके उदयसे जीवके दौर्भाग्य होता है वह दुर्भगनामकर्म है जिस कर्मके उदयसे कानोको प्रिय लगनेवाला स्वर हो वह सुस्वर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे कर्णकटु स्वर हो वह दुःस्वर नामकर्म है । जिस कर्मके उदय से शरीर प्रभायुक्त हो वह आदेय नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीर प्रभाहीन हो या अच्छा कार्य करनेपर भी जीवको गौरव प्राप्त न हो वह अनादेय नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे लोकमे यश हो वह यश कीर्ति नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे अयश हो वह अयश.कीर्ति नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे अंग और उपांगका स्थान और प्रमाण अपनी-अपनी जातिके अनुसार नियमित हो वह निर्माण नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीव पाँच महाकल्याणको को प्राप्त करके तीर्थका प्रवर्त्तन करता है वह तीर्थङ्कर नामकर्म है । गोत्र कर्मकी दो प्रकृतियां हैं-उच्चगोत्र और नीचगोत्र । जिनका दीक्षायोग्य साधु आचार हैं, साधु आचारवालोके साथ जिन्होने सम्बन्ध स्थापित किया है तथा जो आर्य कहलाते हैं उन पुरुषोकी सन्तानको उच्चगोत्र कहा जाता है । उनमें उत्पत्तिका कारणभूत कर्म भी उच्च गोत्र है उससे विपरीत कर्म नीचगोत्र है । अन्तरायकर्मकी पाँच प्रकृतियां हैं-दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय, उपभोगान्तराय और लाभान्तराय । रत्नत्रयसे युक्त जीवोके लिए अपने वित्तका त्याग करनेको दान कहते हैं । इच्छित अर्थकी प्राप्ति होना लाभ है । जो एक बार भोगा जाये वह भोग है जो पुन पुनः भोगा जाये वह उपभोग है । वीर्यका अर्थ शक्ति है । इनकी प्राप्तिमें विघ्न करनेवाला अन्तराय कर्म है । इस प्रकार आठों कर्मोंकी


असुहसुहाणं भेया सव्वा वि य ताउ होंति पयडीओ ।
काऊण पज्जयठिदिं सुहदुक्खं फलंति जीवाणं ॥८५॥

अर्थ: वे सभी कर्म प्रकृतियां अशुभ और शुभके भेदसे दो प्रकारकी होती हैं तथा एक पर्यायमें स्थिति करके जीवोको सुख और दु खरूप फल देती हैं ॥८५॥


सुरणरणारयतिरिआ पयडीओ णामकम्मणिव्वत्ता ।
जहण्णोक्कस्समज्झिम आउवलेणं तिहा हु ठिदी ॥८६॥

अर्थ: देवगति, मनुष्यगति, नरकगति और तिर्यञ्चगति ये नामकर्मकी प्रकृतियां है । जघन्य उत्कृष्ट, और मध्यमके भेदसे आयुकी तीन स्थितियाँ हैं ॥८६॥


अंतमुहुत्तं अवरा वरा हु मणुवाण होइ पल्लतियं ।
मज्झिम अवरा वड्ढी जाव वरं समयपरिहीणं ॥८७॥

अर्थ: मनुष्योंकी जघन्य आयुका प्रमाण एक अन्तर्मुहूर्त है और उत्कृष्ट आयुका प्रमाण तीन पल्य है । मध्यम आयुका प्रमाण एक समय अधिक अन्तर्मुहूर्तसे लेकर उत्कृष्ट आयु तीन पल्यमें एक समय कम तक जानना ॥८७॥


जह मणुए तह तिरिए गब्भजपँचिंदिए वि तण्णेयं ।
इयराणं बहुभेया आरिसमग्गेण णायव्वा ॥८८॥

अर्थ: जैसे मनुष्योमे जघन्य उत्कृष्ट और मध्यम आयुका प्रमाण बतलाया है वैसे ही गर्भज पञ्चेन्द्रिय तिर्यञ्चोंमें भी जानना । शेष तिर्यञ्चोके बहुत भेद आगमके द्वारा जानना चाहिए ॥८८॥


सहस दस सुरणिरये वासा अवरा वरा हु तेतीसं ।
सायरठिदीण संखा सेसं मणुआणमिव मुणह ॥८९॥

अर्थ: देवो और नारकियोकी जघन्य आयुका प्रमाण दस हजार वर्ष है और उत्कृष्ट आयुका प्रमाण तेतीस सागर है । शेष-मध्यम आयुका प्रमाण मनुष्योकी तरह जानना ॥८९॥


पंचावत्थजुओ सो चउविहदुक्खेन दुक्खिओ य तहा।
तावदु कालं जीओ जाव ण भावेइ परमसब्भावं ॥९०॥

अर्थ: जब तक जीव अपने परमसद्भावकी भावना नही करता तब तक पांच अवस्थाओंसे युक्त होता हुआ चार प्रकारके दुःखोंसे दुखी रहता है ॥९०॥


पंचावत्था देहे कम्मादो होइ सयलजीवाणं ।
उप्पत्ती बालत्तं जोवण बुड्ढंत होइ तह मरणं ॥९१॥

अर्थ: उत्पत्ति, बालपना, युवावस्था, बुढ़ापा और मरण ये पाँच अवस्थाएँ सब जीवोंके शरीरमे कर्मके उदयसे होती है ॥९१॥


सहजं खुधाइजादं णइमित्तं सीदवादमादीहिं ।
रोगादिआ य देहज अणिट्ठजोए तु माणसियं ॥९२॥

अर्थ: भूख प्यास आदिसे होनेवाला दुःख सहज है। शीत वायु आदिसे होनेवाला दुःख नैमित्तिक है। रोग आदिसे होनेवाला दु ख देहज है और अनिष्ट संयोगसे होनेवाला दु ख मानसिक है ॥९२॥


विभावादो बंधो मोक्खो सब्भावभावणालोणो ।
तं खु णएणं णच्चा पच्छा आराहओ जोई ॥९३॥

अर्थ: विभावसे बन्ध होता है और स्वभावमे लीन होने से मोक्ष होता है। नयके द्वारा इसे जानने के पश्चात् योगी आराधक होता है ॥९३॥


एवं सियपरिणामी बज्झदि मुच्चेदि दुविहहेदूहिं ।
ण विरुज्झदि बंधाई जह’ ण्येते विरुज्झेई ॥९४॥

अर्थ: इस प्रकार स्याद्वाददृष्टिसे सम्पन्न व्यक्ति अन्तरंग बहिरंग कारणोसे बँधता और छूटता है । जैसे एकान्तवादमें बन्ध और मोक्षकी व्यवस्थामे विरोध आता है वैसे अनेकान्तवादमे विरोध नही आता ॥९४॥


जे सामण्णेणुत्ता गुणपज्जयदव्ववाणं लक्खणं संखा ।
णयविसयदंसणत्थे ते चेव विसेसवो भणिमो ॥९५॥

अर्थ: नयोंके विषयको दिखानेके लिए गुण, पर्याय और द्रव्यका लक्षण तथा संख्याका पहले सामान्य कथन किया । अब उन्हीका विशेषरूपसे कथन करते हैं ॥९५॥


गयणं पोग्गल जीवा धम्माधम्मं खु कालदव्वं च ।
भणियव्वा अणुकमसो जहट्ठिया गयणगब्भेसु ॥९६॥

अर्थ: आकाश, पुद्गल, जीव, धर्म, अधर्म और कालद्रव्य आकाशके गर्भमे जिस प्रकारसे स्थित हैं, क्रमशः उनका कथन करते हैं । अर्थात् आकाशमें स्थित सब द्रव्योंके स्वरूपादिका कथन करते हैं ॥९६॥


चेयणरहियममुत्तं अवगाहलक्खणं च सव्वगयं ।
लोयालोयविभेयं तं णहदव्वं जिणुद्दिट्ठं ॥९७॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने आकाशद्रव्यको अचेतन, अमूर्तिक, व्यापक और अवगाह लक्षणवाला कहा है । वह लोक और अलोकके भेदसे दो रूप है ॥९७॥


जीवेहि पुग्गलेहि य धम्माधम्मेहि जं च कालेहि ।
उच्छण्णं तं लोगं सेसमलोगं हवे णंतम् ॥९८॥

अर्थ: आकाशका जो भाग जीवोसे, पुद्गलोंसे, धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य और कालद्रव्यसे व्याप्त है वह लोक है और शेष अनन्त आकाश अलोक है ॥९८॥


लोगमणादणिहणं अकिट्टिमं तिविहभेयसंठाणं ।
खंधावो तं भणियं पोग्गलदव्वाण सव्वदरसीहिं ॥९९॥

अर्थ: लोक अनादिनिधन है, अकृत्रिम है, पुद्गलद्रव्योंके स्कन्धसे तीन भेद रूप आकारवाला है ऐसा सर्वज्ञ सर्वदर्शी जिनेन्द्रने कहा है ॥९९॥


मुत्तो एयपदेसी कारणरूवोणु कज्जरूवो वा ।
तं खलु पोग्गलदव्वं खंधा ववहारदो भणिया ॥१००॥


वण्ण रस गंध एक्कं फासा दो जस्स संति समयम्मि ।
तं इह मुत्तं भणियं अवरवरं कारणं जं च ॥१०१॥


दव्वाणं च पएसे जो हु विहत्तो हु कालसंखाणं ।
णियगुणपरिणामादो कत्ता सो चेव खंधाणं ॥१०२॥

अर्थ: जैसे लोकमें चन्द्र, सूर्य, तारे आदि स्वभावसे ही बने हैं वैसे ही आकाशके मध्यमे लोकका आकार, स्वभावसे ही बना है, ऐसा जिनदेवने कहा है । न वह ऊपर जाता है, न नीचे जाता है और न तिर्यग् रूपसे । अगुरुलघु गुणके कारण उसका गमनागमन नही होता ॥ वह द्रव्योंके प्रदेशोका और कालकी संख्याका विभाग करता है । वही अपने गुणोके परिणमनसे स्कन्धोका कर्ता है ॥१८२॥


खंधा बादरसुहुमा णिप्पण्णं तेहिं लोयसंठाणं ।
कम्मं णोकम्मं चिय जं बंधो हवइ जीवाणं ॥१०३॥

अर्थ: स्कन्ध बादर भी होते हैं और सूक्ष्म भी होते हैं । लोकका आकार उन्हींसे बना है । कर्म और नोकर्म भी पौद्गलिक स्कन्ध हैं जो जीवोंके साथ बन्धको प्राप्त होते हैं ॥१०३॥


जीवा हु तेवि दुविहा मुक्का संसारिणो य बोहव्वा ।
मुक्का एयपयारा विविहा संसारिणो णेया ॥१०४॥

अर्थ: जीव भी दो प्रकारके हैं-मुक्त जीव और संसारी जीव । मुक्त जीव एक ही प्रकारके होते हैं और संसारी जीव अनेक प्रकारके जानना चाहिए ॥१०४॥


पहु जीवत्तं चेयण उवयोग अमृत्त मुत्तदेहसमं ।
कत्ता हु होइ भुत्ता तहेव कम्मेण संजुत्तो ॥१०५॥

अर्थ: प्रभु है, जीव है, चेतन है, उपयोगमय है, अमूर्तिक है, मूर्तिक शरीर प्रमाण है, कर्ता है, भोक्ता है और कर्मसे संयुक्त है ॥१०५॥


णट्ठट्ठकम्मसुद्धा असरीरा णंतसोक्खणाणड्ढा ।
परमपहुत्तं पत्ता जे ते सिद्धा हु खलु मुक्का ॥१०६॥

घाईकम्मेखयादो केवलणाणेण विदिवपरमट्ठो ।
उवविट्ठसयलतच्चो लद्धसहावो पहू होई ॥१०७॥

अर्थ (गाथा 106 से 107): आठो कर्मोंको नष्ट कर देनेसे जो शुद्ध हैं, शरीरसे रहित हैं, अनन्त सुख और अनन्त ज्ञानसे परिपूर्ण है, परम प्रभुत्वको प्राप्त वे सिद्ध मुक्तजीव हैं। घातिकर्मोंके क्षयसे प्रकट हुए केवलज्ञानके द्वारा जिनने परमार्थको जाना है, और समस्त तत्त्वोका उपदेश दिया है, आत्मस्वभावको प्राप्त वह प्रभु होता है ॥१०६-१०७॥


कम्मकलंकालीणा अलद्धससहावभावसद्भावा ।
गुणमग्गणजीवट्ठिय जीवा संसारिणो भणिया ॥१०८॥

अर्थ: जो कर्ममलरूपी कलंकसे युक्त हैं, जिन्होंने अपने स्वभावको प्राप्त नही किया और न अपने अस्तित्वको ही जाना है तथा जो गुणस्थान मार्गणास्थान और जीवसमासोंमें स्थित हैं उन जीवोंको संसारी कहा है ॥१०८॥


'जो जीवदि जीवस्सदि जीवियपुव्वो हु चदुहि पाणेहिं ।
सो जीवो णायव्वो इंदिय बलमाउ उस्सासो ॥१०९॥

अर्थ: जो इन्द्रिय, बल, आयु, श्वासोच्छ्वास इन चार प्राणोके द्वारा जीता है, आगे जियेगा और पहले जिया था, उसे जीव जानना चाहिए ॥१०९॥


२जीवे भावाभावो केण पयारेण सिद्धि संभवई ।
अह संभवइ पयारो सो जीवो णत्थि संदेहो ॥११०॥

अर्थ: जीवमे भाव और अभावकी सिद्धि किस प्रकारसे संभव है ? यदि ऐसा प्रकार संभव है तो वह जीव है इसमें कोई सन्देह नही है ॥११०॥


ते हूँ’ति चदुवियप्पा ववहार-असुद्ध-सुद्ध-परिणामा ।
अण्णे विय बहुभेया णायव्वा अण्णमग्गेण ॥१११॥

अर्थ: जीवमे भावाभावको बतलानेवाले प्रकारके चार भेद हैं-व्यवहार, अशुद्ध, शुद्ध और परिणाम । अन्य मार्गसे अन्य भी बहुत भेद जानने चाहिए ॥१११॥


मणवय णकाय इंदिय आणप्पाणाउगं च जं जीवे ।
तमसद्भूओ भणदि हु ववहारो लोयमज्झम्मि ॥११२॥

अर्थ: जीवमे जो मनोबल, वचनबल, कायबल, इन्द्रिय, श्वासोच्छ्वास और आयु प्राण हैं यह लोकमे असद्भूत व्यवहारनयका कथन है ॥११२॥


ते चेव भावरूवा जीवे खओवसमदो य ।
ते होति भावपाणा असुद्धणिच्छयणयेण णायव्वा ॥११३॥

अर्थ: जीवमे कर्मोंके क्षयोपशमसे होनेवाले वे ही भावरूप इन्द्रिय आदि भाव प्राण होते हैं और वे अशुद्ध निश्चय नयसे जीवके प्राण जानना चाहिए ॥११३॥


सुद्धो जीवसहावो जो रहिओ दव्वभावकम्मेहिं ।
सो सुद्धणिच्छयादो समासिओ सुद्धणाणीहिं ॥११४॥

अर्थ: द्रव्य और भावकर्मोंसे रहित जीवका जो शुद्ध स्वभाव है उसे शुद्ध ज्ञानियोंने शुद्ध निश्चय-नयसे जीवका स्वभाव कहा है ॥११४॥


जो खलु जीवसहावो णो जणिओ णो खयेण संभूदो ।
कम्माणं सो जीवो भणिओ इह परमभावेण ॥११५॥

अर्थ: जीवका जो स्वभाव न तो उत्पन्न होता है और न कर्मोंके क्षयसे होता है, परमभाव रूपसे उसे ही जीव कहा है ॥११५॥


आदा चेदा भणिओ सा इह फलकज्जणाणभेदा हु ।
तिण्हं पि य संसारी णाणो खलु णाणदेहा हु ॥११६॥

अर्थ: आत्माको चेतन कहा है । वह चेतना कर्मफल चेतना, कर्मचेतना, और ज्ञानचेतनाके भेदसे तीन प्रकारकी है । संसारी जीवके तीनों चेतना होती है, किन्तु ज्ञानचेतना ज्ञानशरीरी केवलज्ञानियोंके होती है ॥११६॥


थावर फलेसु चेदा तस उहयाणं पि होंति णायव्वा ।
अहव असुद्धे णाणे सिद्धा सुद्धेसु णाणेसु ॥११७॥

अर्थ: स्थावर जीवोंके कर्मफल चेतना जानना और त्रस जीवोंके कर्मफल और कर्मचेतना जानना । अथवा इन जीवोंके अशुद्ध ज्ञानचेतना अर्थात् अज्ञानचेतना होती है और सिद्ध जीवोंके शुद्ध ज्ञानचेतना होती है ॥११७॥


उवओगमआ२ जीवा उवओगो णाणदंसणो भणिओ ।
णाणं अट्ठपयारं चउभेयं दंसणं णेयं ॥११८॥

अर्थ: सभी जीव उपयोगमय है । उपयोगके दो भेद कहे है-ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग । ज्ञानोपयोगके आठ भेद हैं और दर्शनोपयोगके चार भेद जानना चाहिए ॥११८॥


रूवरसगंधफासा सद्दवियप्पा वि णत्थि जीवस्स ।
णो संठाणं किरिया तेण अमुत्तो हवे जीवो ॥११९॥

अर्थ: जीवमें न रूप है, न रस है, न गन्ध है,-न स्पर्श है, न शब्दके विकल्प हैं, न आकार है, न क्रिया है इस कारणसे जीव अमूर्तिक है ॥११९॥


जो हु अमुत्तो भणिओ जीवसहावो जिणेहि परमत्थो ।
उवयरियसहावादो अचेयणो मुत्तिसंजुत्तो ॥१२०॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने जो जीवको अमूर्तिक कहा है वह जीवका परमार्थ स्वभाव है । उपचरित स्वभावसे तो मूर्तिक और अचेतन है ॥१२०॥


गुरुलघुदेहपमाणो अत्ता चत्ता हु सत्तसमुघायं ।
ववहारा णिच्छयदो असंखदेसो हु सो णेओ ॥१२१॥

अर्थ: व्यवहारनयसे सात समुद्घातोंको छोडकर जीव अपने छोटे या बड़े शरीरके बराबर है और निश्चयनयसे उसे असंख्यातप्रदेशी जानना चाहिए ॥१२१॥


देहा य हुंति दुविहा थावरतसभेददो य १ विण्णेया ।
थावर पंचपयारा बादरसुहुमा वि चदु तसा तह य ॥१२२॥

अर्थ: स्थावर और त्रसके भेदसे शरीर दो प्रकारके होते हैं । स्थावर पाँच प्रकारके होते हैं । तथा वे बादर भी होते हैं और सूक्ष्म भी होते हैं । तथा त्रस दोइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चौइन्द्रिय और पंचेन्द्रियके भेदसे चार प्रकारके होते हैं ॥१२२॥


देहजुदो सो भोत्ता भोत्ता सो चेव होई इह कत्ता ।
कत्ता पुण कम्मजुदो जीवो संसारिओ भणिओ ॥१२३॥

कम्मं दुविहवियप्पं भावसहावं च दव्वसब्भावं ।
भावे सो णिच्छयदो कत्ता चवहारदो दव्वे ॥१२४॥

अर्थ (गाथा 123 से 124): बौद्ध, सांख्य और सदाशिववादियोंके प्रति जीवके भोक्तृत्व आदिका कथन करते हैं- जो जीव शरीरसे युक्त है वह भोक्ता है और जो भोक्ता है वही कर्ता है । तथा कर्मोंसे युक्त संसारी जीवको कर्ता कहा है ॥१२३॥ कर्मके दो भेद हैं-भावकर्म और द्रव्यकर्म । निश्चयनयसे जीव भावकर्मका कर्ता है और व्यवहारसे द्रव्यकर्मका कर्ता है ॥१२४॥


बंधो अणाइणिहणो संताणादो जिणेहि जो भणिओ ।
सो चेव साइणिहणो जाण तुमं समयबंधेण ॥१२५॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने जो कर्मबन्ध सन्तानरूपसे अनादि निधन कहा है उसे ही तुम प्रतिसमय होनेवाले बन्धकी अपेक्षा सादिसान्त जानो ॥१२५॥


कारणदो इह भव्वे णासइ बंधो वियाण कस्सेव ।
ण हु तं अभवियसत्ते जम्हा पयडो ण मुंचेइ ॥१२६॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन आदि कारणोंके होनेपर भव्य जीवके कर्मबन्ध नष्ट हो जाता है ऐसा जानो । किन्तु अभव्य जीवके बन्धकी परम्परा कभी भी नष्ट नही होती । क्योकि वह अपने अभव्यत्वरूप स्वभावको कभी नही छोड़ता ॥१२६॥


खंधा जे पुव्वुत्ता हवंति कम्माणि जीवभावेण ।
लद्धा पुण ठिदिकालं गलंति ते णियफलं दत्ता ॥१२७॥

अर्थ: पहले जो पुद्गलस्कन्धोका कथन किया है वे पुद्गलस्कन्ध जीवके भावोका निमित्त पाकर स्वयं ही कर्मरूप हो जाते हैं और अपने स्थिति कालतक ठहरने के वाद अपना फल देकर गल जाते हैं ॥१२७॥


भोत्ता हु होइ जइया तइया सो कुणइ रायमादीहिं ।
एवं बंधो जीवे णाणावरणादिकम्मेहिं ॥१२८॥

अर्थ: जब वह जीव पूर्वबद्ध कर्मोंका फल भोगता है तो रागद्वेष रूप परिणमन करता है इस तरह-से जीवमें ज्ञानावरणादिक कर्मोंका बन्ध होता रहता है ॥१२८॥


मिच्छे मिच्छाभावो सम्मे सम्मो वि होइ जीवाणं ।
वत्थू णिमित्तमेत्तं सरायपरिणामवीयरायाए ॥१२९॥

अर्थ: जीवोके मिथ्यात्व अवस्थामें मिथ्याभाव होते हैं और सम्यक्त्व अवस्थामे सम्यक् भाव होते हैं । सराग परिणाम और वीतराग परिणाममे बाह्य वस्तु तो निमित्त मात्र है ॥१२९॥


कम्मं कारणभूयं देहं कज्जं खु अक्ख देहादो ।
अक्खादु विसयरागं रागादि णिबज्झदे तंपि ॥१३०॥

तेण चउग्गइदेहं गेह्णइ पंचप्पयारियं जीवो ।
एवं तं गिह्णंतो पुणो पुणो बंधदे कम्मं ॥१३१॥

इह इव मिच्छादिट्ठी कम्मं संजणइ कम्मभावेहिं ।
जह बीयं कुरणायं तं तं अवरोप्परं तह य ॥१३२॥

अर्थ (गाथा 130 से 132): कर्म कारणभूत है, उसका कार्य शरीर है। शरीरमे इन्द्रियाँ होती हैं। इन्द्रियोसे विषयोमें राग होता है उससे रागादिका बन्ध होता है। इस नवीन बन्धसे चतुर्गतिमे जीव औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्माणके भेदसे पाँच प्रकारके शरीरको ग्रहण करता है। इस तरह उसको ग्रहण करता हुआ जीव पुनः पुनः कर्मका बन्ध करता है। ऐसे ही मिथ्यादृष्टि कर्मसे कर्मको उत्पन्न करता है। जैसे बीजांकुर न्यायमे बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है और अंकुरसे बीज उत्पन्न होता है वैसे ही कर्मके सम्बन्धमे भी जानना चाहिए ॥१३०-१३२॥


लोयपमाणममुत्तं अचेयणं गमणलक्खणं धम्मं।
तप्पडिरूवमधम्मं ठाणे सहयारिणं णेयं ॥१३३॥

अर्थ: धर्मद्रव्य लोकाकाशके बराबर प्रमाणवाला है, अमूर्तिक है, अचेतन है, जीव और पुद्गलों के गमनमें सहायक होना उसका लक्षण है। उसीके समान अधर्मद्रव्य है किन्तु वह चलते हुओंके ठहरनेमे सहायक है ॥१३३॥


लोयालोयविभेयं गमणं ठाणं च जाण हेदूहिं।
जइ णहु ताणं हेऊ कह लोयालोयववहारं ॥१३४॥

अर्थ: लोक और अलोकका भेद तथा गमन और ठहरना ये सब बिना कारणोके नही हो सकते। यदि इनका कोई कारण न होता तो लोक अलोक व्यवहार कैसे होता ? ॥१३४॥


एयपएसि अमुत्तो अचेयणो वट्टणागुणो कालो ।
लोयायासपएसे थक्का ते रयणरासिव्व ॥१३५॥

अर्थ: कालद्रव्य एक प्रदेशी है, अमूर्तिक है, अचेतन है, वर्तनागुणवाला है । कालद्रव्यके वे अणु रत्नोकी राशिकी तरह लोकाकाशके प्रदेशोंपर स्थित है ॥१३५॥


परमत्थो जो कालो सो चिय हेऊ हवेइ परिणामे ।
पज्जयठिदि उवयरिओ ववहारादो य णायव्वो ॥१३६॥

अर्थ: यह जो परमार्थ या निश्चयकाल है वह परिणामका कारण है । पर्यायकी स्थिति उपचारितकाल है और वह व्यवहारसे जाननी चाहिए ॥१३६॥


एयम्मि पएसे खलु इयरपएसा य पंच णिद्दिट्ठा।
ताणं कारणकज्जे उहय सरूवेण णायव्वं॥
पुग्गलमज्झत्थोयं कालाणू मुक्खकारणं होई।
समओ अरूवि जह्मा पुग्गलमुत्तो ण सोक्खो हु ॥१३७॥

अर्थ: एक प्रदेशमे शेष पांचो द्रव्योके प्रदेश कहे है अर्थात् धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य, जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य और कालद्रव्यके प्रदेश एक ही आकाशप्रदेशके साथ रहते हैं । सब आपसमें हिले-मिले होनेपर भी अपना-अपना स्वभाव नही छोड़ते । उनका कारण और कार्य दोनो ही अपने-अपने स्वभावके अनुसार ही जानना चाहिए । जिसका जो कार्य है वह वही कार्य करता है और उसमे वही कारण होता है, अन्य द्रव्य नही । पुद्गलोके मध्यमें स्थित कालाणु मुख्य कारण है क्योकि कालद्रव्य अमूर्तिक है । और पुद्गलद्रव्य मूर्तिक है इसलिए वह मुख्य कारण नही है ॥१३७॥


समयावलि उस्सासो थोवो लव णालिया मुहुत्त दिणं।
पक्खं च मास वरिसं जाण इमं सयल ववहारं ॥१३८॥

अर्थ: समय, आवली, उच्छ्वास, लव, नाली, मुहूर्त, दिन, पक्ष, मास, वर्ष, यह सब व्यवहारकाल है ॥१३८॥


णहएयपएसत्थो परमाणू मंदगइपवट्टंतो ।
वीयमणंतरखेत्तं जावदियं जादि तं समयकालं ॥१३९॥

अर्थ: आकाशके एक प्रदेशमें स्थित पुद्गल परमाणु मन्दगतिसे चलता हुआ जितने कालमें अपने अनन्तरवर्ती प्रदेशमें जाता है उसे समय कहते हैं ॥१३९॥


जेत्तियमेत्तं खेत्तं अणुणा रुद्धं खु गयणदव्वस्स ।
तं च पएसं भणियं जाण तुमं सव्वदरसीहि ॥१४०॥

अर्थ: आकाशके जितने क्षेत्रको पुद्गलका परमाणु रोकता है अर्थात् पुद्गलका एक परमाणु आकाशके जितने क्षेत्रमे रहे उतने क्षेत्रको सर्वज्ञदेवने प्रदेश कहा है ऐसा तुम जानो ॥१४०॥


गयणं दुविहायारं धम्माधम्मं च लोगदो णेयं ।
विविहा पोग्गलजीवा कालं परमाणुमिव भणियं ॥१४१॥

सव्वेसि पज्जाया लोगे अवलोइया हु णाणीहि ।
तह्मा लोयं कज्जं कारणभूदाणि दव्वाणि ॥१४२॥

अर्थ (गाथा 141 से 142): आकाशद्रव्यके दो प्रकार हैं-एक लोकाकाश और दूसरा अलोकाकाश । लोकमें धर्मद्रव्य अधर्मद्रव्य, अनेक प्रकारके पुद्गल और अनेक प्रकारके जीव रहते हैं। कालद्रव्यको परमाणुकी तरह अणुरूप कहा है ॥ ज्ञानी सर्वज्ञदेवने सब द्रव्योंकी पर्यायोंको लोकमें देखा है इसलिए लोक-कार्य है और द्रव्य कारणरूप है ॥१४१-१४२॥


सव्वत्थ अत्थि खंधा बादरसुहुमा वि लोयमज्झम्मि ।
थावर तहेव सुहुमा तसा हु तसनाडिमज्झम्मि ॥१४३॥

अर्थ: लोकके मध्यमे सर्वत्र बादर और सूक्ष्म स्कन्ध रहते हैं । उसी तरह सूक्ष्म और बादर स्थावर जीव तथा त्रसजीव भी रहते हैं । किन्तु त्रसजीव त्रसनालीमे ही रहते है ॥१४३॥


अहु उड्ढे लोयंता चउरंसा एक्करज्जुपरिमाणा ।
चउदहरज्जुच्छेधा लोयं सयतिण्णितेयालं ॥१४४॥

अर्थ: नीचेसे लेकर ऊपर लोकके अन्तपर्यन्त त्रसनाली है । वह चौकोर है, एकराजु उसका विस्तार है और चौदहराजु ऊँचाई है । तथा लोकका क्षेत्रफल ३४३ राजु है ॥१४४॥


विगयसिरो कडिहत्थो ताडियजंघो जुवाणरो उड्ढो ।
तेणायारेण ठिओ तिविहो लोगो मुणेयव्वो ॥१४५॥

अर्थ: एक युवा मनुष्य सिर ऊँचा करके दोनो पैरोको फैलाकर और दोनो हाथोंको कमरपर रखकर खड़ा हो, उसका जैसा आकार होता है वैसा ही आकार तीन प्रकारके लोकका जानना ॥१४५॥


दव्वे खेत्ते काले भावे भावा फुडं पलोएज्जा ।
एवं हि थोवबहुगा णायव्वा एण मग्गेण ॥१४६॥

अर्थ: द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा भावोंको स्पष्ट रूपसे जानना देखना चाहिए । इस प्रकार इस मार्गसे भावोंका अल्पबहुत्व भी जानना चाहिए ॥१४६॥


'सव्वेसिं अतियत्तं णियणियगुणपज्जएहि संजुत्तं ।
पंचेव अत्थिकाया उवविट्ठा बहुपदेसादो ॥१४७॥

अर्थ: अपने-अपने गुणपर्यायोंसे संयुक्त सभी द्रव्य अस्तित्त्वरूप हैं । किन्तु उनमें-से पांच द्रव्योंको ही अस्तिकाय कहा है क्योकि वे बहुप्रदेशो है ॥१४७॥


'जीवे धम्माधम्मे हुंति पदेसा हु संख्यपरिहीणा ।
गयणे णंतानंता तिविहा पुण पोग्गले णेया ॥१४८॥

अर्थ: जीवद्रव्य, धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्यमे असंख्यात प्रदेश होते हैं । आकाशमे अनन्तानन्त प्रदेश है और पुद्गलमे संख्यात असंख्यात तथा अनन्त प्रदेश जानना चाहिए ॥१४८॥


जोवाजीव तहासव बंधो संवरण णिज्जरा मोक्खो ।
एदेहिं सत्ततच्चा सवित्थरं पवयणे जाण ॥१४९॥

अर्थ: जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा, मोक्ष, इन सात तत्त्वोको विस्तारपूर्वक आगमसे जानना चाहिए ॥१४९॥


भणिया जीवाजीवा पुव्वं जे हेउ आसवाईणं ।
ते आसवाइ तच्चं साहिज्जं तं णिसामेह ॥१५०॥

अर्थ: पहले जो जीव अजीव आस्रव आदिके हेतु कहे थे उन आस्रवादि तत्त्वोंको साधते है उसे सुने ॥१५०॥


दुविहं आसवमग्गं णिद्दिठ्ठं दव्वभावभेदेहिं ।
मिच्छत्ताइचउक्कं जीवे भावासवं भणियं ॥१५१॥

अर्थ: द्रव्यास्रव और भावास्रवके भेदसे आस्रवमार्ग दो प्रकारका कहा है । जीवमे पाये जानेवाले मिथ्यात्व अविरति कषाय और योगको भावास्रव कहा है ॥१५१॥


लद्धूण तण्णिमित्तं जोगं जं पुग्गलं पदेसत्थं ।
परिणमदि कम्मरूवं तंपि हु दव्वासवं जीवे ॥१५२॥

अर्थ: उन मिथ्यात्व आदिरूप जीवके भावोंका निमित्त पाकर जीवके प्रदेशोंमें स्थित कर्मरूप होने योग्य जो पुद्गल कर्मरूपसे परिणत होते हैं वह द्रव्यास्रव है ॥१५२॥


अप्पपएसा मुत्ता पुग्गलसत्तो सहाविहा णेया ।
अण्णोण्णं मिल्लंता बंधो खलु होइ णिद्धाइ ॥


कम्मादपदेसाणं अण्णोण्णपवेसणं कसायादो ।
बंधो चउव्विहो खलु ठिदिपयदिपदेसमणुभागा ॥१५३॥

२जोगा पयदिपदेसा ठिदिअणुभागा कसायदो होंति ।
एवं बंधसरूवं णायव्वं जिणवरे भणियं ॥१५४॥

अर्थ (गाथा 153 से 154): कर्म और आत्माके प्रदेशोका परस्परमे प्रवेशरूप बन्धकषायसे होता है वह बन्ध चार प्रकारका है-प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध ॥ प्रकृतिबन्ध और प्रदेशबन्ध योगसे होते है और स्थितिबन्ध तथा अनुभागबन्ध कषायसे होते हैं । इस प्रकार जिनेन्द्रभगवान्‌के द्वारा कथित बन्धका स्वरूप जानना चाहिए ॥१५३-१५४॥


रुंधिय छिद्दसहस्से जलजाणे जह जलं तु णासवदि ।
मिच्छत्ताइअभावे तह जीवे संवरो होई ॥१५५॥

अर्थ: आत्माके प्रदेशोंमें और मूर्त पुद्गलोंमें इस प्रकारकी शक्ति जाननी चाहिए कि दोनो परस्परमें मिलकर स्निग्ध आदिकी तरह बन्धको प्राप्त होते है । जैसे जलयान (नाव) के हजारो छिद्रोको बन्द कर देनेपर उसमे पानी नही आता, वैसे ही मिथ्यात्व आदिका अभाव होनेपर जीवमें संवर होता है ॥१५५॥


चिरबद्धकम्मणिवहं जीवपदेसा हु जं च परिगलइ ।
सा णिज्जरा पउत्ता दुविहा सविपक्क अविपक्का ॥१५६॥

सयमेव कम्मगलणं इच्छारहियाण होइ सत्ताणं ।
सविपक्क णिज्जरा सा अविपक्कमुवायकरणादो ॥१५७॥

अर्थ (गाथा 156 से 157): जीवके प्रदेशोंके साथ चिरकालसे बँधे हुए कर्मसमूहकी परिगलना ( झड़ना ) को निर्जरा कहते हैं । उस निर्जराके दो भेद हैं-सविपाक निर्जरा और अविपाक निर्जरा ॥ इच्छाके बिना प्राणियोंके जो स्वयं ही कर्म विगलित होते हैं वह सविपाक निर्जरा है । और उपाय करनेसे जो कर्मोंकी निर्जरा होती है वह अविपाक निर्जरा है ॥१५६-१५७॥


जं अप्पसहावादो मूलोत्तरपयडिसंचियं मुयदि ।
तं मुक्खं अविरुद्धं दुविहं खलु दव्वभावगयं ॥१५८॥

अर्थ: जो आत्म स्वभावसे, संचित मूल और उत्तर प्रकृतियोसे छूटना है । उसे मोक्ष कहते है वह मोक्ष आत्मस्वभावके अविरुद्ध है अर्थात् आत्मस्वभाव रूप ही है । उसके भी दो भेद हैं-द्रव्य मोक्ष और भाव मोक्ष ॥१५८॥


जीवाइ सत्ततच्चं पण्णत्तं जं जहत्थरूवेण ।
तं चेव णवपयत्था सपुण्णपावा पुणो होंति ॥१५९॥

अर्थ: यथार्थरूपसे जो जीवादि सात तत्त्व कहे है उन्हींमें पुण्य और पापको मिलानेसे नौ पदार्थ होते हैं ॥१५९॥


सुहवेदं सुहगोदं सुहणामं सुहाउगं हवे पुण्णं ।
तव्विवरीयं पावं जाण तुमं दव्वभावभेदेहिं ॥१६०॥

अर्थ: शुभ वेदनीय शुभ गोत्र शुभ नाम और शुभ आयु ये पुण्य कर्म हैं और उसके विपरीत अर्थात् अशुभ वेद अशुभ गोत्र अशुभ नाम और अशुभ आयु पाप कर्म हैं। ये कर्म द्रव्य और भावके भेदसे भेदरूप हैं ॥१६०॥


अहवा कारणभूदा तेसिं वयअव्वयाई इह भणिया ।
ते खलु पुण्णं पावं जाण इमं पवयणे भणियं ॥१६१॥

अर्थ: अथवा उन कर्मोंके कारणभूत जो व्रत अव्रत आदि यहां कहे हैं उन्हे पुण्य और पापरूप जानो, ऐसा आगममें कहा है ॥१६१॥


अज्जीव पुण्णपावे असुद्धजीवे तहासवे बंधे ।
सामी मिच्छादिट्ठी सम्माइट्ठी हवदि सेसे ॥१६२॥

सामी सम्मादिट्ठी जीवे संवरणणिज्जरा मोक्खो ।
सुद्धे चेयणरूवे तह जाण सुणाणपच्चक्खं ॥१६३॥

अर्थ (गाथा 162 से 163): अजीव, पुण्य, पाप, अशुद्धजीव, आस्रव और बन्धका स्वामी तो मिथ्यादृष्टि है और शेषका स्वामी सम्यग्दृष्टि है ॥ शुद्ध चेतनरूप जीव, संवर, निर्जरा और मोक्षका स्वामी सम्यग्दृष्टि है। ऐसा सम्यग्ज्ञानसे प्रत्यक्ष जानो ॥१६२-१६३॥


णच्चा दव्वसहावं जो सद्धाणगुणमंडिओ णाणी ।
चारित्तरयणपुण्णो पच्छा सो णिव्वुदिं लहइ ॥१६४॥

अर्थ: इस तरह जो द्रव्योंके स्वभावको जानकर श्रद्धागुण ( सम्यग्दर्शन ) से सुशोभित हुआ ज्ञानी चारित्ररूपी रत्नसे परिपूर्ण होता है, अर्थात् सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान पूर्वक चारित्रको धारण करता है वह मोक्षको प्राप्त करता है ॥१६४॥


वीरं विसयविरत्तं विगयमलं विमलणाणसंजुत्तं ।
पणविवि वीरजिणिंदं पमाणणयलक्खणं वोच्छं ॥१६५॥

अर्थ: कर्मोंको जीतनेसे वीर, विषयोंसे विरक्त, कर्ममलसे रहित और निर्मल केवलज्ञानसे युक्त जिनेन्द्र महावीरको नमस्कार करके प्रमाण और नयका लक्षण कहूँगा ॥१६५॥


जस्स ण तिवग्गकरणं णहु तस्स तिवग्गसाहणं होई ।
वग्गतियं जइ इच्छह ता तियवग्गं सुणहु पढमं ॥१६६॥

अर्थ: जो त्रिवर्गको नही जानता वह त्रिवर्गका साधन नही कर सकता । अतः यदि त्रिवर्गकी इच्छा है तो पहले त्रिवर्ग को जानो ॥१६६॥


णिक्खेव णय पमाणं छद्दव्वं सुद्ध एव जो अप्पा ।
तक्क पवयणणामं अज्झप्पं होइ हु तिवग्गं ॥१६७॥

अर्थ: निक्षेप नय और प्रमाण तो तर्क या युक्ति रूप प्रथम वर्ग है, छह द्रव्योंका निरूपण प्रवचन या आगम रूप दूसरा वर्ग है और शुद्ध आत्मा अध्यात्मरूप तीसरा वर्ग है इस प्रकार यह त्रिवर्ग है ॥१६७॥


कज्जं सयलसमत्थं जीवो साहेइ वत्थुगहणेण ।
वत्थू पमाणसिद्धं तम्हा तं जाण णियमेण ॥१६८॥

अर्थ: जीव वस्तुको ग्रहण करके सकल समर्थ कार्यको सिद्ध करता है । और वस्तुकी सिद्धि प्रमाणके द्वारा होती है इसलिए उस प्रमाणको नियमसे अवश्य जानना चाहिए ॥१६८॥


गेण्हइ वत्थुसहावं अविरुद्धं सम्मसरूव जं णाणं ।
भणियं खु तं पमाणं पच्चक्खपरोक्खभेएहि ॥१६९॥

अर्थ: जो ज्ञान वस्तुके यथार्थ स्वरूपको सम्यक्रूपसे जानता है उसे प्रमाण कहते है । उसके दो भेद हैं-प्रत्यक्ष और परोक्ष ॥१६९॥


'मइसुइ परोक्खणाणं ओहीमणं होइ वियलपच्चक्खं ।
केवलणाणं च तहा अणोवमं सयलपच्चक्खं ॥१७०॥

अर्थ: मतिज्ञान और श्रुतज्ञान परोक्ष हैं । अवधिज्ञान और मनःपर्ययज्ञान विकल प्रत्यक्ष है तथा केवलज्ञान अनुपम सकल प्रत्यक्ष है ॥१७०॥

श्री-माइल्लधवल-कृत द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र (भाग 2/3)

वत्थू पमाणविसयं णयविसयं हवइ वत्थुएकंसं ।
जं दोहि णिण्णयदं तं णिक्खेवे हवइ विसयं ॥१७१॥

अर्थ: वस्तु प्रमाणका विषय है और वस्तुका एक अंश नयका विषय है । और जो अर्थ प्रमाण और नयसे निर्णीत होता है वह निक्षेपका विषय है ॥१७१॥


णाणासहावभरियं वत्थुं गहिऊण तं पमाणेण ।
एयंतणासणट्ठं पच्छा णयजुंजणं कुणह ॥१७२॥

अर्थ: अनेक स्वभावोसे परिपूर्ण वस्तुको प्रमाणके द्वारा ग्रहण करके तत्पश्चात् एकान्तवादका नाश करनेके लिए नयोकी योजना करनी चाहिए ॥१७२॥


जं णाणीण वियप्पं सुवासयं वत्थुअंससंगहणं ।
तं इह णयं पउत्तं णाणी पुण तेण णाणेण ॥१७३॥

अर्थ: श्रुतज्ञानके आश्रयको लिये हुए ज्ञानीका जो विकल्प वस्तुके अंशको ग्रहण करता है उसे नय कहते है । उस ज्ञानसे जो युक्त होता है वह ज्ञानी है ॥१७३॥


जम्हा णएण विणा होइ ण णरस्स सियवायपडिवत्ती ।
तम्हा सो बोहव्वो एयंतं हंतुकामेण ॥१७४॥

अर्थ: नयके बिना मनुष्यको स्याद्वादका बोध नही हो सकता । इसलिए जो एकान्तका विरोध करना चाहता है उसे नयको जानना चाहिए ॥१७४॥


जह सत्थाणं माई सम्मत्तं तह तवाइगुणणिलए ।
धाउवाए रसो तह णयमूलं अणेयंते ॥१७५॥

अर्थ: जैसे शास्त्रोंका मूल अकारादि वर्ण हैं, तप आदि गुणोके भण्डार साधुमें सम्यक्त्व है, धातुवादमे पारा है, वैसे ही अनेकान्तका मूल नय है ॥१७५॥


तच्चं विस्सवियप्पं एयवियप्पेण साहए जो हु ।
तस्स ण सिज्झइ वत्थू किह एयन्तं पसाहेदि ॥१७६॥

अर्थ: तत्त्व तो नाना विकल्प रूप है उसे जो एक विकल्पके द्वारा सिद्ध करता है उसको वस्तुकी सिद्धि नही होती । तब वह कैसे एकान्तका साधन कर सकता है ॥ १७६ ॥


सर्वथैकान्तरूपेण यदि जानाति वास्तवम् ।
भूरिधर्मात्मकं वस्तु केन निश्चीयते स्फुटम् ॥


झाणं झाणभासं झाणस्स तहेव भावणा भणिया ।
मोत्तु झाणाभासं दोहिं पिय संजुओ समणो ॥१७७॥

झाणस्स भावणे वि य ण हु सो आराहओ हवे णियमा ।
जो ण विजाणइ वत्थुं पमाणणयणिच्छयं किच्चा ॥१७८॥

अर्थ (गाथा 177 से 178): ध्यान, ध्यानाभास और ध्यानकी भावना कही है । श्रमणको ध्यानाभास छोड़कर ध्यान और ध्यानकी भावना करना चाहिए । किन्तु जो प्रमाण और नयका निश्चय करके वस्तुको नहीं जानता वह ध्यानकी भावना होनेपर भी नियमसे आराधक नहीं है ॥१७७-१७८॥


प्रमाणनयनिक्षेपैर्योऽर्थान्नाभिसमीक्षते ।
युक्तं चायुक्तवद्भाति तस्यायुक्तं च युक्तवत् ॥१७९॥

अर्थ: पँचरंगे चित्रमें-से एक रंगका ग्रहण करनेवाला क्रम या अक्रम रूपसे कैसे ग्रहण कर लेता है । यदि सर्वथा एकान्त रूपसे जानना वास्तविक है तो अनेक धर्मात्मक वस्तुका निश्चय कैसे करते हो ॥ अर्थात् जैसे पचरंगे चित्रमें-से एक रगका ग्रहण होता है वैसे ही अनेक धर्मात्मक वस्तुमें से ज्ञाता एक धर्मका ग्रहण करता है । यह नयके बिना सम्भव नहीं है । अतः एकान्तकी सिद्धिके लिए नयको अपनाना आवश्यक है । प्रमाण और नयके स्वरूपका निश्चय होनेपर वस्तुका निश्चय होता है और वस्तुका निश्चय होनेपर सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती है । इस तरह वस्तु स्वरूपके निश्चय और सम्यग्दर्शनके द्वारा जीव ध्यान और ध्यानकी भावनाका आराधक होता है ॥१७९॥


एयंतो एयणओ होइ अणेयंत तस्स समूहो ।
तं खलु णाणवियप्पं सम्मं मिच्छं च णायव्वं ॥१८०॥

अर्थ: एक नयको एकान्त कहते है और उसके समूहको अनेकान्त कहते हैं । यह ज्ञानका भेद है जो सच्चा और मिथ्या होता है ॥१८०॥


जे णयदिट्ठिविहीणा ताण ण वत्थुसहावउवलद्धि ।
वत्थुसहावविहूणा सम्मादिट्ठी कहं हुंति ॥१८१॥

अर्थ: जो नयदृष्टिसे विहीन है उन्हे वस्तुके स्वरूपका ज्ञान नही हो सकता और वस्तुके स्वरूपको न जाननेवाले सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकते हैं ॥१८१॥


णिच्छयववहारणया मूलिमभेया णयाण सव्वाणं ।
णिच्छयसाहणहेउं पज्जयदव्वत्थियं मुणह ॥१८२॥

अर्थ: निश्चयनय और व्यवहारनय सब नयोंके मूल भेद हैं निश्चयके साधनमे कारण पर्यायार्थिक और द्रव्यार्थिक जानो ॥१८२॥


दो चेव य मूलणया भणिया दव्वत्थ पज्जयत्थगया ।
अण्णे असंखसंखा ते तन्भेया मुणेयव्वा ॥१८३॥

अर्थ: द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ये दो ही मूल नय कहे हैं। अन्य असंख्यात संख्याको लिये हुए उन दोनोंके ही भेद जानने चाहिए ॥१८३॥


णेग्गमं संग्रह ववहार तह रिजुसुत्तसद्दअभिरूढा ।
एवंभूदा णव णया वि तह उवणया तिणिण ॥१८४॥

अर्थ: नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ( इन् सात नयोंमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिकको मिलानेसे ) नौ नय है तथा तीन उपनय हैं ॥१८४॥


दव्वत्थो दहभेयं छब्भेयं पज्जयत्थियं णेयं ।
तिविहं च णइगमं तह दुविहं पुण संग्रहं तत्थ ॥१८५॥

ववहारं रिजुसुत्तं दुवियप्पं सेसमाहु एक्केक्का ।
उत्ता इह णयभेया उवणयभेया वि पभणामो ॥१८६॥

अर्थ (गाथा 185 से 186): द्रव्यार्थिक नयके दस भेद है, पर्यायार्थिक नयके छह भेद हैं। नैगम नयके तीन भेद हैं, संग्रह नयके दो भेद है। व्यवहारनय और ऋजुसूत्र नयके दो-दो भेद हैं। शेष शब्द, समभिरूढ और एवंभूत एक-एक ही है। इस प्रकार नयके भेद कहे। उपनयके भेद आगे कहते हैं ॥१८५-१८६॥


सद्भूदमसद्भूदं उवयरियं चेव दुविहि सम्भूवं ।
तिविहं पि असन्भूवं उवयरियं जाण तिविहं पि ॥१८७॥

अर्थ: उपनय तीन हैं-सद्भूत, असद्भूत और उपचरित। सद्भूतनयके दो भेद हैं, असद्भूत नयके तीन भेद है और उपचरितके भी तीन भेद हैं ॥१८७॥


दव्वत्थिएसु दव्वं पज्जायं पज्जयट्ठिए विसयं ।
सब्भूवासब्भूवे उवयरियं चदु णव तियत्थं ॥१८८॥

अर्थ: द्रव्यार्थिक नयोका विषय द्रव्य है और पर्यायार्थिक नयोका विषय पर्याय है। सद्भूत व्यवहारनयके अर्थ चार हैं, असद्भूत व्यवहारनयके अर्थ नौ है और उपचरितनयके अर्थ तीन हैं ॥१८८॥


पज्जयं गउणं किच्चा दव्वंपि य जो हु गिण्हइ लोए ।
सो दव्वत्थिय भणिओ विवरीओ पज्जयत्थिओ ॥१८९॥

अर्थ: जो पर्यायको गौण करके द्रव्यका ग्रहण करता है उसे द्रव्यार्थिकनय कहते है और जो द्रव्यको गौण करके पर्यायको ग्रहण करता है उसे पर्यायार्थिकनय कहते है ॥१८९॥


कम्माणं मज्झगदं जीवं जो गहइ सिद्धसंकासं ।
भण्णइ सो सुद्धणओ खलु कम्मोवाहिणिरवेक्खो ॥१९०॥

अर्थ: जो कर्मोंके मध्यमे स्थित अर्थात् कर्मोंसे लिप्त जीवको सिद्धोंके समान शुद्ध ग्रहण करता है उसे कर्मोपाधि निरपेक्ष शुद्ध द्रव्यार्थिकनय कहते हैं ॥१९०॥


उप्पादवयं गउणं किच्चा जो गहइ केवला सत्ता ।
भण्णइ सो सुद्धणओ इह सत्तागाहओ समए ॥१९१॥

अर्थ: उत्पाद और व्ययको गौण करके जो केवल सत्ताको ग्रहण करता है उसे आगममें सत्ताग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिकनय कहते हैं ॥१९१॥


गुणगुणिआइचउक्के अत्थे जो णो करेइ खलु भेयं ।
सुद्धो सो दव्वत्थी भेयवियप्पेण णिरवेक्खो ॥१९२॥

अर्थ: गुण-गुणी आदि चतुष्करूप अर्थमे जो भेद नही करता, वह भेदविकल्पनिरपेक्ष शुद्ध द्रव्यार्थिक नय है ॥१९२॥


भावे सरायमादी सव्वे जीवामिह जो दु जंपेदि ।
सो हु असुद्धो उत्तो कम्माणउवाहिसावेक्खो ॥१९३॥

अर्थ: जो सब रागादिभावोको जीवका कहता है या रागादिभावोंको जीव कहता है वह कर्मोपाधि सापेक्ष अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय है ॥१९३॥


उप्पादवयविमिस्सा सत्ता गहिऊण भणइ तिवयत्तं ।
दव्वस्स एयसमए जो सो हु असुद्धओ विद्दिओ ॥१९४॥

अर्थ: जो नय उत्पाद व्ययके साथ मिली हुई सत्ताको ग्रहण करके द्रव्यको एक समयमें उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप कहता है वह अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय है ॥१९४॥


भेए सवि संबंधं गुणगुणीयाईंहि कुणइ जो दव्वे ।
सो वि असुद्धो दिट्ठो सहिओ सो भेयकप्पेण ॥१९५॥

अर्थ: जो नय द्रव्यमे गुण गुणी आदिका भेद करके उनके साथ सम्बन्ध कराता है वह भेद कल्पना सापेक्ष अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय है क्योकि वह भेद कल्पनासे सहित है ॥१९५॥


णिस्सेससहावाणं अण्णयरूवेण सव्वदव्वेहिं ।
विवहावं जहि जो सो अण्णयदव्वत्थिओ भणिओ ॥१९६॥

अर्थ: समस्त स्वभावोंमें जो यह द्रव्य है इस प्रकार अन्वयरूपसे द्रव्यकी स्थापना करता है वह अन्वय द्रव्यार्थिक नय है ॥१९६॥


सद्दव्वादिचउक्के संतं दव्वं खु गिण्हए जो हु ।
जियदव्वादिसु काही सो इयरो होइ विवरीओ ॥१९७॥

अर्थ: जो स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावमे वर्तमान द्रव्यको ग्रहण करता है वह स्वद्रव्यादिग्राहक द्रव्यार्थिकनय है । और जो परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावमे असत् द्रव्यको ग्रहण करता है वह पर द्रव्यादिग्राहकद्रव्यार्थिकनय है ॥१९७॥


गेण्हइ दव्वसहावं असुद्धसुद्धोवयारपरिचत्तं ।
सो परमभावगाही णायव्वो सिद्धिकामेण ॥१९८॥

अर्थ: जो अशुद्ध, शुद्ध और उपचरित स्वभावसे रहित परमस्वभावको ग्रहण करता है वह परम भाव ग्राही द्रव्यार्थिकनय है । उसे मोक्षके अभिलाषीको जानना चाहिए ॥१९८॥


अक्किट्टिमा अणिहणा ससिसूराईय पज्जया गाही ।
जो सो अणाइणिच्चो जिणभणिओ पज्जयत्थियओ ॥१९९॥

अर्थ: जो अकृत्रिम और अनिधन अर्थात् अनादि अनन्त चन्द्रमा सूर्य आदि पर्यायोको ग्रहण करता है उसे जिन भगवान्‌ने अनादिनित्य पर्यायार्थिकनय कहा है ॥१९९॥


कम्मेखयादुपण्णो अविणासी जो हु कारणाभावे ।
इदमेवमुच्चरंतो भण्णइ सो साइणिच्च णओ ॥२००॥

अर्थ: जो पर्याय कर्मोंके क्षयसे उत्पन्न होनेके कारण सादि है और विनाशका कारण न होनेसे अविनाशी है, ऐसी सादि नित्य पर्यायको ग्रहण करनेवाला सादि नित्य पर्यायार्थिकनय है ॥२००॥


सत्तो अमुक्खरूवे उप्पादवयं हि गिहणए जो हु ।
सो हु सहावाणिच्चो गाहो खलु सुद्धपज्जाओ ॥२०१॥

अर्थ: जो सत्ताको गौण करके उत्पाद व्ययंको ग्रहण करता है उसे अनित्य स्वभावको ग्रहण करनेवाला शुद्ध पर्यायार्थिकनय कहते है ॥२०१॥


जो गहइ एयसमये उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं ।
सो सब्भावाणिच्चो असुद्ध पज्जत्थियो णेयो ॥२०२॥

अर्थ: जो एक समयमे उत्पाद व्यय और ध्रौव्यसे युक्त पर्यायको ग्रहण करता है वह स्वभाव अनित्य अशुद्ध पर्यायार्थिकनय है ॥२०२॥


देहीणं पज्जाया सुद्धा सिद्धाण भणइ सारिच्छा ।
जो सो १अणिच्चसुद्धो पज्जयगाही हवे स णओ ॥२०३॥

अर्थ: जो संसारी जीवोंकी पर्यायको सिद्धोंके समान शुद्ध कहता है वह अनित्य शुद्ध पर्यायार्थिकनय है ॥२०३॥


भणइ अणिच्चासुद्धा चउगइजीवाण पज्जया जो हु ।
होइ विभावअणिच्चो असुद्धओ पज्जैयत्थिओ ॥२०४॥

अर्थ: जो चार गतियोंके जीवोंकी अनित्य अशुद्ध पर्यायका कथन करता है वह विभाव अनित्य अशुद्ध पर्यायार्थिकनय है ॥२०४॥


णिप्पण्णमिव पयंपदि भाविपदत्थं खु३ जो अणिप्पण्णं ।
अप्पत्थे जह पत्थं भणइ सो भाविणइगमृत्ति णओ ॥२०५॥

अर्थ: जो अनिष्पन्न भावि पदार्थको निष्पन्नकी तरह कहता है उसे भाविनैगमनय कहते हैं। जैसे अप्रस्थको प्रस्थ कहना ॥२०५॥


णिव्वत्तअत्थकिरिया वट्टणकाले तु जं समायरणं ।
तं भूदणइगमनयं जहेज्जदिणं णिव्वुओ२ वीरो ॥२०६॥

अर्थ: जो कार्य हो चुका उसका वर्त्तमानकालमे आरोप करना भूत नैगमनय है जैसे, आजके दिन भगवान् महावीरका निर्वाण हुआ था ॥२०६॥


पारद्धा जा किरिया पचणविहाणादि कहइ जो सिद्धा ।
लोएसु पुच्छमाणो भण्णइ तं वट्टमाणणयं ॥२०७॥

अर्थ: जो प्रारम्भ की गयी पकाने आदिकी क्रियाको लोगोके पूछनेपर सिद्ध या निष्पन्न कहना है वह वर्तमान नैगमनय है ॥२०७॥


अवरोप्परमविरोहे सव्वं अत्थित्ति४ सुद्धसंगहणे ।
होइ तमेव असुद्धं इगिजाइविसेसगहणेण ॥२०८॥


जं संगहेण गहियं भेयइ अत्थं असुद्ध सुद्धं वा ।
सो ववहारो दुविहो असुद्धसुद्धत्थभेयकरो ॥२०९॥

अर्थ: जो संग्रहनयके द्वारा गृहीत शुद्ध अथवा अशुद्ध अर्थका भेद करता है वह व्यवहारनय है । उसके भी दो भेद हैं-अशुद्ध अर्थका भेद करने वाला और शुद्ध अर्थका भेद करनेवाला ॥२०९॥


जो एयसमयवट्टी गेण्हइ दव्वे धुवत्तपज्जायं ।
सो रिउसुत्तो सुहुमो सव्वंपि सद्दं जहा खणियं ॥२१०॥

मणुवाइयपज्जाओ मणुसोत्ति सगट्ठिदीसु वट्टंतो ।
जो भणइ तावकालं सो थूलो होइ रिउसुत्तो ॥२११॥

अर्थ (गाथा 210 से 211): जो द्रव्यमें एक समयवर्ती अध्रुवपर्यायको ग्रहण करता है उसे सूक्ष्म ऋजु सूत्र नय कहते है जैसे सभी शब्द क्षणिक है और जो अपनी स्थितिपर्यन्त रहनेवाली मनुष्य आदि पर्यायको उतने समय तक एक मनुष्य रूपसे ग्रहण करता हैं वह स्थूलऋजुसूत्रनय है ॥२१०-२११॥


जो वट्टणं ण मण्णइ एयत्थे भिण्णलिंगआईणं ।
सो सद्दणओ भणिओ णेओ पुंसाइआण जहा ॥२१२॥

अहवा सिद्धे सद्दे कीरइ जं किंपि अत्थववहारं ।
तं खलु सद्दे विसयं देवो सद्देण जह देवो ॥२१३॥

अर्थ (गाथा 212 से 213): जो एक अर्थमे भिन्न लिंग आदिवाले शब्दोकी प्रवृत्तिको स्वीकार नही करता उसे शब्दनय कहते है । जैसे पुष्य आदि शब्दोमे लिंगभेद होनेसे अर्थभेद जानना चाहिए । अथवा सिद्ध शब्दमे जो कुछ अर्थका व्यवहार किया जाता है वह शब्दनयका विषय है जैसे देवशब्दसे देव अर्थ लिया जाता है ॥२१२-२१३॥


सद्दारूढो अत्थो अत्यारूढो तहेव पुण सद्दो ।
भणइ इह समभिरूढो जह इंद पुरंदरो सक्को ॥२१४॥

अर्थ: जो अर्थको शब्दारूढ और शब्दको अर्थारूढ कहता है वह समभिरूढनय है । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर ॥२१४॥


जं जं करेइ कम्मं देही मणवय णकायचेट्ठादो ।
तं तं खु णामजुत्तो एवंभूदो हवे स णओ ॥२१५॥

अर्थ: प्राणी मन, वचन और कायकी चेष्टासे जो-जो क्रिया करता है उस-उस नामसे युक्त होता है यह एवंभूतनयका मन्तव्य जानना चाहिए ॥२१५॥


पढमतिया दव्वत्थी पज्जयगाही य इयर जे भणिया ।
ते चदु अत्थपहाणा सद्दपहाणा हु तिण्णियेरा ॥२१६॥

अर्थ: पहिलेके तीन नय द्रव्यार्थिक है बाकीके नय पर्यायिको ग्रहण करते है । प्रारम्भके चार नय अर्थप्रधान है और शेष तीन नय शब्दप्रधान हैं ॥२१६॥


पण्णवण भाविभूदे अत्थे इच्छदि य वट्टणं जो सो ।
सव्वेसिं च णयाणं उवरिं खलु संपलोइज्जा ॥२१७॥


पण्णैव ण भाविभूदे अत्थे जो सो हु भेदपज्जाओ ।
अह तं एवंभूदो संभवदो मुणह अत्थेसु ॥२१८॥


गुणेपज्जयदोदव्वे कारकसन्भावदों य दव्वेसु ।
सण्णाईहिय भेयं कुणइँ सब्भूयसुद्धियरो ॥२१९॥

अर्थ: शुद्धसद्भूत व्यवहारनय गुण और पर्यायके द्वारा द्रव्यमे तथा कारक भेदसे द्रव्योमे संज्ञा आदिके द्वारा भेद करता है ॥२१९॥


दव्वाणं खु पएसा बहुगा ववहारदो य एक्केण ।
अण्णेण य णिच्छयदो भणिया का तत्थ खलु हवे जुत्ती ॥२२०॥

अर्थ: एक आचार्यने व्यवहारनयसे द्रव्योके बहुत प्रदेश कहे है । अन्य आचार्यने निश्चयनयसे द्रव्यके बहुत प्रदेश कहे हैं । इसमे क्या युक्ति है ॥२२०॥


एक्कपएसे दव्वं णिच्छयदो भेयकप्पणारहिए ।
सब्भूएणं बहुगा तस्स य ते भेयकप्पणासहिए ॥२२१॥

अर्थ: भेदकल्पना रहित निश्चयनयसे द्रव्य एक प्रदेशी है और भेदकल्पना सहित सद्भूत व्यवहारनयमे बहुत प्रदेशी है ॥२२१॥


अण्णेसिं अण्णगुणा भणइ असब्भूय तिविह भेदोवि ।
सज्जाइ इयर मिस्सो णादव्वो तिविहभेदजुदो ॥२२२॥

अर्थ: जो अन्यके गुणोंको अन्यका कहता है वह असद्भूत व्यवहारनय है। उसके तीन भेद हैं सजाति, विजाति और मिश्र तथा उनमे से भी प्रत्येकके तीन-तीन भेद हैं ॥२२२॥


दव्वगुणपज्जयाणं उवयारं ताण होइ तत्थेव ।
दव्वे गुणपज्जाया गुणदवियं पज्जया णेया ॥२२३॥

पज्जाए दव्वगुणा उवयरियं वा हु बंधसंजुत्ता ।
संबंधे संसिलेसे णाणीणं णेयमादीहि ॥२२४॥

अर्थ (गाथा 223 से 224): द्रव्यमें द्रव्यका, गुणमे गुणका, पर्यायमे पर्यायका, द्रव्यमे गुण और पर्यायका गुणमे द्रव्य और पर्यायका और पर्यायमें द्रव्य और गुणका उपचार करना चाहिए। यह उपचार बन्धसे संयुक्त अवस्था मे तथा ज्ञानीका ज्ञेय आदिके साथ सम्बन्ध होने पर किया जाता है ॥२२३-२२४॥


एयंदियाइदेहा णिव्वत्ता जे वि पोग्गले काए।
ते जो भणेइ जीवा ववहारो सो विजाईओ ॥२२५॥

अर्थ: पोद्गलिक कायमें जो एकेन्द्रिय आदिके शरीर बनते है उन्हे जो जीव कहता है वह विजातीय असद्भूत व्यवहारनय है ॥२२५॥


मुत्तं इह मइणाणं मुत्तिमदव्वेण जण्णिओ जहा।
जइ णहु मुत्तं ताणं तो किं खलिओ हु मुत्तेण ॥२२६॥

अर्थ: मतिज्ञान मूर्तिक है क्योकि मूर्तिक द्रव्यसे पैदा होता है यदि मतिज्ञान मूर्त न होता तो मूर्तके द्वारा वह स्खलित क्यो होता ॥२२६॥


दट्ठूणं पडिबिंबं लवदि हु तं चेव एस पज्जाओ ।
सज्जाइ असन्भूओ उवयरिओ णियस्सजाइपज्जाओ ॥२२७॥

अर्थ: प्रतिबिम्बको देखकर यह वही पर्याय है ऐसा कहा जाता है। यह स्वजाति पर्यायमें स्वजाति पर्यायका उपचार करनेवाला असद्भूत व्यवहारनय है ॥२२७॥


णेयं जीवमजीवं तं पिय णाणं खु तस्स विसयादो ।
जो भणइ एरिसत्थं ववहारो सो असन्भूदो ॥२२८॥

अर्थ: ज्ञेय जीव भी है और अजीव भी है ज्ञानके विषय होनेसे उन्हे जो ‘ज्ञान’ कहता है वह असद्भूत व्यवहारनय है ॥२२८॥


परमाणु एयदेशी बहुयपदेसो पयंपए जो हु ।
सो ववहारो णेओ दव्वे पज्जायउवयारो ॥२२९॥

अर्थ: जो एकप्रदेशी परमाणुको बहुप्रदेशी कहता है उसे द्रव्यमें पर्यायका उपचार करनेवाला असद्भूत व्यवहारनय जानना चाहिए ॥२२९॥


रूवं पि भणइ दव्वं ववहारो अण्णअत्थसंभूदो ।
सेओ जह पासाओ गुणेसु दव्वाण उवयारो ॥२३०॥

अर्थ: अन्य अर्थमें होनेवाला व्यवहार रूपको भी द्रव्य कहता है जैसे सफेद पत्थर । यह गुणोमे द्रव्यका उपचार है ॥२३०॥


णाणं पि हु पज्जायं परिणममाणो दु गिण्हए जम्हा ।
ववहारो खलु जंपइ गुणेसु उवयरियपज्जाओ ॥२३१॥

अर्थ: परिणमनशील ज्ञानको पर्याय रूपसे कहा जाता है इसे गुणोमे पर्यायका उपचार करनेवाला असद्भूत व्यवहारनय कहते है ॥२३१॥


दट्ठूण थूलखंधं पुग्गलदव्वेत्ति जंपए लोए ।
उवयारो पज्जाए पुग्गलदव्वस्स भणइ ववहारो ॥२३२॥

अर्थ: स्थूल स्कन्धको देखकर लोकमे उसे ‘यह पुद्गल द्रव्य है’ ऐसा कहते है। इसे पर्यायमें पुद्गल द्रव्यका आरोप करनेवाला व्यवहारनय कहते हैं ॥२३२॥


दट्ठूण देहठाणं वण्णंतो होइ उत्तमं रूवं ।
गुण उवयारो भणिओ पज्जाए णत्थि संदेहो ॥२३३॥

अर्थ: शरीरके आकारको देखकर उसका वर्णन करते हुए कहना कि कैसा उत्तम रूप है, यह पर्यायमें गुणका उपचार है इसमे सन्देह नही ॥२३३॥


सव्वत्थ पज्जयादो संतो भणिओ जिणेहि ववहारो ।
जस्स ण हवेइ संतो हेऊ दोण्हंपि तस्स कुदो ॥२३४॥

अर्थ: जिनेन्द्रदेवने सर्वत्र पर्यायरूपसे व्यवहारको सत् कहा है । जो व्यवहारको सत् नही मानता उसके मतमे संसार और मोक्षके कारण कैसे बनेगे ॥२३४॥


चउगइ इह संसारो तस्स य हेऊ सुहासुहं कम्मं ।
जइ ता मिच्छा किह सो संसारो संखमिव तस्स मए ॥२३५॥

अर्थ: यह चार गतिरूप संसार है उसके हेतु शुभ और अशुभ कर्म हैं । यदि वह मिथ्या है तो उसके मतमे सांख्यकी तरह वह संसार कैसे बनेगा ॥२३५॥


एंदियादिदेहा जीवा ववहारदो य जिणदिट्ठा ।
हिंसादिसु जदि पापं सव्वत्थवि किण्ण ववहारो ॥२३६॥

अर्थ: जिनेन्द्र देवने व्यवहारनयसे एकेन्द्रिय आदि जीवोंके शरीरको जीव कहा है । यदि उनकी हिंसा करनेमे पाप है तो सर्वत्र व्यवहार क्यो नही मानते ॥२३६॥


बंधेव मोक्खहेऊ अण्णो ववहारदो य णायव्वो ।
णिच्छयदो१ णिय भावो भणिओ खलु सव्वदरसीहिं ॥२३७॥

अर्थ: व्यवहारनयसे बन्धकी तरह मोक्षका हेतु भी अन्य जानना चाहिए। किन्तु निश्चयनयसे सर्वदर्शी भगवान्ने निजभावको बन्ध और मोक्षका कारण कहा है ॥२३७॥


जो चिय जीवसहावो णिच्छयदो होइ सव्वजीवाणं ।
सो चिय भेदुवयारो जाण फुडं होइ ववहारो ॥२३८॥

अर्थ: निश्चयनयसे जो जीव स्वभाव सब जीवोमें होता है भेदोपचारसे वह भी व्यवहार है ऐसा स्पष्ट जानो ॥२३८॥


भेदुवयारं णिच्छय मिच्छादिट्ठीण मिच्छरूवं खु ।
सम्मे सम्मा भणिया तेहि दु बंधो व मोक्खो वा ॥२३९॥

अर्थ: मिथ्यादृष्टियोका भेदरूप उपचार तथा निश्चय मिथ्या होता है ओर सम्यग्दृष्टियोका सम्यक् होता है । उन्हीसे बन्ध अथवा मोक्ष होता है ॥२३९॥


ण मुणइ वत्थुसहावं अह विवरीयं णिरवेक्खदो मुणई ।
तं इह मिच्छाणाणं विवरीयं सम्मँरूवं खु ॥२४०॥

अर्थ: जो वस्तु-स्वरूपको नही जानता या निरपेक्ष रूपसे विपरीत जानता है वह मिथ्याज्ञान है और उससे विपरीत सम्यग्ज्ञान है ॥२४०॥


णो उवयारं कीरइ णाणस्स दंसणस्स वा णेए ।
किह णिच्छित्ती णाणं अण्णेसिं होइ णियमेण ॥२४१॥

अर्थ: ज्ञान और दर्शनका ज्ञेयमे उपचार नही किया जाता । तब नियमसे अन्य पदार्थोंके निश्चय को ज्ञान कैसे कहा जा सकता है ॥२४१॥


असद्भूतव्यवहार.


उवयारा उवयारं सच्चासच्वेसु उभयअत्थेसु ।
सज्जाइइयरमिस्सो उवयरिओ कुणइ ववहारो ॥२४२॥

अर्थ: सत्य, असत्य और सत्यासत्य पदार्थोंमे तथा स्वजातीय, विजातीय और स्वजातिविजातीय पदार्थोंमे जो एक उपचारके द्वारा दूसरे उपचारका विधान किया जाता है उसे उपचरितासद्भूत व्यवहारनय कहते हैं ॥२४२॥


देसवई देसँत्थो अत्थवैणिज्जो तहेव जंपंतो ।
मे देसं मे दव्वं सच्चासच्चंपि उभयत्थं ॥२४३॥

अर्थ: देशका स्वामी कहता है कि यह देश मेरा है, या देशमें स्थित व्यक्ति कहता है कि देश मेरा है या व्यापारी- अर्थका व्यापार करते हुए कहता है कि मेरा धन है तो यह सत्य असत्य और सत्यासत्य उपचरितअसद्भूतव्यवहार नय है ॥२४३॥


पुत्ताइबंधुवग्गं अहं च मम संपयाइ जप्पंतो ।
उवयरियसद्भूओ सजाइव्वेसु णायव्वो ॥२४४॥

अर्थ: पुत्र आदि बन्धुवगंरूप मे हूँ या यह सब सम्पदा मेरी है इस प्रकारका कथन स्वजाति उपचरित असद्भूतव्यवहार नय है ॥२४४॥


आहरणहेमरयणं वच्छादीया ममेदि जप्पंतो ।
उवयरियअसद्भूओ विजाइदव्वेसु णायव्वो ॥२४५॥

अर्थ: आभरण, सोना, रत्न और वस्त्र आदि मेरे है, ऐसा कथन विजातिद्रव्योमे उपचरित असद्भूत व्यवहारनय है ॥२४५॥


देसं व रज्जदुग्गं मिस्सं अण्णं च भणइ मम दव्वं ।
उहयत्थे उवयरिओ होइ असब्भूदववहारो ॥२४६॥

अर्थ: जो देशकी तरह राज्य, दुर्ग आदि अन्य मिश्र-सजातिविजाति द्रव्योको अपना कहता है उसका यह कथन सजाति विजाति उपचरित असद्भूतव्यवहार नय है ॥२४६॥


जीवादिव्वणिवहा जे भणिया विविहभावसंजुत्ता ।
ताण पयासणहेउं पमाणणयलक्खणं भणियं ॥२४७॥

अर्थ: जो अनेक प्रकारके भावोसे संयुक्त जीवादि द्रव्योका समूह आगममे कहा है, उनके प्रकाशन के लिए प्रमाण और नयका लक्षण कहा है ॥२४७॥


दव्वाणं सहावाणं अत्थित्तं मुणसु परमसब्भावं ।
अत्थिसहावा सव्वे अत्थि वि य सव्वभावगयं ॥२४८॥

अर्थ: द्रव्योके स्वभावोमें अस्तित्वको ही परम स्वभाव जानना चाहिए । सभी द्रव्य अस्ति स्वभाव है और अस्ति स्वभाव समस्त भावोमें पाया जाता है ॥२४८॥


इदि तं पमाणविसयं सत्तारूवं खु जं हवे दव्वं ।
णयविसयं तस्संसं सियभिण्णं तंपि पुव्वुत्तं ॥२४९॥

अर्थ: इस प्रकार जो सत्स्वरूप द्रव्य है वह प्रमाणका विषय है और उसका एक अश नयका विषय है । ये प्रमाण और नय परस्परमे कथञ्चिद् भिन्न है यह पहले कहा है ॥२४९॥


सामण्ण अह विसेसे दव्वे णाणं हवेइ अविरोहो ।
साहइ तं सम्मत्तं णहु पुण तं तस्स विवरीयं ॥२५०॥

अर्थ: सामान्य अथवा विशेषरूप द्रव्यमें जो विरोध रहित ज्ञान होता है वह सम्यक्त्वका साधक है, जो उससे विपरीत होता है वह नही ॥२५०॥


सियसावेक्खा सम्मा मिच्छारूवा हु तेवि णिरवेक्खा ।
तम्हा सियसद्भावो विसयं दोहंणपि णायव्वं ॥२५१॥

अर्थ: ‘स्यात्’ सापेक्ष सम्यक् होते है और ‘स्यात्’ निरपेक्ष मिथ्या होते है । अतः स्यात् शब्दसे दोनोंका विषय जानना चाहिए ॥२५१॥


अवरोप्परसावेक्खं णयविसयं अह पमाणविसयं वा ।
तं सावेक्खं भणियं णिरवेक्खं ताण विवरीयं ॥२५२॥

अर्थ: नयका विषय हो या प्रमाणका विषय हो जो परस्परमे सापेक्ष होता है उसे सापेक्ष कहा है और जो उसके विपरीत होता है अर्थात् अन्य निरपेक्ष होता है उसे निरपेक्ष कहा है ॥२५२॥


णियमेणणिसेहणसीलो णिपादणादो य जो हु खलु सिद्धो ।
सो सियसद्दो भणिओ जो सावेक्खं पसाहेदि ॥२५३॥

अर्थ: जो सर्वथा नियमका निषेध करनेवाला है और निपातरूपसे जो सिद्ध है वह ‘स्यात्’ शब्द कहा गया है, वह वस्तुको सापेक्ष सिद्ध करता है ॥२५३॥


त्रिसंज्ञिकोऽयं स्याच्छब्दो युक्तोऽनेकान्तसाधकः ।
निपातनात्समुद्भूतो विरोधध्वंसको मतः ॥२५४॥

अर्थ: प्रमाण, नय और दुर्नयके भेदसे युक्त सात ही भंग होते है । स्यात् सापेक्ष भंगोंको प्रमाण कहते हैं, नयसे युक्त भंगोको नय कहते है और निरपेक्ष भंगोको दुर्नय कहते हैं ॥२५४॥


अत्थित्ति णत्थि दोवि य अव्वत्तव्वं सिएण संजुत्तं ।
अव्वत्तव्वा ते तह पमाणभंगी सुणायव्वा ॥२५५॥

अत्थिसहावं दव्वं सद्वव्वादीसु गाहियणएण ।
तं पिय णत्थिसहावं परदव्वादीहि गहिएण ॥२५६॥

उहयं उहयणएण अव्वत्तव्वं च णैण समुदाए ।
ते तिय अव्वत्तव्वा णियणियणयअत्थसंजोए ॥२५७॥

अर्थ (गाथा 255 से 257): हो सकती । निपातसे इस स्यात् शब्दकी निष्पत्ति हुई है । यह विरोधका नाश करनेवाला है अर्थात् एक ही वस्तुको सर्वथा नित्य और सर्वथा अनित्य मानने में तो विरोध पैदा होता है क्योंकि जो सर्वथा नित्य है, वह अनित्य किस प्रकार हो सकती है और जो सर्वथा अनित्य है वह नित्य किस प्रकार हो सकती है । किन्तु एक ही वस्तुको स्यात् नित्य और स्यात् अनित्य कहनेमें कोई विरोध नही आता । जो किसी अपेक्षासे नित्य है वही अन्य अपेक्षासे अनित्य भी हो सकती है अत स्याद्वाद विरोधका नाशक है । भगवान् केवलीकी दिव्यध्वनिसे इसका जन्म हुआ है अर्थात् केवलज्ञानीने स्याद्वादका आविष्कार किया है क्योंकि जैसे केवलज्ञान सब द्रव्योको एक साथ ग्रहण कर सकता है उस प्रकार केवलज्ञानीकी वाणी भी सबको एक साथ नही कह सकती क्योकि वचनकी प्रवृत्ति तो क्रमसे हो होती है । इसलिए केवलज्ञानके द्वारा ज्ञात अनेकान्तका सूचक या द्योतक शब्द प्रत्येक वाक्यके साथ सम्बद्ध रहता है ऐसा सर्वज्ञ केवलज्ञानीने कहा है । जैसे सिद्ध किया गया एक मन्त्र अनेक अभीष्ट फलोको प्रदान करता है वैसे ही एक ‘स्यात्’ शब्दको भी अनेक अर्थका-अनेक धर्मात्मक पदार्थका साधक जानना चाहिए । स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अस्तिनास्ति, स्यात् अवक्तव्य, स्यादस्ति अवक्तव्य, स्यात् नास्ति अवक्तव्य और स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य ये प्रमाणसप्तभंगी जानना चाहिए । स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावसे द्रव्य अस्तित्वस्वरूप है और परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावसे नास्तिस्वरूप है । स्वद्रव्यादिचतुष्टय परद्रव्यादिचतुष्टयसे अस्ति नास्ति स्वरूप है । दोनों धर्मोको एक साथ करनेकी अपेक्षा अवक्तव्य है । इसी प्रकार अपने-अपने नयके साथ अर्थकी योजना करनेपर अस्ति अवक्तव्य, नास्तिअवक्तव्य और अस्तिनास्ति अवक्तव्य है ॥२५५-२५७॥


अत्थेव णत्थि उभयं अव्वत्तव्वं तहेव पुण तिदयं ।
तहे सिय णयणिरवेक्खं जाणसु दव्वे दुणयभंगी ॥२५८॥

अर्थ: स्यात् पद तथा नयनिरपेक्ष वस्तु अस्ति ही है, नास्ति ही है, उभयरूप,ही है, अवक्तव्य ही है, अस्ति अवक्तव्य ही है, नास्ति अवक्तव्य ही है, अस्तिनास्ति अवक्तव्य ही है यह दुर्नयभंगी जानना चाहिए ॥२५८॥


एकणिरुद्धे इयरो पडिवक्खो अंवेरेय सम्भावो ।
सव्वेसिं स सहावे कायव्वा होइ तह भंगा ॥२५९॥

अर्थ: वस्तुके किसी एक धर्मको ग्रहण करने पर दूसरा उसका प्रतिपक्षी धर्म होता है वे दोनों ही धर्म वस्तुके स्वभाव हैं । सभी वस्तुओंके स्वभावमे सप्तभंगीकी योजना करना चाहिए ॥२५९॥


धम्मी धम्मसहावो धम्मा पुण एक्कएक्कतेणिठ्ठा ।
अवरोप्परं विभिण्णा णयदो गउणमुक्खभावेण ॥२६०॥

अर्थ: धर्मी ( वस्तु ) धर्मस्वभाव होता है और धर्म एक-एक करके वस्तुमे रहते है । वे नयदृष्टिसे गौणता और मुख्यतासे परस्परमें भिन्न होते हैं ॥२६०॥


सियजुत्तो णयणिवहो दव्वसहावं भणेइ इह तत्थं ।
सुणयपमाणा जुत्तो णहु जुत्तिविवज्जियं तच्चं ॥२६१॥

अर्थ: ‘स्यात्’ पदसे युक्त नयसमूह द्रव्यके यथार्थ स्वभावको कहता है । सम्यक् नय और प्रमाणको युक्ति कहते हैं । जो युक्तिसे शून्य है वह तत्त्व नही है ॥२६१॥


तच्चं पि हेयमियरं हेयं खलु होइ ताणे परदव्वं ।
णियदव्वे पिय जाणसु हेयोहेयं च णयजोए ॥२६२॥

अर्थ: तत्त्व भी हेय और उपादेय होता है । पर द्रव्यरूप तत्त्व हेय है । निज द्रव्यमें भी नयके योगसे हेय और उपादेय जानना चाहिए ॥२६२॥


मिच्छा सरागमूढो हेयो आदा हवेइ णियमेण ।
तन्विवरीयो झेओ णायव्वो सिद्धिकामेण ॥२६३॥

अर्थ: मिथ्या दृष्टि और सरागी आत्मा नियमसे हेय है और सम्यक्त्वी वीतरागी आत्मा मुमुक्षुके द्वारा ध्यान करनेके योग्य जानना चाहिए ॥२६३॥


जो सियभेदुवयारं धम्माणं कुणइ एगवत्थुस्स ।
सो ववहारो भणियो विवरीओ णिच्छयो होइ ॥२६४॥

अर्थ: जो एक वस्तुके धर्मोंमें कथंचित् भेदका उपचार करता है उसे व्यवहारनय कहते हैं और उससे विपरीत निश्चयनय होता है ॥२६४॥


एकको चि ज्ञेयरूवो इयरो ववहारदो य तह भणिओ ।
णिच्छयणएण शुद्धो १ सम्मग्गुतियेण णिय अप्पा ॥२६५॥

अर्थ: एक भी ध्येयरूप व्यवहारनयसे भेदरूप कहा गया है। निश्चयनयसे शुद्ध आत्मा ध्येयरूप है और व्यवहारनयसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे युक्त निज आत्मा ध्येय है ॥२६५॥


तिण्णि णया भूदत्था इयरा ववहारदो य तह भणिया ।
दो चेव शुद्धरूवा एक्को गाही य परमभावेण ॥२६६॥

अर्थ: तीन नय भूतार्थ हैं, शेष नय व्यवहारसे कहे गये है । उन तीन नयोंमेंसे दो नय ( शुद्धग्राही होनेसे ) शुद्धरूप हैं और एक नय परमभावका ग्राही होनेसे भूतार्थ है ॥२६६॥


जं जस्स भणिय भावं तं तस्स पहाणदो य तं दव्वं ।
तम्हा ज्ञेयं भणियं णिच्छयणय णिच्छिओ अत्यो ॥२६७॥

अर्थ: जिस वस्तुका जो स्वभाव कहा है उसका, प्रधानरूपसे वही द्रव्यरूप होता है इसलिए निश्चयनयके द्वारा निश्चित अर्थको ही ध्येय-ध्यान करनेके योग्य कहा है ॥२६७॥


तच्चाणेसणकाले समयं बुज्झेहिं जुत्तिमग्गेण ।
णो आराहणसमये पच्चक्खो अणुहवो जम्हा ॥२६८॥

अर्थ: तत्त्वको खोजते समय युक्तिमार्गके द्वारा आगमकी बातको जानना चाहिए । आराधनाके समय नहीं । क्योकि अनुभव तो प्रत्यक्षका विषय है ॥२६८॥


एयंते णिरवेक्खे णो सिज्झइ विविधभावगं दव्वं ।
तं तहव अणेयंते इदि बुज्झह सिय अणेयंत्तं ॥२६९॥

अर्थ: निरपेक्ष एकान्तवादमें अनेक भावरूप द्रव्यकी सिद्धि नहीं होती। इसी तरह एकान्त निरपेक्ष अनेकान्तवादमें भी तत्त्वकी निर्णीति नहीं होती। इसलिए कथंचित् अनेकान्तवादको जानना चाहिए ॥२६९॥


जं खवोवसमं णाणं सम्मग्गरूवं जिणेहि पण्णत्तं ।
तं सियगाही होदि हु सपरसरूवेण णिब्भंतं ॥


जुत्तीसु जुत्तमग्गे जं चउभेएण होइ खलु ठवणं ।
कज्जे सदि णामादिसु तं णिक्खेवं हवे समए ॥२७०॥

अर्थ: युत्तिके द्वारा सुयुक्त मार्गमें कार्यके वशसे नाम स्थापना द्रव्य और भावमें पदार्थकी स्थापनाको आगममे निक्षेप कहा है ॥२७०॥


दव्वं विविहसहावं जेण सहावेण होइ तं झेयं ।
तस्स निमित्तं कीरइ एक्कं पिय दव्व चउभेयं ॥२७१॥

अर्थ: द्रव्य अनेक स्वभाववाला होता है। उनमेसे जिस स्वभावके द्वारा वह ध्येय या ज्ञेय-ध्यान या ज्ञानका विषय होता है, उसके लिए एक भी द्रव्यके चार भेद किये जाते है ॥२७१॥


णाम ठवणा दव्वं भावं तह जाण होइ णिक्खेवं ।
दव्वे सण्णा णामं दुविहं पिय तंपि विक्खादं ॥२७२॥

अर्थ: निक्षेपके चार भेद है-नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव । उनमेसे द्रव्यकी संज्ञाको नाम कहते हैं और नामके दो भेद प्रसिद्ध है ॥२७२॥


मोहेरजअंतराए हणणगुणादो य णाम अरिहंतो ।
अरिहो पूयाए वा सेसा णामं हवे अण्णं ॥२७३॥

अर्थ: मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका घात करनेसे अरिहन्त नाम है और पूजाके योग्य होनेसे अर्हन्त नाम है। इन गुणोंके बिना किसीका अरिहन्त या अर्हन्त नाम रखना नामनिक्षेपका उदाहरण है ॥२७३॥


सायार इयर ठवणा कित्तिम इयरा हु बिंबजा पढमा ।
इयरा खाइय भणिया ठवणा अरिहो य णायव्वो ॥२७४॥

अर्थ: स्थापना के दो भेद है-साकार और निराकार। कृत्रिम या अकृत्रिम बिम्बोमे अर्हन्त परमेष्ठीकी स्थापना साकार स्थापना है। और क्षायिक गुणोमे अर्हन्तकी स्थापनाको निराकार स्थापना कहते हैं ॥२७४॥


दव्वं खु होइ दुविहं आगमगोआगमेण जह भणियं ।
अरहंतसत्यजाणो णोजुत्तो दव्व-अरिहंतो ॥२७५॥

अर्थ: द्रव्यनिक्षेपके दो भेद हैं–आगम द्रव्यनिक्षेप और नोआगम द्रव्यनिक्षेप। जो व्यक्ति अरिहन्त विषयक शास्त्रका ज्ञाता है किन्तु उसमें उपयुक्त नही है अर्थात् ज्ञाता होते हुए भी जब


णोआगमं पि तिविहं णाणिसरीरं भावि कम्मं च ।
णाणिसरीरं तिविहं चुद चत्तं चाविदं चेति ॥२७६॥

अर्थ (गाथा 275 से 276): वह उस विषयक शास्त्रके चिन्तनमें नही लगा है उसे आगम द्रव्य अरिहन्त कहते हैं। नोआगमद्रव्यके तीन भेद हैं-ज्ञायक शरीर, भावि और कर्मनोकर्म । ज्ञायक शरीरके तीन भेद हैं-च्युत, च्यावित और त्यक्त ॥२७५-२७६॥


आगमणोआगमदो तहेव भावो वि होदि दव्वं वा ।
अरहंतसत्थजाणो आगमभावो हु अरहंतो ॥२७७॥

तग्गुणरायपरिणदो णोआगमभाव होइ अरहंतो ।
तग्गुणराई झादा केवलणाणी हु परिणदो भणिओ ॥२७८॥

अर्थ (गाथा 277 से 278): द्रव्यनिक्षेपकी तरह भावनिक्षेपके भी दो भेद हैं-आगमभावनिक्षेप और नोआगमभावनिक्षेप । जो अरिहन्त विषयक शास्त्रका ज्ञाता उसमें उपयुक्त है वह आगमभाव अरिहन्त है। और जो अरिहन्तके गुणरूप परिणत है, वह नोआगमभाव अरिहन्त है। अरिहन्तके गुणोंसे युक्त केवलज्ञानीको अर्हन्तके गुणरूप परिणत कहा है ॥२७७-२७८॥


अह गुणपज्जयवंतं दव्वं भणियं खु अण्णसूरीहिं ।
भावं चिह्नं तस्स य तेहिं पिय एरिसं भणियं ॥२७९॥

णो इहुं भणियव्वं भिण्णं काऊण एसु णिक्खेवं ।
तस्सेव दंसणट्ठं भणियं काऊणमिह सुत्तं ॥२८०॥

अर्थ (गाथा 279 से 280): अथवा अन्य आचार्योंने गुणपर्यायवान्‌को द्रव्य कहा है। और उसका चिह्न भाव है ऐसा भी उन्होंने कहा है। उनको भिन्न करके उनमे निक्षेपका कथन नही करना चाहिए। इसी बातको बतलानेके लिए यहाँ सूत्रका कथन किया है ॥२७९-२८०॥


सद्देसु जाण णामं तहेव ठवणा हु थूलरिउसुत्ते ।
दव्वं पिय उवयारे भावं पज्जायमज्झगदं ॥२८१॥

अर्थ: शब्द नयोंमें नाम निक्षेप तथा स्थूलऋजुसूत्रनयमे स्थापना निक्षेपका अन्तर्भाव जानना । उपचारसे द्रव्य भी ऋजुसूत्रनयके अन्तर्गत है और भावनिक्षेप पर्यायके अन्तर्गत है ॥२८१॥


निक्खेव णय पमाणं णादूणं भावयंति जे तच्चं ।
ते तत्थतच्चमग्गे लहंति लग्गा हु तत्थयं तच्चं ॥२८२॥

अर्थ: जो निक्षेप नय और प्रमाणको जानकर तत्त्वकी भावना करते हैं वे वास्तविक तत्त्वके मार्गमें संलग्न होकर वास्तविक तत्त्वको प्राप्त करते हैं ॥२८२॥


गुणपज्जायलकखणसहावणिक्खेवणयपमाणं च ।
जाणदि जदि सवियप्पं दव्वसहावं खु बुज्झेदि ॥२८३॥

अर्थ: यदि आप गुण, पर्याय, लक्षण, स्वभाव, निक्षेप, नय और प्रमाणको भेद सहित जानते हैं तो आप द्रव्यके स्वभावको समझ सकते हैं । अर्थात् द्रव्यके स्वभावको जाननेके लिए गुणपर्याय आदिका जानना आवश्यक है ॥२८३॥


दंसणणाणचरित्तं सम्मगं परमं च जेहि उवेलद्धं ।
पणविवि ते परमेट्ठी वोच्छेहं णाणदंसणचरित्तं ॥२८४॥

अर्थ: जिन्होने उत्कृष्ट सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको प्राप्त कर लिया है अर्थात् क्षायिक सम्यक्त्व, केवलज्ञान और यथाख्यातचारित्रसे युक्त अर्हन्तपरमेष्ठीको और सिद्धपरमेष्ठीको नमस्कार करके मै सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रके स्वरूपको कहूँगा ॥२८४॥


दंसणणाणचरित्तं मग्गं मोक्खस्स भणिय दुविहं पि ।
णहु सुहमसुहं होदि हु तं पि य बंधो हवे णियमा ॥२८५॥

अर्थ: व्यवहार सम्यग्दर्शन, व्यवहार सम्यग्ज्ञान और व्यवहारचारित्र तथा निश्चय सम्यग्दर्शन, निश्चयसम्यग्ज्ञान और निश्चय सम्यक्चारित्रको मोक्षका मार्ग कहा है । शुभ और अशुभ भाव मोक्षके मार्ग नही है, उनसे तो नियमसे कर्मबन्ध होता है ॥२८५॥


णो ववहारो मग्गो मोहो हवदि सुहासुहमिदि १वयणं ।


णियदव्वजाणणट्ठं इयरं कहियं जिणेहि छहदव्वं ।
तहया परछद्दव्वे जाणणभावो ण होइ सण्णाणं ॥
णहु एसा सुन्दरा जुत्ती ॥२८६॥

अर्थ: व्यवहार मार्ग नहीं है क्योकि व्यवहार या तो शुभरूप होता हैं या अशुभरूप होता हैं और शुभ तथा अशुभ तो मोहरूप हैं । निज द्रव्य (आत्मा) को जाननेके लिए जिनेन्द्र देवने अन्य छह द्रव्योका कथन किया है । इसलिए पररूप छह द्रव्योंमें जो ज्ञायक भाव है अर्थात् अपने सिवाय बाकीके छह द्रव्योका जो ज्ञान है वह सम्यग्ज्ञान नही है । किन्तु यह युक्ति सुन्दर नहीं है ॥ २८६ ॥


णियसमयं पि य मिच्छा अह जड सुण्णो य तस्स सो चेदा ।
जाणगभावो मिच्छा उवयरिओ तेण सो भणई ॥२८७॥

जं चिय जीवसहावं उवयारं भणिय तं पि ववहारो ।
तम्हा णहु तं मिच्छा विसेसदो भणइ सब्भावं ॥२८८॥

झेओ जीवसहावो सो इह सपरावभासगो भणिओ ।
तस्स य साहणहेऊ उवयारो भणिय अत्थेसु ॥२८९॥

जह सब्भूओ भणिदो साहणहेऊ अभेदपरमत्थो ।
तह उवयारो जाणह साहणहेऊ अणुपयारो ॥२९०॥

अर्थ (गाथा 287 से 290): उक्त प्रकारसे कहनेवालेकी आत्मा यदि जड़ और शून्य है तो स्वसमय भी मिथ्या ठहरता है। किन्तु ज्ञायक भाव मिथ्या है इसलिए उसे उपचारित कहा है। जीवका जो स्वभाव उपचारित कहा है वह भी व्यवहार है। इसलिए वह मिथ्या नही है किन्तु विशेष रूपसे स्वभावको कहता है। जीवका स्वभाव ध्येय-ध्यान करनेके योग्य है। और उस स्वभावको स्व और पर का प्रकाशक कहा है। उस स्वभावके साधनका हेतु उपचार पदार्थोंमे कहा है। जैसे सद्भूत व्यवहारनय परमार्थ अभेदके साधनका हेतु है वैसे ही उपचार, अनुपचारके साधनका हेतु है ॥ २८७-२९० ॥


जो इह सुदेण १ भिण्णो जाणदि अप्पाणमिणं तु केवलं सुद्धं ।
तं सुयकेवलिमिसिणो भणंति लोयप्पदीवयरा ॥-समयसार गा० ९
उवयारेण विजाणइ सम्मग्गुरूवेण जेण परदव्वं ।
सम्मेगणिच्छय तेण वि सइयसहावं तु जाणंतो ॥२९१॥

अर्थ: यतः यह आत्मा या ज्ञान पर द्रव्यको सम्यक् रूपसे उपचारसे जानता है अतः सम्यक् निश्चयकी दृष्टिसे अपने स्वरूपको जानता है ॥ २९१ ॥


उवसमखयमिस्साणं तिहूणं एक्को वि णहु असन्भूवो ।
णोवत्तव्वं एवं सोवि गुणो जेण उवयरिओ ॥२९२॥

अर्थ: औपशमिक, क्षायिक और मिश्र (क्षायोपशमिक ) इन तीनो भावोंमेसे कोई भी भाव असद्भूत नही है, ऐसा नही कहना चाहिए, क्योकि ये सब भी उपचरित है ॥ २९२ ॥


णदु णयपक्खं मिच्छा तं पिय णेयंतदव्वसिद्धियरं ।
सियसद्दसमारूढं जिणवयणविणिग्गयं सुद्धं ॥२९३॥

अर्थ: जिनवाणीसे निकले हुए शुद्ध ‘स्यात्’ शब्दसे युक्त नय पक्ष मिथ्या नही होता, बल्कि वस्तु स्वरूपकी सिद्धि करता है ॥ २९३ ॥


अवरोप्परसुविरुद्धा सव्वे धम्मा फुरंति जीवाणं ।
जाव ण सियसावेक्खो गहिओ वत्थूण सन्भावो ॥२९४॥

अर्थ: जब तक ‘स्यात्’ पदकी अपेक्षासे वस्तुके स्वभावको ग्रहण नही किया जाता तभी तक जीवोंके सभी धर्म परस्परमें विरुद्ध प्रतीत होते है ॥ २९४ ॥


जं जं मुणदि सदिट्ठी सम्मगरूवं खु होदि तं तं पि ।
जह इह वयणं मंतं मंतीणं सिद्धमंतेण ॥२९५॥

अर्थ: किन्तु सम्यग्दृष्टि जो-जो जानता है वह-वह सत्य होता है । जैसे वचन मान्त्रिकके द्वारा सिद्ध किये जाने पर मन्त्र बन जाता है ॥ २९५ ॥


य एव नित्यक्षणिकादयो नया मिथोऽनपेक्षाः स्वपरप्रणाशिनः ।
त एव तत्त्वं विमलस्य ते मुनेः परस्परेक्षाः स्वपरोपकारिणः ॥


णो ववहारेण विणा णिच्छयसिद्धी कया वि णिद्दिट्ठा ।
साहणहेऊ जम्हा तस्स य सो भणिय ववहारो ॥२९६॥

अर्थ: जो परस्पर निरपेक्ष, नित्य और क्षणिक आदि दृष्टियां है वे अपना और परका विनाश करनेवाली है । किन्तु परस्पर सापेक्ष वे ही दृष्टियां विमलनाथ भगवान्के मतमे तात्त्विक हैं उन्हीके आधार पर तत्त्वकी व्यवस्था होती है अतः वे स्व और परका उपकार करनेवाली है । व्यवहारके बिना कभी भी निश्चयकी सिद्धि नही होती । इसलिए निश्चयकी सिद्धिमें जो हेतु है उसे व्यवहार कहा है ॥ २९६ ॥


दव्वसुयादो सम्मं भावं तं चेव अप्पसब्भावं ।
तं पि य केवलणाणं संवेयणसंगदो जहा ॥२९७॥

अर्थ: द्रव्यश्रुतसे समीचीन भाव होता है। वह समीचीन भाव आत्माके स्वभावरूप ही है। तथा आत्मस्वभाव केवल ज्ञानरूप है क्योकि आत्मसंवेदनसे ही वह प्रकट होता है ॥२९७॥


दव्वसुयादो भावं तत्तो भेय हवेइ संवेदं ।
तत्तो सवित्ती खलु केवलणाणं हवे तत्तो ॥

अर्थ: द्रव्यश्रुतसे भावश्रुत और भावश्रुतसे भेदज्ञान होता है। भेदज्ञानसे आत्मसंवेदन होता है। और आत्मसंवेदनसे केवलज्ञान होता है।


'मिच्छा सरायभूदो जीवो कत्ता जिणागमे पडिदो ।
णहु विवरीओ कत्ता उवयरिओ जइवि अत्थेसु ॥२९८॥

अर्थ: जिनागममे मिथ्यादृष्टि सरागी जीवको कर्ता कहा है । उससे जो विपरीत है वह कर्ता नही है, यद्यपि पदार्थोंमे उसका उपचार किया जाता है ॥२९८॥


असुहं सुहं विय कम्मं दुविहं तं दव्वभावभेयगयं ।
तं पिय पडुच्च मोहं संसारो तेण जीवस्स ॥२९९॥

अर्थ: अशुभ और शुभकर्म द्रव्य तथा भावके भेदसे दो प्रकारके हैं। इनका कारण मोह है उसीसे जीवको संसारमे भटकना पडता है ॥२९९॥


दंसणचरित्तमोहं दुविहं पि य विविहभेयसन्भावं ।
एयाणं ते भेया जे भणिया पच्चयाईहिं ॥३००॥

पच्चयवंतो रागा दोसामोहे य आसवा तेसिं ।
आसवदो खलु कम्मं कम्मेण य देह तं पि संसारो ॥३०१॥

अर्थ (गाथा 300 से 301): मोहनीय कर्मके दो भेद हैं–दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय । इन दोनोके भी अनेक भेद हैं । कर्मोंके हेतु जो मिथ्यात्व आदि और राग-द्वेष आदि है वे भी इन्हीके भेद है । मिथ्यात्व आदि रूप भाव राग, द्वेष, मोह रूप आस्रवोंके कारण है । आस्रवभाव कर्मका कारण है । कर्म शरीरका कारण है और शरीर ससारका कारण है ॥३००-३०१॥


मिच्छेत्तं अण्णाणं अविरमण कसाय जोग जे भावा ।
ते इह पच्चय जीवे विसेसदो हुंति ते बहुगा ॥३०२॥

अर्थ: जीवमे मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरति, कषाय और योगरूप जो भाव है उन्हे यहाँ प्रत्यय कहा है । उनके बहुतसे भेद हैं ॥३०२॥


मिच्छेत्तं पुणं दुविहं मूढत्तं तह सहावणिरवेक्खं ।
तस्सोदयेण जीवो विवरीदं गेहणए तच्चं ॥३०३॥

अर्थ: मिथ्यात्वके दो भेद है-एक मूढता रूप और दूसरा स्वभावनिरपेक्ष अर्थात् परोपदेशरूप । मिथ्यात्व कर्मके उदयसे जीव तत्त्वको विपरीत रूपसे ग्रहण करता है अर्थात् वस्तुका जैसा स्वरूप है उससे उलटा जानता है ॥३०३॥


अत्थित्तं णो मण्णदि णत्थिसहावस्स जो हु सावेक्खं ।
णत्थी विय तह दव्वे मूढो मूढो हु सव्वत्थ ॥३०४॥

अर्थ: जो द्रव्यमे अस्तित्वको नास्तिस्वभाव सापेक्ष नही मानता और नास्तित्वको अस्तित्व स्वभावसापेक्ष नही मानता वह मूढ सर्वत्र मूढ ही है ।३०४॥


मूढो विय सुदहेदुं सहावणिरवेक्खरूवदो होइ ।
अलहंतो खवणादी मिच्छाथयदंसणो खलु उदए ॥३०५॥

अर्थ: मिथ्यात्व प्रकृतिका उदय होनेपर कर्मका क्षय आदि न कर सकनेवाला मूढ मिथ्यादृष्टि भी शास्त्र आदिका निमित्त मिलनेपर स्वाभावनिरपेक्ष रूपसे मिथ्यादृष्टि होता है ॥३०५॥


ससयविमोहविब्भमजुत्तं जं तं खु होइ अण्णाणं ।
अहव कुसत्थाज्झयणं पावपयं हवदि तं णाणं ॥३०६॥

अर्थ: संशय, विमोह और विभ्रमसे युक्त जो ज्ञान होता है उसे अज्ञान कहते हैं । अथवा कुशास्त्रोके अध्ययन चिन्तनसे जो पापदायक ज्ञान होता है वह भी अज्ञान है ॥३०६॥


हिंसा असच्च मोसो मेहुणसेवा परिग्गहे गहणं ।
अविरदिभेया भणिया एयाण बहुविहा अण्णे ॥३०७॥

अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुनसेवन और परिग्रहका ग्रहण ये पांच अविरतिके भेद कहे है । इनके अन्य बहुतसे भेद है ॥ ३०७ ॥


कोहो थ माण माया लोह कसाया हु होंति जीवाणं ।
एक्केक्का चउभेया किरिया हु सुहासुहं जोगं ॥३०८॥

अर्थ: जीवोंके जो क्रोध, मान, माया और लोभ होते हैं उन्हे कषाय कहते हैं । इनमेसे प्रत्येकके चार-चार भेद होते हैं-उनके नाम हैं अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ । शुभ और अशुभ क्रियाको योग कहते हैं ॥ ३०८ ॥


मोहो व दोसभाओ असुहो वा राग पावमिदि भणियं ।
सुहरागो खलु पुण्णं सुहदुक्खादी फलं ताणं ॥३०९॥

अर्थ: मोह, द्वेषभाव और अशुभ रागको पाप कहा है और शुभरागको पुण्य कहा है । उनका फल सुख-दुःख आदि है ॥ ३०९ ॥


कज्जं पडि जह पुरिसो इक्को वि अणेकरूवमापण्णो ।
तह मोहो बहुभेओ णिद्दिष्ट्ठो पच्चयादीहि ॥३१०॥

अर्थ: जैसे एक भी पुरुष कार्यकी अपेक्षा अनेक रूप होता है वैसे ही मोहनीय कर्म भी प्रत्यय आदिके द्वारा अनेक प्रकारका कहा है ॥ ३१० ॥


देवगुरुसत्थभत्तो गुणोवयारकिरियोहि संजुत्तो ।
पूजादाणाइरदो उवओगो सो सुहो तस्स ॥३११॥

अर्थ: देवगुरु और शास्त्रका जो भक्त है, गुणोंसे आकृष्ट होकर उनकी विनय भक्ति आदि करता है, पूजा, दान आदिमे लीन रहता है वह मनुष्य शुभ उपयोगवाला है ॥३११॥


परदो इह सुहमसुहं सुद्धं ससहावसंगदो भावं ।
सुद्धे मुंचदि जीवो बज्झदि सो इयरभावेहिं ॥३१२॥

अर्थ: परद्रव्यमे अनुरक्तिसे शुभ और अशुभ भाव होते हैं और आत्मस्वभावमे लीनतासे शुद्ध भाव होता है। शुद्ध भावके होने पर जीव मुक्त होता है और शुभ तथा अशुभ भावोंसे बँधता है ॥३१२॥


जं किंपि सयलदुक्खं जीवाणं तं खु होइ कम्भादो ।
तं पिय कारणवंतो तम्हा तं कारणं हणह ॥३१३॥

अर्थ: जीवोको जो कुछ भी दुःख है वह सब कर्मके ही कारण है । उन कर्मोंके भी कारण हैं और इसलिए उन कारणोंको ही हटाना चाहिए ॥३१३॥


लद्धूण दुचिहहेउं जीवो मोहं खवेइ णियमेण ।
अब्भंतरबाहिरेयं जह तह व सुणह वोच्छामि ॥३१४॥

अर्थ: आभ्यन्तर और बाह्य रूपसे दोनों प्रकारके कारणोको प्राप्त करके जीव जिस प्रकारसे मोहनीय कर्मका नियमसे क्षय करता है उसे सुनो, मै कहता हूँ ॥३१४॥


काऊण करणलद्धी सम्मत्तभावस्स कुणइ जं गहणं ।
उवसमखयमिस्सादो पयडीणं तं पि णियहेउं ॥३१५॥

अर्थ: कर्म प्रकृतियोके उपशम क्षय या क्षयोपशमसे करण लब्धिको करके जीव जो सम्यक्त्व भावको या आत्म स्वभावको ग्रहण करता है वह आभ्यन्तर हेतु है ॥३१५॥


तित्थयरकेवलिसमणभवसुमरणसत्थदेवमहिमादी ।
इच्चेवमाइ बहुगा बाहिरहेऊ मुणेयव्वा ॥३१६॥

अर्थ: तीर्थंकर, केवली, श्रमण, पूर्वजन्मका स्मरण, शास्त्र, देव, महिमा आदि बहुतसे बाह्य हेतु जानना चाहिए ॥३१६॥


आसण्णभव्वजीवो अणंतगुणसेढिसुद्धिसंपण्णो ।
बुज्झंतो खलु अट्ठे खवदि स मोहं पमाणणयजोए ॥३१७॥

अर्थ: जो निकट भव्य जीव अनन्तगुणश्रेणि निर्जरासे सम्पन्न होता है और प्रमाण नयकी योजना के द्वारा तत्त्वार्थको जानता है वही मोहका क्षय करता है ॥३१७॥


एवं उवसम मिस्सं खाइयसम्मं च केऽपि गिण्हंति ।
तिण्णिवि णएण’ तियहा णिच्छय सम्भूव तह असन्भूओ ॥३१८॥

अर्थ: इस प्रकार कुछ जीव उपशम सम्यक्त्व, क्षायिक सम्यक्त्व या क्षायोपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण करते हैं। वह सम्यक्त्व निश्चयनय, सद्भूत व्यवहारनय और असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा तीन प्रकार है ॥३१८॥


सण्णाइभेयभिण्णं जीवादो णाणदंसणचरित्तं ।
सो सब्भूवो भणिदो पुव्वं चिय जाण व्यवहारो ॥३१९॥

अर्थ: जीवसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र नामादिके भेद होनेसे भिन्न है ऐसा कथन करनेवाला सद्भूत व्यवहारनय जानना चाहिए ॥३१९॥


णेयं खु जत्थ णाणं सद्देयं जत्थ दंसणं भणियं ।
चरियं खलु चारित्तं, णायव्वं त असन्भूवं ॥३२०॥

अर्थ: और जिसमे ज्ञेयको ज्ञान, श्रद्धेयको सम्यग्दर्शन और आचरणीयको चारित्र कहा जाये उसे असद्भूत व्यवहारनय जानना चाहिए ॥३२०॥


सद्धा तत्त्वे दंसण तस्सेव सहावजाणगं णाणं ।
असुहणिवित्ती चरणं ववहारो मोक्खमग्गं च ॥३२१॥

अर्थ: तत्त्वोकी श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है, तत्त्वार्थके स्वरूपको जानना सम्यग्ज्ञान है और अशुभ कार्योंको त्यागना सम्यक् चारित्र है, यह व्यवहार मोक्षमार्ग है ॥३२१॥


आणा तह अहिगमदो णिसग्गभावेण केवि गिह्णंति ।
एवं हि ठाइऊण णिच्छयभावं खु साहंति ॥३२२॥

अर्थ: कुछ लोग सर्वज्ञ देवकी आज्ञाके रूपमें, कुछ परोपदेशसे तथा कुछ परोपदेशके बिना स्वतः ही व्यवहाररत्नत्रयको ग्रहण करते हैं और इस तरह वे व्यवहाररत्नत्रयकी स्थापना करके निश्चय-रत्नत्रय रूप भावकी साधना करते हैं ॥३२२॥


आदे तियदसहावे णो उवयारं ण भेदकरणं च ।
तं णिच्छैयं हि भणियं जं तिण्णिवि होइ आदेव ॥३२३॥

अर्थ: रत्नत्रय स्वरूप आत्मामें न उपचार करना और न भेद व्यवहार करनेको निश्चय कहा है क्योकि रत्नत्रय तो आत्मा ही है अर्थात् आत्मासे भिन्न रत्नत्रय नही है ॥३२३॥


एवं दंसणजुत्तो चरित्तमोहं च खविय सामण्णो ।
लॅहदि हु सो परमप्पा वट्टंतो एण³ कम्मेण ॥३२४॥

अर्थ: इस क्रमसे सम्यग्दर्शनसे युक्त मुनि चारित्र मोहनीयका क्षय करके परमात्मपदको प्राप्त करता है ॥ ३२४ ॥


दंसेणकारणभूदं णाणं सम्मं खु होइ जीवस्स ।
तं सुयणाणं णियमा जिणवयर्णविणिग्गयं परमं ॥३२५॥

अर्थ: सम्यग्दर्शनपूर्वक जीवके जो ज्ञान होता है वह सम्यग्ज्ञान है । अथवा सम्यग्दर्शनका कारणभूत जीवका ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और वह ज्ञान जिनागमसे निकला हुआ नियमसे उत्तम श्रुतज्ञान है ॥ ३२५ ॥


वत्थूण जं सहावं जहट्ठियं णयपमाण तह सिद्धं ।
तं तह व जौंणणे इह सम्मं णाणं जिणा वंति ॥३२६॥

अर्थ: वस्तुका जो यथावस्थित स्वभाव नय और प्रमाणके द्वारा सिद्ध है उसको वैसा ही जानना सम्यग्ज्ञान है ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं ॥ ३२६ ॥


संसयविमोहुविब्भमविवज्जियं अप्पपरसरूवस्स ।
गहणं सम्मं णाणं सायारमणेयभेयं तु ॥-द्रव्यसं ४२ ॥
बहिरंतं परमतत्तवं णच्चा णाणं खु जं ठियं णाणे ।
तं इह णिच्छयणाणं पुव्वं तं सुणह ववहारं ॥३२७॥

अर्थ: बाह्य और अन्तः परमतत्त्वको जानकर ज्ञानका ज्ञानमें ही स्थिर होनेको यहाँ निश्चयज्ञान, कहा है । और पहले जो ज्ञानका कथन किया है उसे व्यवहारज्ञान जानो ॥ ३२७ ॥


ता सुयसायरमहणं कीरह सुपमाणमेरुमहणेण ।
सियणयफणिंदगहिए जाव ण मुणिओ हु वत्थुसब्भाओ ॥३२८॥

अर्थ: स्याद्वादनयरूपी नागराजसे गृहीत प्रमाणरूपी मेरुमथानीके द्वारा तब तक श्रुतरूपी सागर का मन्थन करो, जब तक वस्तुके स्वरूपका ज्ञान न होवे ॥ ३२८ ॥


णिच्छय सज्झसरूवं सराय तस्सेव साहणं चरणं ।
तह्मा दो विय कमसो पडिज्जे[च्छ]माणं पबुज्झेह ॥३२९॥

अर्थ: निश्चय साध्य स्वरूप है । उसका साधन सराग और वीतराग चारित्र है । अतः दोनोको भी क्रमसे धारण करने पर जीव प्रबोधको प्राप्त होता है ॥३२९॥


दंसणसुद्धिविसुद्धो मूलाइगुणेहि संजुओ तहय ।
सुहदुःखाइसमाणो झाणणिलीणो हवे समणो ॥३३०॥

अर्थ: जो दोष रहित सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध तथा मूल और उत्तर गुणोंसे युक्त होता है सुख और दुःखमे जिसका समभाव होता है, तथा आत्मध्यानमें लीन रहता है वह श्रमण-जैनसाधु, चारित्र का धारक या चारित्रका स्वामी है ॥३३०॥


असुहेण रायरहिओ वयाइराएण जो हु संजुत्तो ।
सो इह भणिय सरागो मुक्को दोहं पि खलु इयरो१ ॥३३१॥

अर्थ: जो अशुभ प्रवृत्तियोंसे तो राग नहीं करता, किन्तु जिसे व्रतादिरूप शुभ प्रवृत्तियोंमे राग रहता है उसे यहाँ सराग चारित्रका धारक श्रमण कहा है और जिसे अशुभ और शुभ दोनो ही प्रकारका राग नहीं है वह श्रमण वीतराग है ॥३३१॥


सम्मा विय मिच्छा विय तवोधणा समण तहय अणयारा ।
होंति विराय सराया जइरिसिमुणिणो य णायव्वा ॥३३२॥

अर्थ: तपस्वी अनगार श्रमण सम्यग्दृष्टि भी होते है और मिथ्यादृष्टि भी होते हैं तथा ऋषि, यति और मुनि सरागी भी होते है और वीतरागी भी होते है ॥३३२॥


इंदियसोक्खणिमित्तं सद्धाणादीणि कुणइ सो मिच्छो ।
तं पिय मोक्खणिमित्तं कुव्वंतो भणइ सद्दिट्ठी ॥३३३॥

अर्थ: जो इन्द्रिय सुखकी प्राप्तिके लिए श्रद्धान ज्ञान और चारित्रका पालन करता है वह मिथ्यादृष्टि है और जो मोक्षके लिए श्रद्धान आदि करता है वह सम्यग्दृष्टि है ॥३३३॥


मूलुत्तरसमणगुणा धारणं कहणं च पंच आयारो ।
सोही तहव सुणिट्ठा सरायचरिया हवइ एवं ॥३३४॥

अर्थ: श्रमणोके मूलगुणों और उत्तरगुणोका धारण करना, उनका कथन करना, पाँच प्रकारका आचार, आठ प्रकारकी शुद्धि तथा सुनिष्ठा ये सब सरागचारित्र है ॥ ३३४ ॥


वदसमिरिंदियरोहो आवस्साचेललोचमह णाणं ।
ठिढभोज्ज एयभत्तं खिदिसयणमदंतघसणं च ॥३३५॥

अर्थ: पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँचों इन्द्रियोका निरोध, छह आवश्यक, वस्त्रका सर्वथा त्याग, केशलोचन, स्नान न करना, खड़े होकर भोजन करना, दिनमे केवल एक बार भोजन करना, पृथ्वीपर सोना और दन्तघर्षण न करना ये २८ मूल गुण श्रमणोके हैं ॥ ३३५ ॥


तवपरिसहाण भेया गुणा हु ते उत्तरा य बोहव्वा ।
दंसणणाणचरित्तं तववीरिय पंचहायारं ॥३३६॥

अर्थ: तप और परीषहोके भेदोंको साधुके उत्तर गुण जानना चाहिए । दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार ये पाँच प्रकारके आचार हैं ॥३३६॥ कारण है । ध्यान करते समय अचानक आनेवाले उपसर्गको शान्तिके साथ सहन करना परीपह है । परीषहके २२ भेद है-१. भूखकी बाधाको सहना, २. प्यासकी बाधाको सहना, ३. शीत, ४. उष्ण, ५. डास मच्छर, ६. नंगेपनकी बाधाको सहना, ७ संयमसे अरति उत्पन्न होनेके कारण उपस्थित होनेपर भी संयममे रति करना, ८ स्त्रियोकी बाधाको निर्विकार चित्तसे सहना, ९ नंगे पैर चलनेकी बाधाको सहना, १०. एक ही आसनसे बैठनेकी बाधाको सहना, ११. जमीनपर एक ही करवटसे सोनेकी बाधाको सहना, १२ अत्यन्त कठोर बचनोको सुनकर भी शान्त रहना, १३. मारकी परीषह को सहना, १४. आहारादिके न मिलने पर भी किसीसे याचना न करना, १५. आहारादिका लाभ न होने पर भी सन्तुष्ट रहना, १६ पैरमें कांटा लगनेकी परीपहको सहना, १७ रोगादिका कष्ट सहन करना, १८. शरीर पर लगे मलसे खेदखिन्न न होना, १९. मान-अपमानमें हर्ष-विषाद न करना, २०. अपने पाण्डित्यका गर्व न करना, २१. ज्ञानकी प्राप्ति न होने पर खेदखिन्न न होना तथा २२ श्रद्धान से च्युत होने के निमित्त उपस्थित होने पर भी च्युत न होना । ये बाईस परीषह तथा पूर्वोक्त १२ प्रकारके तप साधुके उत्तर गुण कहे जाते है । पांच आचार भी उत्तर गुण है-दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार । विनय और आचारमें अन्तर है-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तपके निर्मल करनेमें जो प्रयत्न किया जाता है वह विनय है और उनके निर्मल हो जानेपर जो उनका पालन यत्नपूर्वक किया जाता है उसे आचार कहते है ।


विज्जावच्चं संघे साहुसमायार तित्थअभिवुड्ढो ।
धम्मक्खाणं सुसत्थे सरायचरणे ण णिसिद्धं ॥३३७॥

अर्थ: संघमे वैयावृत्य करना, साधु सामाचारी, धर्म तीर्थकी वृद्धिके लिए प्रयत्न, धर्मका निरूपण, ये सब कार्ये सरागचारित्रमें निषिद्ध नही है ॥३३७॥


लोगियसद्धारहिओ चरणविहीणो तहेव अववादी ।
विवरीओ खलु तच्चे बज्जेव्वा ते समायारे ॥३३८॥

अर्थ: जो लौकिकजन श्रद्धामे रहित है, चारित्रसे हीन है, अपवादशील है यह साधुत्वसे विपरीत है, अतः उनके साथ सामाचारी नही करना चाहिए ॥३३८॥


दिक्खागहणाणुक्कमसरायचारित्तकहणवित्थारो ।
पवययणसारे पिच्छह तत्सेव य एत्थ लेस्सेक्कं ॥३३९॥

अर्थ: दीक्षाग्रहणके अनुक्रमसे सरागचारित्रके कथनका विस्तार प्रवचनसारमे देखना चाहिए । यहाँ उसीका लेशमात्र कथन किया है ॥३३९॥


सुहमसुहं चिय कम्मं जीवे देहुब्भवं जणदि दुक्खं ।
दुहपडियारो पढमो णहु पुण तं पहिज्जई इतरत्थे ॥३४०॥

अर्थ: शुभ और अशुभ कर्म जीवको शारीरिक दुःख देते हैं। किन्तु प्रथम शुभोपयोगसे उस दुःखका प्रतिकार तो होता है किन्तु सुखकी प्राप्ति नहीं होती ॥३४०॥


मोत्तूणं मिच्छात्तियं सम्मगरयणत्तयेण संजुत्तो ।
वट्टं तो सुहचेट्ठे परंपरा तस्स णिव्वाणं ॥३४१॥

अर्थ: जो मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रको त्यागकर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे युक्त होता हुआ शुभ कर्म करता है उसका परम्परासे मोक्ष होता है ॥३४१॥


ववहारादो बंधो मोक्खो जम्हा सहावसंजुत्तो ।
तम्हा कुरु तं गउणं सहावमाराहणाकाले ॥३४२॥

अर्थ: चूँकि व्यवहारसे बन्ध होता है और स्वभावमे लीन होनेसे मोक्ष होता है इसलिए स्वभावकी आराधनाके समय व्यवहारको गौण करना चाहिए ॥३४२॥


विवरीए फुडबंधो जिणेहि भणिओ विहावसंजुत्तो ।
सो वि संसारहेऊ भणिओ खलु सव्वदरसीहि ॥३४३॥

अर्थ: यदि स्वभावकी आराधनाके समयमें भी व्यवहारकी मुख्यता रही तो स्पष्ट रूपसे बन्ध होता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है । सर्वज्ञ सर्वदर्शी जिनदेवोने विभावसे संयुक्त अवस्थाको संसारका कारण कहा है ॥३४३॥


मज्झिमजहणुक्कस्सा सराय इव वीयरायसामग्गी ।
तम्हा सुद्धचरित्तं पंचमकाले वि देसदो अत्थि ॥३४४॥

अर्थ: कहा भी है-निश्चय से मोक्ष होता है । उसके हेतुको उपचरित सद्भूत कहते हैं । जो असद्भूत है उसे भी हेतु जानना चाहिये । जैसे सरागदशाके जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भेद होते हैं वैसे ही वीतरागदशाके भी जघन्य, मध्यम उत्कृष्ट भेद होते हैं । अतः एकदेश वीतरागचारित्र पंचमकालमे भी होता है ॥३४४॥


जह सुह णासइ असुहं तहेव असुहं सुद्धेण खलु चरिए ।
तम्हा सुद्धधुवजोगी मा वट्टउ णिंदणादीहि ॥३४५॥

अर्थ: जैसे शुभ अशुभको नष्ट करता है वैसे ही शुद्धचारित्रके द्वारा शुभका नाश होता है । इसलिए शुद्धोपयोगी साधुको निन्दा, गर्दा वगैरह नहीं करना चाहिए ॥ ३४५ ॥


आलोयणादिकिरिया जं विसकुंभेत्ति सुद्धचरियस्स ।
भणियमिह समयसारे तं जाण सुएण अत्येण ॥३४६॥

अर्थ: पंचमकालमें भरतक्षेत्रमें आत्मस्वभावमें स्थित ज्ञानी सम्यग्दृष्टिके धर्मध्यान होता है । जो ऐसा नहीं मानता है वह अज्ञानी मिथ्यादृष्टि है । समयसारमें जो वीतरागचारित्रवाले साधुकी आलोचना आदि क्रियाओंको विषकुम्भ कहा है उसे आगमके द्वारा सम्यक् रीतिसे जानना चाहिए ॥ ३४६ ॥


कम्मं तियालविसयं डहेइ णाणी हु णाणझाणेण ।
पडिक्कमणाइ तम्हा भणियं खलु णाणझाणं तु ॥३४७॥

अर्थ: ज्ञानी पुरुष आत्मध्यानके द्वारा त्रिकालवर्ती कर्मोंको भस्म कर देता है इसलिए आत्मध्यान को ही निश्चयसे प्रतिक्रमण आदि कहा है ॥ ३४७ ॥


जह व णिरुद्धं असुहं सुहेण सुहमवि तहेव सुद्धेण ।
तम्हा एण कमेण य जोई झाएउ णियमादं ॥३४८॥

अर्थ: जैसे शुभके द्वारा अशुभका निरोध होता है वैसे ही शुद्धोपयोगके द्वारा शुभ कर्मोंका भी निरोध होता है । इसलिए योगीको इसी क्रमसे अपनी आत्माका ध्यान करना चाहिए ॥ ३४८ ॥


गहिओ सो सुदणाणे पच्छा संवेयणेण झायव्वो ।
जो णहु सुयमवलंबइ सो मुज्झइ अप्पसब्भावे ॥३४९॥

अर्थ: पहले श्रुतज्ञानके द्वारा आत्माको ग्रहण करके पीछे संवेदनके द्वारा उसका ध्यान करना चाहिए । जो श्रुतका अवलम्बन नही लेता वह आत्माके सद्भावमें मूढ रहता है ॥ ३४९ ॥


सोत्तूणं बहिंचित्ता चिंताणाणम्मि होइ सुदणाणं ।
तं पिय संवित्तिगयं झाणं सद्दिट्ठिणो भणियं ॥३५०॥

अर्थ: बाह्य चिन्ताको छोड़कर ज्ञानका चिन्तन करनेसे श्रुतज्ञान होता है। वही ज्ञान संवित्तिगत होने पर सम्यग्दृष्टिका ध्यान कहा गया है ॥३५०॥


लक्खणदो णियलक्खं अणुहवमाणस्स जं हवे सोक्खं ।
सा संवित्ती भणिया सयलवियप्पाण णिद्दहणा ॥३५१॥

अर्थ: लक्षणके द्वारा अपने लक्ष्यका अनुभव करते हुए जो सुख होता है उसे संवित्ति कहते हैं। वह संवित्ति समस्त विकल्पोंको नष्ट करनेवाली है ॥३५१॥


समणा सराय इयरा पमादरहिया तहेव इयरा हु ।
अणुहव चायपमादो सुद्धे इयरेसु विकहाई ॥३५२॥

अर्थ: द्रव्यश्रुतसे भावश्रुत होता है, भावश्रुतसे भेदज्ञान होता है। भेदज्ञानसे आत्मानुभूति होती है और आत्मानुभूतिसे केवलज्ञान होता है। इसका आशय यह है कि मोक्षार्थीको आगम और अध्यात्म शास्त्रका अभ्यास करना चाहिए उसके बिना भेदज्ञान नहीं होता और भेदज्ञानके बिना आत्मानुभूति नहीं होती। क्योंकि आगमाभ्यासके बिना गुणस्थान, जीवसमास, मार्गणा आदिका बोध नहीं होता और अध्यात्मके जाने बिना इस सबसे भिन्न मैं हूँ इस प्रकारका बोध नहीं होता। ऐसा बोध न होनेसे अपने आत्माको भावकर्मरूप रागादि विकल्पोंसे और ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मोंसे भिन्न नहीं जानता तथा नोकर्मरूप शरीर आदिसे भी अपनेको भिन्न नहीं जानता। इस प्रकारका भेदज्ञान न होनेसे अपनी शुद्ध आत्माकी ओर रुचि कैसे हो सकती है। अतः द्रव्यश्रुत अर्थात् परमागमको पढ़कर द्रव्य गुण पर्यायका सम्यक् ज्ञान करना चाहिए। पीछे आगमके आधारसे स्वसंवेदन ज्ञान होने पर स्वसंवेदन ज्ञानके बलसे केवलज्ञान प्रकट होता है। श्रमण, सरागी और वीतरागी तथा प्रमादरहित और प्रमादसहित होते हैं। प्रमादको त्याग कर शुद्ध आत्माका अनुभव करो। प्रमादसहितमे तो विकथा आदि प्रमाद रहते हैं ॥३५२॥


दुक्खं णिंदा चिंता मोहोविय णत्थि कोइ अपमत्ते
उप्पज्जइ परमसुहं परमप्पयेणाणअणुहवणे ॥३५३॥

अर्थ: अप्रमत्त साधुके दुःख, निन्दा, चिन्ता, मोह और कोई भी प्रमाद नहीं होता । इसलिए उत्कृष्ट आत्मिक ज्ञानका अनुभवन करते हुए उसे परम सुख होता है ॥३५३॥


हेयोपादेयविदो संजमतववीयरायसंजुत्तो ।
जिद्ददुक्खाइं तहं चिय सामग्गी सुद्धचरणस्स ॥३५४॥

अर्थ: शुद्ध आचरणकी सामग्री है-हेय और उपादेयका सम्यक् परिज्ञान, संयम, तप और वीतरागतासे संयुक्त होना तथा परीषह आदिका जीतना । अर्थात् जो ज्ञानी हेय उपादेयको ठीक रीतिसे जानता है, संयम और तपके साथ वीतरागी होता है तथा परीषहोको जीतता है उनसे घबराता नहीं है वही शुद्धचारित्रका पालन करनेमे समर्थ होता है ॥३५४॥


सामण्णे णियबोहे वियलियपरभावपरमसब्भावे ।
तत्थाराहणजुत्तो भणिओ खलु सुद्धचारित्ती ॥३५५॥

अर्थ: समस्त परभावोसे रहित परम सद्भावरूप आत्मज्ञानमें जो तात्त्विक आराधनासे युक्त होता है उसे शुद्धचारित्रवाला ध्याता कहा है ॥३५५॥


सामण्णं परिणाभी जीवसहावं च परमसब्भावं ।
धेयं गुज्झं परमं तहेव तच्चं समयसारं ॥३५६॥

समदा तह मज्झत्थं सुद्धो भावो य वीयरायत्तं ।
तह चारित्तं धम्मो सहावआराहणा भणिया ॥३५७॥

अर्थ (गाथा 356 से 357): सामान्य, परिणामी, जीवस्वभाव, परम-सद्भाव, परमगुह्य, तत्त्व, समयसार ये सब ध्येय ( जिसका ध्यान किया जाता है ) के नामान्तर हैं । समता, माध्यस्थ्य, शुद्धभाव, वीतरागता, चारित्र, धर्म, स्वभाव आराधना भी उसे कहते हैं ॥३५६-५७॥


अत्थित्ताइसहावा सामण्णविसेससंठिया जत्थ ।
अवरुप्परमविरुद्धं तं णियतच्चं हवे परमं ॥३५८॥

अर्थ: जिसमें अस्तित्वादित्वभावरूप सामान्य और विशेष परस्परमें अविरुद्ध रूपसे स्थित हैं वही परम निजतत्त्व है ॥३५८॥


होऊण जत्थ णट्ठा होसंति पुणोऽवि जत्थ पज्जाया ।
वट्टंता वट्टंति हु तं णियतच्चं हवे परमं ॥३५९॥

अर्थ: जिसमें पर्याय उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती है, और नष्ट होकर पुनः उत्पन्न होती है तथा वर्तमान भी रहती है वह परम निजतत्त्व है ॥३५९॥


णासंतो वि ण णट्ठो उप्पण्णो णेव संभवे जंतो ।
संतो तियालविसये तं णियतच्चं हवे परमं ॥३६०॥

अर्थ: जो असत् नही होते हुए भी न नष्ट होता है और न उत्पन्न होता है तथा तीनों कालोमे सत् रहता है वह परम निजतत्त्व है ॥३६०॥


कारणकज्जसहावं समयं णाऊण होइ ज्झायव्वं ।
कज्जं सुद्धसरूवं कारणभूतं तु साहणं तस्स ॥३६१॥

अर्थ: समय कारण रूप और कार्यरूप है ऐसा जानकर उसका ध्यान करना चाहिए। कार्य शुद्धस्वरूप है और उसका जो साधन है वह कारणभूत है ॥३६१॥


सुद्धो कम्मखयादो कारणसमओ हु जीवसब्भावो ।
खय पुणु सहावझाणं तम्हा तं कारणं झेयं ॥३६२॥

अर्थ: कर्मोके क्षयसे शुद्ध जीवका स्वभाव कारण समय है । कर्मोंका क्षय उस स्वभावके ध्यानसे होता है । अतः कारणसमय शुद्धस्वरूप ध्येय-ध्यानके योग्य है ॥३६२॥


किरियातीदो सत्थो अणंतणाणाइसंजुओ अप्पा ।
तह मज्झत्थो सुद्धो कज्जसहावो हवे समओ ॥३६३॥

अर्थ: निष्क्रिय, प्रशस्त, अनन्तज्ञानादि गुणोसे युक्त वीतराग शुद्ध आत्मा कार्य समय है ॥३६३॥


उदयादिसु पंचण्हं कारणसमओ हु तत्थ परिणामो ।
जम्हा लद्धा हेऊ सुद्धो सो जणइ अप्पाणं ॥३६४॥

अर्थ: और औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक तथा पारिणामिक इन पाँच भावोंमें जो पारिणामिकभाव है वह कारणसमय है । क्योकि शुद्धात्मस्वरूपका श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप कारणके मिलनेपर उसीका ध्यान आत्माको शुद्ध करता है ॥३६४॥


जह इह बिहावहेदू असुद्धयं कुणइ आदमेवादा ।
तह सब्भावं लद्धा सुद्धो सो कुणइ अप्पाणं ॥३६५॥

अर्थ: जैसे इस संसारमे आत्मा विभावके कारणोको पाकर अपनेको अशुद्ध करता है वैसे ही स्वभावको पाकर अपनेको शुद्ध करता है ॥३६५॥


उप्पज्जंतो कज्जं कारणमप्पा णियं वि जणयंतो ।
तम्हा इह ण विरुद्धं एक्कस्स वि कारणं कज्जं ॥३६६॥

अर्थ: कार्यको उत्पन्न करनेसे आत्मा कारण है और स्वयं ही उत्पन्न होनेसे कार्य है । इसलिए एक ही आत्माका कारण और कार्य होना विरुद्ध नही है ॥३६६॥


असुद्धसंवेयणेण य अप्पा बंधेइ कम्मणोकम्मं ।
सुद्धसंवेयणेण य अप्पा मुंचेइ कम्मणोकम्मं ॥३६७॥

अर्थ: अशुद्ध संवेदनसे आत्मा कर्म और नोकर्मसे बँधता है । और शुद्ध संवेदनसे कर्म और नोकर्म से छूटता है ॥३६७॥


पढमं मुत्तसरूवं मुत्तसहावेण मिस्सियं जम्हा ।
विदियं मुत्तामुत्तं सपरसरूवस्स पच्चक्खं ॥३६८॥

अर्थ: पहला अशुद्ध स्वसंवेदन मूर्तरूप है क्योंकि वह पौद्गलिक कर्मोंके उदयादिसे होनेवाले औदयिक आदि भावोंसे मिला हुआ होता है । और दूसरा शुद्ध स्वसंवेदन मूर्तिक भी है और अमूर्तिक भी है क्योंकि उसमें स्व और परस्वरूपका प्रत्यक्ष होता है ॥३६८॥


हेऊ सुद्धे सिद्धइ बज्झइ इयरेण णिच्छियं जीवो ।
तम्हा दव्वं भावो गउणाइविवक्खए णेओ ॥३६९॥

अर्थ: अतः शुद्ध कारणके होनेपर जीव मुक्त होता है और अशुद्ध कारणके होनेपर निश्चितरूपसे बँधता है । इसलिए गौण और मुख्य विवक्षासे द्रव्य और भावको जानना चाहिए ॥३६९॥ वस्तुओको जानता है वैसे ही अन्तर्मुखाकार अपनी आत्माको स्पष्ट जानता है।’ इस तरह स्वसंवेदनज्ञान ही कार्य कारणसमयसाररूप परिणमन करता है।


ओदयियं उवसमियं खयउवसमियं च खाइयं परमं ।
इगवीस दो भेया अट्ठारस णव तिंहा य परिणामी ॥३७०॥

अर्थ: औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक और पारिणामिक भाव के क्रम से इक्कीस, दो, अठारह, नौ और तीन भेद है ॥३७०॥


लेस्सा कसाय वेदा असिद्ध अण्णाण गई अचारित्तं ।
मिच्छत्तं ओदयियं दंसण चरणं च उवसमियं ॥३७१॥

अर्थ: छह लेश्याएँ, चार कषाय, तीन वेद, एक असिद्धत्व, अज्ञान एक, चार गति, अचारित्र और मिथ्यात्व ये इक्कीस भेद औदयिक भाव के है। तथा सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र ये दो भेद औपशमिक भाव के हैं ॥३७१॥


मिच्छतियं चउसम्मग दंसणतिदयं च पंच लद्धीओ ।
मिस्सं दंसण चरणं विरदाविरदाण चारित्तं ॥३७२॥

अर्थ: तीन मिथ्याज्ञान, चार सम्यग्ज्ञान, तीन दर्शन, पाँच लब्धियाँ, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र और विरताविरत चारित्र ये अठारह भेद क्षायोपशमिक भावके है ॥३७२॥


णाणं दंसण चरणं खाइय सम्मत्त पंचलद्धीओ ।
१खाइयभेदा णेया णव होदि हु केवला लद्धी ॥३७३॥

अर्थ: क्षायिकज्ञान, क्षायिकदर्शन, क्षायिकचारित्र, क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिकवीर्य ये नौ क्षायिकभाव के भेद है इन्हे नौ केवललब्धि कहते हैं ॥३७३॥


सेंद्धाणणाणचरणं जाव ण जीवस्स परमसब्भावे ।
ता अण्णाणी मूढो संसारमहोदहिं भमइ ॥३७४॥

अर्थ: जबतक जीवका अपने परमस्वभावमे श्रद्धान ज्ञान और आचरण नही है तबतक वह मूढ अज्ञानी संसार-समुद्रमे भटकता है ॥३७४॥

श्री-माइल्लधवल-कृत द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र (भाग 3/3)

कम्मजभावातीदं जाणगभावं विसेसआधारं ।
तं परिणामी जीवो अचेयणं पहुदि इयराणं ॥३७५॥

सव्वेसिं सब्भावो जिणेहि खलु पारिणामिओ भणिओ ।
तम्हा णियलाहत्थं ज्झेओ इह पारिणामिओ भावो ॥३७६॥

अर्थ (गाथा 375 से 376): कर्मजन्यभावसे रहित जो ज्ञायक भाव है जो विशेष आधाररूप है वही जीवका पारिणामिक भाव है। शेष द्रव्योंमे अचेतनपना आदि पारिणामिक भाव है। जिनेन्द्रदेवने पारिणामिकको सभी द्रव्योंका स्वभाव कहा है। इसलिए आत्मलाभके लिए इस संसारमें पारिणामिक भाव ही ध्येय-ध्यानके योग्य है ॥३७५-३७६॥


भेदोवयारे जइया वट्टदि सो विय सुहासुहाधीणो ।
तहया कत्ता भणिदो संसारी तेण सो आदा ॥३७७॥

जइया तव्विवरीए आदसहावांहि संठियो होवि ।
तहया किंच ण कुव्वदि सहावलाहो हवे तेण ॥३७८॥

अर्थ (गाथा 377 से 378): जब वह जीव शुभ और अशुभ भावों के अधीन होकर भेदोपचार मे प्रवर्तता है तब यह कर्मों का कर्ता होता है और उससे वह संसारी कहा जाता है । किन्तु जब उसके विपरीत आत्म-स्वभाव में स्थित होता है तब वह कुछ भी नही करता और उससे उसे स्वरूपकी प्राप्ति-मोक्ष होत है ॥३७७-३७८॥


णादाणुभूइ सम्मं णिच्छयणाणं तु जाणगं तस्स ।
सुहअसुहाण णिवित्ति चरणं साहुस्स वीयरायस्स ॥३७९॥

अर्थ: आत्मा की अनुभूति निश्चय सम्यक्त्व है । उसका जानना निश्चय सम्यग्ज्ञान है और शुभ तथा अशुभसे निवृत्ति वीतरागी साधुका निश्चयचारित्र है ॥३७९॥


जाणगभावो जाणदि अप्पाणं जाण णिच्छयणयेण ।
परदव्वं ववहारा मइसुइओहिमणकेवलधारं ॥३८०॥

अर्थ: निश्चयनयसे ज्ञान अपने ज्ञायकभावको जानता है और व्यवहारनयसे मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय और केवलज्ञानके आधारसे परद्रव्यको जानता है ॥३८०॥


सद्धाणणाणचरणं कुव्वंतो तच्चणिच्छयो भणियो ।
णिच्छयचारी चेदा परदव्वं णहु भणइ मज्झं ॥३८१॥

अर्थ: सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका पालन करनेवालेके ही तत्त्वका निश्चय कहा है । तत्त्वका निश्चय करनेवाला आत्मा परद्रव्यको अपना नही कहता है ॥३८१॥


णिच्छयदो खलु मोक्खो बंधो व्यवहारचारिणो जम्हा ।
तम्हा णिव्वुदिकामो ववहारं चयउ तिविहेण ॥३८२॥

अर्थ: निश्चयदृष्टिसे ही मोक्षकी प्राप्ति होती है और व्यवहारका अनुसरण करनेवालेके बन्ध होता है । इसलिए मोक्षके अभिलाषीको मन, वचन, कायसे व्यवहारको छोडना चाहिए ॥३८२॥


एवं मिच्छादिट्ठी णाणी णिस्संशयं हवदि पत्तो ।
जो ववहारेण मम दव्वं जाणंतो अप्पयं कुणदि ॥

अर्थ: कहा भी है-इस प्रकार मिथ्यादृष्टि अज्ञानी जीव संसारका पात्र होता है इसमें रंचमात्र भी सन्देह नहीं है, वह व्यवहारसे द्रव्य मेरा है ऐसा जानता हुआ उसे अपना मान लेता है।


जइवि चउट्ठयलाहो सिद्धाणं सण्णिहो हवे अरिहो ।
सो विय जह संसारी णिच्छयलेवो तहेव ववहारो ॥३८३॥

अर्थ: यद्यपि अनन्तचतुष्टयसे युक्त अर्हन्त सिद्धोंके समान हैं फिर भी वे संसारी कहे जाते हैं उसी तरह व्यवहार निश्चयका लेप है ॥३८३॥


मोत्तूणं बहि विसयं विसयं आदा वि वट्टदे काउं ।
तहिया संवर णिज्जर मोक्खो वि य होइ साहुस्स ॥३८४॥

रुद्धक्ख जिदकसायो मुक्कवियप्पो सहावमासेज्ज ।
झायउ जोई एवं णियतच्चं देहपरिचत्तं ॥३८५॥

अर्थ (गाथा 384 से 385): जब साधु बाह्य विषयको छोड़कर और आत्माको ही विषय बनाकर वर्तता है तब उसके संवर, निर्जरा और मोक्ष होता है ॥३८४॥ इन्द्रियोंका निरोध करके, कषायोको जीतकर, विकल्पको छोड़कर तथा स्वभावको प्राप्त करके योगोको देहसे भिन्न आत्मतत्त्वका ध्यान करना चाहिए ॥३८५॥


आदा तणुप्पमाणो णाणं खलु होइ तप्पमाणं तु ।
तं संचेयणरूवं तेण हु अणुहवइ तत्थेव ॥३८६॥

अर्थ: आत्मा शरीरके बराबर है और ज्ञान आत्माके बराबर है । वह ज्ञान संचेतनरूप है अतः उसीमें उसका अनुभव करना चाहिए ॥३८६॥


पस्सदि तेण सरूवं जाणइ तेणेव अप्पसब्भावं ।
अणुहवइ तेण रूवं अप्पा णाणप्पमाणादो ॥३८७॥

अर्थ: ज्ञानके द्वारा ही यह जीव अपने स्वरूपको देखता है । ज्ञानके द्वारा ही आत्माके स्वभावको जानता है ज्ञानके द्वारा आत्मस्वरूपका अनुभव करता है क्योंकि आत्मा ज्ञानप्रमाण है ॥३८७॥


'अप्पा णाणपमाणं णाणं खलु होइ जीवपरिमाणं ।
णवि ऊणं णवि अहियं जह दीवो तेण परिमाणो ॥३८८॥

अर्थ: आत्मा ज्ञान प्रमाण है और ज्ञान आत्मा प्रमाण है न कम है और न ज्यादा है । जैसे दीपक है उसी तरह आत्माका परिमाण है ॥३८८॥


णिज्जियसासो णिप्फंदलोयणो मुक्कसयलवावारो ।
जो एहावत्थगओ सो जोई णत्थि संदेहो ॥३८९॥

अर्थ: जिसका श्वासोच्छ्वास अत्यन्त मन्द हो, नेत्र निश्चल हों, समस्त व्यापार छूट गये हों, जो इस अवस्थामे लीन है वह योगी है इसमें सन्देह नही है ॥३८९॥


संवेयणेण गहिओ सो इह पच्चक्खरूवदो फुरइ ।
तं सुयणाणाधीणं सुयणाणं लक्खलक्खणदो ॥३९०॥

लक्खमिह भणियमादा ज्झेओ तब्भोवसंगदो सोवि ।
चेयण तह उवलद्धी दंसण णाणं च लक्खणं तस्स ॥३९१॥

अर्थ (गाथा 390 से 391): स्वसंवेदनके द्वारा गृहीत वह आत्मा ध्यानमें प्रत्यक्षरूपसे झलकता है। वह श्रुतज्ञानके अधीन है और श्रुतज्ञान लक्ष्य ओर लक्षणसे होता है। यहाँ लक्ष्य आत्मा है, वह आत्मा अपने ज्ञान, दर्शन आदि गुणोंके साथ ध्येय-ध्यान करने योग्य है। उस आत्माका लक्षण चेतना या उपलब्धि है वह चेतना दर्शन ओर ज्ञानरूप है ॥३९०-३९१॥


लक्खणदो तं गेण्हसु चेदा सो चेव होमि अहमेक्को ।
उदयं उवसम मिस्सं भावं तं कम्मणा जणियं ॥३९२॥

लक्खणदो तं गेण्हसु णादा सो चेव होमि अहमेक्को ।
उदयं उवसम मिस्सं भावं तं कम्मणा जणियं ॥३९३॥

लक्खणदो तं गेण्हसु दट्ठा सो चेव होमि’ अहमेक्को ।
उदयं उवसम मिस्सं भावं तं कम्मणा जणियं ॥३९४॥

लक्खणदो तं गेण्हसु उवलद्धा चेव होमि अहमेक्को ।
उदयं उवसम मिस्सं भावं तं कम्मणा जणियं ॥३९५॥

अर्थ (गाथा 392 से 395): लक्षणसे उस आत्माको ग्रहण करो कि जो चैतन्यस्वरूप है वही मै हूँ। जो औदयिक, औपशमिक और क्षायोपशमिक भाव है वे सब कर्मजन्य है। लक्षणसे उस आत्माको ग्रहण करो कि जो यह ज्ञाता है वही मै हूँ। औदयिक, औपशमिक और क्षायोपशमिक भाव तो कर्मजन्य है। लक्षणसे उस आत्माको ग्रहण करो कि जो द्रष्टा है वही मैं हूँ। औदयिक, औपशमिक और क्षायोपशमिक भाव तो कर्मजन्य हैं। लक्षण से उस आत्माको ग्रहण करो कि जो यह उपलब्धा है वही मै हूँ। औदयिक, ओपशामिक और क्षायोपशामिक भाव तो कर्मजन्य हैं ॥३९२-३९५॥


अहमेक्को खलु परमो भिण्णो कोहादु जाणगो होमि ।
एवं एकीभूदे परमाणंदो भवे चेदा ॥३९६॥

माणो य माय लोहो सुक्खं दुक्खं च रायमादीणं ।
एवं भावणहेऊ गाहाबंधेण कायव्वं ॥३९७॥

अर्थ (गाथा 396 से 397): मै क्रोध आदिसे भिन्न एक परमतत्त्व हूँ, मै केवल ज्ञाता हूँ। इस प्रकारकी एकत्व भावना होने पर आत्मा परमानन्दमय होता है । इसी तरह भावनाके लिए मान, माया, लोभ, सुख-दुःख और रागादिको भी लेकर गाथा-रचना करना चाहिए ॥ ३९६-३९७ ॥


वत्थूण अंसगहणं णियत्तविसयं तहेव सावरणं ।
तं इह कम्मे जणियं णहु पुण सो जाणगो भावो ॥३९८॥

अर्थ: वस्तुके अंशका जो ग्रहण ( ज्ञान ) नियत विषयको लिये हुए आवरण सहित होता है वह ( ज्ञान ) कर्मजन्य है, वह ज्ञायक भाव नहीं है ॥३९८॥


सो इह भणिय सहाओ जो हु गुणो पारिणामिओ जीवे ।
लद्धी खओवसमदो उवओगो तं पि अत्थगहणेण ॥३९९॥

अर्थ: लक्षणके द्वारा निजलक्ष्यका ध्यान करनेवाला ध्यान प्रत्ययको प्राप्त करता है। सुख ज्ञान-विशेष है… ॥३९९॥


इंदियमणस्स पसमज आदुत्थं तहय सोक्ख चउभेयं ।
लक्खणदो णियलक्खं अणुहवणे होइ आदुत्थं ॥४००॥

अर्थ: सुखके चार भेद हैं-इन्द्रियजन्य, मानसिक, प्रशमजन्य और आत्मसे उत्पन्न सुख। लक्षणके द्वारा निजलक्ष्यका अनुभव करनेपर आत्मिक सुख होता है ॥४००॥


सम्मगु पेच्छइ जहा वत्थुसहावं च जेण सद्दिट्ठी ।
तम्हा तं णियरूवं मज्झत्थ णियउ जेण सद्दिट्ठी ॥४०१॥

अर्थ: यतः सम्यक् दृष्टिवाला मनुष्य वस्तुके स्वरूपको सम्यक् रीतिसे देखता है इसलिए मध्यस्थ होकर उस आत्मस्वरूपका अवलोकन करो जिससे सम्यग्दृष्टि होता है ॥४०१॥


जीवो ससहावमओ कहं वि सो चेव जादपरसमओ ।
जुत्तो जइ ससहावे तो परभावं खु मुंचेदि ॥४०२॥

अर्थ: जीव अप्ने स्वभावमय है, वही किसी प्रकार परसमयरूप हो गया है। यदि वह अपने स्वभावमे युक्त हो जाये-लीन हो जाये तो परभावको छोड़ देता है-परभावसे छूट जाता है ॥४०२॥


जीवो सहावणियदो अणियदगुणपज्जओथ परसमओ ।
जइ कुणई सगसमयं पब्भस्सदि कम्मबंधादो ॥-पञ्चास्ति० गा० १५५।
सुहमसुहभावरहिओ सहावसंवेयणेण वट्टंतो ।
सो णियचरियं चरदि हु पुणो पुणो तत्थ विहरंतो ॥४०३॥

अर्थ: जो शुभ और अशुभ भावसे रहित होकर स्वभावका अनुभवन कर रहा है वह बार-बार उसीमें विहार करता हुआ स्वचरितका ही आचरण करता है ॥४०३॥


जं चिय सरायंकाले भेदुवयारेण भिण्णचारित्तं ।
तं चेव वीयराये विवरीयं होइ कायव्वं ॥४०४॥

अर्थ: सराग अवस्थामें भेदके उपचारसे जो भेदरूप चारित्र होता है, वही चारित्र वीतराग अवस्थामें विपरीत (अभेदरूप) करणीय होता है ॥४०४॥


चरियं चरदि सगं सो जो परदव्वप्पभावरहिदप्पा ।
दंसणणाणवियप्पो अवियप्पं चविअप्पादो ॥-पञ्चास्ति० गा० १५९ ।
मोक्खं तु परमसोक्खं जीवे चारित्तसंजुदे दिट्ठं ।
वट्टइ तं जइवग्गे अणवरयं भावणालीणे ॥४०५॥

अर्थ: चारित्रसे युक्त जीवमे परम सौख्यरूप मोक्ष पाया जाता है और वह चारित्र निरन्तर भावनामें लीन मुनि समुदायमे पाया जाता है ॥४०५॥


रागादिभावकम्मा मज्झ सहावा ण कम्मजा जहा ।
जो संवेयणगाही सोहं णादा हवे आदा ॥४०६॥

अर्थ: रागादि भावकर्म मेरे स्वभाव नही है क्योंकि वे तो कर्मजन्य है । मै तो ज्ञाता आत्मा हूँ जो स्वसंवेदनके द्वारा जाना जाता है अर्थात् इस प्रकार भावना निरन्तर भानेवाले मुनियोमे ही चारित्र पाया जाता है ॥४०६॥


परभावादो सुण्णो संपुण्णो जो हु होइ सब्भावो ।
जो संवेयणगाही सोहं णादा हवे आदा ॥४०७॥

अर्थ: जो परभावसे सर्वथा रहित सम्पूर्ण स्वभाववाला है वही मै ज्ञाता आत्मा हूँ स्वसंवेदनसे जिसका ग्रहण होता है ॥४०७॥


जडसब्भावं णहु मे जहा तं भणिय जाण जडदव्वे ।
जो संवेयणगाही सोहं णादा हवे आदा ॥४०८॥

अर्थ: मेरा जडस्वभाव नही है क्योकि जड़स्वभाव तो जड़ द्रव्य-अचेतन द्रव्यमें कहा है मैं तो वही ज्ञाता आत्मा हूँ जो स्वसंवेदनके द्वारा ग्रहण किया जाता है ॥४०८॥


मज्झ सहावं णाणं दंसण चरणं ण कोचि आवरणम् ।
जो संवेयणगाही सोहं णादा हवे आदा ॥४०९॥

अर्थ: मेरा स्वभाव ज्ञान, दर्शन, चारित्र है, कोई भी आवरण मेरा स्वभाव नही है । इस प्रकार मै वही ज्ञाता आत्मा हूँ जो स्वसंवेदनके द्वारा ग्रहण किया जाता है ॥४०९॥


घाइच्चउक्कं चत्ता संपत्तं परमभावसब्भावं ।
जो संवेयणगाही सोहं णादा हवे आदा ॥४१०॥

अर्थ: चार घातिया कर्मोंको नष्ट करके परम पारणामिक स्वभावको प्राप्त मै वही ज्ञाता आत्मा हूँ जो स्वसंवेदनके द्वारा ग्रहण किया जाता है ॥४१०॥


सामण्णणाणझाणे विस्सेसं मुणसु झाइयं सव्वं ।
तत्थ द्विया विसेसा इदि तं वयणं मुणेयव्वं ॥४११॥

अर्थ: सामान्य ज्ञानका ध्यान करने पर समस्त विशेषोंका ध्यान हुआ समझना चाहिए । क्योकि विशेष सामान्यमे ही गर्भित है ऐसा शास्त्रका कथन है ॥४११॥


उप्पादो य विणासो गुणाण सहजेट्ठयाण सामण्णे ।
जल इव लहरीभूदो णायव्वो सव्वदव्वेसु ॥४१२॥

अर्थ: सामान्य चैतन्य स्वरूपमे स्वाभाविक गुणोका उत्पाद और वैभाविक गुणोंका विनाश होता है । जैसे जलमे तरंग उठने पर पहलेकी तरंगोका विनाश और नवीन तरंगोकी उत्पत्ति होती है । ऐसा सब द्रव्योंमे जानना चाहिए ॥४१२॥


एदं पिय परमपदं सारपदं सासणे पढिदं ।
एदं विय थिररूवं लाहो अस्सेव णिव्वाणं ॥४१३॥

अर्थ: जिन शासनमें उस परमपारिणामिक भावको ही परमपद और सारभूत पद कहा है । वही सदा अविनाशी और स्थायी है उसीकी प्राप्तिको निर्वाण कहते हैं ॥४१३॥


एदह्नि रदो णिच्चं संतुट्ठो होदि णिच्चमेदेण ।
एदेण होदि तित्तो तो हुवदि हु उत्तमं सोक्खं ॥४१४॥

अर्थ: जो इस परमपारिणामिकभावस्वरूप शुद्धचैतन्यस्वरूपमे लीन रहता है वह सदा सन्तुष्ट रहता है, सदा तृप्त रहता है इसीसे उत्तम सुख प्राप्त होता है ॥४१४॥


एदेण सयलदोसा जीवे णसंति रायमादीया ।
मोत्तू विविधविभावं एत्थेवय संठिया सिद्धा ॥४१५॥

अर्थ: इसीसे जीवमें समस्त रागादि दोष नष्ट होते है । अनेक प्रकारके विभावोंसे छूटकर सिद्ध जीव इसी अपने परमपारिणामिकस्वरूप शुद्ध चैतन्यमे स्थित हैं ॥४१५॥


णादूण समयसारं तेण पयत्तंयपि ज्झाइदं चेव ।
समरसिभूदो तेण य सिद्धो सिद्धालयं जाइ ॥४१६॥

अर्थ: समयसारको जानकर ( जिसने परमपारिणामिक भाव स्वरूप वीतरागचारित्रको अपनाया उसने ) सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रका भी ध्यानकर ही लिया । उसीके साथ एक-मेक होकर सिद्धजीव सिद्धालयमे जाते है अर्थात् शुद्ध चैतन्य स्वरूप जीवत्वको प्राप्त होकर मुक्त होते हैं ॥४१६॥


लवणं व इणं भणियं णयचक्कं सयलसत्थसुद्धियरं ।
सम्मा वि य सुअ मिच्छा जीवाणं सुणयमग्गरहियाणं ॥४१७॥

अर्थ: जैसे लवण ( नमक ) सब व्यंजनोको शुद्धकर देता है-सुस्वादु वना देता है वैसे ही समस्त शास्त्रोंकी शुद्धिके कर्ता इस नयचक्रको कहा है । सुनयके ज्ञानसे रहित जीवोके लिए सम्यक् श्रुत भी मिथ्या हो जाता है ॥४१७॥


जं सारं सारमज्झे जरमरणहरं णाणदिट्ठीहि दिट्ठं ।
जं तच्चं तच्चभूदं परमसुहमयं सव्वलोयाण मज्झे ॥
जं भावं भावयंता भवभयरहियं जं च पावंति ठाणं ।
तं तच्चं णाणभावं समयगुणजुदं सासयं सव्वकालं ॥४१८॥

अर्थ: ज्ञानचक्षु महापुरुषोंके द्वारा परमार्थके मध्यमें भी जो जरा और मृत्युको दूर करनेवाला ‘सार’ देखा गया है, सब लोकोंके मध्यमे जो परमसुखमयं तत्त्व तत्त्वभूत है, जिस भावकी भावना करके जीव संसार भयसे रहित स्थान ( मुक्ति ) को प्राप्त करते हैं वह तत्त्व एकत्वगुणसे युक्त ज्ञानभाव है, वह सदा स्थायी है ॥४१८॥


जइ इच्छह उत्तरिदुं अण्णाणमहोवहिं सुलीलाए ।
ता णादुं कुणह मई णयचक्के दुणयतिमिरमत्तण्डे ॥४१९॥

अर्थ: यदि लीलामात्रसे अज्ञानरूपी समुद्रको पार करनेकी इच्छा है तो दुर्नयरूपी अन्धकारके लिए सूर्यके समान नयचक्रको जाननेमें अपनी बुद्धिको लगाओ ॥४१९॥


सुणिऊण दोहसत्थं सिग्धं हसिऊण सुहंकरो भणइ ।
एत्थ ण सोहइ अत्यो गाहाबंधेण तं भणह ॥४२०॥

अर्थ: दोहोमे रचित शास्त्रको सुनते ही शुभंकर हँस दिया और बोला-इस रूपमे यह ग्रन्थ शोभा नही देता । गाथाओंमे इसकी रचना करो ॥४२०॥


दारियदुण्णयदणुयं परअप्पपरिक्खतिक्खखरधारं ।
सव्वण्हूविण्हूचिण्हं सुदंसणं णमह णयचक्कं ॥४२१॥

अर्थ: यह सुदर्शन नयचक्र दुर्नयरूपी दैत्यका विदारण करनेवाला है, स्व और परकी परीक्षारूपी तीक्ष्ण कठोर उसकी धार है, यह सर्वज्ञरूपी विष्णुका चिह्न है। इसे नमस्कार करो ॥४२१॥


सुयकेवलीहि कहियं सुयसमुद्दअमुदमयणाणं ।
बहुभंगभंगुराविय विराइदं णमह णयचक्कं ॥४२२॥

अर्थ: श्रुतकेवलीके द्वारा कहे गये, श्रुतरूपी समुद्रका आलोडन करके निकाले गये अमृतमय भंगोंसे ज्ञानरूप और बहुभंगरूपी सुशोभित नयचक्रको नमस्कार करो ॥४२२॥


सियसद्दसुणयदुण्णयदणुदेहविदारणेक्कवरवीरं
तं देवसेणदेवं णयचक्कयरं गुरुं णमह ॥४२३॥

अर्थ: स्यात् शब्दसे युक्त सुनयके द्वारा दुर्नयरूपी दैत्यके शरीरको विदारण करनेमें एकमात्र श्रेष्ठ वीर नयचक्रके कर्ता उन देवसेन नामक गुरुदेवको नमस्कार करो ॥४२३॥


दव्वसहावपयासं दोहयबंधेण आसि जं दिट्ठं ।
तं गाहाबंधेण रहयं माइल्ल धवलेण ॥४२४॥

अर्थ: जो द्रव्य स्वभाव प्रकाश दोहाओंमें रचा हुआ देखा गया, माइल्लधवलने उसे गाथाबद्ध किया ॥४२४॥


सुसमीरेण पोयं पेरयं संतं जहा तिरणट्ठं ।
सिरिदेवसेणमुणिणा तह णयचक्कं पुणो रहयं ॥४२५॥

अर्थ: जैसे अनुकूल वायुके द्वारा प्रेरित हुआ जहाज तैरनेमें समर्थ होता है वैसे ही श्री देवसेन मुनिने नयचक्रको पुनः रचा ॥४२५॥