श्री-माइल्लधवल-कृत द्रव्यस्वभावप्रकाशक नयचक्र (भाग 2/3)
वत्थू पमाणविसयं णयविसयं हवइ वत्थुएकंसं ।
जं दोहि णिण्णयदं तं णिक्खेवे हवइ विसयं ॥१७१॥
अर्थ: वस्तु प्रमाणका विषय है और वस्तुका एक अंश नयका विषय है । और जो अर्थ प्रमाण और नयसे निर्णीत होता है वह निक्षेपका विषय है ॥१७१॥
णाणासहावभरियं वत्थुं गहिऊण तं पमाणेण ।
एयंतणासणट्ठं पच्छा णयजुंजणं कुणह ॥१७२॥
अर्थ: अनेक स्वभावोसे परिपूर्ण वस्तुको प्रमाणके द्वारा ग्रहण करके तत्पश्चात् एकान्तवादका नाश करनेके लिए नयोकी योजना करनी चाहिए ॥१७२॥
जं णाणीण वियप्पं सुवासयं वत्थुअंससंगहणं ।
तं इह णयं पउत्तं णाणी पुण तेण णाणेण ॥१७३॥
अर्थ: श्रुतज्ञानके आश्रयको लिये हुए ज्ञानीका जो विकल्प वस्तुके अंशको ग्रहण करता है उसे नय कहते है । उस ज्ञानसे जो युक्त होता है वह ज्ञानी है ॥१७३॥
जम्हा णएण विणा होइ ण णरस्स सियवायपडिवत्ती ।
तम्हा सो बोहव्वो एयंतं हंतुकामेण ॥१७४॥
अर्थ: नयके बिना मनुष्यको स्याद्वादका बोध नही हो सकता । इसलिए जो एकान्तका विरोध करना चाहता है उसे नयको जानना चाहिए ॥१७४॥
जह सत्थाणं माई सम्मत्तं तह तवाइगुणणिलए ।
धाउवाए रसो तह णयमूलं अणेयंते ॥१७५॥
अर्थ: जैसे शास्त्रोंका मूल अकारादि वर्ण हैं, तप आदि गुणोके भण्डार साधुमें सम्यक्त्व है, धातुवादमे पारा है, वैसे ही अनेकान्तका मूल नय है ॥१७५॥
तच्चं विस्सवियप्पं एयवियप्पेण साहए जो हु ।
तस्स ण सिज्झइ वत्थू किह एयन्तं पसाहेदि ॥१७६॥
अर्थ: तत्त्व तो नाना विकल्प रूप है उसे जो एक विकल्पके द्वारा सिद्ध करता है उसको वस्तुकी सिद्धि नही होती । तब वह कैसे एकान्तका साधन कर सकता है ॥ १७६ ॥
सर्वथैकान्तरूपेण यदि जानाति वास्तवम् ।
भूरिधर्मात्मकं वस्तु केन निश्चीयते स्फुटम् ॥
झाणं झाणभासं झाणस्स तहेव भावणा भणिया ।
मोत्तु झाणाभासं दोहिं पिय संजुओ समणो ॥१७७॥
झाणस्स भावणे वि य ण हु सो आराहओ हवे णियमा ।
जो ण विजाणइ वत्थुं पमाणणयणिच्छयं किच्चा ॥१७८॥
अर्थ (गाथा 177 से 178): ध्यान, ध्यानाभास और ध्यानकी भावना कही है । श्रमणको ध्यानाभास छोड़कर ध्यान और ध्यानकी भावना करना चाहिए । किन्तु जो प्रमाण और नयका निश्चय करके वस्तुको नहीं जानता वह ध्यानकी भावना होनेपर भी नियमसे आराधक नहीं है ॥१७७-१७८॥
प्रमाणनयनिक्षेपैर्योऽर्थान्नाभिसमीक्षते ।
युक्तं चायुक्तवद्भाति तस्यायुक्तं च युक्तवत् ॥१७९॥
अर्थ: पँचरंगे चित्रमें-से एक रंगका ग्रहण करनेवाला क्रम या अक्रम रूपसे कैसे ग्रहण कर लेता है । यदि सर्वथा एकान्त रूपसे जानना वास्तविक है तो अनेक धर्मात्मक वस्तुका निश्चय कैसे करते हो ॥ अर्थात् जैसे पचरंगे चित्रमें-से एक रगका ग्रहण होता है वैसे ही अनेक धर्मात्मक वस्तुमें से ज्ञाता एक धर्मका ग्रहण करता है । यह नयके बिना सम्भव नहीं है । अतः एकान्तकी सिद्धिके लिए नयको अपनाना आवश्यक है । प्रमाण और नयके स्वरूपका निश्चय होनेपर वस्तुका निश्चय होता है और वस्तुका निश्चय होनेपर सम्यग्दर्शनकी प्राप्ति होती है । इस तरह वस्तु स्वरूपके निश्चय और सम्यग्दर्शनके द्वारा जीव ध्यान और ध्यानकी भावनाका आराधक होता है ॥१७९॥
एयंतो एयणओ होइ अणेयंत तस्स समूहो ।
तं खलु णाणवियप्पं सम्मं मिच्छं च णायव्वं ॥१८०॥
अर्थ: एक नयको एकान्त कहते है और उसके समूहको अनेकान्त कहते हैं । यह ज्ञानका भेद है जो सच्चा और मिथ्या होता है ॥१८०॥
जे णयदिट्ठिविहीणा ताण ण वत्थुसहावउवलद्धि ।
वत्थुसहावविहूणा सम्मादिट्ठी कहं हुंति ॥१८१॥
अर्थ: जो नयदृष्टिसे विहीन है उन्हे वस्तुके स्वरूपका ज्ञान नही हो सकता और वस्तुके स्वरूपको न जाननेवाले सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकते हैं ॥१८१॥
णिच्छयववहारणया मूलिमभेया णयाण सव्वाणं ।
णिच्छयसाहणहेउं पज्जयदव्वत्थियं मुणह ॥१८२॥
अर्थ: निश्चयनय और व्यवहारनय सब नयोंके मूल भेद हैं निश्चयके साधनमे कारण पर्यायार्थिक और द्रव्यार्थिक जानो ॥१८२॥
दो चेव य मूलणया भणिया दव्वत्थ पज्जयत्थगया ।
अण्णे असंखसंखा ते तन्भेया मुणेयव्वा ॥१८३॥
अर्थ: द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिक ये दो ही मूल नय कहे हैं। अन्य असंख्यात संख्याको लिये हुए उन दोनोंके ही भेद जानने चाहिए ॥१८३॥
णेग्गमं संग्रह ववहार तह रिजुसुत्तसद्दअभिरूढा ।
एवंभूदा णव णया वि तह उवणया तिणिण ॥१८४॥
अर्थ: नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ और एवंभूत ( इन् सात नयोंमें द्रव्यार्थिक और पर्यायार्थिकको मिलानेसे ) नौ नय है तथा तीन उपनय हैं ॥१८४॥
दव्वत्थो दहभेयं छब्भेयं पज्जयत्थियं णेयं ।
तिविहं च णइगमं तह दुविहं पुण संग्रहं तत्थ ॥१८५॥
ववहारं रिजुसुत्तं दुवियप्पं सेसमाहु एक्केक्का ।
उत्ता इह णयभेया उवणयभेया वि पभणामो ॥१८६॥
अर्थ (गाथा 185 से 186): द्रव्यार्थिक नयके दस भेद है, पर्यायार्थिक नयके छह भेद हैं। नैगम नयके तीन भेद हैं, संग्रह नयके दो भेद है। व्यवहारनय और ऋजुसूत्र नयके दो-दो भेद हैं। शेष शब्द, समभिरूढ और एवंभूत एक-एक ही है। इस प्रकार नयके भेद कहे। उपनयके भेद आगे कहते हैं ॥१८५-१८६॥
सद्भूदमसद्भूदं उवयरियं चेव दुविहि सम्भूवं ।
तिविहं पि असन्भूवं उवयरियं जाण तिविहं पि ॥१८७॥
अर्थ: उपनय तीन हैं-सद्भूत, असद्भूत और उपचरित। सद्भूतनयके दो भेद हैं, असद्भूत नयके तीन भेद है और उपचरितके भी तीन भेद हैं ॥१८७॥
दव्वत्थिएसु दव्वं पज्जायं पज्जयट्ठिए विसयं ।
सब्भूवासब्भूवे उवयरियं चदु णव तियत्थं ॥१८८॥
अर्थ: द्रव्यार्थिक नयोका विषय द्रव्य है और पर्यायार्थिक नयोका विषय पर्याय है। सद्भूत व्यवहारनयके अर्थ चार हैं, असद्भूत व्यवहारनयके अर्थ नौ है और उपचरितनयके अर्थ तीन हैं ॥१८८॥
पज्जयं गउणं किच्चा दव्वंपि य जो हु गिण्हइ लोए ।
सो दव्वत्थिय भणिओ विवरीओ पज्जयत्थिओ ॥१८९॥
अर्थ: जो पर्यायको गौण करके द्रव्यका ग्रहण करता है उसे द्रव्यार्थिकनय कहते है और जो द्रव्यको गौण करके पर्यायको ग्रहण करता है उसे पर्यायार्थिकनय कहते है ॥१८९॥
कम्माणं मज्झगदं जीवं जो गहइ सिद्धसंकासं ।
भण्णइ सो सुद्धणओ खलु कम्मोवाहिणिरवेक्खो ॥१९०॥
अर्थ: जो कर्मोंके मध्यमे स्थित अर्थात् कर्मोंसे लिप्त जीवको सिद्धोंके समान शुद्ध ग्रहण करता है उसे कर्मोपाधि निरपेक्ष शुद्ध द्रव्यार्थिकनय कहते हैं ॥१९०॥
उप्पादवयं गउणं किच्चा जो गहइ केवला सत्ता ।
भण्णइ सो सुद्धणओ इह सत्तागाहओ समए ॥१९१॥
अर्थ: उत्पाद और व्ययको गौण करके जो केवल सत्ताको ग्रहण करता है उसे आगममें सत्ताग्राहक शुद्ध द्रव्यार्थिकनय कहते हैं ॥१९१॥
गुणगुणिआइचउक्के अत्थे जो णो करेइ खलु भेयं ।
सुद्धो सो दव्वत्थी भेयवियप्पेण णिरवेक्खो ॥१९२॥
अर्थ: गुण-गुणी आदि चतुष्करूप अर्थमे जो भेद नही करता, वह भेदविकल्पनिरपेक्ष शुद्ध द्रव्यार्थिक नय है ॥१९२॥
भावे सरायमादी सव्वे जीवामिह जो दु जंपेदि ।
सो हु असुद्धो उत्तो कम्माणउवाहिसावेक्खो ॥१९३॥
अर्थ: जो सब रागादिभावोको जीवका कहता है या रागादिभावोंको जीव कहता है वह कर्मोपाधि सापेक्ष अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय है ॥१९३॥
उप्पादवयविमिस्सा सत्ता गहिऊण भणइ तिवयत्तं ।
दव्वस्स एयसमए जो सो हु असुद्धओ विद्दिओ ॥१९४॥
अर्थ: जो नय उत्पाद व्ययके साथ मिली हुई सत्ताको ग्रहण करके द्रव्यको एक समयमें उत्पाद व्यय ध्रौव्यरूप कहता है वह अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय है ॥१९४॥
भेए सवि संबंधं गुणगुणीयाईंहि कुणइ जो दव्वे ।
सो वि असुद्धो दिट्ठो सहिओ सो भेयकप्पेण ॥१९५॥
अर्थ: जो नय द्रव्यमे गुण गुणी आदिका भेद करके उनके साथ सम्बन्ध कराता है वह भेद कल्पना सापेक्ष अशुद्ध द्रव्यार्थिक नय है क्योकि वह भेद कल्पनासे सहित है ॥१९५॥
णिस्सेससहावाणं अण्णयरूवेण सव्वदव्वेहिं ।
विवहावं जहि जो सो अण्णयदव्वत्थिओ भणिओ ॥१९६॥
अर्थ: समस्त स्वभावोंमें जो यह द्रव्य है इस प्रकार अन्वयरूपसे द्रव्यकी स्थापना करता है वह अन्वय द्रव्यार्थिक नय है ॥१९६॥
सद्दव्वादिचउक्के संतं दव्वं खु गिण्हए जो हु ।
जियदव्वादिसु काही सो इयरो होइ विवरीओ ॥१९७॥
अर्थ: जो स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावमे वर्तमान द्रव्यको ग्रहण करता है वह स्वद्रव्यादिग्राहक द्रव्यार्थिकनय है । और जो परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावमे असत् द्रव्यको ग्रहण करता है वह पर द्रव्यादिग्राहकद्रव्यार्थिकनय है ॥१९७॥
गेण्हइ दव्वसहावं असुद्धसुद्धोवयारपरिचत्तं ।
सो परमभावगाही णायव्वो सिद्धिकामेण ॥१९८॥
अर्थ: जो अशुद्ध, शुद्ध और उपचरित स्वभावसे रहित परमस्वभावको ग्रहण करता है वह परम भाव ग्राही द्रव्यार्थिकनय है । उसे मोक्षके अभिलाषीको जानना चाहिए ॥१९८॥
अक्किट्टिमा अणिहणा ससिसूराईय पज्जया गाही ।
जो सो अणाइणिच्चो जिणभणिओ पज्जयत्थियओ ॥१९९॥
अर्थ: जो अकृत्रिम और अनिधन अर्थात् अनादि अनन्त चन्द्रमा सूर्य आदि पर्यायोको ग्रहण करता है उसे जिन भगवान्ने अनादिनित्य पर्यायार्थिकनय कहा है ॥१९९॥
कम्मेखयादुपण्णो अविणासी जो हु कारणाभावे ।
इदमेवमुच्चरंतो भण्णइ सो साइणिच्च णओ ॥२००॥
अर्थ: जो पर्याय कर्मोंके क्षयसे उत्पन्न होनेके कारण सादि है और विनाशका कारण न होनेसे अविनाशी है, ऐसी सादि नित्य पर्यायको ग्रहण करनेवाला सादि नित्य पर्यायार्थिकनय है ॥२००॥
सत्तो अमुक्खरूवे उप्पादवयं हि गिहणए जो हु ।
सो हु सहावाणिच्चो गाहो खलु सुद्धपज्जाओ ॥२०१॥
अर्थ: जो सत्ताको गौण करके उत्पाद व्ययंको ग्रहण करता है उसे अनित्य स्वभावको ग्रहण करनेवाला शुद्ध पर्यायार्थिकनय कहते है ॥२०१॥
जो गहइ एयसमये उप्पादव्वयधुवत्तसंजुत्तं ।
सो सब्भावाणिच्चो असुद्ध पज्जत्थियो णेयो ॥२०२॥
अर्थ: जो एक समयमे उत्पाद व्यय और ध्रौव्यसे युक्त पर्यायको ग्रहण करता है वह स्वभाव अनित्य अशुद्ध पर्यायार्थिकनय है ॥२०२॥
देहीणं पज्जाया सुद्धा सिद्धाण भणइ सारिच्छा ।
जो सो १अणिच्चसुद्धो पज्जयगाही हवे स णओ ॥२०३॥
अर्थ: जो संसारी जीवोंकी पर्यायको सिद्धोंके समान शुद्ध कहता है वह अनित्य शुद्ध पर्यायार्थिकनय है ॥२०३॥
भणइ अणिच्चासुद्धा चउगइजीवाण पज्जया जो हु ।
होइ विभावअणिच्चो असुद्धओ पज्जैयत्थिओ ॥२०४॥
अर्थ: जो चार गतियोंके जीवोंकी अनित्य अशुद्ध पर्यायका कथन करता है वह विभाव अनित्य अशुद्ध पर्यायार्थिकनय है ॥२०४॥
णिप्पण्णमिव पयंपदि भाविपदत्थं खु३ जो अणिप्पण्णं ।
अप्पत्थे जह पत्थं भणइ सो भाविणइगमृत्ति णओ ॥२०५॥
अर्थ: जो अनिष्पन्न भावि पदार्थको निष्पन्नकी तरह कहता है उसे भाविनैगमनय कहते हैं। जैसे अप्रस्थको प्रस्थ कहना ॥२०५॥
णिव्वत्तअत्थकिरिया वट्टणकाले तु जं समायरणं ।
तं भूदणइगमनयं जहेज्जदिणं णिव्वुओ२ वीरो ॥२०६॥
अर्थ: जो कार्य हो चुका उसका वर्त्तमानकालमे आरोप करना भूत नैगमनय है जैसे, आजके दिन भगवान् महावीरका निर्वाण हुआ था ॥२०६॥
पारद्धा जा किरिया पचणविहाणादि कहइ जो सिद्धा ।
लोएसु पुच्छमाणो भण्णइ तं वट्टमाणणयं ॥२०७॥
अर्थ: जो प्रारम्भ की गयी पकाने आदिकी क्रियाको लोगोके पूछनेपर सिद्ध या निष्पन्न कहना है वह वर्तमान नैगमनय है ॥२०७॥
अवरोप्परमविरोहे सव्वं अत्थित्ति४ सुद्धसंगहणे ।
होइ तमेव असुद्धं इगिजाइविसेसगहणेण ॥२०८॥
जं संगहेण गहियं भेयइ अत्थं असुद्ध सुद्धं वा ।
सो ववहारो दुविहो असुद्धसुद्धत्थभेयकरो ॥२०९॥
अर्थ: जो संग्रहनयके द्वारा गृहीत शुद्ध अथवा अशुद्ध अर्थका भेद करता है वह व्यवहारनय है । उसके भी दो भेद हैं-अशुद्ध अर्थका भेद करने वाला और शुद्ध अर्थका भेद करनेवाला ॥२०९॥
जो एयसमयवट्टी गेण्हइ दव्वे धुवत्तपज्जायं ।
सो रिउसुत्तो सुहुमो सव्वंपि सद्दं जहा खणियं ॥२१०॥
मणुवाइयपज्जाओ मणुसोत्ति सगट्ठिदीसु वट्टंतो ।
जो भणइ तावकालं सो थूलो होइ रिउसुत्तो ॥२११॥
अर्थ (गाथा 210 से 211): जो द्रव्यमें एक समयवर्ती अध्रुवपर्यायको ग्रहण करता है उसे सूक्ष्म ऋजु सूत्र नय कहते है जैसे सभी शब्द क्षणिक है और जो अपनी स्थितिपर्यन्त रहनेवाली मनुष्य आदि पर्यायको उतने समय तक एक मनुष्य रूपसे ग्रहण करता हैं वह स्थूलऋजुसूत्रनय है ॥२१०-२११॥
जो वट्टणं ण मण्णइ एयत्थे भिण्णलिंगआईणं ।
सो सद्दणओ भणिओ णेओ पुंसाइआण जहा ॥२१२॥
अहवा सिद्धे सद्दे कीरइ जं किंपि अत्थववहारं ।
तं खलु सद्दे विसयं देवो सद्देण जह देवो ॥२१३॥
अर्थ (गाथा 212 से 213): जो एक अर्थमे भिन्न लिंग आदिवाले शब्दोकी प्रवृत्तिको स्वीकार नही करता उसे शब्दनय कहते है । जैसे पुष्य आदि शब्दोमे लिंगभेद होनेसे अर्थभेद जानना चाहिए । अथवा सिद्ध शब्दमे जो कुछ अर्थका व्यवहार किया जाता है वह शब्दनयका विषय है जैसे देवशब्दसे देव अर्थ लिया जाता है ॥२१२-२१३॥
सद्दारूढो अत्थो अत्यारूढो तहेव पुण सद्दो ।
भणइ इह समभिरूढो जह इंद पुरंदरो सक्को ॥२१४॥
अर्थ: जो अर्थको शब्दारूढ और शब्दको अर्थारूढ कहता है वह समभिरूढनय है । जैसे इन्द्र, शक्र और पुरन्दर ॥२१४॥
जं जं करेइ कम्मं देही मणवय णकायचेट्ठादो ।
तं तं खु णामजुत्तो एवंभूदो हवे स णओ ॥२१५॥
अर्थ: प्राणी मन, वचन और कायकी चेष्टासे जो-जो क्रिया करता है उस-उस नामसे युक्त होता है यह एवंभूतनयका मन्तव्य जानना चाहिए ॥२१५॥
पढमतिया दव्वत्थी पज्जयगाही य इयर जे भणिया ।
ते चदु अत्थपहाणा सद्दपहाणा हु तिण्णियेरा ॥२१६॥
अर्थ: पहिलेके तीन नय द्रव्यार्थिक है बाकीके नय पर्यायिको ग्रहण करते है । प्रारम्भके चार नय अर्थप्रधान है और शेष तीन नय शब्दप्रधान हैं ॥२१६॥
पण्णवण भाविभूदे अत्थे इच्छदि य वट्टणं जो सो ।
सव्वेसिं च णयाणं उवरिं खलु संपलोइज्जा ॥२१७॥
पण्णैव ण भाविभूदे अत्थे जो सो हु भेदपज्जाओ ।
अह तं एवंभूदो संभवदो मुणह अत्थेसु ॥२१८॥
गुणेपज्जयदोदव्वे कारकसन्भावदों य दव्वेसु ।
सण्णाईहिय भेयं कुणइँ सब्भूयसुद्धियरो ॥२१९॥
अर्थ: शुद्धसद्भूत व्यवहारनय गुण और पर्यायके द्वारा द्रव्यमे तथा कारक भेदसे द्रव्योमे संज्ञा आदिके द्वारा भेद करता है ॥२१९॥
दव्वाणं खु पएसा बहुगा ववहारदो य एक्केण ।
अण्णेण य णिच्छयदो भणिया का तत्थ खलु हवे जुत्ती ॥२२०॥
अर्थ: एक आचार्यने व्यवहारनयसे द्रव्योके बहुत प्रदेश कहे है । अन्य आचार्यने निश्चयनयसे द्रव्यके बहुत प्रदेश कहे हैं । इसमे क्या युक्ति है ॥२२०॥
एक्कपएसे दव्वं णिच्छयदो भेयकप्पणारहिए ।
सब्भूएणं बहुगा तस्स य ते भेयकप्पणासहिए ॥२२१॥
अर्थ: भेदकल्पना रहित निश्चयनयसे द्रव्य एक प्रदेशी है और भेदकल्पना सहित सद्भूत व्यवहारनयमे बहुत प्रदेशी है ॥२२१॥
अण्णेसिं अण्णगुणा भणइ असब्भूय तिविह भेदोवि ।
सज्जाइ इयर मिस्सो णादव्वो तिविहभेदजुदो ॥२२२॥
अर्थ: जो अन्यके गुणोंको अन्यका कहता है वह असद्भूत व्यवहारनय है। उसके तीन भेद हैं सजाति, विजाति और मिश्र तथा उनमे से भी प्रत्येकके तीन-तीन भेद हैं ॥२२२॥
दव्वगुणपज्जयाणं उवयारं ताण होइ तत्थेव ।
दव्वे गुणपज्जाया गुणदवियं पज्जया णेया ॥२२३॥
पज्जाए दव्वगुणा उवयरियं वा हु बंधसंजुत्ता ।
संबंधे संसिलेसे णाणीणं णेयमादीहि ॥२२४॥
अर्थ (गाथा 223 से 224): द्रव्यमें द्रव्यका, गुणमे गुणका, पर्यायमे पर्यायका, द्रव्यमे गुण और पर्यायका गुणमे द्रव्य और पर्यायका और पर्यायमें द्रव्य और गुणका उपचार करना चाहिए। यह उपचार बन्धसे संयुक्त अवस्था मे तथा ज्ञानीका ज्ञेय आदिके साथ सम्बन्ध होने पर किया जाता है ॥२२३-२२४॥
एयंदियाइदेहा णिव्वत्ता जे वि पोग्गले काए।
ते जो भणेइ जीवा ववहारो सो विजाईओ ॥२२५॥
अर्थ: पोद्गलिक कायमें जो एकेन्द्रिय आदिके शरीर बनते है उन्हे जो जीव कहता है वह विजातीय असद्भूत व्यवहारनय है ॥२२५॥
मुत्तं इह मइणाणं मुत्तिमदव्वेण जण्णिओ जहा।
जइ णहु मुत्तं ताणं तो किं खलिओ हु मुत्तेण ॥२२६॥
अर्थ: मतिज्ञान मूर्तिक है क्योकि मूर्तिक द्रव्यसे पैदा होता है यदि मतिज्ञान मूर्त न होता तो मूर्तके द्वारा वह स्खलित क्यो होता ॥२२६॥
दट्ठूणं पडिबिंबं लवदि हु तं चेव एस पज्जाओ ।
सज्जाइ असन्भूओ उवयरिओ णियस्सजाइपज्जाओ ॥२२७॥
अर्थ: प्रतिबिम्बको देखकर यह वही पर्याय है ऐसा कहा जाता है। यह स्वजाति पर्यायमें स्वजाति पर्यायका उपचार करनेवाला असद्भूत व्यवहारनय है ॥२२७॥
णेयं जीवमजीवं तं पिय णाणं खु तस्स विसयादो ।
जो भणइ एरिसत्थं ववहारो सो असन्भूदो ॥२२८॥
अर्थ: ज्ञेय जीव भी है और अजीव भी है ज्ञानके विषय होनेसे उन्हे जो ‘ज्ञान’ कहता है वह असद्भूत व्यवहारनय है ॥२२८॥
परमाणु एयदेशी बहुयपदेसो पयंपए जो हु ।
सो ववहारो णेओ दव्वे पज्जायउवयारो ॥२२९॥
अर्थ: जो एकप्रदेशी परमाणुको बहुप्रदेशी कहता है उसे द्रव्यमें पर्यायका उपचार करनेवाला असद्भूत व्यवहारनय जानना चाहिए ॥२२९॥
रूवं पि भणइ दव्वं ववहारो अण्णअत्थसंभूदो ।
सेओ जह पासाओ गुणेसु दव्वाण उवयारो ॥२३०॥
अर्थ: अन्य अर्थमें होनेवाला व्यवहार रूपको भी द्रव्य कहता है जैसे सफेद पत्थर । यह गुणोमे द्रव्यका उपचार है ॥२३०॥
णाणं पि हु पज्जायं परिणममाणो दु गिण्हए जम्हा ।
ववहारो खलु जंपइ गुणेसु उवयरियपज्जाओ ॥२३१॥
अर्थ: परिणमनशील ज्ञानको पर्याय रूपसे कहा जाता है इसे गुणोमे पर्यायका उपचार करनेवाला असद्भूत व्यवहारनय कहते है ॥२३१॥
दट्ठूण थूलखंधं पुग्गलदव्वेत्ति जंपए लोए ।
उवयारो पज्जाए पुग्गलदव्वस्स भणइ ववहारो ॥२३२॥
अर्थ: स्थूल स्कन्धको देखकर लोकमे उसे ‘यह पुद्गल द्रव्य है’ ऐसा कहते है। इसे पर्यायमें पुद्गल द्रव्यका आरोप करनेवाला व्यवहारनय कहते हैं ॥२३२॥
दट्ठूण देहठाणं वण्णंतो होइ उत्तमं रूवं ।
गुण उवयारो भणिओ पज्जाए णत्थि संदेहो ॥२३३॥
अर्थ: शरीरके आकारको देखकर उसका वर्णन करते हुए कहना कि कैसा उत्तम रूप है, यह पर्यायमें गुणका उपचार है इसमे सन्देह नही ॥२३३॥
सव्वत्थ पज्जयादो संतो भणिओ जिणेहि ववहारो ।
जस्स ण हवेइ संतो हेऊ दोण्हंपि तस्स कुदो ॥२३४॥
अर्थ: जिनेन्द्रदेवने सर्वत्र पर्यायरूपसे व्यवहारको सत् कहा है । जो व्यवहारको सत् नही मानता उसके मतमे संसार और मोक्षके कारण कैसे बनेगे ॥२३४॥
चउगइ इह संसारो तस्स य हेऊ सुहासुहं कम्मं ।
जइ ता मिच्छा किह सो संसारो संखमिव तस्स मए ॥२३५॥
अर्थ: यह चार गतिरूप संसार है उसके हेतु शुभ और अशुभ कर्म हैं । यदि वह मिथ्या है तो उसके मतमे सांख्यकी तरह वह संसार कैसे बनेगा ॥२३५॥
एंदियादिदेहा जीवा ववहारदो य जिणदिट्ठा ।
हिंसादिसु जदि पापं सव्वत्थवि किण्ण ववहारो ॥२३६॥
अर्थ: जिनेन्द्र देवने व्यवहारनयसे एकेन्द्रिय आदि जीवोंके शरीरको जीव कहा है । यदि उनकी हिंसा करनेमे पाप है तो सर्वत्र व्यवहार क्यो नही मानते ॥२३६॥
बंधेव मोक्खहेऊ अण्णो ववहारदो य णायव्वो ।
णिच्छयदो१ णिय भावो भणिओ खलु सव्वदरसीहिं ॥२३७॥
अर्थ: व्यवहारनयसे बन्धकी तरह मोक्षका हेतु भी अन्य जानना चाहिए। किन्तु निश्चयनयसे सर्वदर्शी भगवान्ने निजभावको बन्ध और मोक्षका कारण कहा है ॥२३७॥
जो चिय जीवसहावो णिच्छयदो होइ सव्वजीवाणं ।
सो चिय भेदुवयारो जाण फुडं होइ ववहारो ॥२३८॥
अर्थ: निश्चयनयसे जो जीव स्वभाव सब जीवोमें होता है भेदोपचारसे वह भी व्यवहार है ऐसा स्पष्ट जानो ॥२३८॥
भेदुवयारं णिच्छय मिच्छादिट्ठीण मिच्छरूवं खु ।
सम्मे सम्मा भणिया तेहि दु बंधो व मोक्खो वा ॥२३९॥
अर्थ: मिथ्यादृष्टियोका भेदरूप उपचार तथा निश्चय मिथ्या होता है ओर सम्यग्दृष्टियोका सम्यक् होता है । उन्हीसे बन्ध अथवा मोक्ष होता है ॥२३९॥
ण मुणइ वत्थुसहावं अह विवरीयं णिरवेक्खदो मुणई ।
तं इह मिच्छाणाणं विवरीयं सम्मँरूवं खु ॥२४०॥
अर्थ: जो वस्तु-स्वरूपको नही जानता या निरपेक्ष रूपसे विपरीत जानता है वह मिथ्याज्ञान है और उससे विपरीत सम्यग्ज्ञान है ॥२४०॥
णो उवयारं कीरइ णाणस्स दंसणस्स वा णेए ।
किह णिच्छित्ती णाणं अण्णेसिं होइ णियमेण ॥२४१॥
अर्थ: ज्ञान और दर्शनका ज्ञेयमे उपचार नही किया जाता । तब नियमसे अन्य पदार्थोंके निश्चय को ज्ञान कैसे कहा जा सकता है ॥२४१॥
असद्भूतव्यवहार.
उवयारा उवयारं सच्चासच्वेसु उभयअत्थेसु ।
सज्जाइइयरमिस्सो उवयरिओ कुणइ ववहारो ॥२४२॥
अर्थ: सत्य, असत्य और सत्यासत्य पदार्थोंमे तथा स्वजातीय, विजातीय और स्वजातिविजातीय पदार्थोंमे जो एक उपचारके द्वारा दूसरे उपचारका विधान किया जाता है उसे उपचरितासद्भूत व्यवहारनय कहते हैं ॥२४२॥
देसवई देसँत्थो अत्थवैणिज्जो तहेव जंपंतो ।
मे देसं मे दव्वं सच्चासच्चंपि उभयत्थं ॥२४३॥
अर्थ: देशका स्वामी कहता है कि यह देश मेरा है, या देशमें स्थित व्यक्ति कहता है कि देश मेरा है या व्यापारी- अर्थका व्यापार करते हुए कहता है कि मेरा धन है तो यह सत्य असत्य और सत्यासत्य उपचरितअसद्भूतव्यवहार नय है ॥२४३॥
पुत्ताइबंधुवग्गं अहं च मम संपयाइ जप्पंतो ।
उवयरियसद्भूओ सजाइव्वेसु णायव्वो ॥२४४॥
अर्थ: पुत्र आदि बन्धुवगंरूप मे हूँ या यह सब सम्पदा मेरी है इस प्रकारका कथन स्वजाति उपचरित असद्भूतव्यवहार नय है ॥२४४॥
आहरणहेमरयणं वच्छादीया ममेदि जप्पंतो ।
उवयरियअसद्भूओ विजाइदव्वेसु णायव्वो ॥२४५॥
अर्थ: आभरण, सोना, रत्न और वस्त्र आदि मेरे है, ऐसा कथन विजातिद्रव्योमे उपचरित असद्भूत व्यवहारनय है ॥२४५॥
देसं व रज्जदुग्गं मिस्सं अण्णं च भणइ मम दव्वं ।
उहयत्थे उवयरिओ होइ असब्भूदववहारो ॥२४६॥
अर्थ: जो देशकी तरह राज्य, दुर्ग आदि अन्य मिश्र-सजातिविजाति द्रव्योको अपना कहता है उसका यह कथन सजाति विजाति उपचरित असद्भूतव्यवहार नय है ॥२४६॥
जीवादिव्वणिवहा जे भणिया विविहभावसंजुत्ता ।
ताण पयासणहेउं पमाणणयलक्खणं भणियं ॥२४७॥
अर्थ: जो अनेक प्रकारके भावोसे संयुक्त जीवादि द्रव्योका समूह आगममे कहा है, उनके प्रकाशन के लिए प्रमाण और नयका लक्षण कहा है ॥२४७॥
दव्वाणं सहावाणं अत्थित्तं मुणसु परमसब्भावं ।
अत्थिसहावा सव्वे अत्थि वि य सव्वभावगयं ॥२४८॥
अर्थ: द्रव्योके स्वभावोमें अस्तित्वको ही परम स्वभाव जानना चाहिए । सभी द्रव्य अस्ति स्वभाव है और अस्ति स्वभाव समस्त भावोमें पाया जाता है ॥२४८॥
इदि तं पमाणविसयं सत्तारूवं खु जं हवे दव्वं ।
णयविसयं तस्संसं सियभिण्णं तंपि पुव्वुत्तं ॥२४९॥
अर्थ: इस प्रकार जो सत्स्वरूप द्रव्य है वह प्रमाणका विषय है और उसका एक अश नयका विषय है । ये प्रमाण और नय परस्परमे कथञ्चिद् भिन्न है यह पहले कहा है ॥२४९॥
सामण्ण अह विसेसे दव्वे णाणं हवेइ अविरोहो ।
साहइ तं सम्मत्तं णहु पुण तं तस्स विवरीयं ॥२५०॥
अर्थ: सामान्य अथवा विशेषरूप द्रव्यमें जो विरोध रहित ज्ञान होता है वह सम्यक्त्वका साधक है, जो उससे विपरीत होता है वह नही ॥२५०॥
सियसावेक्खा सम्मा मिच्छारूवा हु तेवि णिरवेक्खा ।
तम्हा सियसद्भावो विसयं दोहंणपि णायव्वं ॥२५१॥
अर्थ: ‘स्यात्’ सापेक्ष सम्यक् होते है और ‘स्यात्’ निरपेक्ष मिथ्या होते है । अतः स्यात् शब्दसे दोनोंका विषय जानना चाहिए ॥२५१॥
अवरोप्परसावेक्खं णयविसयं अह पमाणविसयं वा ।
तं सावेक्खं भणियं णिरवेक्खं ताण विवरीयं ॥२५२॥
अर्थ: नयका विषय हो या प्रमाणका विषय हो जो परस्परमे सापेक्ष होता है उसे सापेक्ष कहा है और जो उसके विपरीत होता है अर्थात् अन्य निरपेक्ष होता है उसे निरपेक्ष कहा है ॥२५२॥
णियमेणणिसेहणसीलो णिपादणादो य जो हु खलु सिद्धो ।
सो सियसद्दो भणिओ जो सावेक्खं पसाहेदि ॥२५३॥
अर्थ: जो सर्वथा नियमका निषेध करनेवाला है और निपातरूपसे जो सिद्ध है वह ‘स्यात्’ शब्द कहा गया है, वह वस्तुको सापेक्ष सिद्ध करता है ॥२५३॥
त्रिसंज्ञिकोऽयं स्याच्छब्दो युक्तोऽनेकान्तसाधकः ।
निपातनात्समुद्भूतो विरोधध्वंसको मतः ॥२५४॥
अर्थ: प्रमाण, नय और दुर्नयके भेदसे युक्त सात ही भंग होते है । स्यात् सापेक्ष भंगोंको प्रमाण कहते हैं, नयसे युक्त भंगोको नय कहते है और निरपेक्ष भंगोको दुर्नय कहते हैं ॥२५४॥
अत्थित्ति णत्थि दोवि य अव्वत्तव्वं सिएण संजुत्तं ।
अव्वत्तव्वा ते तह पमाणभंगी सुणायव्वा ॥२५५॥
अत्थिसहावं दव्वं सद्वव्वादीसु गाहियणएण ।
तं पिय णत्थिसहावं परदव्वादीहि गहिएण ॥२५६॥
उहयं उहयणएण अव्वत्तव्वं च णैण समुदाए ।
ते तिय अव्वत्तव्वा णियणियणयअत्थसंजोए ॥२५७॥
अर्थ (गाथा 255 से 257): हो सकती । निपातसे इस स्यात् शब्दकी निष्पत्ति हुई है । यह विरोधका नाश करनेवाला है अर्थात् एक ही वस्तुको सर्वथा नित्य और सर्वथा अनित्य मानने में तो विरोध पैदा होता है क्योंकि जो सर्वथा नित्य है, वह अनित्य किस प्रकार हो सकती है और जो सर्वथा अनित्य है वह नित्य किस प्रकार हो सकती है । किन्तु एक ही वस्तुको स्यात् नित्य और स्यात् अनित्य कहनेमें कोई विरोध नही आता । जो किसी अपेक्षासे नित्य है वही अन्य अपेक्षासे अनित्य भी हो सकती है अत स्याद्वाद विरोधका नाशक है । भगवान् केवलीकी दिव्यध्वनिसे इसका जन्म हुआ है अर्थात् केवलज्ञानीने स्याद्वादका आविष्कार किया है क्योंकि जैसे केवलज्ञान सब द्रव्योको एक साथ ग्रहण कर सकता है उस प्रकार केवलज्ञानीकी वाणी भी सबको एक साथ नही कह सकती क्योकि वचनकी प्रवृत्ति तो क्रमसे हो होती है । इसलिए केवलज्ञानके द्वारा ज्ञात अनेकान्तका सूचक या द्योतक शब्द प्रत्येक वाक्यके साथ सम्बद्ध रहता है ऐसा सर्वज्ञ केवलज्ञानीने कहा है । जैसे सिद्ध किया गया एक मन्त्र अनेक अभीष्ट फलोको प्रदान करता है वैसे ही एक ‘स्यात्’ शब्दको भी अनेक अर्थका-अनेक धर्मात्मक पदार्थका साधक जानना चाहिए । स्यात् अस्ति, स्यात् नास्ति, स्यात् अस्तिनास्ति, स्यात् अवक्तव्य, स्यादस्ति अवक्तव्य, स्यात् नास्ति अवक्तव्य और स्यात् अस्ति नास्ति अवक्तव्य ये प्रमाणसप्तभंगी जानना चाहिए । स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभावसे द्रव्य अस्तित्वस्वरूप है और परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभावसे नास्तिस्वरूप है । स्वद्रव्यादिचतुष्टय परद्रव्यादिचतुष्टयसे अस्ति नास्ति स्वरूप है । दोनों धर्मोको एक साथ करनेकी अपेक्षा अवक्तव्य है । इसी प्रकार अपने-अपने नयके साथ अर्थकी योजना करनेपर अस्ति अवक्तव्य, नास्तिअवक्तव्य और अस्तिनास्ति अवक्तव्य है ॥२५५-२५७॥
अत्थेव णत्थि उभयं अव्वत्तव्वं तहेव पुण तिदयं ।
तहे सिय णयणिरवेक्खं जाणसु दव्वे दुणयभंगी ॥२५८॥
अर्थ: स्यात् पद तथा नयनिरपेक्ष वस्तु अस्ति ही है, नास्ति ही है, उभयरूप,ही है, अवक्तव्य ही है, अस्ति अवक्तव्य ही है, नास्ति अवक्तव्य ही है, अस्तिनास्ति अवक्तव्य ही है यह दुर्नयभंगी जानना चाहिए ॥२५८॥
एकणिरुद्धे इयरो पडिवक्खो अंवेरेय सम्भावो ।
सव्वेसिं स सहावे कायव्वा होइ तह भंगा ॥२५९॥
अर्थ: वस्तुके किसी एक धर्मको ग्रहण करने पर दूसरा उसका प्रतिपक्षी धर्म होता है वे दोनों ही धर्म वस्तुके स्वभाव हैं । सभी वस्तुओंके स्वभावमे सप्तभंगीकी योजना करना चाहिए ॥२५९॥
धम्मी धम्मसहावो धम्मा पुण एक्कएक्कतेणिठ्ठा ।
अवरोप्परं विभिण्णा णयदो गउणमुक्खभावेण ॥२६०॥
अर्थ: धर्मी ( वस्तु ) धर्मस्वभाव होता है और धर्म एक-एक करके वस्तुमे रहते है । वे नयदृष्टिसे गौणता और मुख्यतासे परस्परमें भिन्न होते हैं ॥२६०॥
सियजुत्तो णयणिवहो दव्वसहावं भणेइ इह तत्थं ।
सुणयपमाणा जुत्तो णहु जुत्तिविवज्जियं तच्चं ॥२६१॥
अर्थ: ‘स्यात्’ पदसे युक्त नयसमूह द्रव्यके यथार्थ स्वभावको कहता है । सम्यक् नय और प्रमाणको युक्ति कहते हैं । जो युक्तिसे शून्य है वह तत्त्व नही है ॥२६१॥
तच्चं पि हेयमियरं हेयं खलु होइ ताणे परदव्वं ।
णियदव्वे पिय जाणसु हेयोहेयं च णयजोए ॥२६२॥
अर्थ: तत्त्व भी हेय और उपादेय होता है । पर द्रव्यरूप तत्त्व हेय है । निज द्रव्यमें भी नयके योगसे हेय और उपादेय जानना चाहिए ॥२६२॥
मिच्छा सरागमूढो हेयो आदा हवेइ णियमेण ।
तन्विवरीयो झेओ णायव्वो सिद्धिकामेण ॥२६३॥
अर्थ: मिथ्या दृष्टि और सरागी आत्मा नियमसे हेय है और सम्यक्त्वी वीतरागी आत्मा मुमुक्षुके द्वारा ध्यान करनेके योग्य जानना चाहिए ॥२६३॥
जो सियभेदुवयारं धम्माणं कुणइ एगवत्थुस्स ।
सो ववहारो भणियो विवरीओ णिच्छयो होइ ॥२६४॥
अर्थ: जो एक वस्तुके धर्मोंमें कथंचित् भेदका उपचार करता है उसे व्यवहारनय कहते हैं और उससे विपरीत निश्चयनय होता है ॥२६४॥
एकको चि ज्ञेयरूवो इयरो ववहारदो य तह भणिओ ।
णिच्छयणएण शुद्धो १ सम्मग्गुतियेण णिय अप्पा ॥२६५॥
अर्थ: एक भी ध्येयरूप व्यवहारनयसे भेदरूप कहा गया है। निश्चयनयसे शुद्ध आत्मा ध्येयरूप है और व्यवहारनयसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे युक्त निज आत्मा ध्येय है ॥२६५॥
तिण्णि णया भूदत्था इयरा ववहारदो य तह भणिया ।
दो चेव शुद्धरूवा एक्को गाही य परमभावेण ॥२६६॥
अर्थ: तीन नय भूतार्थ हैं, शेष नय व्यवहारसे कहे गये है । उन तीन नयोंमेंसे दो नय ( शुद्धग्राही होनेसे ) शुद्धरूप हैं और एक नय परमभावका ग्राही होनेसे भूतार्थ है ॥२६६॥
जं जस्स भणिय भावं तं तस्स पहाणदो य तं दव्वं ।
तम्हा ज्ञेयं भणियं णिच्छयणय णिच्छिओ अत्यो ॥२६७॥
अर्थ: जिस वस्तुका जो स्वभाव कहा है उसका, प्रधानरूपसे वही द्रव्यरूप होता है इसलिए निश्चयनयके द्वारा निश्चित अर्थको ही ध्येय-ध्यान करनेके योग्य कहा है ॥२६७॥
तच्चाणेसणकाले समयं बुज्झेहिं जुत्तिमग्गेण ।
णो आराहणसमये पच्चक्खो अणुहवो जम्हा ॥२६८॥
अर्थ: तत्त्वको खोजते समय युक्तिमार्गके द्वारा आगमकी बातको जानना चाहिए । आराधनाके समय नहीं । क्योकि अनुभव तो प्रत्यक्षका विषय है ॥२६८॥
एयंते णिरवेक्खे णो सिज्झइ विविधभावगं दव्वं ।
तं तहव अणेयंते इदि बुज्झह सिय अणेयंत्तं ॥२६९॥
अर्थ: निरपेक्ष एकान्तवादमें अनेक भावरूप द्रव्यकी सिद्धि नहीं होती। इसी तरह एकान्त निरपेक्ष अनेकान्तवादमें भी तत्त्वकी निर्णीति नहीं होती। इसलिए कथंचित् अनेकान्तवादको जानना चाहिए ॥२६९॥
जं खवोवसमं णाणं सम्मग्गरूवं जिणेहि पण्णत्तं ।
तं सियगाही होदि हु सपरसरूवेण णिब्भंतं ॥
जुत्तीसु जुत्तमग्गे जं चउभेएण होइ खलु ठवणं ।
कज्जे सदि णामादिसु तं णिक्खेवं हवे समए ॥२७०॥
अर्थ: युत्तिके द्वारा सुयुक्त मार्गमें कार्यके वशसे नाम स्थापना द्रव्य और भावमें पदार्थकी स्थापनाको आगममे निक्षेप कहा है ॥२७०॥
दव्वं विविहसहावं जेण सहावेण होइ तं झेयं ।
तस्स निमित्तं कीरइ एक्कं पिय दव्व चउभेयं ॥२७१॥
अर्थ: द्रव्य अनेक स्वभाववाला होता है। उनमेसे जिस स्वभावके द्वारा वह ध्येय या ज्ञेय-ध्यान या ज्ञानका विषय होता है, उसके लिए एक भी द्रव्यके चार भेद किये जाते है ॥२७१॥
णाम ठवणा दव्वं भावं तह जाण होइ णिक्खेवं ।
दव्वे सण्णा णामं दुविहं पिय तंपि विक्खादं ॥२७२॥
अर्थ: निक्षेपके चार भेद है-नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव । उनमेसे द्रव्यकी संज्ञाको नाम कहते हैं और नामके दो भेद प्रसिद्ध है ॥२७२॥
मोहेरजअंतराए हणणगुणादो य णाम अरिहंतो ।
अरिहो पूयाए वा सेसा णामं हवे अण्णं ॥२७३॥
अर्थ: मोहनीय, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय कर्मका घात करनेसे अरिहन्त नाम है और पूजाके योग्य होनेसे अर्हन्त नाम है। इन गुणोंके बिना किसीका अरिहन्त या अर्हन्त नाम रखना नामनिक्षेपका उदाहरण है ॥२७३॥
सायार इयर ठवणा कित्तिम इयरा हु बिंबजा पढमा ।
इयरा खाइय भणिया ठवणा अरिहो य णायव्वो ॥२७४॥
अर्थ: स्थापना के दो भेद है-साकार और निराकार। कृत्रिम या अकृत्रिम बिम्बोमे अर्हन्त परमेष्ठीकी स्थापना साकार स्थापना है। और क्षायिक गुणोमे अर्हन्तकी स्थापनाको निराकार स्थापना कहते हैं ॥२७४॥
दव्वं खु होइ दुविहं आगमगोआगमेण जह भणियं ।
अरहंतसत्यजाणो णोजुत्तो दव्व-अरिहंतो ॥२७५॥
अर्थ: द्रव्यनिक्षेपके दो भेद हैं–आगम द्रव्यनिक्षेप और नोआगम द्रव्यनिक्षेप। जो व्यक्ति अरिहन्त विषयक शास्त्रका ज्ञाता है किन्तु उसमें उपयुक्त नही है अर्थात् ज्ञाता होते हुए भी जब
णोआगमं पि तिविहं णाणिसरीरं भावि कम्मं च ।
णाणिसरीरं तिविहं चुद चत्तं चाविदं चेति ॥२७६॥
अर्थ (गाथा 275 से 276): वह उस विषयक शास्त्रके चिन्तनमें नही लगा है उसे आगम द्रव्य अरिहन्त कहते हैं। नोआगमद्रव्यके तीन भेद हैं-ज्ञायक शरीर, भावि और कर्मनोकर्म । ज्ञायक शरीरके तीन भेद हैं-च्युत, च्यावित और त्यक्त ॥२७५-२७६॥
आगमणोआगमदो तहेव भावो वि होदि दव्वं वा ।
अरहंतसत्थजाणो आगमभावो हु अरहंतो ॥२७७॥
तग्गुणरायपरिणदो णोआगमभाव होइ अरहंतो ।
तग्गुणराई झादा केवलणाणी हु परिणदो भणिओ ॥२७८॥
अर्थ (गाथा 277 से 278): द्रव्यनिक्षेपकी तरह भावनिक्षेपके भी दो भेद हैं-आगमभावनिक्षेप और नोआगमभावनिक्षेप । जो अरिहन्त विषयक शास्त्रका ज्ञाता उसमें उपयुक्त है वह आगमभाव अरिहन्त है। और जो अरिहन्तके गुणरूप परिणत है, वह नोआगमभाव अरिहन्त है। अरिहन्तके गुणोंसे युक्त केवलज्ञानीको अर्हन्तके गुणरूप परिणत कहा है ॥२७७-२७८॥
अह गुणपज्जयवंतं दव्वं भणियं खु अण्णसूरीहिं ।
भावं चिह्नं तस्स य तेहिं पिय एरिसं भणियं ॥२७९॥
णो इहुं भणियव्वं भिण्णं काऊण एसु णिक्खेवं ।
तस्सेव दंसणट्ठं भणियं काऊणमिह सुत्तं ॥२८०॥
अर्थ (गाथा 279 से 280): अथवा अन्य आचार्योंने गुणपर्यायवान्को द्रव्य कहा है। और उसका चिह्न भाव है ऐसा भी उन्होंने कहा है। उनको भिन्न करके उनमे निक्षेपका कथन नही करना चाहिए। इसी बातको बतलानेके लिए यहाँ सूत्रका कथन किया है ॥२७९-२८०॥
सद्देसु जाण णामं तहेव ठवणा हु थूलरिउसुत्ते ।
दव्वं पिय उवयारे भावं पज्जायमज्झगदं ॥२८१॥
अर्थ: शब्द नयोंमें नाम निक्षेप तथा स्थूलऋजुसूत्रनयमे स्थापना निक्षेपका अन्तर्भाव जानना । उपचारसे द्रव्य भी ऋजुसूत्रनयके अन्तर्गत है और भावनिक्षेप पर्यायके अन्तर्गत है ॥२८१॥
निक्खेव णय पमाणं णादूणं भावयंति जे तच्चं ।
ते तत्थतच्चमग्गे लहंति लग्गा हु तत्थयं तच्चं ॥२८२॥
अर्थ: जो निक्षेप नय और प्रमाणको जानकर तत्त्वकी भावना करते हैं वे वास्तविक तत्त्वके मार्गमें संलग्न होकर वास्तविक तत्त्वको प्राप्त करते हैं ॥२८२॥
गुणपज्जायलकखणसहावणिक्खेवणयपमाणं च ।
जाणदि जदि सवियप्पं दव्वसहावं खु बुज्झेदि ॥२८३॥
अर्थ: यदि आप गुण, पर्याय, लक्षण, स्वभाव, निक्षेप, नय और प्रमाणको भेद सहित जानते हैं तो आप द्रव्यके स्वभावको समझ सकते हैं । अर्थात् द्रव्यके स्वभावको जाननेके लिए गुणपर्याय आदिका जानना आवश्यक है ॥२८३॥
दंसणणाणचरित्तं सम्मगं परमं च जेहि उवेलद्धं ।
पणविवि ते परमेट्ठी वोच्छेहं णाणदंसणचरित्तं ॥२८४॥
अर्थ: जिन्होने उत्कृष्ट सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रको प्राप्त कर लिया है अर्थात् क्षायिक सम्यक्त्व, केवलज्ञान और यथाख्यातचारित्रसे युक्त अर्हन्तपरमेष्ठीको और सिद्धपरमेष्ठीको नमस्कार करके मै सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रके स्वरूपको कहूँगा ॥२८४॥
दंसणणाणचरित्तं मग्गं मोक्खस्स भणिय दुविहं पि ।
णहु सुहमसुहं होदि हु तं पि य बंधो हवे णियमा ॥२८५॥
अर्थ: व्यवहार सम्यग्दर्शन, व्यवहार सम्यग्ज्ञान और व्यवहारचारित्र तथा निश्चय सम्यग्दर्शन, निश्चयसम्यग्ज्ञान और निश्चय सम्यक्चारित्रको मोक्षका मार्ग कहा है । शुभ और अशुभ भाव मोक्षके मार्ग नही है, उनसे तो नियमसे कर्मबन्ध होता है ॥२८५॥
णो ववहारो मग्गो मोहो हवदि सुहासुहमिदि १वयणं ।
णियदव्वजाणणट्ठं इयरं कहियं जिणेहि छहदव्वं ।
तहया परछद्दव्वे जाणणभावो ण होइ सण्णाणं ॥
णहु एसा सुन्दरा जुत्ती ॥२८६॥
अर्थ: व्यवहार मार्ग नहीं है क्योकि व्यवहार या तो शुभरूप होता हैं या अशुभरूप होता हैं और शुभ तथा अशुभ तो मोहरूप हैं । निज द्रव्य (आत्मा) को जाननेके लिए जिनेन्द्र देवने अन्य छह द्रव्योका कथन किया है । इसलिए पररूप छह द्रव्योंमें जो ज्ञायक भाव है अर्थात् अपने सिवाय बाकीके छह द्रव्योका जो ज्ञान है वह सम्यग्ज्ञान नही है । किन्तु यह युक्ति सुन्दर नहीं है ॥ २८६ ॥
णियसमयं पि य मिच्छा अह जड सुण्णो य तस्स सो चेदा ।
जाणगभावो मिच्छा उवयरिओ तेण सो भणई ॥२८७॥
जं चिय जीवसहावं उवयारं भणिय तं पि ववहारो ।
तम्हा णहु तं मिच्छा विसेसदो भणइ सब्भावं ॥२८८॥
झेओ जीवसहावो सो इह सपरावभासगो भणिओ ।
तस्स य साहणहेऊ उवयारो भणिय अत्थेसु ॥२८९॥
जह सब्भूओ भणिदो साहणहेऊ अभेदपरमत्थो ।
तह उवयारो जाणह साहणहेऊ अणुपयारो ॥२९०॥
अर्थ (गाथा 287 से 290): उक्त प्रकारसे कहनेवालेकी आत्मा यदि जड़ और शून्य है तो स्वसमय भी मिथ्या ठहरता है। किन्तु ज्ञायक भाव मिथ्या है इसलिए उसे उपचारित कहा है। जीवका जो स्वभाव उपचारित कहा है वह भी व्यवहार है। इसलिए वह मिथ्या नही है किन्तु विशेष रूपसे स्वभावको कहता है। जीवका स्वभाव ध्येय-ध्यान करनेके योग्य है। और उस स्वभावको स्व और पर का प्रकाशक कहा है। उस स्वभावके साधनका हेतु उपचार पदार्थोंमे कहा है। जैसे सद्भूत व्यवहारनय परमार्थ अभेदके साधनका हेतु है वैसे ही उपचार, अनुपचारके साधनका हेतु है ॥ २८७-२९० ॥
जो इह सुदेण १ भिण्णो जाणदि अप्पाणमिणं तु केवलं सुद्धं ।
तं सुयकेवलिमिसिणो भणंति लोयप्पदीवयरा ॥-समयसार गा० ९
उवयारेण विजाणइ सम्मग्गुरूवेण जेण परदव्वं ।
सम्मेगणिच्छय तेण वि सइयसहावं तु जाणंतो ॥२९१॥
अर्थ: यतः यह आत्मा या ज्ञान पर द्रव्यको सम्यक् रूपसे उपचारसे जानता है अतः सम्यक् निश्चयकी दृष्टिसे अपने स्वरूपको जानता है ॥ २९१ ॥
उवसमखयमिस्साणं तिहूणं एक्को वि णहु असन्भूवो ।
णोवत्तव्वं एवं सोवि गुणो जेण उवयरिओ ॥२९२॥
अर्थ: औपशमिक, क्षायिक और मिश्र (क्षायोपशमिक ) इन तीनो भावोंमेसे कोई भी भाव असद्भूत नही है, ऐसा नही कहना चाहिए, क्योकि ये सब भी उपचरित है ॥ २९२ ॥
णदु णयपक्खं मिच्छा तं पिय णेयंतदव्वसिद्धियरं ।
सियसद्दसमारूढं जिणवयणविणिग्गयं सुद्धं ॥२९३॥
अर्थ: जिनवाणीसे निकले हुए शुद्ध ‘स्यात्’ शब्दसे युक्त नय पक्ष मिथ्या नही होता, बल्कि वस्तु स्वरूपकी सिद्धि करता है ॥ २९३ ॥
अवरोप्परसुविरुद्धा सव्वे धम्मा फुरंति जीवाणं ।
जाव ण सियसावेक्खो गहिओ वत्थूण सन्भावो ॥२९४॥
अर्थ: जब तक ‘स्यात्’ पदकी अपेक्षासे वस्तुके स्वभावको ग्रहण नही किया जाता तभी तक जीवोंके सभी धर्म परस्परमें विरुद्ध प्रतीत होते है ॥ २९४ ॥
जं जं मुणदि सदिट्ठी सम्मगरूवं खु होदि तं तं पि ।
जह इह वयणं मंतं मंतीणं सिद्धमंतेण ॥२९५॥
अर्थ: किन्तु सम्यग्दृष्टि जो-जो जानता है वह-वह सत्य होता है । जैसे वचन मान्त्रिकके द्वारा सिद्ध किये जाने पर मन्त्र बन जाता है ॥ २९५ ॥
य एव नित्यक्षणिकादयो नया मिथोऽनपेक्षाः स्वपरप्रणाशिनः ।
त एव तत्त्वं विमलस्य ते मुनेः परस्परेक्षाः स्वपरोपकारिणः ॥
णो ववहारेण विणा णिच्छयसिद्धी कया वि णिद्दिट्ठा ।
साहणहेऊ जम्हा तस्स य सो भणिय ववहारो ॥२९६॥
अर्थ: जो परस्पर निरपेक्ष, नित्य और क्षणिक आदि दृष्टियां है वे अपना और परका विनाश करनेवाली है । किन्तु परस्पर सापेक्ष वे ही दृष्टियां विमलनाथ भगवान्के मतमे तात्त्विक हैं उन्हीके आधार पर तत्त्वकी व्यवस्था होती है अतः वे स्व और परका उपकार करनेवाली है । व्यवहारके बिना कभी भी निश्चयकी सिद्धि नही होती । इसलिए निश्चयकी सिद्धिमें जो हेतु है उसे व्यवहार कहा है ॥ २९६ ॥
दव्वसुयादो सम्मं भावं तं चेव अप्पसब्भावं ।
तं पि य केवलणाणं संवेयणसंगदो जहा ॥२९७॥
अर्थ: द्रव्यश्रुतसे समीचीन भाव होता है। वह समीचीन भाव आत्माके स्वभावरूप ही है। तथा आत्मस्वभाव केवल ज्ञानरूप है क्योकि आत्मसंवेदनसे ही वह प्रकट होता है ॥२९७॥
दव्वसुयादो भावं तत्तो भेय हवेइ संवेदं ।
तत्तो सवित्ती खलु केवलणाणं हवे तत्तो ॥
अर्थ: द्रव्यश्रुतसे भावश्रुत और भावश्रुतसे भेदज्ञान होता है। भेदज्ञानसे आत्मसंवेदन होता है। और आत्मसंवेदनसे केवलज्ञान होता है।
'मिच्छा सरायभूदो जीवो कत्ता जिणागमे पडिदो ।
णहु विवरीओ कत्ता उवयरिओ जइवि अत्थेसु ॥२९८॥
अर्थ: जिनागममे मिथ्यादृष्टि सरागी जीवको कर्ता कहा है । उससे जो विपरीत है वह कर्ता नही है, यद्यपि पदार्थोंमे उसका उपचार किया जाता है ॥२९८॥
असुहं सुहं विय कम्मं दुविहं तं दव्वभावभेयगयं ।
तं पिय पडुच्च मोहं संसारो तेण जीवस्स ॥२९९॥
अर्थ: अशुभ और शुभकर्म द्रव्य तथा भावके भेदसे दो प्रकारके हैं। इनका कारण मोह है उसीसे जीवको संसारमे भटकना पडता है ॥२९९॥
दंसणचरित्तमोहं दुविहं पि य विविहभेयसन्भावं ।
एयाणं ते भेया जे भणिया पच्चयाईहिं ॥३००॥
पच्चयवंतो रागा दोसामोहे य आसवा तेसिं ।
आसवदो खलु कम्मं कम्मेण य देह तं पि संसारो ॥३०१॥
अर्थ (गाथा 300 से 301): मोहनीय कर्मके दो भेद हैं–दर्शन मोहनीय और चारित्र मोहनीय । इन दोनोके भी अनेक भेद हैं । कर्मोंके हेतु जो मिथ्यात्व आदि और राग-द्वेष आदि है वे भी इन्हीके भेद है । मिथ्यात्व आदि रूप भाव राग, द्वेष, मोह रूप आस्रवोंके कारण है । आस्रवभाव कर्मका कारण है । कर्म शरीरका कारण है और शरीर ससारका कारण है ॥३००-३०१॥
मिच्छेत्तं अण्णाणं अविरमण कसाय जोग जे भावा ।
ते इह पच्चय जीवे विसेसदो हुंति ते बहुगा ॥३०२॥
अर्थ: जीवमे मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरति, कषाय और योगरूप जो भाव है उन्हे यहाँ प्रत्यय कहा है । उनके बहुतसे भेद हैं ॥३०२॥
मिच्छेत्तं पुणं दुविहं मूढत्तं तह सहावणिरवेक्खं ।
तस्सोदयेण जीवो विवरीदं गेहणए तच्चं ॥३०३॥
अर्थ: मिथ्यात्वके दो भेद है-एक मूढता रूप और दूसरा स्वभावनिरपेक्ष अर्थात् परोपदेशरूप । मिथ्यात्व कर्मके उदयसे जीव तत्त्वको विपरीत रूपसे ग्रहण करता है अर्थात् वस्तुका जैसा स्वरूप है उससे उलटा जानता है ॥३०३॥
अत्थित्तं णो मण्णदि णत्थिसहावस्स जो हु सावेक्खं ।
णत्थी विय तह दव्वे मूढो मूढो हु सव्वत्थ ॥३०४॥
अर्थ: जो द्रव्यमे अस्तित्वको नास्तिस्वभाव सापेक्ष नही मानता और नास्तित्वको अस्तित्व स्वभावसापेक्ष नही मानता वह मूढ सर्वत्र मूढ ही है ।३०४॥
मूढो विय सुदहेदुं सहावणिरवेक्खरूवदो होइ ।
अलहंतो खवणादी मिच्छाथयदंसणो खलु उदए ॥३०५॥
अर्थ: मिथ्यात्व प्रकृतिका उदय होनेपर कर्मका क्षय आदि न कर सकनेवाला मूढ मिथ्यादृष्टि भी शास्त्र आदिका निमित्त मिलनेपर स्वाभावनिरपेक्ष रूपसे मिथ्यादृष्टि होता है ॥३०५॥
ससयविमोहविब्भमजुत्तं जं तं खु होइ अण्णाणं ।
अहव कुसत्थाज्झयणं पावपयं हवदि तं णाणं ॥३०६॥
अर्थ: संशय, विमोह और विभ्रमसे युक्त जो ज्ञान होता है उसे अज्ञान कहते हैं । अथवा कुशास्त्रोके अध्ययन चिन्तनसे जो पापदायक ज्ञान होता है वह भी अज्ञान है ॥३०६॥
हिंसा असच्च मोसो मेहुणसेवा परिग्गहे गहणं ।
अविरदिभेया भणिया एयाण बहुविहा अण्णे ॥३०७॥
अर्थ: हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुनसेवन और परिग्रहका ग्रहण ये पांच अविरतिके भेद कहे है । इनके अन्य बहुतसे भेद है ॥ ३०७ ॥
कोहो थ माण माया लोह कसाया हु होंति जीवाणं ।
एक्केक्का चउभेया किरिया हु सुहासुहं जोगं ॥३०८॥
अर्थ: जीवोंके जो क्रोध, मान, माया और लोभ होते हैं उन्हे कषाय कहते हैं । इनमेसे प्रत्येकके चार-चार भेद होते हैं-उनके नाम हैं अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध, मान, माया, लोभ और संज्वलन क्रोध, मान, माया, लोभ । शुभ और अशुभ क्रियाको योग कहते हैं ॥ ३०८ ॥
मोहो व दोसभाओ असुहो वा राग पावमिदि भणियं ।
सुहरागो खलु पुण्णं सुहदुक्खादी फलं ताणं ॥३०९॥
अर्थ: मोह, द्वेषभाव और अशुभ रागको पाप कहा है और शुभरागको पुण्य कहा है । उनका फल सुख-दुःख आदि है ॥ ३०९ ॥
कज्जं पडि जह पुरिसो इक्को वि अणेकरूवमापण्णो ।
तह मोहो बहुभेओ णिद्दिष्ट्ठो पच्चयादीहि ॥३१०॥
अर्थ: जैसे एक भी पुरुष कार्यकी अपेक्षा अनेक रूप होता है वैसे ही मोहनीय कर्म भी प्रत्यय आदिके द्वारा अनेक प्रकारका कहा है ॥ ३१० ॥
देवगुरुसत्थभत्तो गुणोवयारकिरियोहि संजुत्तो ।
पूजादाणाइरदो उवओगो सो सुहो तस्स ॥३११॥
अर्थ: देवगुरु और शास्त्रका जो भक्त है, गुणोंसे आकृष्ट होकर उनकी विनय भक्ति आदि करता है, पूजा, दान आदिमे लीन रहता है वह मनुष्य शुभ उपयोगवाला है ॥३११॥
परदो इह सुहमसुहं सुद्धं ससहावसंगदो भावं ।
सुद्धे मुंचदि जीवो बज्झदि सो इयरभावेहिं ॥३१२॥
अर्थ: परद्रव्यमे अनुरक्तिसे शुभ और अशुभ भाव होते हैं और आत्मस्वभावमे लीनतासे शुद्ध भाव होता है। शुद्ध भावके होने पर जीव मुक्त होता है और शुभ तथा अशुभ भावोंसे बँधता है ॥३१२॥
जं किंपि सयलदुक्खं जीवाणं तं खु होइ कम्भादो ।
तं पिय कारणवंतो तम्हा तं कारणं हणह ॥३१३॥
अर्थ: जीवोको जो कुछ भी दुःख है वह सब कर्मके ही कारण है । उन कर्मोंके भी कारण हैं और इसलिए उन कारणोंको ही हटाना चाहिए ॥३१३॥
लद्धूण दुचिहहेउं जीवो मोहं खवेइ णियमेण ।
अब्भंतरबाहिरेयं जह तह व सुणह वोच्छामि ॥३१४॥
अर्थ: आभ्यन्तर और बाह्य रूपसे दोनों प्रकारके कारणोको प्राप्त करके जीव जिस प्रकारसे मोहनीय कर्मका नियमसे क्षय करता है उसे सुनो, मै कहता हूँ ॥३१४॥
काऊण करणलद्धी सम्मत्तभावस्स कुणइ जं गहणं ।
उवसमखयमिस्सादो पयडीणं तं पि णियहेउं ॥३१५॥
अर्थ: कर्म प्रकृतियोके उपशम क्षय या क्षयोपशमसे करण लब्धिको करके जीव जो सम्यक्त्व भावको या आत्म स्वभावको ग्रहण करता है वह आभ्यन्तर हेतु है ॥३१५॥
तित्थयरकेवलिसमणभवसुमरणसत्थदेवमहिमादी ।
इच्चेवमाइ बहुगा बाहिरहेऊ मुणेयव्वा ॥३१६॥
अर्थ: तीर्थंकर, केवली, श्रमण, पूर्वजन्मका स्मरण, शास्त्र, देव, महिमा आदि बहुतसे बाह्य हेतु जानना चाहिए ॥३१६॥
आसण्णभव्वजीवो अणंतगुणसेढिसुद्धिसंपण्णो ।
बुज्झंतो खलु अट्ठे खवदि स मोहं पमाणणयजोए ॥३१७॥
अर्थ: जो निकट भव्य जीव अनन्तगुणश्रेणि निर्जरासे सम्पन्न होता है और प्रमाण नयकी योजना के द्वारा तत्त्वार्थको जानता है वही मोहका क्षय करता है ॥३१७॥
एवं उवसम मिस्सं खाइयसम्मं च केऽपि गिण्हंति ।
तिण्णिवि णएण’ तियहा णिच्छय सम्भूव तह असन्भूओ ॥३१८॥
अर्थ: इस प्रकार कुछ जीव उपशम सम्यक्त्व, क्षायिक सम्यक्त्व या क्षायोपशमिक सम्यक्त्वको ग्रहण करते हैं। वह सम्यक्त्व निश्चयनय, सद्भूत व्यवहारनय और असद्भूत व्यवहारनयकी अपेक्षा तीन प्रकार है ॥३१८॥
सण्णाइभेयभिण्णं जीवादो णाणदंसणचरित्तं ।
सो सब्भूवो भणिदो पुव्वं चिय जाण व्यवहारो ॥३१९॥
अर्थ: जीवसे सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र नामादिके भेद होनेसे भिन्न है ऐसा कथन करनेवाला सद्भूत व्यवहारनय जानना चाहिए ॥३१९॥
णेयं खु जत्थ णाणं सद्देयं जत्थ दंसणं भणियं ।
चरियं खलु चारित्तं, णायव्वं त असन्भूवं ॥३२०॥
अर्थ: और जिसमे ज्ञेयको ज्ञान, श्रद्धेयको सम्यग्दर्शन और आचरणीयको चारित्र कहा जाये उसे असद्भूत व्यवहारनय जानना चाहिए ॥३२०॥
सद्धा तत्त्वे दंसण तस्सेव सहावजाणगं णाणं ।
असुहणिवित्ती चरणं ववहारो मोक्खमग्गं च ॥३२१॥
अर्थ: तत्त्वोकी श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है, तत्त्वार्थके स्वरूपको जानना सम्यग्ज्ञान है और अशुभ कार्योंको त्यागना सम्यक् चारित्र है, यह व्यवहार मोक्षमार्ग है ॥३२१॥
आणा तह अहिगमदो णिसग्गभावेण केवि गिह्णंति ।
एवं हि ठाइऊण णिच्छयभावं खु साहंति ॥३२२॥
अर्थ: कुछ लोग सर्वज्ञ देवकी आज्ञाके रूपमें, कुछ परोपदेशसे तथा कुछ परोपदेशके बिना स्वतः ही व्यवहाररत्नत्रयको ग्रहण करते हैं और इस तरह वे व्यवहाररत्नत्रयकी स्थापना करके निश्चय-रत्नत्रय रूप भावकी साधना करते हैं ॥३२२॥
आदे तियदसहावे णो उवयारं ण भेदकरणं च ।
तं णिच्छैयं हि भणियं जं तिण्णिवि होइ आदेव ॥३२३॥
अर्थ: रत्नत्रय स्वरूप आत्मामें न उपचार करना और न भेद व्यवहार करनेको निश्चय कहा है क्योकि रत्नत्रय तो आत्मा ही है अर्थात् आत्मासे भिन्न रत्नत्रय नही है ॥३२३॥
एवं दंसणजुत्तो चरित्तमोहं च खविय सामण्णो ।
लॅहदि हु सो परमप्पा वट्टंतो एण³ कम्मेण ॥३२४॥
अर्थ: इस क्रमसे सम्यग्दर्शनसे युक्त मुनि चारित्र मोहनीयका क्षय करके परमात्मपदको प्राप्त करता है ॥ ३२४ ॥
दंसेणकारणभूदं णाणं सम्मं खु होइ जीवस्स ।
तं सुयणाणं णियमा जिणवयर्णविणिग्गयं परमं ॥३२५॥
अर्थ: सम्यग्दर्शनपूर्वक जीवके जो ज्ञान होता है वह सम्यग्ज्ञान है । अथवा सम्यग्दर्शनका कारणभूत जीवका ज्ञान सम्यग्ज्ञान है और वह ज्ञान जिनागमसे निकला हुआ नियमसे उत्तम श्रुतज्ञान है ॥ ३२५ ॥
वत्थूण जं सहावं जहट्ठियं णयपमाण तह सिद्धं ।
तं तह व जौंणणे इह सम्मं णाणं जिणा वंति ॥३२६॥
अर्थ: वस्तुका जो यथावस्थित स्वभाव नय और प्रमाणके द्वारा सिद्ध है उसको वैसा ही जानना सम्यग्ज्ञान है ऐसा जिनेन्द्रदेव कहते हैं ॥ ३२६ ॥
संसयविमोहुविब्भमविवज्जियं अप्पपरसरूवस्स ।
गहणं सम्मं णाणं सायारमणेयभेयं तु ॥-द्रव्यसं ४२ ॥
बहिरंतं परमतत्तवं णच्चा णाणं खु जं ठियं णाणे ।
तं इह णिच्छयणाणं पुव्वं तं सुणह ववहारं ॥३२७॥
अर्थ: बाह्य और अन्तः परमतत्त्वको जानकर ज्ञानका ज्ञानमें ही स्थिर होनेको यहाँ निश्चयज्ञान, कहा है । और पहले जो ज्ञानका कथन किया है उसे व्यवहारज्ञान जानो ॥ ३२७ ॥
ता सुयसायरमहणं कीरह सुपमाणमेरुमहणेण ।
सियणयफणिंदगहिए जाव ण मुणिओ हु वत्थुसब्भाओ ॥३२८॥
अर्थ: स्याद्वादनयरूपी नागराजसे गृहीत प्रमाणरूपी मेरुमथानीके द्वारा तब तक श्रुतरूपी सागर का मन्थन करो, जब तक वस्तुके स्वरूपका ज्ञान न होवे ॥ ३२८ ॥
णिच्छय सज्झसरूवं सराय तस्सेव साहणं चरणं ।
तह्मा दो विय कमसो पडिज्जे[च्छ]माणं पबुज्झेह ॥३२९॥
अर्थ: निश्चय साध्य स्वरूप है । उसका साधन सराग और वीतराग चारित्र है । अतः दोनोको भी क्रमसे धारण करने पर जीव प्रबोधको प्राप्त होता है ॥३२९॥
दंसणसुद्धिविसुद्धो मूलाइगुणेहि संजुओ तहय ।
सुहदुःखाइसमाणो झाणणिलीणो हवे समणो ॥३३०॥
अर्थ: जो दोष रहित सम्यग्दर्शनसे विशुद्ध तथा मूल और उत्तर गुणोंसे युक्त होता है सुख और दुःखमे जिसका समभाव होता है, तथा आत्मध्यानमें लीन रहता है वह श्रमण-जैनसाधु, चारित्र का धारक या चारित्रका स्वामी है ॥३३०॥
असुहेण रायरहिओ वयाइराएण जो हु संजुत्तो ।
सो इह भणिय सरागो मुक्को दोहं पि खलु इयरो१ ॥३३१॥
अर्थ: जो अशुभ प्रवृत्तियोंसे तो राग नहीं करता, किन्तु जिसे व्रतादिरूप शुभ प्रवृत्तियोंमे राग रहता है उसे यहाँ सराग चारित्रका धारक श्रमण कहा है और जिसे अशुभ और शुभ दोनो ही प्रकारका राग नहीं है वह श्रमण वीतराग है ॥३३१॥
सम्मा विय मिच्छा विय तवोधणा समण तहय अणयारा ।
होंति विराय सराया जइरिसिमुणिणो य णायव्वा ॥३३२॥
अर्थ: तपस्वी अनगार श्रमण सम्यग्दृष्टि भी होते है और मिथ्यादृष्टि भी होते हैं तथा ऋषि, यति और मुनि सरागी भी होते है और वीतरागी भी होते है ॥३३२॥
इंदियसोक्खणिमित्तं सद्धाणादीणि कुणइ सो मिच्छो ।
तं पिय मोक्खणिमित्तं कुव्वंतो भणइ सद्दिट्ठी ॥३३३॥
अर्थ: जो इन्द्रिय सुखकी प्राप्तिके लिए श्रद्धान ज्ञान और चारित्रका पालन करता है वह मिथ्यादृष्टि है और जो मोक्षके लिए श्रद्धान आदि करता है वह सम्यग्दृष्टि है ॥३३३॥
मूलुत्तरसमणगुणा धारणं कहणं च पंच आयारो ।
सोही तहव सुणिट्ठा सरायचरिया हवइ एवं ॥३३४॥
अर्थ: श्रमणोके मूलगुणों और उत्तरगुणोका धारण करना, उनका कथन करना, पाँच प्रकारका आचार, आठ प्रकारकी शुद्धि तथा सुनिष्ठा ये सब सरागचारित्र है ॥ ३३४ ॥
वदसमिरिंदियरोहो आवस्साचेललोचमह णाणं ।
ठिढभोज्ज एयभत्तं खिदिसयणमदंतघसणं च ॥३३५॥
अर्थ: पाँच महाव्रत, पाँच समिति, पाँचों इन्द्रियोका निरोध, छह आवश्यक, वस्त्रका सर्वथा त्याग, केशलोचन, स्नान न करना, खड़े होकर भोजन करना, दिनमे केवल एक बार भोजन करना, पृथ्वीपर सोना और दन्तघर्षण न करना ये २८ मूल गुण श्रमणोके हैं ॥ ३३५ ॥
तवपरिसहाण भेया गुणा हु ते उत्तरा य बोहव्वा ।
दंसणणाणचरित्तं तववीरिय पंचहायारं ॥३३६॥
अर्थ: तप और परीषहोके भेदोंको साधुके उत्तर गुण जानना चाहिए । दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार ये पाँच प्रकारके आचार हैं ॥३३६॥ कारण है । ध्यान करते समय अचानक आनेवाले उपसर्गको शान्तिके साथ सहन करना परीपह है । परीषहके २२ भेद है-१. भूखकी बाधाको सहना, २. प्यासकी बाधाको सहना, ३. शीत, ४. उष्ण, ५. डास मच्छर, ६. नंगेपनकी बाधाको सहना, ७ संयमसे अरति उत्पन्न होनेके कारण उपस्थित होनेपर भी संयममे रति करना, ८ स्त्रियोकी बाधाको निर्विकार चित्तसे सहना, ९ नंगे पैर चलनेकी बाधाको सहना, १०. एक ही आसनसे बैठनेकी बाधाको सहना, ११. जमीनपर एक ही करवटसे सोनेकी बाधाको सहना, १२ अत्यन्त कठोर बचनोको सुनकर भी शान्त रहना, १३. मारकी परीषह को सहना, १४. आहारादिके न मिलने पर भी किसीसे याचना न करना, १५. आहारादिका लाभ न होने पर भी सन्तुष्ट रहना, १६ पैरमें कांटा लगनेकी परीपहको सहना, १७ रोगादिका कष्ट सहन करना, १८. शरीर पर लगे मलसे खेदखिन्न न होना, १९. मान-अपमानमें हर्ष-विषाद न करना, २०. अपने पाण्डित्यका गर्व न करना, २१. ज्ञानकी प्राप्ति न होने पर खेदखिन्न न होना तथा २२ श्रद्धान से च्युत होने के निमित्त उपस्थित होने पर भी च्युत न होना । ये बाईस परीषह तथा पूर्वोक्त १२ प्रकारके तप साधुके उत्तर गुण कहे जाते है । पांच आचार भी उत्तर गुण है-दर्शनाचार, ज्ञानाचार, चारित्राचार, तपाचार और वीर्याचार । विनय और आचारमें अन्तर है-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र और सम्यक्तपके निर्मल करनेमें जो प्रयत्न किया जाता है वह विनय है और उनके निर्मल हो जानेपर जो उनका पालन यत्नपूर्वक किया जाता है उसे आचार कहते है ।
विज्जावच्चं संघे साहुसमायार तित्थअभिवुड्ढो ।
धम्मक्खाणं सुसत्थे सरायचरणे ण णिसिद्धं ॥३३७॥
अर्थ: संघमे वैयावृत्य करना, साधु सामाचारी, धर्म तीर्थकी वृद्धिके लिए प्रयत्न, धर्मका निरूपण, ये सब कार्ये सरागचारित्रमें निषिद्ध नही है ॥३३७॥
लोगियसद्धारहिओ चरणविहीणो तहेव अववादी ।
विवरीओ खलु तच्चे बज्जेव्वा ते समायारे ॥३३८॥
अर्थ: जो लौकिकजन श्रद्धामे रहित है, चारित्रसे हीन है, अपवादशील है यह साधुत्वसे विपरीत है, अतः उनके साथ सामाचारी नही करना चाहिए ॥३३८॥
दिक्खागहणाणुक्कमसरायचारित्तकहणवित्थारो ।
पवययणसारे पिच्छह तत्सेव य एत्थ लेस्सेक्कं ॥३३९॥
अर्थ: दीक्षाग्रहणके अनुक्रमसे सरागचारित्रके कथनका विस्तार प्रवचनसारमे देखना चाहिए । यहाँ उसीका लेशमात्र कथन किया है ॥३३९॥
सुहमसुहं चिय कम्मं जीवे देहुब्भवं जणदि दुक्खं ।
दुहपडियारो पढमो णहु पुण तं पहिज्जई इतरत्थे ॥३४०॥
अर्थ: शुभ और अशुभ कर्म जीवको शारीरिक दुःख देते हैं। किन्तु प्रथम शुभोपयोगसे उस दुःखका प्रतिकार तो होता है किन्तु सुखकी प्राप्ति नहीं होती ॥३४०॥
मोत्तूणं मिच्छात्तियं सम्मगरयणत्तयेण संजुत्तो ।
वट्टं तो सुहचेट्ठे परंपरा तस्स णिव्वाणं ॥३४१॥
अर्थ: जो मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान और मिथ्याचारित्रको त्यागकर सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रसे युक्त होता हुआ शुभ कर्म करता है उसका परम्परासे मोक्ष होता है ॥३४१॥
ववहारादो बंधो मोक्खो जम्हा सहावसंजुत्तो ।
तम्हा कुरु तं गउणं सहावमाराहणाकाले ॥३४२॥
अर्थ: चूँकि व्यवहारसे बन्ध होता है और स्वभावमे लीन होनेसे मोक्ष होता है इसलिए स्वभावकी आराधनाके समय व्यवहारको गौण करना चाहिए ॥३४२॥
विवरीए फुडबंधो जिणेहि भणिओ विहावसंजुत्तो ।
सो वि संसारहेऊ भणिओ खलु सव्वदरसीहि ॥३४३॥
अर्थ: यदि स्वभावकी आराधनाके समयमें भी व्यवहारकी मुख्यता रही तो स्पष्ट रूपसे बन्ध होता है ऐसा जिनेन्द्रदेवने कहा है । सर्वज्ञ सर्वदर्शी जिनदेवोने विभावसे संयुक्त अवस्थाको संसारका कारण कहा है ॥३४३॥
मज्झिमजहणुक्कस्सा सराय इव वीयरायसामग्गी ।
तम्हा सुद्धचरित्तं पंचमकाले वि देसदो अत्थि ॥३४४॥
अर्थ: कहा भी है-निश्चय से मोक्ष होता है । उसके हेतुको उपचरित सद्भूत कहते हैं । जो असद्भूत है उसे भी हेतु जानना चाहिये । जैसे सरागदशाके जघन्य, मध्यम और उत्कृष्ट भेद होते हैं वैसे ही वीतरागदशाके भी जघन्य, मध्यम उत्कृष्ट भेद होते हैं । अतः एकदेश वीतरागचारित्र पंचमकालमे भी होता है ॥३४४॥
जह सुह णासइ असुहं तहेव असुहं सुद्धेण खलु चरिए ।
तम्हा सुद्धधुवजोगी मा वट्टउ णिंदणादीहि ॥३४५॥
अर्थ: जैसे शुभ अशुभको नष्ट करता है वैसे ही शुद्धचारित्रके द्वारा शुभका नाश होता है । इसलिए शुद्धोपयोगी साधुको निन्दा, गर्दा वगैरह नहीं करना चाहिए ॥ ३४५ ॥
आलोयणादिकिरिया जं विसकुंभेत्ति सुद्धचरियस्स ।
भणियमिह समयसारे तं जाण सुएण अत्येण ॥३४६॥
अर्थ: पंचमकालमें भरतक्षेत्रमें आत्मस्वभावमें स्थित ज्ञानी सम्यग्दृष्टिके धर्मध्यान होता है । जो ऐसा नहीं मानता है वह अज्ञानी मिथ्यादृष्टि है । समयसारमें जो वीतरागचारित्रवाले साधुकी आलोचना आदि क्रियाओंको विषकुम्भ कहा है उसे आगमके द्वारा सम्यक् रीतिसे जानना चाहिए ॥ ३४६ ॥
कम्मं तियालविसयं डहेइ णाणी हु णाणझाणेण ।
पडिक्कमणाइ तम्हा भणियं खलु णाणझाणं तु ॥३४७॥
अर्थ: ज्ञानी पुरुष आत्मध्यानके द्वारा त्रिकालवर्ती कर्मोंको भस्म कर देता है इसलिए आत्मध्यान को ही निश्चयसे प्रतिक्रमण आदि कहा है ॥ ३४७ ॥
जह व णिरुद्धं असुहं सुहेण सुहमवि तहेव सुद्धेण ।
तम्हा एण कमेण य जोई झाएउ णियमादं ॥३४८॥
अर्थ: जैसे शुभके द्वारा अशुभका निरोध होता है वैसे ही शुद्धोपयोगके द्वारा शुभ कर्मोंका भी निरोध होता है । इसलिए योगीको इसी क्रमसे अपनी आत्माका ध्यान करना चाहिए ॥ ३४८ ॥
गहिओ सो सुदणाणे पच्छा संवेयणेण झायव्वो ।
जो णहु सुयमवलंबइ सो मुज्झइ अप्पसब्भावे ॥३४९॥
अर्थ: पहले श्रुतज्ञानके द्वारा आत्माको ग्रहण करके पीछे संवेदनके द्वारा उसका ध्यान करना चाहिए । जो श्रुतका अवलम्बन नही लेता वह आत्माके सद्भावमें मूढ रहता है ॥ ३४९ ॥
सोत्तूणं बहिंचित्ता चिंताणाणम्मि होइ सुदणाणं ।
तं पिय संवित्तिगयं झाणं सद्दिट्ठिणो भणियं ॥३५०॥
अर्थ: बाह्य चिन्ताको छोड़कर ज्ञानका चिन्तन करनेसे श्रुतज्ञान होता है। वही ज्ञान संवित्तिगत होने पर सम्यग्दृष्टिका ध्यान कहा गया है ॥३५०॥
लक्खणदो णियलक्खं अणुहवमाणस्स जं हवे सोक्खं ।
सा संवित्ती भणिया सयलवियप्पाण णिद्दहणा ॥३५१॥
अर्थ: लक्षणके द्वारा अपने लक्ष्यका अनुभव करते हुए जो सुख होता है उसे संवित्ति कहते हैं। वह संवित्ति समस्त विकल्पोंको नष्ट करनेवाली है ॥३५१॥
समणा सराय इयरा पमादरहिया तहेव इयरा हु ।
अणुहव चायपमादो सुद्धे इयरेसु विकहाई ॥३५२॥
अर्थ: द्रव्यश्रुतसे भावश्रुत होता है, भावश्रुतसे भेदज्ञान होता है। भेदज्ञानसे आत्मानुभूति होती है और आत्मानुभूतिसे केवलज्ञान होता है। इसका आशय यह है कि मोक्षार्थीको आगम और अध्यात्म शास्त्रका अभ्यास करना चाहिए उसके बिना भेदज्ञान नहीं होता और भेदज्ञानके बिना आत्मानुभूति नहीं होती। क्योंकि आगमाभ्यासके बिना गुणस्थान, जीवसमास, मार्गणा आदिका बोध नहीं होता और अध्यात्मके जाने बिना इस सबसे भिन्न मैं हूँ इस प्रकारका बोध नहीं होता। ऐसा बोध न होनेसे अपने आत्माको भावकर्मरूप रागादि विकल्पोंसे और ज्ञानावरणादि द्रव्य कर्मोंसे भिन्न नहीं जानता तथा नोकर्मरूप शरीर आदिसे भी अपनेको भिन्न नहीं जानता। इस प्रकारका भेदज्ञान न होनेसे अपनी शुद्ध आत्माकी ओर रुचि कैसे हो सकती है। अतः द्रव्यश्रुत अर्थात् परमागमको पढ़कर द्रव्य गुण पर्यायका सम्यक् ज्ञान करना चाहिए। पीछे आगमके आधारसे स्वसंवेदन ज्ञान होने पर स्वसंवेदन ज्ञानके बलसे केवलज्ञान प्रकट होता है। श्रमण, सरागी और वीतरागी तथा प्रमादरहित और प्रमादसहित होते हैं। प्रमादको त्याग कर शुद्ध आत्माका अनुभव करो। प्रमादसहितमे तो विकथा आदि प्रमाद रहते हैं ॥३५२॥
दुक्खं णिंदा चिंता मोहोविय णत्थि कोइ अपमत्ते
उप्पज्जइ परमसुहं परमप्पयेणाणअणुहवणे ॥३५३॥
अर्थ: अप्रमत्त साधुके दुःख, निन्दा, चिन्ता, मोह और कोई भी प्रमाद नहीं होता । इसलिए उत्कृष्ट आत्मिक ज्ञानका अनुभवन करते हुए उसे परम सुख होता है ॥३५३॥
हेयोपादेयविदो संजमतववीयरायसंजुत्तो ।
जिद्ददुक्खाइं तहं चिय सामग्गी सुद्धचरणस्स ॥३५४॥
अर्थ: शुद्ध आचरणकी सामग्री है-हेय और उपादेयका सम्यक् परिज्ञान, संयम, तप और वीतरागतासे संयुक्त होना तथा परीषह आदिका जीतना । अर्थात् जो ज्ञानी हेय उपादेयको ठीक रीतिसे जानता है, संयम और तपके साथ वीतरागी होता है तथा परीषहोको जीतता है उनसे घबराता नहीं है वही शुद्धचारित्रका पालन करनेमे समर्थ होता है ॥३५४॥
सामण्णे णियबोहे वियलियपरभावपरमसब्भावे ।
तत्थाराहणजुत्तो भणिओ खलु सुद्धचारित्ती ॥३५५॥
अर्थ: समस्त परभावोसे रहित परम सद्भावरूप आत्मज्ञानमें जो तात्त्विक आराधनासे युक्त होता है उसे शुद्धचारित्रवाला ध्याता कहा है ॥३५५॥
सामण्णं परिणाभी जीवसहावं च परमसब्भावं ।
धेयं गुज्झं परमं तहेव तच्चं समयसारं ॥३५६॥
समदा तह मज्झत्थं सुद्धो भावो य वीयरायत्तं ।
तह चारित्तं धम्मो सहावआराहणा भणिया ॥३५७॥
अर्थ (गाथा 356 से 357): सामान्य, परिणामी, जीवस्वभाव, परम-सद्भाव, परमगुह्य, तत्त्व, समयसार ये सब ध्येय ( जिसका ध्यान किया जाता है ) के नामान्तर हैं । समता, माध्यस्थ्य, शुद्धभाव, वीतरागता, चारित्र, धर्म, स्वभाव आराधना भी उसे कहते हैं ॥३५६-५७॥
अत्थित्ताइसहावा सामण्णविसेससंठिया जत्थ ।
अवरुप्परमविरुद्धं तं णियतच्चं हवे परमं ॥३५८॥
अर्थ: जिसमें अस्तित्वादित्वभावरूप सामान्य और विशेष परस्परमें अविरुद्ध रूपसे स्थित हैं वही परम निजतत्त्व है ॥३५८॥
होऊण जत्थ णट्ठा होसंति पुणोऽवि जत्थ पज्जाया ।
वट्टंता वट्टंति हु तं णियतच्चं हवे परमं ॥३५९॥
अर्थ: जिसमें पर्याय उत्पन्न होकर नष्ट हो जाती है, और नष्ट होकर पुनः उत्पन्न होती है तथा वर्तमान भी रहती है वह परम निजतत्त्व है ॥३५९॥
णासंतो वि ण णट्ठो उप्पण्णो णेव संभवे जंतो ।
संतो तियालविसये तं णियतच्चं हवे परमं ॥३६०॥
अर्थ: जो असत् नही होते हुए भी न नष्ट होता है और न उत्पन्न होता है तथा तीनों कालोमे सत् रहता है वह परम निजतत्त्व है ॥३६०॥
कारणकज्जसहावं समयं णाऊण होइ ज्झायव्वं ।
कज्जं सुद्धसरूवं कारणभूतं तु साहणं तस्स ॥३६१॥
अर्थ: समय कारण रूप और कार्यरूप है ऐसा जानकर उसका ध्यान करना चाहिए। कार्य शुद्धस्वरूप है और उसका जो साधन है वह कारणभूत है ॥३६१॥
सुद्धो कम्मखयादो कारणसमओ हु जीवसब्भावो ।
खय पुणु सहावझाणं तम्हा तं कारणं झेयं ॥३६२॥
अर्थ: कर्मोके क्षयसे शुद्ध जीवका स्वभाव कारण समय है । कर्मोंका क्षय उस स्वभावके ध्यानसे होता है । अतः कारणसमय शुद्धस्वरूप ध्येय-ध्यानके योग्य है ॥३६२॥
किरियातीदो सत्थो अणंतणाणाइसंजुओ अप्पा ।
तह मज्झत्थो सुद्धो कज्जसहावो हवे समओ ॥३६३॥
अर्थ: निष्क्रिय, प्रशस्त, अनन्तज्ञानादि गुणोसे युक्त वीतराग शुद्ध आत्मा कार्य समय है ॥३६३॥
उदयादिसु पंचण्हं कारणसमओ हु तत्थ परिणामो ।
जम्हा लद्धा हेऊ सुद्धो सो जणइ अप्पाणं ॥३६४॥
अर्थ: और औदयिक, औपशमिक, क्षायिक, क्षायोपशमिक तथा पारिणामिक इन पाँच भावोंमें जो पारिणामिकभाव है वह कारणसमय है । क्योकि शुद्धात्मस्वरूपका श्रद्धान ज्ञान आचरणरूप कारणके मिलनेपर उसीका ध्यान आत्माको शुद्ध करता है ॥३६४॥
जह इह बिहावहेदू असुद्धयं कुणइ आदमेवादा ।
तह सब्भावं लद्धा सुद्धो सो कुणइ अप्पाणं ॥३६५॥
अर्थ: जैसे इस संसारमे आत्मा विभावके कारणोको पाकर अपनेको अशुद्ध करता है वैसे ही स्वभावको पाकर अपनेको शुद्ध करता है ॥३६५॥
उप्पज्जंतो कज्जं कारणमप्पा णियं वि जणयंतो ।
तम्हा इह ण विरुद्धं एक्कस्स वि कारणं कज्जं ॥३६६॥
अर्थ: कार्यको उत्पन्न करनेसे आत्मा कारण है और स्वयं ही उत्पन्न होनेसे कार्य है । इसलिए एक ही आत्माका कारण और कार्य होना विरुद्ध नही है ॥३६६॥
असुद्धसंवेयणेण य अप्पा बंधेइ कम्मणोकम्मं ।
सुद्धसंवेयणेण य अप्पा मुंचेइ कम्मणोकम्मं ॥३६७॥
अर्थ: अशुद्ध संवेदनसे आत्मा कर्म और नोकर्मसे बँधता है । और शुद्ध संवेदनसे कर्म और नोकर्म से छूटता है ॥३६७॥
पढमं मुत्तसरूवं मुत्तसहावेण मिस्सियं जम्हा ।
विदियं मुत्तामुत्तं सपरसरूवस्स पच्चक्खं ॥३६८॥
अर्थ: पहला अशुद्ध स्वसंवेदन मूर्तरूप है क्योंकि वह पौद्गलिक कर्मोंके उदयादिसे होनेवाले औदयिक आदि भावोंसे मिला हुआ होता है । और दूसरा शुद्ध स्वसंवेदन मूर्तिक भी है और अमूर्तिक भी है क्योंकि उसमें स्व और परस्वरूपका प्रत्यक्ष होता है ॥३६८॥
हेऊ सुद्धे सिद्धइ बज्झइ इयरेण णिच्छियं जीवो ।
तम्हा दव्वं भावो गउणाइविवक्खए णेओ ॥३६९॥
अर्थ: अतः शुद्ध कारणके होनेपर जीव मुक्त होता है और अशुद्ध कारणके होनेपर निश्चितरूपसे बँधता है । इसलिए गौण और मुख्य विवक्षासे द्रव्य और भावको जानना चाहिए ॥३६९॥ वस्तुओको जानता है वैसे ही अन्तर्मुखाकार अपनी आत्माको स्पष्ट जानता है।’ इस तरह स्वसंवेदनज्ञान ही कार्य कारणसमयसाररूप परिणमन करता है।
ओदयियं उवसमियं खयउवसमियं च खाइयं परमं ।
इगवीस दो भेया अट्ठारस णव तिंहा य परिणामी ॥३७०॥
अर्थ: औदयिक, औपशमिक, क्षायोपशमिक, क्षायिक और पारिणामिक भाव के क्रम से इक्कीस, दो, अठारह, नौ और तीन भेद है ॥३७०॥
लेस्सा कसाय वेदा असिद्ध अण्णाण गई अचारित्तं ।
मिच्छत्तं ओदयियं दंसण चरणं च उवसमियं ॥३७१॥
अर्थ: छह लेश्याएँ, चार कषाय, तीन वेद, एक असिद्धत्व, अज्ञान एक, चार गति, अचारित्र और मिथ्यात्व ये इक्कीस भेद औदयिक भाव के है। तथा सम्यग्दर्शन और सम्यक्चारित्र ये दो भेद औपशमिक भाव के हैं ॥३७१॥
मिच्छतियं चउसम्मग दंसणतिदयं च पंच लद्धीओ ।
मिस्सं दंसण चरणं विरदाविरदाण चारित्तं ॥३७२॥
अर्थ: तीन मिथ्याज्ञान, चार सम्यग्ज्ञान, तीन दर्शन, पाँच लब्धियाँ, क्षायोपशमिक सम्यक्त्व, क्षायोपशमिक चारित्र और विरताविरत चारित्र ये अठारह भेद क्षायोपशमिक भावके है ॥३७२॥
णाणं दंसण चरणं खाइय सम्मत्त पंचलद्धीओ ।
१खाइयभेदा णेया णव होदि हु केवला लद्धी ॥३७३॥
अर्थ: क्षायिकज्ञान, क्षायिकदर्शन, क्षायिकचारित्र, क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिकदान, क्षायिकलाभ, क्षायिकभोग, क्षायिक उपभोग, क्षायिकवीर्य ये नौ क्षायिकभाव के भेद है इन्हे नौ केवललब्धि कहते हैं ॥३७३॥
सेंद्धाणणाणचरणं जाव ण जीवस्स परमसब्भावे ।
ता अण्णाणी मूढो संसारमहोदहिं भमइ ॥३७४॥
अर्थ: जबतक जीवका अपने परमस्वभावमे श्रद्धान ज्ञान और आचरण नही है तबतक वह मूढ अज्ञानी संसार-समुद्रमे भटकता है ॥३७४॥