यदि द्रव्यदृष्टि से देखो तो, नारी तो कोई द्रव्य नहीं।
असमान जाति का नाम मात्र, उसमें तो सुख है नहीं कहीं॥1॥
जिस तन पर रीझ रहा मोही, वह तो पुद्गल का पिण्ड अरे।
परिणति में आस्रव बंध चले, उसमें भीतर चैतन्य रहे॥2॥
वह तो तेरे सम ही भाई, किंचित् विकार अस्तित्व नहीं।
उसको निरखे भागे विकार, समता से होवे मुक्ति-मही॥3॥
पर्यायमूढ़ मिथ्यात्वी को, निज भोग योग्य वह है दिखती।
ज्यों रोग पीलिया होने पर, शुभ श्वेत वस्तु पीली दिखती॥4॥
पति को तो पत्नी रूप दिखे, भाई को भगिनी दिखती है।
सुत को माता, पुत्री पितु को, ज्यों दृष्टि हो त्यों सृष्टि है॥5॥
कैमरा वस्त्र अरु चर्म ग्रहे, अस्थि एक्स-रे का विषय बने।
त्यों अज्ञानी उपरोक्त लखे, पर ज्ञानी को चैतन्य दिखे॥6॥
व्यवहार चतुर आगम प्रवीण, भी उसको लख चिंतन करता।
चैतन्य विराधन कर माया से, आत्मा स्त्री तन धरता॥7॥
यदि इसके हाव-भाव लखकर, मैं अपना धर्म विसारूँगा।
तो पाप बंध होगा भारी, नरभव की बाजी हारूँगा॥8॥
यह भव तो भव के नाश हेतु, चिन्तामणि सम मैंने पाया।
नारी की माया से हटकर, पाऊँगा रत्नत्रय माया॥9॥
निज आत्मतत्त्व है निर्विकार, उसका अवलम्बन मुझे उचित।
इससे विकार करना न योग्य, बस रहना ज्ञायक मुझे उचित॥10॥
स्त्री पर्याय को पाकर भी, जो ज्ञानरूप चेतन देखे।
तो सम्यक्त्वी होकर निश्चय, यह स्त्रीलिंग तत्क्षण छेदे॥11॥
ऐसा विचार कर यदि उर से, किंचित् करुणा का स्रोत बहे।
तो जम्बूस्वामी सम विरक्त, उस उर में भी वैराग्य भरे॥12॥
अरु ध्यान दशा में निर्विकल्प, स्वाभाविक परिणति होती है।
निज ज्ञायक में जागृति रहे, परिणति बाहर से सोती है॥13॥
हैं धन्य-धन्य वे जीव सदा, जो हैं ऐसी परिणति धारी।
उनकी महिमा के वर्णन में, इन्द्रों की भी बुद्धि हारी॥14॥
मैं बार-बार उनके चरणों में, सादर शीश नवाता हूँ।
उन सम ही होऊँ निर्विकार, बस यही भावना भाता हूँ॥15॥
दोहा
परमब्रह्म लखता रहूँ, एक अचल निज-भाव।
पूर्ण अखण्डित शील हो, मेटूँ सकल-विभाव॥
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
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