सुनो भव्य! णमोकार की महिमा गाता सकल समाज रे।
पंच परमेष्ठी को मैं नमन करूँ शत बार रे॥
अर्हंतों को द्रव्य और गुण-पर्यायों से मैं जानूँ,
निज आत्मा को लक्ष्य बनाकर, उन समान गुण प्रगटाऊँ।
महामंत्र निश-दिन में जपकर, उनका ही गुणगान करूँ॥1॥
सिद्ध अनंतानंत हुए हैं, उस पथ को अपनाकर के,
शुद्ध त्रिकाली ध्रुव स्वभाव में, स्थिरता निज उर लाकर के।
उन समान उर स्थिरता लाऊँ, णमोकार का जाप करूँ॥2॥
आचार्यों से दीक्षा लेते, सर्वसाधु के उन्नायक,
हैं छत्तीस गुणों के धारी, ध्याते निज को गुणनायक।
अनादि-अनंत मंत्र को ध्याकर, हो जाऊँ भव पार रे॥3॥
उपाध्याय उपकारी होते, आत्मधर्म का दे उपदेश,
द्वादशांग का मर्म सिखाते, मुद्रा अनुपम, निर्मल वेश।
अपराजित यह मंत्र सभी, विघ्नों का करे विनाश रे॥4॥
साधु सिद्धपद प्राप्त हेतु, निर्ग्रन्थ दशा धारण करते,
उस पथ पर अविरल बढ़कर, वो निज आनंद में समा जाते।
मूलमंत्र को आराधो, बस यही मुक्ति-सोपान रे॥5॥
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रचनाकार: ध्रुव राजेंद्र महाजन (Dhruv Rajendra Mahajan), हिंगोली