णमोकार महामंत्र | Namokar Mahamantra

णमोकार महामंत्र

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पाठ पहला

णमोकार महामंत्र

णमो अरहंताणं,
णमो सिद्धाणं णमो आइरियाणं।
णमो उवज्झायाणं,
णमो लोए सव्व साहूणं।।

लोक में सब अरहंतों को नमस्कार हो, सब सिद्धों को नमस्कार हो, सब आचार्यों को नमस्कार हो, सब उपाध्यायों को नमस्कार हो और सब साधुओं को नमस्कार हो।
णमोकार मंत्र की महिमा
एसो पंचणमोयारो सव्वपावप्पणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं होइ मंगलम्।।

यह पंच नमस्कार मंत्र सब पापों का नाश करनेवाला है तथा सब मंगलों में पहला मंगल है।
यह मंत्र मोह-राग-द्वेष का अभाव करनेवाला और सम्यग्ज्ञान प्राप्त करानेवाला है।
अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु ये पाँचों परमेष्ठी कहलाते हैं। जो जीव इन पाँचों परमेष्ठियों को पहिचान कर उनके बताये हुए मार्ग पर चलता है उसे सच्चा सुख प्राप्त होता है।

प्रश्न -

१. णमोकार मंत्र शुद्ध बोलिए।
२. इस मंत्र में किसको नमस्कार किया गया है?
३. इस मंत्र के स्मरण से क्या लाभ है?
४. पंच परमेष्ठियों के नाम बताइये।
५. सच्चा सुख कैसे प्राप्त होता है?

पाठ दूसरा

चार मंगल

चत्तारि मंगलं, अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपण्णत्तो धम्मो मंगलं।

चत्तारि लोगुत्तमा, अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।

चत्तारि सरणं पव्वज्जामि, अरहंते सरणं पव्वज्जामि, सिद्धे सरणं पव्वज्जामि, साहू सरणं पव्वज्जामि, केवलिपण्णत्तं धम्मं सरणं पव्वज्जामि।

लोक में चार मंगल हैं। अरहंत भगवान मंगल हैं, सिद्ध भगवान मंगल हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय और साधु) मंगल हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया गया वीतराग धर्म मंगल है।

जो मोह-राग-द्वेषरूपी पापों को गलावे और सच्चा सुख उत्पन्न करे, उसे मंगल कहते हैं। अरहंतादिक स्वयं मंगलमय हैं और उनमें भक्तिभाव होने से परम मंगल होता है।
लोक में चार उत्तम हैं। अरहंत भगवान उत्तम हैं, सिद्ध भगवान उत्तम हैं, साधु (आचार्य, उपाध्याय और साधु) उत्तम हैं तथा केवली भगवान द्वारा बताया हुआ वीतराग धर्म उत्तम है।
लोक में जो सबसे महान हो, उसे उत्तम कहते हैं। लोक में ये चारों सबसे महान हैं, अतः उत्तम हैं।
मैं चारों की शरण में जाता हूँ। अरहंत भगवान की शरण में जाता हूँ, सिद्ध भगवान की शरण में जाता हूँ, साधुओं (आचार्य, उपाध्याय, और साधु) की शरण में जाता हूँ और केवली भगवान द्वारा बताये गये वीतराग धर्म की शरण में जाता हूँ।
शरण सहारों को कहते हैं। पंचपरमेष्ठी द्वारा बताये हुए मार्ग पर चलकर अपनी आत्मा की शरण लेना ही पंचपरमेष्ठी की शरण है।
जो व्यक्ति पंचपरमेष्ठी की शरण लेता है उसका कल्याण होता है अर्थात् दुःख (भव-भ्रमण) मिट जाता है।

प्रश्न -

१. मंगल, उत्तम और शरण शब्द का अर्थ समझाइये।
२. हमें किसकी शरण लेना चाहिए?
३. आत्मा का हित किस बात में है?
४. चत्तारि मंगल आदि पाठ को शुद्ध बोलिए।
५. पंचपरमेष्ठी की शरण का क्या अर्थ है?

पाठ तीसरा

तीर्थंकर भगवान

छात्र - गुरुजी ! बाहुबली क्या भगवान नहीं हैं ?
अध्यापक - क्यों नहीं हैं ?
छात्र - चौबीस भगवानों में तो उनका नाम आता ही नहीं है।
अध्यापक - चौबीस तो तीर्थंकर होते हैं। जो वीतरागी और सर्वज्ञ हैं, वे सभी भगवान हैं। अरहंत परमेष्ठी और सिद्ध परमेष्ठी भगवान ही तो हैं।
छात्र - क्या तीर्थंकर भगवान नहीं होते ?
अध्यापक - तीर्थंकर तो भगवान होते ही हैं पर साथ ही जो तीर्थंकर न हों पर वीतरागी और पूर्णज्ञानी हों, वे अरहंत और सिद्ध भी भगवान हैं।
छात्र - तो तीर्थंकर किसे कहते हैं ?

अध्यापक - जो धर्मतीर्थ (मुक्ति का मार्ग) का उपदेश देते हैं, समवशरण आदि विभूति से युक्त होते हैं और जिनको तीर्थंकर नामकर्म नाम का महापुण्य का उदय होता है, उन्हें तीर्थंकर कहते हैं। वे चौबीस होते हैं।
छात्र - कृपया चौबीसों के नाम बताइए ?
अध्यापक -
१. ऋषभदेव (आदिनाथ)
२. अजितनाथ
३. संभवनाथ
४. अभिनंदन
५. सुमतिनाथ
६. पद्मप्रभ
७. सुपार्श्वनाथ
८. चंद्रप्रभ
९. पुष्पदन्त (सुविधिनाथ)
१०. शीतलनाथ
११. श्रेयांसनाथ
१२. वासुपूज्य
१३. विमलनाथ
१४. अनंतनाथ
१५. धर्मनाथ
१६. शांतिनाथ
१७. कुन्थुनाथ
१८. अरहनाथ
१९. मल्लिनाथ
२०. मुनिसुव्रत
२१. नेमिनाथ
२२. नेमिनाथ
२३. पार्श्वनाथ
२४. महावीर
(वर्धमान, वीर, अतिवीर, सन्मति)
छात्र - इनका तो याद रहना कठिन है।
अध्यापक - कठिन नहीं है। हम तुम्हें एक छन्द सुनाते हैं, उसे याद कर लेना, फिर याद रखने में सरलता होगी।

छन्द

ऋषभ¹ अजित² संभव³ अभिनंदन⁴,
सुमति⁵ पद्म⁶ सुपार्श्व⁷ जिनराय।
चन्द्र⁸ पुष्पदन्त⁹ शीतल¹⁰ श्रेयांस¹¹ जिन,
वासुपूज्य¹² पूजित सुराय¹³।
विमल¹⁴ अनन्त¹⁵ धर्म¹⁶ जस उज्ज्वल,
शान्ति¹⁷ कुन्थु¹⁸ अर¹⁹ मल्लि²⁰ मनाय।
मुनिसुव्रत²¹ नमि²² नेमि²³ पार्श्व²⁴ प्रभु,
वर्धमान²⁵ पद पूज्य चढ़ाय।।

छात्र - इनके जानने से क्या लाभ है ?
अध्यापक - इनके उपदेश को समझकर उस पर चलने से हम सब भी भगवान बन सकते हैं।

प्रश्न -

१. भगवान किसे कहते हैं ?
२. तीर्थंकर किसे कहते हैं ?
३. तीर्थंकर और भगवान में क्या अंतर है ? क्या प्रत्येक भगवान तीर्थंकर होते हैं ?
४. तीर्थंकर कितने होते हैं ? नाम सहित बताइए।
५. क्या भगवान भी चौबीस ही होते हैं ?
६. पहले, पाँचवें, आठवें, तेरहवें, सोलहवें, बीसवें, बाईसवें और चौबीसवें तीर्थंकरों के नाम बताइये।
७. एक से अधिक नाम किन-किन तीर्थंकरों के हैं ? नाम सहित बताइये।
८. १-२४ चौबीस तीर्थंकरों के नाम।

पाठ चौथा

देवदर्शन

दिनेश - ओ जिनेश ! कहाँ जा रहे हो ?
जिनेश - मन्दिरजी।
दिनेश - क्यों ?
जिनेश - जिनेन्द्र भगवान के दर्शन करने।
दिनेश - अच्छा मैं भी चलता हूँ।
जिनेश - तुम चलोगे तो चलो; पर पहिले यह चमड़े की पट्टी (बेल्ट) पर खोलकर आओ। तुम्हें पता नहीं मन्दिर में चमड़े से बनी वस्तुएँ लेकर नहीं जाना चाहिए।
दिनेश - अच्छा भाई ! मैं अभी खोलकर आया।
(दोनों मन्दिर पहुँचते हैं)
जिनेश - अरे भाई ! कहाँ चले जा रहे हो ? जूते तो यहीं खोल दो। मन्दिर के भीतर चप्पल, जूते पहिने हुए नहीं जाते। मालूम होता है पहिले तुम कभी मन्दिर आये ही नहीं, इसीकारण दर्शन करने की विधि भी नहीं जानते।

दिनेश - हाँ भाई, नहीं जानता, अब तुम बताओ।
जिनेश - सुनो ! मन्दिर के दरवाजे पर पानी रखा रहता है। हमें चाहिए कि सबसे पहिले चप्पल-जूते खोलकर पानी से हाथ-पैर धोकर फिर भगवान की जयजयकार करते हुए तथा तीन बार नि:सहि नि:सहि नि:सहि बोलते हुए मन्दिर में प्रवेश करें।
दिनेश - नि:सहि का क्या अर्थ होता है ?
जिनेश - नि:सहि का अर्थ है सर्व सांसारिक कार्यों का निषेध। तात्पर्य है कि संसार के सब कार्यों की उलझन छोड़ कर मन्दिर में प्रवेश करें।
दिनेश - उसके बाद ?
जिनेश - उसके बाद भगवान की वेदी के सामने ॐ जय जय जय नमोऽस्तु नमोऽस्तु नमोऽस्तु णमो अरहंताणं णमो जिणाणं मंत्र एवं चत्तारि मंगल आदि पाठ बोलते हुए जिनेन्द्र भगवान का अष्टंग नमस्कार करें। इसके बाद चित्त को एकाग्र करके भगवान की स्तुति पढ़ते हुए तीन प्रदक्षिणा देनी चाहिए। उसके बाद फिर भगवान को नमस्कार कर नौ बार णमोकार मंत्र पढ़ते हुए कायोत्सर्ग करना चाहिए।
दिनेश - अच्छा तो शान्ति से इस प्रकार चित्त एकाग्र करके भगवान का दर्शन करना चाहिए। और…
जिनेश - और क्या ? उसके बाद शान्ति से बैठकर कम से कम आधा घंटा शास्त्र पढ़ना चाहिए। यदि मन्दिरजी में उस समय प्रवचन हो रहा हो तो वह सुनना चाहिए।
दिनेश - बस…।
जिनेश - बस क्या ? जो शास्त्र में पढ़ा हो अथवा प्रवचन में सुना हो, उसे थोड़ी देर बैठकर मनन करना चाहिए तथा सोचना चाहिए कि मैं कौन हूँ ? भगवान कौन हैं ? मैं स्वयं भगवान कैसे बन सकता हूँ ? आदि, आदि।
दिनेश - इन सबसे क्या लाभ होगा ?
जिनेश - इससे आत्मा में शान्ति प्राप्त होती है। परिणामों में निर्मलता आती है। मन्दिर में आत्मा की चर्चा होती है। अतः यदि हम आत्मा को समझकर उसमें लीन हो जावें तो परमात्मा बन सकते हैं।

प्रश्न -

१. देवदर्शन की विधि अपने शब्दों में बोलिए।
२. मन्दिर में कैसे और क्यों जाना चाहिए ?
३. मन्दिर में कौन-कौन वस्तु नहीं ले जाना चाहिए ?
४. देवदर्शन करते समय क्या बोलना चाहिए ?
५. मन्दिर में क्या-क्या करना चाहिए ?

पाठ पाँचवाँ

जीव-अजीव

हीरालाल - मेरा कितना अच्छा नाम है ?
ज्ञानचन्द - अहा ! बहुत अच्छा नाम है ! अरे भाई ! हीरा कीमती अवश्य होता है, परन्तु है तो अजीव ही न? आखिर क्या तुम जीव (चेतन) से अजीव बनना पसन्द करते हो ?
हीरालाल - अरे भाई ! यह जीव-अजीव क्या है ?
ज्ञानचन्द - जीव ! जीव नहीं जानते ? तुम जीव तो हो ही । जो जानता-द्रष्टा है, वही जीव है । जो जानता है, जिसमें ज्ञान है, वही जीव है ।
हीरालाल - और अजीव ?
ज्ञानचन्द - जिसमें ज्ञान नहीं है, जो जान नहीं सकता, वही अजीव है । जैसे हम तुम जानते हैं, अतः जीव हैं ।

हीरा, सोना, चाँदी, टेबल, कुर्सी जानते नहीं हैं, अतः अजीव हैं ।
हीरालाल - जीव-अजीव की और क्या पहिचान है ?
ज्ञानचन्द - जीव सुख व दुःख का अनुभव करता है, अजीव में सुख-दुःख नहीं होता । हम तुम सुख-दुःख का अनुभव करते हैं, ये (टेबल और शरीर) अजीव हैं। अतः जीव हैं । टेबल, कुर्सी सुख-दुःख का अनुभव नहीं करते, अतः अजीव हैं ।
हीरालाल - आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं, शरीर में सुख-दुःख होता है, तो अपना शरीर तो जीव है न ?
ज्ञानचन्द - नहीं भाई ! आँखें थोड़ी ही देखती हैं, कान थोड़े ही सुनते हैं, देखने-सुनने वाला इनसे अलग कोई जीव (आत्मा) है । यदि आँख देखे और कान सुने तो मुझे (मरा शरीर) को भी देखना-सुनना चाहिए । इसीलिए तो कहा है कि शरीर अजीव है और आँख, कान आदि शरीर के ही हिस्से हैं, अतः वे भी अजीव हैं ।
हीरालाल - अच्छा भाई ज्ञानचन्द, अब मैं समझ गया कि :-
में जीव हूँ ।
शरीर अजीव है ।

मुझ में ज्ञान है ।
शरीर में ज्ञान नहीं है ।
मैं जानता हूँ ।
शरीर कुछ जानता नहीं है ।

ज्ञानचन्द - समझ गये तो बताओ,
हम ही जीव हैं या अजीव ? मैं जीव हूँ ।
हीरालाल - जैसे हमारा शरीर अजीव है, वैसे ही हाथी आदि सब जीवों का शरीर भी अजीव है, पर उनकी आत्मा तो जीव ही है ।
यह समझ तो लिया, पर इसके जानने से लाभ क्या है ? यह भी तो बताओ ।
ज्ञानचन्द - इसको जाने बिना आत्मा की सच्ची पहिचान नहीं हो सकती और आत्मा की पहिचान बिना सच्चा सुख नहीं मिल सकता तथा हमें सुखी होना है, इसलिए इनको जानना भी आवश्यक है ।
जीव-अजीव का ज्ञान कर हम स्वयं भगवान बन सकते हैं ।

प्रश्न -

१. जीव किसे कहते हैं ?
२. अजीव किसे कहते हैं ?
३. नीचे लिखी वस्तुओं में जीव-अजीव की पहिचान करो :-
हाथी, तुम, कुर्सी, मकान, रेल, कान, आँख, रोटी, हवाई जहाज, हवा, आग ।
४. जीव-अजीव की पहिचान से क्या लाभ है ?

पाठ छठवाँ

दिनचर्या

अध्यापक - बालकों ! आज हम तुम्हारे नाखून और दाँत देखेंगे ।
अध्यापक - अच्छा, बोलो रमेश ! तुम कितने दिनों से नहीं नहाये ?
रमेश - जी, मैं तो रोज नहाता हूँ ।
अध्यापक - प्रतिदिन नहाने वाले के हाथ-पैर इतने गंदे नहीं होते हैं । हो सकता है तुम रोज नहाते हो, पर दो लोटे पानी सिर पर डाल लेना ही नहाना नहीं है, हमें अच्छी तरह मल-मल कर नहाना चाहिए ।
इसीप्रकार हमें अपने दाँत साफ करने के लिए प्रतिदिन प्रातःकाल मंजन भी करना चाहिए । जो बच्चे मंजन नहीं करते हैं उनके मुँह से बदबू आती रहती है, उनके दाँत कमजोर हो जाते हैं और गिर जाते हैं ।

सुरेश - गुरुजी ! मैं तो शाम को नहाता हूँ ।
अध्यापक - नहीं, हमें प्रत्येक काम समय पर करना चाहिए । तभी ठीक रहता है । हमें प्रतिदिन की दिनचर्या बना लेना चाहिए और फिर उसके अनुसार अपना दैनिक कार्य निर्धारण चाहिए ।
रमेश - गुरुजी ! हमारी दिनचर्या आप ही बना दें । हम आज से उसके अनुसार ही कार्य करेंगे ।
अध्यापक - प्रत्येक बालक को चाहिए कि वह सूर्योदय होने के पूर्व बिस्तर छोड़ दे । सबसे पहले नौ बार णमोकार मंत्र का जाप करें, फिर थोड़ी देर आत्मा के स्वरूप का विचार कर मन को शुद्ध करें ।
सुरेश - क्या मन भी अशुद्ध होता है ?
अध्यापक - हाँ भाई, जिस तरह बाह्य गंदगी हमारे शरीर को गंदा कर देती है, उसी प्रकार मोह-राग-द्वेष आदि विकारी भावों से हमारा मन (आत्मा) गंदा हो जाता है । जिस प्रकार स्नान, मंजन आदि द्वारा हमारी देह साफ हो जाती है, उसी प्रकार आत्मा और परमात्मा के चिंतन से हमारा मन (आत्मा) पवित्र होता है ।
हमें अंतर और बाहर दोनों की पवित्रता पर ध्यान देना चाहिए ।
रमेश - उसके बाद ?
अध्यापक - उसके बाद शौच (टट्टी) आदि से निपट कर मंजन करके स्नान करे तथा शुद्ध साफ धुले हुए कपड़े पहिन कर मंदिरों में देवदर्शन करने जान चाहिए ।
देवदर्शन की विधि तो तुम्हें उस दिन समझाई थी । उसके बाद ही अल्पाहार (दूध, नाश्ता) लेकर यदि स्कूल और पाठशाला का समय हो वहाँ चले जाना चाहिए, नहीं तो घर पर ही स्वयं अध्ययन करना चाहिए ।
इसी प्रकार भोजन भी प्रतिदिन यथासमय १०-११ बजे शांतिपूर्वक करना चाहिए । शाम को दिन छिपने के पूर्व ही भोजन से निवृत्त हो जाना प्रत्येक बालक का कर्तव्य है । रात्रि को भोजन कभी नहीं करना चाहिए । इस प्रकार रात्रि को भी जब तक तुम्हारा मन लगे ८-९ बजे तक अपना पाठ याद करना चाहिए । उसके बाद आत्मा और परमात्मा का स्मरण करते हुए स्वच्छ और साफ बिस्तर पर शांति से सो जाना चाहिए ।
सब बालक - आज से हम आपकी बताई हुई दिनचर्या के अनुसार ही चलेंगे और शरीर की सफाई के साथ ही आत्मा की पवित्रता का भी ध्यान रखेंगे ।

प्रश्न -

१. एक अच्छे बालक की दिनचर्या कैसी होनी चाहिए ?
२. प्रातः सबसे पहले उठकर हमें क्या करना चाहिए ?
३. शारीरिक सफाई और मन की पवित्रता से क्या समझते हो ?
४. शारीरिक सफाई के लिए क्या-क्या करना चाहिए ?
५. मानसिक (आत्मिक) पवित्रता के लिए क्या-क्या करना चाहिए ?

पाठ सातवाँ

बेटी - क्या वे जन्म से ही वीतरागी सर्वज्ञ थे ? उनका जन्म कहाँ हुआ था ?
माँ - नहीं बेटी ! उन्होंने वीतरागता और सर्वज्ञता पुरुषार्थ से प्राप्त की थी। उनका जन्म अयोध्या नगरी में वहाँ के राजा नाभिराय की रानी मरुदेवी के गर्भ से हुआ था।
बेटी - वे तो राजकुमार थे, क्या उन्होंने राज्य नहीं किया ?
माँ - राज्य किया, विवाह भी किया था। उनकी दो शादियाँ हुई थीं। पहली पत्नी का नाम नन्दा था, जिससे भरत चक्रवर्ती आदि सौ पुत्र और ब्राह्मी नामक पुत्री उत्पन्न हुई। दूसरी पत्नी का नाम सुनन्दा था, जिससे बाहुबली पुत्र और सुन्दरी नामक पुत्री उत्पन्न हुई।
बेटी - तो क्या भरत चक्रवर्ती और बाहुबली आदिनाथ भगवान के ही पुत्र थे ?
माँ - भगवान तो वे बाद में बने। उस समय तो उनका नाम राजा ऋषभदेव था। प्रथम तीर्थंकर भगवान होने से उन्हें आदिनाथ भी कहने लगे।

एक दिन राजा ऋषभदेव अपनी सभा में बैठे नीलंजना का नृत्य देख रहे थे। नृत्य के बीच में ही नीलंजना की मृत्यु हो गई। यह देख उन्हें संसार की क्षणभंगुरता का ध्यान आया और राजपाट आदि सभी का राग छोड़कर दिगम्बर हो गये। छह माह तक तो आत्म-ध्यान में लीन रहे। उसके बाद छह माह तक आहार की विधि नहीं मिली।

बेटी - माँ, चलो न घर !
माँ - चलती तो हूँ, ज़रा भक्तामरजी का पाठ कर लूँ।
बेटी - भक्तामरजी क्या है ?
माँ - भक्तामर स्तोत्र एक स्तुति का नाम है, जिसमें भगवान आदिनाथ की स्तुति (भक्ति) की गई है।
बेटी - माँ, आदिनाथ कौन थे जिनकी स्तुति हजारों लोग प्रतिदिन करते हैं ?
माँ - वे भगवान थे। वे दुनियाँ की सब बातों को जानते थे तथा उनके मोह-राग-द्वेष नष्ट हो चुके थे, इस कारण परम सुखी थे।

बन गए तथा उनकी दिव्यध्वनि द्वारा तत्त्वोपदेश होने लगा जिससे भव्य जीवों को मुक्ति के मार्ग का ज्ञान हुआ।
बेटी - तो तुम क्या उनकी ही स्तुति करती हो ? मैं भी क्या कहूँगी। क्या वे मुझे भी मुक्ति का मार्ग बतायेंगे ?
माँ - अवश्य किया करना। वे तो कुछ दिन बाद मुक्त हो गए थे अर्थात् धर्मसभा (समवशरण) आदि को भी छोड़कर सिद्ध हो गए। पर उनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग तो आज तक भी ज्ञानियों के द्वारा हमें प्राप्त है और जो उनके बताए मुक्तिमार्ग पर चलते हैं वे ही सच्चे भक्त हैं तथा वे स्वयं भगवान भी बन सकते हैं।

प्रश्न -

१. भक्तामर स्तोत्र में किसकी स्तुति है ?
२. भगवान आदिनाथ का संक्षिप्त परिचय दीजिए ?
३. अक्षय तृतीया पर्व के सम्बन्ध में तुम क्या जानते हो ?
४. राजा ऋषभदेव भगवान आदिनाथ कैसे बने उन्हें आदिनाथ क्यों कहा जाता है ?
५. उन्हें वैराग्य कैसे हुआ ?
६. क्या उनका बताया हुआ मुक्तिमार्ग हम पा सकते हैं ? यदि हाँ, तो कैसे ?

एक वर्ष बाद अक्षय तृतीया के दिन ऋषभ मुनि का सर्वप्रथम आहार राजा श्रेयांस के यहाँ इक्षुरस (गन्ने का रस) का हुआ। उसी दिन से अक्षय तृतीया पर्व चल पड़ा।
बेटी - क्या वे मुनि होते ही सर्वज्ञ बन गये थे ?
माँ - नहीं बेटी ! एक हजार वर्ष तक बराबर मौन आत्म-साधना करते रहे। एक दिन आत्म-तल्लीनता की दशा में उन्हें केवलज्ञान की प्राप्ति हुई और वे वीतरागी सर्वज्ञ

पाठ आठवाँ

मेरा धाम

शुद्धात्म है मेरा नाम,
मात्र जानना मेरा काम।
मुक्तिपुरी है मेरा धाम,
मिलता जहाँ पूर्ण विश्राम ॥१॥

जहाँ भूख का नाम नहीं है,
जहाँ प्यास का काम नहीं है।
खाँसी और जुखाम नहीं है,
आधि ‘व्याधि’ का नाम नहीं है॥

सत् ‘शिव’ सुन्दर मेरा धाम,
शुद्धात्म है मेरा नाम।
मात्र जानना मेरा काम ॥२॥
स्वपर भेद-विज्ञान करेंगे,
निज आत्म का ध्यान धरेंगे।
राग-द्वेष का त्याग करेंगे,
चिदानन्द रस पान करेंगे।

सब सुखदाता मेरा धाम,
शुद्धात्म है मेरा नाम।
मात्र जानना मेरा काम ॥३॥

१. निवास,
२. मानसिक रोग,
३. शारीरिक रोग,
४. सच्चा,
५. कल्याणकारी,
६. आत्मा का आनन्द।

संकल्प - ‘भगवान बनेंगे’

सम्यग्दर्शन प्राप्त करेंगे।
सप्तभयों से नहीं डरेंगे।।
सप्त तत्व का ज्ञान करेंगे।
जीव-अजीव पहिचान करेंगे।।
स्व-पर भेदविज्ञान करेंगे।
निजआनंद का पान करेंगे।।
पंच प्रभु का ध्यान करेंगे।
गुरुजन का सम्मान करेंगे।।
जिनवाणी का श्रवण करेंगे।
पठन करेंगे, मनन करेंगे।।
रात्रि भोजन नहीं करेंगे।
बिना छना जल काम न लेंगे।।
निज स्वभाव को प्राप्त करेंगे।
मोह भाव का नाश करेंगे।।
रागद्वेष का त्याग करेंगे।
और अधिक क्या? बोलो बालक!
भक्त नहीं, भगवान
ब न े ं ग े ।।

पाठ पहला

देव-स्तुति

वीतराग सर्वज्ञ हितंकर, भविजन की अब पूरो आस।
ज्ञान भानु का उदय करो, मम मिथ्यातम का होय विनाश।।
जीवों की हम करुणा पालें, झूठ वचन नहीं कहें कदा।
परधन कबहूँ न हरें स्वामी, ब्रह्मचर्य व्रत रखें सदा।।
तृष्णा लोभ न बढ़े हमारा, तोष सुधा नित पिया करें।
श्री जिनधर्म हमारा प्यारा, तिस की सेवा किया करें।।
दूर भगावें बुरी रीतियाँ, सुखद रीति का करें प्रचार।
मेल-मिलाप बढ़ावें हम सब, धर्मोन्नति का करें प्रसार।।
सुख-दुख में हम समता धारें, रहे अचल जिन सदा अटल।
न्याय-मार्ग को लेश न त्यागें, वृद्धि करें निज आत्मबल।।
अष्ट करम जो दुःख हेतु हैं, तिनके क्षय का करें उपाय।
नाम आपका जपैं निरन्तर, विघ्न शोक सब ही टल जाय।।
आत्म शुद्ध हमारा होवे, पाप मैल नहिं चढ़े कदा।
विद्या की ही उन्नति हम में, धर्म ज्ञान हैं बढ़े सदा।।
हाथ जोड़कर शीश नवाते, तुमको भविजन खड़े-खड़े।
यह सब पूरो आस हमारी, चरण शरण में आन पड़े।।

देव-स्तुति का सारांश

यह स्तुति सच्चे देव की है। सच्चा देव उसे कहते हैं, जो
वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हो। वीतरागी वह है जो राग-द्वेष से
रहित हो और जो लोकलोक के समस्त पदार्थों को एकसाथ जानता
हो, वही सर्वज्ञ है। आत्महित का उपदेश देने वाला होने से वीतरागी,
सर्वज्ञ, हितोपदेशी कहलाता है।

वीतराग भगवान से प्रार्थना करता हुआ भव्य जीव सबसे पहिले यही
कहता है कि मैं मिथ्यात्व का नाश और सम्यग्दर्शन को प्राप्त करूँ,
क्योंकि मिथ्यात्व का नाश किए बिना धर्म का आरंभ ही नहीं होता है।

इसके बाद वह अपनी भावना व्यक्त करता हुआ कहता है कि
मेरी प्रवृत्ति पाँचों पापों और कषायों में न जावे। मैं हिंसा न करूँ, झूठ
न बोलूँ, चोरी न करूँ, कुशील सेवन न करूँ तथा लोभ के वशीभूत
होकर परिग्रह संग्रह न करूँ, सदा संतोष धारण किए रहूँ और मेरा
जीवन धर्म की सेवा में लगा रहे।

हम धर्म के नाम पर फैलने वाली कुरीतियों गृहीत मिथ्यात्वादि
और सामाजिक कुरीतियों को दूर करके धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र
में सही परम्पराओं का निर्माण करें तथा परस्पर में धर्म-प्रेम रखें।

हम सुख में प्रसन्न होकर फूल न जावें और दुःख को देखकर
घबड़ा न जावें, दोनों ही दशाओं में धैर्य से काम लेकर समताभाव रखें
तथा न्याय-मार्ग पर चलते हुए निरन्तर आत्मबल में वृद्धि करते रहें।

आठों ही कर्म दुःख के निमित्त हैं, कोई भी शुभाशुभ कर्म सुख
का कारण नहीं है, अतः हम उनके नाश का उपाय करते रहें। आपका
स्मरण सदा रहें जिससे सन्मार्ग में कोई विघ्न बाधाएँ न आवें।

हे भगवन्! हम और कुछ भी नहीं चाहते हैं, हम तो मात्र यही
चाहते हैं कि हमारी आत्मा पवित्र हो जावे और उसे मिथ्यात्वादि पापी
रूपी मैल कभी भी मलिन न करे तथा लौकिक विद्या की उन्नति के
साथ हमारा धर्मज्ञान (तत्त्वज्ञान) निरन्तर बढ़ता रहे।

हम सभी भव्य जीव खड़े हुए हाथ जोड़कर आपको नमस्कार
कर रहे हैं, हम तो आपके चरणों की शरण में आ गये हैं, हमारी
भावना अवश्य ही पूर्ण हो।

प्रश्न -

१. यह स्तुति किसकी है? सच्चा देव किसे कहते हैं?
२. पूरी स्तुति सुनाइये या लिखिए।
३. उक्त प्रार्थना का आशय अपने शब्दों में लिखिए।
४. निम्नांकित पंक्तियों का अर्थ लिखिए :-
“ज्ञान भानु का उदय करो, मम मिथ्यातम का होय विनाश।।”
“दूर भगावें बुरी रीतियाँ, सुखद रीति का करें प्रचार।।”
“अष्ट करम जो दुःख हेतु हैं, तिनके क्षय का करें उपाय।।”

पाठ में आये हुए मुत्रात्मक सिद्धान्त-वाक्य -

१. जो वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी हो, वही सच्चा देव है।
२. जो राग-द्वेष से रहित हो, वही वीतरागी है।
३. जो लोकलोक के समस्त पदार्थों को एकसाथ जानता हो, वही
सर्वज्ञ है।
४. आत्म-हितकारी उपदेश देनेवाला होने से वही हितोपदेशी है।
५. मिथ्यात्व का नाश किए बिना धर्म का आरंभ नहीं होता।
६. आठों ही कर्म दुःख के निमित्त हैं, कोई भी शुभाशुभ कर्म सुख
का कारण नहीं है।
७. ज्ञानी भक्त आत्मशुद्धि के अलावा और कुछ नहीं चाहता।

पाठ दूसरा

पाप

पुत्र - पिताजी लोग कहते हैं कि लोभ पाप का बाप है, तो यह लोभ
सबसे बड़ा पाप होता होगा?

पिता - नहीं बेटा, सबसे बड़ा पाप तो मिथ्यात्व ही है, जिसके वश
होकर जीव घोर पाप करता है।

पुत्र - पाँच पापों में तो इसका नाम है नहीं। उनके नाम तो मुझे याद
हैं - हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह।

पिता - ठीक है बेटा! पर लोभ का नाम भी जो पापों में नहीं है किन्तु
उसके वश होकर लोग पाप करते हैं, इसीलिए तो उसे पाप
का बाप कहा जाता है; उसी प्रकार मिथ्यात्व तो ऐसा भयंकर
पाप है कि जिसके छूटे बिना संसार-भ्रमण छूटता ही नहीं।

पुत्र - ऐसा क्यों?

पिता - उल्टी मान्यता का नाम ही तो मिथ्यात्व है। जब तक मान्यता
ही उल्टी रहेगी तब तक जीव पाप छोड़ेगा कैसे?

पुत्र - तो, सही बात समझना ही मिथ्यात्व छोड़ना है?

पिता - हाँ, अपनी आत्मा को सही समझ लेना ही मिथ्यात्व छोड़ना
है। जब यह जीव अपनी आत्मा को पहचान लेगा तो पाप भी
छोड़ने लगेगा।

प्रश्नोत्तर

पुत्र - किसी जीव को सताना, मारना उसका दिल दुखाना ही हिंसा है न ?
पिता - हाँ, दुनिया तो मात्र इसी को हिंसा कहती है; पर अपनी आत्मा में जो मोह-राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं वे भी हिंसा हैं, उसकी खबर उन्हें नहीं।
पुत्र - ऐं ! तो फिर गुस्सा करना और लोभ करना आदि भी हिंसा होगी ?
पिता - सभी कषायें हिंसा हैं। कषायें अर्थात् राग-द्वेष और मोह को ही तो भावाहिंसा कहते हैं। दूसरों को सताना-मारना आदि तो द्रव्यवहिंसा है।
पुत्र - जैसा देखा, जाना और सुना हो, वैसा ही न कहना झूठ है, इसमें सच्ची समझ की क्या जरूरत है ?
पिता - जैसा देखा, जाना और सुना हो, वैसा ही न कह कर अन्यथा कहना तो झूठ है ही, साथ ही जब तक हम किसी बात को सही समझेंगे नहीं, तब तक हमारा कहना सही कैसे होगा ?
पुत्र - जैसा देखा, जाना और सुना, वैसा कह दिया। बस छुट्टी।
पिता - नहीं ! इसमें किसी अज्ञानी से सुन लिया कि हिंसा में धर्म होता है, तो क्या हिंसा में धर्म मान लेना सत्य हो जायेगा ?
पुत्र - वाह ! हिंसा में धर्म बताना सत्य कैसे होगा ?
पिता - इसीलिए तो कहते हैं कि सत्य बोलने के पहले सत्य जानना आवश्यक है।
पुत्र - किसी दूसरे की वस्तु को चुरा लेना ही चोरी है ?
पिता - हाँ, किसी की पड़ी हुई, भूली हुई, रखी हुई वस्तु को बिना उसकी आज्ञा लिए उठा लेना या उठाकर किसी को दे देना तो चोरी ही है, किन्तु यदि परवस्तु का ग्रहण भी न हो परन्तु ग्रहण करने का भाव ही हो, तो वह भाव भी चोरी है।
पुत्र - ठीक है, पर यह कुशील क्या बला है ? लोग कहते हैं कि पराई माँ-बहिन को बुरी निगाह से देखना कुशील है। बुरी निगाह क्यों होती है ?
पिता - विषय-वासना ही तो बुरी निगाह है। इससे अधिक तुम अभी समझ नहीं सकते।
पुत्र - अनाप-शनाप रुपया-पैसा जोड़ना ही परिग्रह है न ?
पिता - रुपया-पैसा मकान आदि जोड़ना तो परिग्रह है ही, पर असल में तो उनके जोड़ने का भाव तथा उनके प्रति राग रखना और उन्हें अपना मानना परिग्रह है। इसप्रकार की उल्टी मान्यता को मिथ्यात्व कहते हैं।
पुत्र - है ! मिथ्यात्व परिग्रह है ?
पिता - हाँ ! हाँ !! चौबीस प्रकार के परिग्रहों में सबसे पहिला नम्बर तो उसका ही आता है। फिर क्रोध, मान, माया और लोभ आदि कषायों का।
पुत्र - तो क्या कषायें भी परिग्रह हैं ?
पिता - हाँ ! हाँ !! हाँ ही। कषायें हिंसा भी हैं और परिग्रह भी। वास्तव में तो सब पापों की जड़ मिथ्यात्व और कषायें ही हैं।
पुत्र - इसका मतलब तो यह हुआ कि पापों से बचने के लिए पहिले मिथ्यात्व और कषायें छोड़ना चाहिए ?
पिता - तुम बहुत समझदार हो, सच्ची बात तुम्हारी समझ में बहुत जल्दी आ गई। जो जीव को बुरे रास्ते में डाल दे, उसी को तो पाप कहते हैं। एक तरह से दुःख का कारण बुरा कार्य ही पाप है। मिथ्यात्व और कषायें बुरे काम हैं, अतः पाप हैं।

प्रश्न -

१. पाप कितने होते हैं ? नाम गिनाइये।
२. जीव घोर पाप क्यों करता है ?
३. क्या सत्य समझे बिना सत्य बोला जा सकता है ? तर्कसंगत उत्तर दीजिए।
४. क्या कषायें परिग्रह हैं ? स्पष्ट कीजिए।
५. द्रव्याहिंसा और भावाहिंसा किसे कहते हैं ?
६. पापों से बचने के लिए क्या करना चाहिए ?
७. सबसे बड़ा पाप कौन है और क्यों ?

पाठ में आये हुए मुक्तात्मक सिद्धान्त वाक्य

१. दुःख का कारण बुरा कार्य ही पाप है।
२. मिथ्यात्व और कषायें दुःख के कारण बुरे कार्य होने से पाप हैं।
३. सबसे बड़ा पाप मिथ्यात्व है।
४. मिथ्यात्व के वश होकर जीव घोर पाप करता है।
५. मिथ्यात्व छूटे बिना भव-भ्रमण मिटता नहीं।
६. उल्टी मान्यता का नाम ही मिथ्यात्व है।
७. सही बात समझकर उसे मानना ही मिथ्यात्व छोड़ना है।
८. आत्मा में उत्पन्न होने वाले मोह-राग-द्वेष ही भावाहिंसा है, दूसरों को सताना आदि तो द्रव्याहिंसा है।
९. सत्य बोलने के पहले सत्य समझना आवश्यक है।
१०. मिथ्यात्व और कषायें परिग्रह के भेद हैं।
११. सब पापों की जड़ मिथ्यात्व और कषायें ही हैं।

पाठ तीसरा

कषाय

सुबोध - भाई तुम तो कहते थे कि आत्मा जानता-देखता है, पर क्या आत्मा क्रोध नहीं करता; छल-कपट नहीं करता ?
प्रबोध - हाँ ! हाँ !! क्यों नहीं करता ? पर जैसा आत्मा का स्वभाव जानना-देखना है, वैसा आत्मा का स्वभाव क्रोध आदि करना नहीं। कषाय तो उसका विभाव है, स्वभाव नहीं।
सुबोध - यह विभाव क्या होता है ?
प्रबोध - आत्मा के स्वभाव के विपरीत भाव को विभाव कहते हैं। आत्मा का स्वभाव आनन्द है। मिथ्यात्व, राग, द्वेष (कषाय) आनन्द स्वभाव से विपरीत हैं, इसलिए वे विभाव हैं।
सुबोध - राग-द्वेष क्या चीज है ?
प्रबोध - जब हम किसी को भला जानकर चाहने लगते हैं, तो वह राग कहलाता है और जब किसी को बुरा जानकर दूर करना चाहते हैं, तो द्वेष कहलाता है।
सुबोध - और कषाय ?
प्रबोध - दिन-रात तो कषाय करते हो और यह भी नहीं जानते कि वह क्या वस्तु है ? कषाय राग-द्वेष का ही दूसरा नाम है। जो आत्मा को कसे अर्थात् दुःख दे, उसे ही कषाय कहते हैं। एक तरह से आत्मा में उत्पन्न होने वाला विकार राग-द्वेष ही कषाय है अथवा जिससे संसार की प्राप्ति हो वही कषाय है।
सुबोध - ये कषायें कितनी होती हैं ?
प्रबोध - कषायें चार प्रकार की होती हैं। क्रोध, मान, माया और लोभ।
सुबोध - अच्छा तो हम जो गुस्सा करते हैं, उसे ही क्रोध कहते होंगे।
प्रबोध - हाँ भाई ! यह क्रोध बहुत बुरी चीज है।
सुबोध - तो हमें यह क्रोध आता ही क्यों है ?
प्रबोध - मुख्यतया जब हम ऐसा मानते हैं कि इसने मेरा बुरा किया तो आत्मा में क्रोध पैदा होता है। इसी प्रकार जब हम यह मान लेते हैं कि दुनियाँ की वस्तुएँ मेरी हैं, मैं इनका स्वामी हूँ, तो मान हो जाता है।
सुबोध - यह मान क्या है ?
प्रबोध - घमण्ड को ही मान कहते हैं। लोग कहते हैं कि यह बहुत घमण्डी है। इसे अपने धन और ताकत का बहुत घमण्ड है। सम्पत्ति-पैसा, शरीर आदि बाह्य पदार्थ टिकने वाले तो हैं नहीं, हम व्यर्थ ही घमण्ड करते हैं।
सुबोध - कुछ लोग छल-कपट करते हैं ?
प्रबोध - हाँ भाई ! वह तो माया है, उसे ही तो माया कहते हैं। करते हैं मायाचारी भर कर पूँछ होते हैं। मायाचारी जीव के मन में कुछ और होता है, वह कहता कुछ और है और करता उससे भी अलग है। छल-कपट तोभी जीवों को बहुत होता है।
सुबोध - लोभ कषाय के बारे में भी कुछ बताइये ?
प्रबोध - यह बहुत खतरनाक कषाय है, इसे तो पाप का बाप कहा जाता है। कोई चीज देखो कि यह मुझे मिल जाय, लोभी सदा यही सोचा करता है।
सुबोध - यह तो सब ठीक है कि कषायें बुरी चीज हैं, पर प्रश्न तो यह है कि ये उत्पन्न क्यों होती हैं और मिटें कैसे ?
प्रबोध - मिथ्यात्व (उल्टी मान्यता) के कारण परपदार्थ या तो इष्ट (अनुकूल) या अनिष्ट (प्रतिकूल) मालूम पड़ते हैं, मुख्यतया इसी कारण कषाय उत्पन्न होती हैं। जब तत्त्वज्ञान के अभ्यास से परपदार्थ न तो अनुकूल ही मालूम हो और न प्रतिकूल, तब मुख्यतया कषाय भी उत्पन्न न होगी।
सुबोध - अच्छा तो हमें तत्त्वज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास करना चाहिए। उसी से कषाय मिटेगी।
प्रबोध - हाँ ! हाँ !! सच बात तो यही है।

प्रश्न -

प्रश्नोत्तर

१. कषाय किसे कहते हैं ? कषाय को विभाव क्यों कहा ?
२. कषाय से हानि क्या है ?
३. क्या कषाय आत्मा का स्वभाव है ?
४. कषायें कितनी होती हैं ? नाम बताइये।
५. कषायें क्यों उत्पन्न होती हैं ? वे कैसे मिटें ?
६. आत्मा का स्वभाव क्या है ?

पाठ में आए हुए सूत्रवाक्य सिद्धान्त वाक्य -

१. जो आत्मा को कसे अर्थात् दुःखी करे, उसे कषाय कहते हैं।
२. कषाय राग-द्वेष का दूसरा नाम है।
३. कषाय आत्मा का विभाव है, स्वभाव नहीं।
४. आत्मा का स्वभाव जानना-देखना है।
५. क्रोध गुस्सा को कहते हैं।
६. मान घमण्ड को कहते हैं।
७. माया छल-कपट को कहते हैं।
८. किसी वस्तु को देखकर प्राप्ति की इच्छा होना ही लोभ है।
९. मनुष्यता मिथ्यात्व के कारण परपदार्थ इष्ट और अनिष्ट भासित होने से कषाय उत्पन्न होती है।
१०. तत्त्वज्ञान के अभ्यास से जब परपदार्थ इष्ट और अनिष्ट भासित न हों तो मनुष्यता कषाय भी उत्पन्न न होगी।

१४

पाठ चौथा

सदाचार

बाल-सभा

(कक्षा चार के बालकों की एक सभा हो रही है। बालकों में से ही एक को अध्यक्ष बनाया गया है। वह कुर्सी पर बैठा है।)
अध्यक्ष - (खड़े होकर) अब आपके सामने शान्तिलाल एक कहानी सुनायेंगे।
शान्तिलाल - (टेबल के पास खड़े होकर) माननीय अध्यक्ष महोदय एवं सहपाठी भाइयो और बहिनो !
अध्यक्ष महोदय की आज्ञानुसार मैं आपको एक शिक्षाप्रद कहानी सुनाता हूँ। आशा है आप शान्ति से सुनेंगे।

एक बालक बहुत हठी था। वह खाने-पीने का लोभी भी बहुत था। जब देखो तब अपने घर पर अपने भाई-बहिनों से जरा-जरा-सी चीजों पर लड़ पड़ता था, उसकी माँ उसे बहुत समझाती पर वह न मानता।
एक दिन उसके घर मिठाई बनीं। माँ ने सब बच्चों को बराबर बाँट दी। सब मिठाई पाकर प्रसन्न होकर खाने लगे पर वह कहने लगा मेरा लड्डू छोटा है। दूसरे बच्चे तब तक खा चुके थे, नहीं तो बदल दिया जाता। वह क्रोधी तो था ही, जोर-जोर से रोने

१५

लगा और गुस्से में आकर लड्डू भी फेंक दिया। जाकर एक कोने में लेट गया। दिन भर खाना भी नहीं खाया। सबको बहुत मनाया पर वह तो घमण्डी भी था न, मानता कैसे ?

कोने में था एक बिच्छू और बिच्छू ने उसको काट खाया। उसे अपने किए की सजा मिल गई। दिन भर भूखा रहा, लड्डू भी गया और बिच्छू ने काट खाया सो अलग। क्रोधी, मानी, लोभी और हठी बालकों को यही दशा होती है। इसलिए हमें क्रोध, मान, लोभ एवं हठ नहीं करना चाहिए।
इतना कहकर मैं अपना स्थान ग्रहण करता हूँ।
(तालियों की गड़गड़ाहट)
अध्यक्ष - (खड़े होकर) शान्तिलाल ने बहुत शिक्षाप्रद कहानी सुनाई है। अब मैं निर्मला बहिन से निवेदन करूँगा कि वे भी कोई शिक्षाप्रद बात सुनायें।
निर्मला - (टेबल के पास खड़ी होकर)
आदरणीय अध्यक्ष महोदय एवं भाइयो और बहिनो ! मैं आपके सामने भाषण देने नहीं आई हूँ। मैंने अखबार में कल एक बात पढ़ी थी, वही सुना देना चाहती हूँ।

एक गाँव में एक बारात आई थी। उसके लिए रात में भोजन बन रहा था। अंधेरे में किसी ने देख नहीं पाया और साग में एक साँप गिर गया। रात में ही भोज हुआ। सब बारातियों ने भोजन किया पर चार-पाँच आदमियों बोले हम तो रात में नहीं खाते। सबने

१६

उनकी खूब हँसी उड़ाई। वे बड़े धर्मात्मा बने फिरते हैं, रात में भूखे रहेंगे तो सीधे स्वर्ग जायेंगे !
पर हुआ यह कि भोजन करते ही लोग बेहोश होने लगे। दूसरों को स्वर्ग भेजने वाले खुद स्वर्ग की तैयारी करने लगे। पर जल्दी ही उन पाँच आदमियों ने उन्हें अस्पताल पहुँचाया। वहाँ मुश्किल से आठों को बचाया जा सका। यदि वे भी रात में खाते तो एक भी आदमी नहीं बचता। इसलिए किसी को भी रात्रि में भोजन नहीं करना चाहिए। इतना कहकर मैं अपना स्थान ग्रहण करती हूँ।
एक छात्र - (अपने स्थान पर ही खड़े होकर)
निर्मला बहिन ? रात के खाने में मात्र यही दोष है या कुछ और भी ?

अध्यक्ष - *(अपने स्थान पर खड़े होकर) आप अपने स्थान पर बैठ जाइये। क्या आपको सभा में बैठना भी नहीं

१७

आता ? क्या आप यह भी नहीं जानते कि सभा में इस प्रकार बीच में नहीं बोलना चाहिए तथा यदि कोई अति आवश्यक बात भी हो तो अध्यक्ष की आज्ञा लेकर बोलना चाहिए ?
चूँकि प्रश्न आ ही गया है, अतः यदि निर्मला बहिन चाहें तो मैं उनसे अनुरोध करूँगा कि वे इसका उत्तर दें।*
निर्मला - (खड़े होकर) यह तो मैंने रात्रि भोजन से होने वाली प्रत्यक्ष सामने दिखने वाली हानि की ओर संकेत किया है, पर वास्तव में रात्रि भोजन में मूढ़ता अधिक होने से राग की तीव्रता रहती है, अतः वह आत्म-साधना में भी बाधक है।
अध्यक्ष - *(खड़े होकर) निर्मला बहिन ने बड़ी ही अच्छी बात बताई है। हम सबको यही निर्णय कर लेना चाहिए कि आज से रात में नहीं खायेंगे।
बहुत से साथी बोलना चाहते हैं पर समय बहुत हो गया है, अतः आज उनसे क्षमा चाहते हैं। उनकी बात अगली मीटिंग में सुनेंगे। मैं अब भाषण तो क्या दूँ पर एक बात कह देना चाहता हूँ।
मैं अभी आठ दिन पहले पिताजी के साथ कलकत्ता गया था। वहाँ वैज्ञानिक प्रयोगशाला देखने को मिली। उसमें मैंने स्वयं अपनी आँखों से देखा कि जो पानी हमें साफ दिखाई देता है, सूक्ष्मदर्शी से देखने पर उसमें लाखों जीव नजर आते हैं।
अतः मैंने प्रतिज्ञा कर ली कि अब बिना छना

१८

पानी कभी भी नहीं पीऊँगा। मैं आप लोगों से भी निवेदन करना चाहता हूँ, आप लोग भी यह निश्चय कर लें कि पानी छानकर ही पीयेंगे।
इतना कहकर मैं आज की इस सभा की समाप्ति की घोषणा करता हूँ।
(भगवान महावीर की जयध्वनिपूर्वक सभा समाप्त होती है।)

प्रश्न -

१. पानी छानकर क्यों पीना चाहिए ?
२. रात में भोजन से क्या हानि है ?
३. क्रोध करना क्यों बुरा है ?
४. हठी बालक की कहानी अपने शब्दों में लिखिए।
५. सभा-संचालन की विधि अपने शब्दों में लिखिए।

१९

पाठ पाँचवाँ

गतियाँ

पुत्र - पिताजी! आज मन्दिर में सुना कि “चारों गति के माहि प्रभु दुःख पायो में घणी।” ये चारों गतियाँ क्या हैं, जिनमें दुःख ही दुःख है।

पिता - बेटा! गति तो जीव की अवस्था-विशेष को कहते हैं। जीव संसार में मोटे तौर पर चार अवस्थाओं में पाये जाते हैं, उन्हें ही चार गतियाँ कहते हैं। जब यह जीव अपनी आत्मा को पहिचानकर उसकी साधना करता है तो चतुर्गति के दुःखों से छूट जाता है और अपना अविनाशी सिद्ध पद पा लेता है, उसे पंचम गति कहते हैं।

पुत्र - वे चार गतियाँ कौन-कौन-सी हैं?

पिता - मनुष्य, तिर्यंच, नरक और देव।

पुत्र - मनुष्य तो हम तुम भी हैं न?

पिता - हम मनुष्यगति में हैं, अतः मनुष्य कहलाते हैं। वैसे हैं तो हम तुम भी आत्मा (जीव)।

जन्म लेता है अर्थात् मनुष्य-शरीर धारण करता है तो उसे मनुष्य कहते हैं।

पुत्र - अच्छा तो हम मनुष्य गति के जीव हैं। गाय, भैंस, घोड़ा आदि किस गति में हैं?

पिता - वे तिर्यंचगति के जीव हैं। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, वनस्पति, कीड़े-मकोड़े, हाथी, घोड़े-कबूतर, मोर आदि पशु-पक्षी जो तुम्हें दिखाई देते हैं, वे सभी तिर्यंचगति में आते हैं।

तिर्यंचगति

जब कोई जीव मरकर इनमें पैदा होता है तो वह तिर्यंच कहलाता है।

पुत्र - जब मनुष्यों को कीड़ दिखाई देने वाले सभी तिर्यंच हैं तो फिर नारकी कौन हैं?

पिता - इस पृथ्वी के नीचे सात नरक हैं। वहाँ का वातावरण बहुत ही कष्टप्रद है। वहाँ पर कहीं शरीर को जला देनेवाली भयंकर गर्मी और कहीं शरीर को गला देने वाली भयंकर सर्दी पड़ती है। भोजन-पानी का सर्वथा अभाव है। वहाँ जीवों को भयंकर भूख, प्यास की वेदना सहनी पड़ती है। वे लोग तीव्र कषायी भी होते हैं, आपस में लड़ने-झगड़ते रहते हैं, मारकाट मची रहती है।

नारकीगति

जब कोई जीव कहीं से मरकर मनुष्यगति में जन्म लेता है, उन्हें नारकी कहते हैं।

पुत्र - और देव…?

पिता - जैसे जिन जीवों के भाव होते हैं, उनके अनुसार उन्हें फल भी मिलता है। उनके उन्हें फल मिले ऐसे स्थान भी होते हैं। जैसे पाप का फल भोगने का स्थान नरकादि गति है, उसी प्रकार जो जीव पुण्य भाव करता है उनका फल भोगने का स्थान देवगति है। देवगति में मुख्यतः भोग-सामग्री प्राप्त रहती है।

देवगति

जो जीव मरकर देवों में जन्म लेते हैं, उन्हें देवगति के जीव कहते हैं।

पुत्र - अच्छी गति कौन-सी है?

पिता - जब बता दिया कि चारों गति में दुःख ही है तो फिर गति अच्छी कैसे होगी? ये चारों संसार हैं। इसे छोड़कर जो मुक्त हुए वे सिद्ध जीव पंचम गति वाले हैं। एकमात्र पूर्ण आनन्दमय सिद्धगति ही है।

पुत्र - मनुष्यगति को अच्छी कहो न? क्योंकि इसमें ही मोक्षपद मिलता है?

पिता - यदि यह अच्छी होती तो सिद्ध जीव इसका भी परित्याग क्यों करते? अतः चतुर्गति का परित्याग छोड़ना ही अच्छा है?

पुत्र - जब इन गतियों का चक्कर छोड़ना ही अच्छा है तो फिर यह जीव इन गतियों में घूमता ही क्यों है?

पिता - जब अपराध करेगा तो सजा भोगनी ही पड़ेगी।

पुत्र - किस अपराध के फल में कौन-सी गति प्राप्त होती है?

पिता - बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह रखने का भाव ही ऐसा अपराध है जिससे इस जीव को नरक जाना पड़ता है तथा भावों की कुटिलता अर्थात् मायाचार, छल-कपट तिर्यंचायु बंध के कारण है।

पुत्र - मनुष्य तथा देव…?

पिता - अल्प आरम्भ और अल्प परिग्रह रखने का भाव और स्वभाव की सरलता मनुष्यायु के बंध के कारण है। इसी प्रकार संयम के साथ रहने वाला शुभरूप राग और असंयमांश मंदकषायमय भाव तथा अज्ञानपूर्वक किये गये तपश्चरण के भाव देवायु के बंध के कारण हैं।

पुत्र - उक्त पाप बंध के कारण होने से अपराध ही हैं तो फिर निरपराध दशा क्या है?

पिता - एक वीतराग भाव ही निरपराध दशा है, अतः वह मोक्ष का कारण है।

पुत्र - इन सबके जानने से क्या लाभ है?

पिता - हम यह जान जायेंगे कि चारों गतियों में दुःख ही दुःख है, सुख नहीं और चतुर्गति भ्रमण का कारण शुभरूप भाव है, इनसे छूटने का उपाय एक वीतराग भाव है। हमें वीतराग भाव प्राप्त करने के लिए ज्ञानस्वभावी आत्मा का आश्रय लेना चाहिए।

प्रश्न -

१. गति किसे कहते हैं? वे कितने प्रकार की होती हैं?
२. तिर्यंचगति किसे कहते हैं?
३. नरकगति के वातावरण का वर्णन कीजिए। ऐसे कौन-से कारण हैं जिनसे जीव नरकगति प्राप्त करता है?
४. क्या देवगति में भी सुख नहीं है? सकारण उत्तर दीजिए।
५. सबसे अच्छी गति कौन-सी है? युक्तिसंगत उत्तर दीजिए।

पाठ में आये हुए मुख्य सिद्धान्त वाक्य -

१. जीव की अवस्था विशेष को गति कहते हैं।
२. जीव कहीं से मरकर मनुष्य-शरीर धारण करता है, उसे मनुष्यगति कहते हैं।
३. जीव कहीं से मरकर तिर्यंच-शरीर धारण करता है, उसे तिर्यंचगति कहते हैं।
४. जीव कहीं से मरकर नारकी-शरीर धारण करता है, उसे नरकगति कहते हैं।
५. जीव कहीं से मरकर देव-शरीर धारण करता है, उसे देवगति कहते हैं।
६. जीव अपनी आत्मा को पहिचान कर उसकी साधना द्वारा चतुर्गति के दुःखों से छूटकर सिद्धपद पा लेता है, उसे पंचमगति कहते हैं।
७. एक वीतराग भाव ही पंचमगति (मोक्ष) का कारण है। वीतराग भाव प्राप्त करने के लिए ज्ञानस्वभावी आत्मा का आश्रय लेना चाहिए।

पाठ छठवाँ

द्रव्य

छात्र - गुरुजी, अम्मा कहती थी कि जो हमें दिखाई देता है, वह तो सब पुद्गल क्या होता है?

अध्यापक - ठीक है। हमें आँखों से तो सिर्फ वर्ग (रंग) ही दिखाई देता है और वह मात्र पुद्गल में ही पाया जाता है। जिसमें स्पर्श, रस, गंध और वर्ण पाया जाय, उसे पुद्गल कहते हैं। यह अजीव द्रव्य है।

छात्र - द्रव्य किसे कहते हैं? वे कितने प्रकार के हैं?

अध्यापक - गुणों के समूह को द्रव्य कहते हैं। वे छह प्रकार के हैं - जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल।

छात्र - तो क्या द्रव्यों में अजीव नहीं है?

अध्यापक - जीव को छोड़कर बाकी सब द्रव्य अजीव ही तो हैं। जिसमें ज्ञान पाया जाय वे ही जीव हैं। बाकी सब अजीव।

छात्र - जब द्रव्य छह प्रकार के हैं तो हमें दिखाई केवल पुद्गल ही क्यों देता?

अध्यापक - क्योंकि इन्द्रियाँ रूप, रस आदि को ही जानती हैं और

आत्मा आदि वस्तुएँ अरूपी हैं, अतः इन्द्रियाँ उनके
ज्ञान में निमित्त नहीं हैं।
छात्र - …पूजा पाठ को धर्मद्रव्य कहते होंगे और हिंसादिक
को अधर्म द्रव्य।
अध्यापक - नहीं भाई! वे धर्म और अधर्म अलग बात है, ये धर्म
और अधर्म तो द्रव्यों के नाम हैं जो कि सारे लोक में
तिल में तेल के समान फैले हुए हैं।
छात्र - इनकी क्या परिभाषा है?
अध्यापक - जिस प्रकार जल मछली के चलने में निमित्त है, उसी
प्रकार स्वयं चलते हुए जीवों और पुद्गलों को चलने में
जो निमित्त हो वही धर्म द्रव्य है तथा जैसे वृक्ष की
छाया पथिकों को ठहरने में निमित्त होती है, उसी
प्रकार गमन पूर्वक ठहरने वाले जीवों और पुद्गलों को
ठहरने में जो निमित्त हो, वही अधर्म द्रव्य है।
छात्र - जब धर्म द्रव्य चलायेगा और अधर्म द्रव्य ठहरायेगा तो
जीवों को बड़ी परेशानी होगी?
अध्यापक - वे कोई चलाते ठहराते थोड़े ही हैं। जब जीव और
पुद्गल स्वयं चलें या ठहरें तो मात्र निमित्त होते हैं।
छात्र - आकाश तो नीला-नीला साफ दिखाई देता ही है, उसे
क्या समझना?
अध्यापक - नहीं, अभी तुम्हें बताया था कि नीलापन-पीलापन तो
पुद्गल की पर्याय है। आकाश तो अरूपी है, उसमें
कोई रंग नहीं होता। जो सब द्रव्यों के रहने में निमित्त
हो, वही आकाश है।

२८

— अंश यहाँ समाप्त; पूर्ण ग्रंथ के लिए नीचे संलग्न PDF देखें —


:paperclip: मूल दस्तावेज़ (PDF): 3016.pdf

स्रोत: Gyata संग्रह।

प्रूफरीडिंग बाकी है