नंदीश्वर – नंदीश्वर,
वन्दों मैं नन्दीश्वर ।
जयवन्तो नन्दीश्वर,
जयवन्तो नन्दीश्वर ।। टेक ।।
अकृत्रिम मंदिर नंदीश्वर, अकृत्रिम जिनबिम्ब मनोहर।
मानो प्रभु साक्षात विराजें, मुक्तिमार्ग संदेश सुनावें ।। 1।।
अकृत्रिम निज ज्ञायक भाव, आश्रय करने योग्य स्वभाव।
दर्पणवत् जिनबिम्ब दिखाय, भवि अंतर में लख सुखपाय ।। 2 ।।
श्याम रत्नमय अंजनगिरि है, योजन सहस चौरासी सोहे।
चहुँ दिश चार-चार शुभ वापी, लाख-लाख योजन प्रभु भाखी ।। 3 ।।
फटिक समान सु दधिगिरी जानो, मध्य सहस दश योजन मानो।
योजन सहस तुंग सुखदाई, मुख पर दो दो रतिकर भाई. ।। 4।।
बावन चैत्यालय सुखकारी, सुर वंदें तज भाव विकारी।
भाव नमन नित हो अविकारा, अंतर में चिद्बिम्ब निहारा।। 5।।
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’