अनादि काल से मान रहा था, मुझ को पर का कर्ता,
विकल्पों को ही अपना माना, निज से निज को नहीं जाना,
मैं तो हूँ ज्ञायक-मूर्ति।
शक्ति से हूँ भगवान आत्मा, श्री गुरु ने समझाया,
अनंत गुणों का एक रूप हूँ, शुद्ध पर्यायों से भी न्यारा,
मैं तो हूँ असंगी।
निज चैतन्य के आश्रय से ही, स्वयं को पहचानूँ,
बन के चैतन्य महल का स्वामी, स्वयं स्व में बस जाऊँ,
मैं तो हूँ सच्चिदानंदी।
श्री गुरु ने कहा, झाँक तू अपने अंदर,
निरावरण, अखंड, चैतन्य सूर्य प्रकाश है तेरे भीतर,
मैं तो हूँ स्वरूपानंदी।
रचनाकार: मुकुल शाह (Mukul Shah), अहमदाबाद