नगरी हो सिद्धों सी, जिनकुल सा घराना हो।
शरण हो ज्ञायक की, फिर जग में ना आना हो।
अंजन के जैसा मन, निःशंक हमारा हो।
समन्तभद्र स्वामी, सा नमन हमारा हो।।1।।
पारस प्रभु सी हो क्षमा, समता सी धारा हो।
सेठ सुदर्शन सा अहो, शील हमारा हो।।2।।
सति सिया सी नारी हो, चैतन्य विहारी हो।
मैना सी श्रद्धा, नियति ये हमारी हो।।3।।
वैराग्य भरत जी सा, जग का रस खारा हो।
टोडरमल जी सा, 'बलिदान हमारा हो।।4।।
निरपेक्ष धनंजय सी, भक्ति ही सहारा हो।
विष्णु मुनि जैसा, वात्सल्य हमारा हो।।5।।
दृष्टि अमूढ़ता की, हो जाये रेवती सी।
अर्जुन सी दृष्टि, अरु लक्ष्य हमारा हो।।6।।
समकित सी नैया हो, जिनदेव खिवैया हों।
जिनवाणी सी मां, गणधर से भैया हों।।7।।
सर्वार्थसिद्धि देवों सी, चर्चा हमारी हो।
धन्य दिगम्बर मुनि, चर्या ही प्यारी हो।। 8।।
रचयिता: संजीव जी उस्मानपुर