धार संयम बने मुनिराज, आज मुनि-राजा बने।। टेक।।
त्यागे जग के मान-विभव सब,
रागादिक तज निर्विकल्प अब,
रहा निज द्रव्य सर्वस्व आज ॥ आज मुनि… ॥
देह-दशा से रहे उदासी,
आत्म-सुधा पीवें अविनाशी,
रहे निज द्रव्य माहिं निवास ॥ आज मुनि… ॥
शीत-ताप जिन चित नहीं डोले,
सब जीवों में समता घोलें,
करें जंगल में मंगल काज ॥ आज मुनि… ॥
भाव शुभाशुभ से हो न्यारे,
निज आनंद-सुधा को धारे,
आत्म-निद्रा ही सहज स्वभाव ॥ आज मुनि… ॥
यथाजात दिक्-अम्बर सोहे,
सम-दम-यम से नाता जोड़े,
मोरपिच्छी, कमंडल साज ॥ आज मुनि… ॥
राग-द्वेष सब दूर भगावें,
निज आत्मा का पंथ बतावें,
ध्यान-लीन रहें ऋषि-राज ॥ आज मुनि… ॥
रचनाकार: पर्व जैन (Parv Jain), खनियाधाना
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