मुमुक्षु का श्रद्धान | Mumukshu ka Shraddhan

निर्मल चरित्रवंत मुमुक्षु, सेवन करो सु यह सिद्धांत।
एक शुद्ध चिन्मय सदैव हूँ, परम ज्योतिमय आतमराम ।। 1 ।।

विविध भाव जो भिन्न लक्षणों वाले प्रगटित होय रहे।
वे नहीं मैं हूँ भासे मुझको, वे समग्र पर द्रव्य अरे ।। 2 ।।

पर द्रव्यों को ग्रहण करें, वे अपराधी ही बँधते हैं।
निज में ही संतुष्ट गुप्त बुध, निरपराध नहीं बँधते हैं।। 3।।

लौकिक में भी चोरादिक ही, सदा सशंकित फिरते हैं।
पकड़ न लेवे कोई कहीं, भयभीत आकुलित रहते हैं।। 4 ।।

किन्तु निरपराधी जन को, बंधन की शंका भी नहीं हो।
रहें सदा निंश्चत शांत वे, सहज निराकुल जीवन हो ।। 5 ।।

शुद्धातम सेवी ज्ञानी त्यों, निरपराध निर्भय रहते।
नहीं स्वप्न में भी बंधन की, शंका हो निर्बन्ध रहते ।। 6 ।।

भेदज्ञान का चमत्कार यह, अन्तर में देखो भाई।
घोर परीषह उपसर्गों में भी हो समता सुखदाई।। ७।।

निज आतम ही इक अवलम्बन, भव सागर तिर जाने को।
ज्ञानानंदमय निज स्वभाव ही, साधन शिव पद पाने को।। ८।।

एक आत्मा को जाने से, ज्ञेय समस्त झलकते हैं।
एक आत्मा को ध्याने से, सर्व विभाव विनशते हैं।। ९।।

नहीं किसी की कभी अपेक्षा, स्वयं-स्वयं में पूर्ण है।
पर भावों से शून्य स्वयं सिद्ध निज वैभव आपूर्ण है।। १०।।

है अनुभूत मार्ग इससे ही हुये अनन्तों सिद्ध हैं।
नमों-नमों अब भगवन्तों को, कीना मार्ग प्रसिद्ध है।। ११।।

वंदनीय निर्ग्रन्थ साधु जो, विचरें मुक्तिमार्ग में।
परम जितेन्द्रिय रहें उद्यमी, सम्यक् ज्ञान विराग में।। १२।।

वे भी अहो प्रशंसनीय हैं, जिन्हें हुआ श्रद्धान है।
धन्य जिनेश्वर के लघुनंदन, लहे अवश्य निर्वाण है।। १३।।

उनका हो सत्संग सहज ही ध्याऊँ अपना रूप असंग।
क्षण भर भी अब नहीं सुहावे मोही लोकजनों का संग।। १४।।

होऊँ परम निर्ग्रन्थ रहूँ, निर्द्वन्द्व सहज निज पद घ्याऊँ।
स्वयं-स्वयं में तृप्त रहूँ, बस स्वयं-स्वयं में रम जाऊँ।। १५।।

नित्योद्योत रूप परमातम, शाश्वत आनंद धाम है।
हुआ सहज निश्चिंत मुक्ति निज में ही मिले ललाम है।। १६।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह