मुझे परीक्षा की क्या आवश्यकता है ? | Mujhe Pariksha Ki Kya Avashyakata Hai

मुझे परीक्षा की क्या आवश्यकता है ?

-प्रो. वीरसागर जैन

प्रश्न- मैं तो जैन हूँ, मुझे तो वीतराग-सर्वज्ञ की वाणी मिली है, मैं उसे स्वीकार करके आत्महित कर लूँ, मुझे परीक्षा की क्या आवश्यकता है ?

उत्तर- यह भावुकता की बात है, यदि इससे आत्महित होता तो सभी धर्मों के अनुयायियों का हो जाए, क्योंकि सब ऐसा ही कहते हैं, सबको ऐसा ही लगता है कि मेरा धर्म श्रेष्ठ है, मेरे शास्त्र सत्य हैं | दूसरी बात यह समझना बहुत आवश्यक है कि परीक्षा के बिना अन्दर से सच्चा निर्धार नहीं होता, चाहे कोई कितना भी कुछ करे। उसे लगता तो है कि मैंने मान लिया, श्रद्धान कर लिया, पर वास्तव में ऐसा नहीं हुआ होता है | सच्चा श्रद्धान तो स्वयं परीक्षा करने पर ही होता है, उसके बिना कथमपि नहीं होता | तीसरी बात- तुम वीतराग-सर्वज्ञ की आज्ञा मानते हो तो यह भी उन्हीं की आज्ञा है कि स्वयं परीक्षा करो, मेरी बात मात्र मेरे कहने से मत मानो, अत: आज्ञा मानने के लिए भी परीक्षा करना आवश्यक ही है |