तर्ज : हम लाए हैं विदेह से…
संसार दुख का घर है, इसमें नहीं फँसाना।
रत्नत्रय पथ पर चलकर, शिवपुर हमें है जाना।। 1।।
इसका उपाय करना, ये फर्ज है हमारा।
दुष्कर्म त्याग करना, कर्तव्य है हमारा।। 2।।
हम आगमों से जानें, निज रूप को पिछानें।
फिर अन्यथा है दुर्लभ, श्री जैन धर्म पाना।। 3।।
हिंसादि पाप करना, अत्यन्त दुख का हेतु।
इनको भी शीघ्र छोड़ो, यदि सुख तुम्हें है पाना।। 4।।
दुर्लभ मनुष्य गति है, चिन्तामणि रतन सी।
दुर्लभ धर्म को पाकर, पथ भ्रष्ट को बचाना।। 5।।
दुखियों पर दया करना, उत्तम पर श्रद्धा रखना।
सम्यक्त्व धार लेना, फिर ज्ञान को बढ़ाना।। 6।।
चारित्र सार जग में, इसके बिना नहीं कुछ।
इसको भी शीघ्र पालो, कल का नहीं ठिकाना।। 7।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह