मिथ्यात्व के नाश में न्यायशास्त्र की भूमिका
-प्रो. वीरसागर जैन
जैन न्याय एक उत्कृष्ट विद्या है; किन्तु बहुत-से लोग लोग जैन होकर भी, जैन धर्म की आराधना करते हुए भी न्याय का अध्ययन नहीं करते हैं, जबकि जैन धर्म के मुख्य प्रयोजन की सिद्धि न्याय से ही होती है, न्याय के बिना नहीं हो सकती |
जैन धर्म का मुख्य प्रयोजन मिथ्यात्व का नाश करना है, जन्म-मरण का नाश करना है | यह जीव अनादि काल से मिथ्यात्व के कारण चौरासी लाख योनियों में निरन्तर जन्म-मरण कर रहा है | इस मिथ्यात्व एवं जन्म-मरण के चक्र को नष्ट करना ही जैन धर्म का मुख्य प्रयोजन है, मूल उद्देश्य है ।
वैसे तो दुनिया में अनेक धर्म-सम्प्रदाय हैं और सभी मनुष्य को प्रायः अच्छी शिक्षाएँ देते हैं, कोई भी हिंसा, झूठ, चोरी आदि की शिक्षा नहीं देता, सभी धर्म-सम्प्रदाय मनुष्य को पापों से बचाकर पुण्यकार्यों में लगाते हैं और उसे एक अच्छा मनुष्य बनाने की कोशिश करते हैं, आदर्श नागरिक बनाने की कोशिश करते हैं ।
यह सब बहुत अच्छी बात है, किन्तु जन्म-मरण और उसके कारणभूत मिथ्यात्व का नाश तो केवल जैन धर्म ही कर सकता है | यही जैन धर्म की मुख्य विशेषता है | अन्य धर्म दुर्गति से बचाकर सुगति में तो ले जा सकते हैं, किन्तु सभी गतियों से मुक्त नहीं कर सकते, जन्म-मरण के चक्र से बाहर नहीं निकाल सकते | अतः मिथ्यात्व का नाश करके जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति दिलाना ही जैन धर्म की सबसे बड़ी विशेषता सिद्ध होती है | जो जीव इस दुर्लभ कार्य को करते हैं, उन्हीं का जैन धर्म पाना सफल-सार्थक कहा जा सकता है, अन्य का नहीं | जो जीव जैन धर्म को पाकर भी सामान्य पुण्यार्जन में ही संतुष्ट हो जाते हैं, नरकादि दुर्गतियों से बचकर स्वर्गादि सुगति की प्राप्ति को ही अपना लक्ष्य बना लेते हैं, उनका जैन धर्म को पाना विशेष सफल-सार्थक नहीं कहा जा सकता |
जैन धर्म के मूर्धन्य आचार्य श्री कुन्दकुन्दस्वामी ने भी अपने ‘भावपाहुड’ ग्रन्थ में जैन धर्म की यही मुख्य विशेषता कही है | यथा-
जह रयणाणं पवरं वज्जं तरुगणाण गोसीरं |
तह धम्माणं पवरं जिणधम्मं भाविभवमहणं || - भावपाहुड, गाथा 80 अर्थ- जिस प्रकार रत्नों में सर्वश्रेष्ठ वज्र होता है, वृक्षों में सर्वश्रेष्ठ गोशीर चन्दन होता है, उसी प्रकार धर्मों में सर्वश्रेष्ठ जिनधर्म है, क्योंकि वही आगामी जन्म-मरणों का नाश करता है ।
इसी प्रकार के भाव अन्य भी अनेक आचार्यों ने व्यक्त किये हैं । आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी का यह कथन भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है-
“जिनधर्म में तो यह आम्नाय है कि पहले बड़ा पाप छुड़ाकर फिर छोटा पाप छुड़ाया है, इसलिए इस मिथ्यात्व को सप्त व्यसनादिक से भी बड़ा पाप जानकर पहले छुड़ाया है । इसलिए जो पाप के फल से डरते हैं, अपने आत्मा को दुःखसमुद्र में नहीं डुबाना चाहते, वे जीव इस मिथ्यात्व को अवश्य छोड़ो ।” -मोक्षमार्गप्रकाशक, पृष्ठ 192
अतः जैन धर्म के आराधकों को तो अपनी सम्पूर्ण शक्ति मिथ्यात्व के नाश में ही लगानी चाहिए, केवल दुर्गति से बचकर सुगति में जाने जितना ही कार्य कर लेना पर्याप्त नहीं है, सर्व गतियों से रहित होने का अर्थात् जन्म-मरण के नाश का ही उद्यम करना योग्य है ।
विचारणीय है कि मिथ्यात्व का नाश कैसे होता है और उसमें न्यायशास्त्र की क्या भूमिका है ।
दरअसल, यह बात एकदम स्पष्ट है कि मिथ्यात्व का नाश सम्यग्ज्ञान से ही हो सकता है, अन्य कोई उपाय नहीं है, क्योंकि जैसा ज्ञान होता है वैसा ही श्रद्धान होता है । यदि ज्ञान मिथ्या हो तो श्रद्धान सम्यक् नहीं हो सकता । अतः श्रद्धान को सम्यक् करने के लिए सर्वप्रथम हमें अपने ज्ञान को सम्यक् करना चाहिए । यही एक मात्र उपाय है मिथ्यात्व को नष्ट करने का, अन्य कोई उपाय नहीं है ।
कितने ही लोग अपना ज्ञान तो सम्यक् नहीं करते हैं और ऊपर से ही येन-केन प्रकारेण धर्म की बात को मानने की कोशिश करते हैं, किन्तु इससे उनका अन्दर का श्रद्धान ठीक नहीं होता, वह मिथ्या ही बना रहता है । बाहर से देखनेवालों को तो लगता है कि इनका श्रद्धान ठीक हो गया और स्वयं तक को भी ऐसा लगने लगता है कि मेरा श्रद्धान ठीक हो गया, किन्तु वास्तव में वह ठीक नहीं होता, मिथ्या ही बना रहता है । ऐसा इस जीव के साथ अनन्त बार हो चुका है ।
अतः मिथ्यात्व का नाश करने के लिए सर्वप्रथम तो इस बात को भलीभांति स्वीकार करना चाहिए कि जब तक हम स्वयं सच्चा ज्ञान नहीं करेंगे तबतक हमारे मिथ्यात्व का नाश होना कथमपि सम्भव नहीं है । तथा इसके बाद पूरी ईमानदारी से सच्चा ज्ञान करने का उद्यम करना चाहिए ।
बहुत से लोग दूसरों की देखादेखी धर्म की बातों को मानते हैं, बहुत से लोग कुल अपेक्षा धर्म की बातों को मानते हैं और बहुत से लोग किसी सांसारिक प्रयोजन के लिए ही धर्म की बातों को मानते हैं, किन्तु ये सब सच्चे धर्मात्मा नहीं हैं, सम्यग्दृष्टि नहीं हैं, मिथ्यादृष्टि ही हैं । इन सबकी समीक्षा पंडित टोडरमलजी ने अपने ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में सातवें अधिकार में भलीभांति की है, जो सुप्रसिद्ध ही है, तथापि जिसने नहीं पढ़ी हो उसे अवश्य पढ़ना चाहिए ।
तथा वहीं पर उन्होंने एक और बहुत महत्त्वपूर्ण प्रकरण लिखा है- परीक्षा रहित आज्ञानुसारी धर्मधारक मिथ्यादृष्टि, जो इस सम्बन्ध में विशेष ध्यान देकर पढ़ने योग्य है । यहाँ उसे पूरा उद्धृत करने से यह लेख बहुत लम्बा हो जाएगा, अतः पाठकों से निवेदन है कि वे उसे मूलतः ही पूरा पढ़ें । उस प्रकरण की कतिपय पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-
“तथा कितने ही जीव आज्ञानुसारी जैनी होते हैं, जैसी शास्त्र में आज्ञा है वैसी मानते हैं, परन्तु आज्ञा की परीक्षा नहीं करते । यदि आज्ञा ही मानना धर्म हो तो सर्व मतवाले अपने अपने शास्त्र की आज्ञा मानकर धर्मात्मा हो जाएँ ।…
बिना परीक्षा किये सत्य-असत्य का निर्णय कैसे हो ? और बिना निर्णय किये जिसप्रकार अन्यमती अपने शास्त्रों की आज्ञा मानते हैं उसीप्रकार इसने जैन शास्त्रों की आज्ञा मानी । यह तो पक्ष से आज्ञा मानना है । …
बिना परीक्षा किये ही आज्ञा मानने से सम्यक्त्व व धर्मध्यान हो तो जो द्रव्यलिंगी आज्ञा मानकर मुनि हुए, आज्ञानुसार साधन द्वारा ग्रैवेयक पर्यन्त जाते हैं, उनके मिथ्यादृष्टिपना कैसे रहा ? इसलिए कुछ परीक्षा करके मानने पर ही सम्यक्त्व व धर्मध्यान होता है । …
इसलिए बिना परीक्षा किये केवल आज्ञा ही द्वारा जो जैनी हैं, उन्हें भी मिथ्यादृष्टि ही जानना ।”
- मोक्षमार्गप्रकाशक, सातवाँ अधिकार, पृष्ठ 215
इसप्रकार आचार्यकल्प पंडित टोडरमलजी ने अपने ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में स्थान-स्थान पर परीक्षा करके श्रद्धान करने की विशेष प्रेरणा दी है । उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि परीक्षा के बिना किये गये श्रद्धान को तो अश्रद्धानवत् ही जानना ।
न केवल ‘मोक्षमार्गप्रकाशक’ में, अन्य भी अनेक मूल प्राकृत-संस्कृत-जैन-ग्रन्थों में परीक्षा करके ही श्रद्धान करने की बारम्बार प्रेरणा दी गई है । यथा ‘तिलोयपण्णत्ति’ में कहा है कि-
“जुत्तीए अत्थ पडिगहणं ।” - आचार्य यतिवृषभ, तिलोयपण्णत्ति 1/83
अर्थात् युक्ति (परीक्षा) से अर्थ का ग्रहण करना चाहिए ।
आचार्य यतिवृषभ स्वामी का कहना है कि जो व्यक्ति प्रमाणनयनिक्षेपात्मक युक्ति (परीक्षा) से अर्थ का ग्रहण नहीं करेगा, उसे युक्त अयुक्त और अयुक्त युक्त प्रतिभासित होगा । यथा-
जो ण पमाणणएहिं णिक्खेवेण णिरक्खदे अटुं ।
तस्साजुत्तं जुत्तं जुत्तमजुत्तं च पडिहादि ॥ - आचार्य यतिवृषभ, तिलोयपण्णत्ति, 1/82
इसी प्रकार अन्य भी अनेक ग्रन्थों में कहा है । तत्त्वार्थसूत्र का यह कथन तो सुप्रसिद्ध है ही कि “प्रमाणनयैरधिगमः” अर्थात् तत्त्व का सम्यक् ज्ञान प्रमाण-नयों के द्वारा ही होता है, अन्यथा नहीं । आचार्य कुन्दकुन्द ने भी ‘प्रवचनसार’ के तृतीय अधिकार चारित्राधिकार में बार-बार कहा है कि जबतक अर्थनिश्चय नहीं होगा तबतक अंतर्मन निःशल्य नहीं हो सकता और उसके बिना शुद्धोपयोग की प्राप्ति नहीं हो सकती, अतः सर्वप्रथम स्वाध्याय के द्वारा भलीभांति अर्थ का निश्चय करना चाहिए । ( द्रष्टव्य गाथा 32, 71, 72)
इसी प्रकार आचार्य वीरसेन स्वामी का यह कथन भी विशेष ध्यान देने योग्य है-
जुत्तिविरहियगुरुवयणादो पयमाणस्स पमाणाणुसारित्तविरोहादो । -जयधवला 1/1-1
अर्थात् जो व्यक्ति युक्ति से विरहित है और केवल गुरुवचनों पर विश्वास करता है, उसे सच्चा प्रमाणानुसारी नहीं माना जा सकता ।
दरअसल, बात यह है कि स्वयं परीक्षा किये बिना अपने अंदर से सच्चा विश्वास उत्पन्न नहीं होता, वह कभी भी झट से विचलित हो जाता है, क्योंकि उसने स्वयं परीक्षा करके ठीक से निर्णय नहीं किया होता ।
आचार्य कुन्दकुन्द के निज वैभव की प्राप्ति में भी परीक्षा या युक्ति के अवलम्बन की बड़ी भूमिका बताई गई है । कहा गया है कि उन्हें यह निज वैभव निम्नलिखित चार सोपानों के माध्यम से प्राप्त हुआ है- आगम (स्यात्पदमुद्रितशब्दब्रह्म) का सेवन, युक्ति का अवलम्बन, परापर गुरु का उपदेश, स्वानुभव । -समयसार टीका, आत्मख्याति, गाथा 5
इनमें युक्ति का अवलम्बन न्याय या परीक्षा ही है ।
इस प्रकार यह अत्यन्त स्पष्ट है कि मिथ्यात्व के नाश के लिए जीव को स्वयं को एकदम निष्पक्ष एवं सच्चा तत्त्वज्ञान होना अनिवार्य है, उसके बिना मिथ्यात्व का नाश सम्भव नहीं है । तथा इस सच्चे तत्त्वज्ञान के लिए न्यायशास्त्र की महती आवश्यकता है, न्यायशास्त्र के बिना सच्चा तत्त्वज्ञान होना सम्भव नहीं है ।
सच्चा तत्त्वज्ञान प्राप्त करने में मुख्यतः तीन बाधाएँ आती हैं-
१. तत्त्व/वस्तु का स्वरूप अत्यन्त जटिल है, अनन्त धर्मात्मक है | उसे कहा ही नहीं जा सकता, जानना भी अत्यन्त कठिन है |
२. हम मोह-राग-द्वेष से आक्रान्त हैं ।
३. लोक में मतभेद बहुत हैं, उनके प्रतिपादनकर्ता स्वयं को आप्त घोषित करते हैं |
न्यायशास्त्र इन तीनों बाधाओं से पार लगाकर समीचीन तत्त्वज्ञान कराता है | यथा-
- न्याय प्रमाणनयात्मक होता है, अतः वह वस्तु को अनन्तधर्मात्मक होते हुए भी मुख्य-गौण-शैली का आश्रय लेकर भलीभांति समझा देता है |
- न्यायशास्त्र हमें परीक्षा करने की ऐसी निर्दोष विधि सिखा देता है कि हम मोह-राग-द्वेष से सहित होते हुए भी उनसे ऊपर उठकर वस्तुस्वरूप को देखने की कला सीख जाते हैं ।
- न्यायशास्त्र हमें ऐसी वैज्ञानिक पद्धति भी सिखाता है कि उससे हम बहुत अधिक मतभेदों के बीच भी सत्य का ग्रहण एवं असत्य का त्याग करने में समर्थ बन जाते हैं।
इसप्रकार हम देखते हैं कि न्यायशास्त्र हमें सर्व बाधाओं से पार लगाकर सच्चा तत्त्वज्ञान कराता है, जो मिथ्यात्व के नाश हेतु अनिवार्य है, अतः उसकी मिथ्यात्व के नाश में महती भूमिका है | उसके द्वारा कोई भी जीव शीघ्र ही सच्चा तत्त्वज्ञान प्राप्त कर मिथ्यात्व का नाश कर सकता है और दुर्लभ सम्यक्त्व की प्राप्ति कर सकता है | सभी लोग न्यायशास्त्र के अध्ययन द्वारा मिथ्यात्व का नाश कर सम्यक्त्व की प्राप्ति करें - यही मेरी मंगल भावना है।