मिथ्या मोह निवारो चेतन, मिथ्या मोह निवारो ॥ टेक ॥
पर से कुछ सम्बन्ध नहीं है, सहज पूर्ण है सारो।
मिथ्या है कर्तृत्व तुम्हारो, दुर्विकल्प निरवारो॥ 1 ॥
ज्ञाता-दृष्टा रूप त्रिकाली, अपनो भाव सम्हारो।
अपना है सर्वस्व स्वयं में, सहज सिद्ध अविकारो ॥ 2 ॥
मिथ्या इष्ट-अनिष्ट कल्पना, राग-द्वेष दुःखकारो।
ये ही नये बन्ध का कारण, परम गुरु उच्चारो ॥ 3 ॥
कर संवर निर्जरा ज्ञानमय, आवागमन विडारो।
ध्रुव और अचल सिद्ध पद पावो, जो है सबसे न्यारो ॥ 4 ॥
स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’