मेरा प्रभु मुझमें ही आज दीखे मुझे।
अब न किंचित् जरूरत जगत की मुझे।।टेक।।
परिणमन होता सब ही स्वतंत्रपने।
मेरा कर्तृत्व किंचित् न दीखे मुझे।। 1।।
स्व की अस्ति में, पर की है नास्ति सदा।
मुझमें पर भाव किंचित् न दीखे मुझे।। 2।।
एक रूप अभेद सु निष्क्रिय अहो।
भेदमात्र नहीं मुझमें दीखे मुझे।। 3।।
कार्य परमात्मा सादि अनंत है।
मेरा कारण प्रभु शाश्वत दीखे मुझे।। 4।।
मोक्ष होना हो तब हो, न दरकार है।
सहज मुक्त स्वभाव सु दीखे मुझे।। 5।।
मेरे ज्ञान में ज्ञान हि ज्ञान अहो।
दूसरा और कुछ भी न दीखे मुझे।। 6।।
तृप्त ही हूँ विकल्प नहीं कुछ रहें।
सहज आनंदमय जीवन दीखे मुझे ।। 7।।
कहाँ की कषायें, कर्म भव गति।
मेरे चिद्रूप में, कुछ न दीखे मुझे ।। 8।।
पारिणामिक परम ध्रुव, सहज शान्त है।
मुझमें उत्पाद-व्यय भी न दीखे मुझे ।। 9।।
महिमा आनन्दमय आदि-अन्त नहीं।
मेरा वैभव खुला आज दीखे मुझे ।। 10।।
स्वांग दीखे नहीं, मोह उपजे नहीं।
मेरा सहज स्वरूप ही दीखे मुझे ।। 11।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह