मत सुनो जगत की चेतन, दे प्रभु वचनों पर ध्यान | mata suno jagata ki chetana de prabhu vachanom para dhyana

मत सुनो जगत की चेतन, दे प्रभु वचनों पर ध्यान।

पर से उपयोग हटाओ, निज में ही निज का ज्ञान ॥
निज में ही निज का दर्शन, निज में ही निज का ज्ञान ।
निज में स्थिरता चारित निज में ही पद निर्वान ॥ १ ॥

सब अपनी-अपनी कहते, खुद मोह वेग में बहते।
नहीं वस्तु स्वभाव पिछाने, आकुलित व्यर्थ ही होते ॥
तू भी ममता में फंसकर, निज लक्ष्य चूक नहिं जाना।
दुर्लभ अवसर पाया है, अब करो भेद विज्ञान ॥ २ ॥

ज्यों वीर न पीछे देखे, आगे ही बढ़ते जाते।
विघ्नों से नहीं डरावे, लालच में भी न फँसते ॥
त्यों पर की ओर न देखो, पापोदय से न डरना।
पुण्योदय के वैभव में, किंचित् भी अटक न जाना ॥ 3 ॥

अत्यन्ताभाव सदा ही पर से नहीं लेना-देना।
नहीं इष्ट-अनिष्ट कभी भी झूठी भ्रान्ति तज देना ॥
निज विकल्प भी दुखदायी समता से ही सुख पाना।
संकल्प-विकल्प नहीं हों, निज में ही दृष्टि लगाना ॥ 4 ॥

कोई नहीं साथी जग में, दुःख में नहीं हाथ बँटावे ।
जिनका आश्रय करके तू निशदिन बहु पाप कमावे ॥
वे सब ही होंगे न्यारे, फल इकले को ही पाना।
अब भी चेतो रे चेतन, नहीं आवे काम बहाना ॥ 5॥

अब व्यर्थ दीनता छोड़ो, अपनी शक्ति पहिचानो।
पर की आशा है झूठी, पुरुषार्थ स्वयं ही ठानो ॥
जिनदेव-शास्त्र-गुरुवर का, श्रद्धान हृदय में लाना।
तत्त्वों का करके निर्णय, फिर करो भेद-विज्ञाना॥ 6 ॥

आत्मानुभूति को पाकर, सम्यक्त्व ज्योति प्रगटाओ।
चिरकाल का मोह अंधेरा, क्षण भर में दूर भगाओ ॥
फिर जग से उदासीन हो, निर्ग्रन्थ दशा प्रगटाना।
सब अन्तर्जल्प मिटाकर, ज्ञायक में ही रम जाना ॥ 7 ॥

उपसर्ग परीषह होवें किंचित् भी नहीं चिगाओ।
हो क्षपक श्रेणी आरोहण, अरहंत दशा तब पायो ॥
जग भर के भावि जीवों को मुक्तिमार्ग दिखाना।
फिर ‘आत्मन्’ होय अयोगी, निर्वाण परम पद पाना ॥ 8 ॥


स्रोत: जिन भक्ति सिंधु
Artist: ब्र. रवीन्द्रजी ‘आत्मन्’