मंगलाष्टक स्तोत्र भाषा (कविवर वृन्दावन) | Mangalashtak Stotra Bhasha (Kavivar Vrindavan)

मंगलाष्टक स्तोत्र भाषा (कविवर वृन्दावन)

संघसहित श्रीकुंदकुंद गुरु, वंदनहेत गये गिरनार।
वाद पर्यो तहं संशयमतिसों, साक्षी वदी अंविकाकार॥
‘सत्य पंथ निरग्रंथ दिगंवर,’ कही सुरी तहँ प्रगट पुकार।
सो गुरु देव वसौ उर मेरे, विघनहरण मंगल करतार॥१॥

स्वामी समंतभद्र मुनिवरसों, शिवकोटी हठ कियो अपार।
वंदन करौ शर्भुपिंडीको, तव गुरु रच्यो स्वयंभू सार॥
वंदन करत पिंडिका फाटी,प्रगट भये जिनचंद्र उदार॥ सो०
श्रीअकलंकदेव मुनिवरसों, वाद रच्यो जहँ वौद्ध विचार।
तारादेवी घट में थापी, पटके ओट करत उच्चार॥

जीत्यो स्यादवादवल मुनिवर,वौद्धवोध तारा-मदटार॥ सो०
श्रीमत विद्यानंदि जवै, श्रीदेवागमथुति सुनी सुधार।
अर्थहेत पहुँच्यो जिनमंदिर, मिल्यो अर्थ तहँ सुखवातार॥
तव व्रत परमदिगम्वरको धर,परमतको कीनो परिहार॥ सो०
श्रीमत मानतुंग मुनिवर पर भूप कोप जव कियो गँवार।
वंद कियो तालों में तवही, भक्तामर गुरु रच्यो उदार॥

चक्रेश्वरी प्रगट तव ह्वै कै, वंधनकाट कियो जयकार॥सो०
श्रीमत वादिराज मुनिवरसों,कह्यो कुष्टि भूपति जिहँ वार।
श्रावक सेठ कह्यो तिह अवसर, मेरे गुरु कंचन तनधार॥
तवही एकोभाव रच्यो गुरु,तन सुवरणदुति भयो अपार॥सो०
श्रीमत कुमुदचन्द्र मुनिवरसों,वाद पर्यो जहँ सभा मझार।
तव ही श्रीकल्यानधाम थुति, श्री गुरु रचना रची अपार॥

तव प्रतिमा श्रीपार्श्वनाथकी,प्रगट भई त्रिभुवन जयकार।सो०
श्रीमत अभयचन्द्र गुरुसों जव दिल्लीपति इमि कही पुकार।
कै तुम मोहि दिखावहु अतिशय कै पकरौ मेरो मत सार॥
तवगुरु प्रगट अलौकिक अतिशय तुरत हर्यो ताको मदभार।
सो गुरु देव वसौ उर मेरे, विघनहरण मंगल करतार॥

दोहा-विघन हरण मंगल करण वांछित फलदातार।
वृन्दावन’ अष्टक रच्यो. करौ कंठ सुखकार॥


Artist: कविवर वृन्दावन
स्रोत: पूजन-पाठ-प्रदीप (सातवां संस्करण, देहली), पृष्ठ ३०७