मङ्गलाचरण (क्रमबद्धपर्याय) | Mangalacharan (Krambaddh paryay)

(दोहा)

क्रमनियमित क्रमबद्ध है, जग की सब पर्याय।
निर्णय हो सर्वज्ञ का, दृष्टि निज में आय ।।

(वीरछन्द)

सकल द्रव्य के गुण अरु पर्यायों को जाने केवलज्ञान ।
मानो उसमें डूब गये हों किन्तु न छूता उन्हें सुजान ।।
जब जिसका जिसमें जिस थल में जिस विधि से होना जो कार्य।
तब उसका उसमें उस थल में उस विधि से होता वह कार्य।। 1 ।।

जन्म-मरण हो या सुख-दुःख हो अथवा हो संयोग-वियोग।
जैसे जाने हैं जिनवर ने वैसे ही सब होने योग्य ।।
कोई न उनका कर्ता-हर्ता उनका होना वस्तु स्वभाव।
ज्ञान-कला में ज्ञेय झलकते किन्तु नहीं उसमें परभाव।। 2 ।।

अतः नहीं मैं पर का कर्ता और न पर में मेरा कार्य।
सहज, स्वयं, निज क्रम से होती है मुझमें मेरी पर्याय ।।
पर्यायों से दृष्टि पलटती भासित हो ज्ञायक भगवान।
वस्तु स्वरूप बताया तुमने शत-शत वन्दन गुरु कहान ।। 3 ।।

रचयिता: पं. श्री अभय जी जैन, देवलाली

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ये मंगलाचरण की रचना किसने की है ?

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