णमोकार का मंत्र शाश्वत इसकी महिमा अपरम्पार ।
पाप ताप संताप क्लेश हरता भवभय नाशक सुखकार ।।
सर्व अमंगल का हर्ता है सर्वश्रेष्ठ है मन्त्र पवित्र ।
पाप पुण्य आस्रव का नाशक संवरमय निर्जरा विचित्र ।।
बन्ध विनाशक मोक्ष प्रकाशक वीतराग पद दाता मित्र ।
श्री पंच परमेष्ठी प्रभु के झलक रहे हैं इसमें चित्र ।।
इसके उच्चारण से होता विषय कषायों का परिहार ।
इसके उच्चारण से होता अन्तर मन निर्मल अविकार ।।
इसके ध्यान मात्र से होता अन्तर द्वन्दों का प्रतिकार ।
इसके ध्यान मात्र से होता बाह्यान्तर आनन्द अपार ।।
णमोकार है मन्त्र श्रेष्ठतम सर्व पाप नाशनहारी ।
सर्व मंगलों में पहला मंगल पढ़ते ही सुखकारी ।।
यह पवित्र अपवित्र दशा सुस्थिति दुस्थिति में हितकारी ।
निमिष मात्र में जपते ही होते विलीन पातकभारी ।।
सर्व विघ्न बाधा नाशक है सर्व संकटों का हर्ता ।
अजर अमर अविकल अविकारी अविनाशी सुख का कर्ता ।।
कर्माष्टक का चक्र मिटाता, मोक्ष लक्ष्मी का दाता ।
धर्मचक्र से सिद्धचक्र पाता जो ओम् नमः ध्याता ।।
ओम् शब्द में गर्भित पाँचों परमेष्ठी निज गुण धारी ।
जो भी ध्याते बन जाते परमात्मा पूर्ण ज्ञानधारी ।।
जय जय जयति पंच परमेष्ठी जय जय णमोकार जिन मंत्र ।
भव बंधन से छुटकारे का यही एक है मंत्र स्वतंत्र ।।
इसकी अनुपम महिमा का शब्दों से कैसे हो वर्णन ।
जो अनुभव करते हैं वे ही पा लेते हैं मुक्ति गगन ।।
अर्घ्य
जल गंधाक्षत पुष्प सुचरु ले दीप धूप फल अर्घ्य धरूँ ।
जिन गृह में जिनराज पंच कल्याणक पाँचों नमन करूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री जिनेन्द्र पंच कल्याणकेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जल गंधाक्षत पुष्प सुचरु ले दीप धूप फल अर्घ्य धरूँ ।
जिन गृह में पाँचों परमेष्ठी के चरणों में नमन करूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री अरहंतादि पंच परमेष्ठिभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
जल गंधाक्षत पुष्प सुचरु ले दीप धूप फल अर्घ्य धरूँ ।
जिन गृह में जिन प्रतिमा सम्मुख सहस्त्रनाम को नमन करूँ ।।
ॐ ह्रीं श्री भगवज्जिन सहस्त्रनामेभ्यो अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा ।
स्वस्ति मंगल
मंगलमय भगवान् वीर प्रभु मंगलमय गौतम गणधर ।
मंगलमय श्री कुन्दकुन्द मुनि मंगल जैन धर्म सुखकर ।।
मंगलमय श्री ऋषभदेवप्रभु मंगलमय श्री अजित जिनेश ।
मंगलमय श्री सम्भव जिनवर, मंगल अभिनन्दन परमेश ।।
मंगलमय श्री सुमति जिनोत्तम मंगल पद्मनाथ सर्वेश ।
मंगलमय सुपार्श्व जिन स्वामी मंगल चन्द्राप्रभु चन्द्रेश ।।
मंगलमय श्री पुष्पदंत प्रभु, मंगल शीतलनाथ सुरेश ।
मंगलमय श्रेयान्सनाथ जिन मंगल वासुपूज्य पूज्येश ।।
मंगलमय श्री विमलनाथ विभु, मंगल अनन्तनाथ महेश ।
मंगलमय श्री धर्मनाथ प्रभु, मंगल शांतिनाथ चक्रेश ।।
मंगलमय श्री कुन्थुनाथ जिन मंगल श्री अरनाथ गुणेश ।
मंगलमय श्री मल्लिनाथ प्रभु मंगल मुनिसुव्रत सत्येश ।।
मंगलमय नमिनाथ जिनेश्वर मंगल नेमिनाथ योगेश ।
मंगलमय श्री पार्श्वनाथ प्रभु, मंगल वर्द्धमान तीर्थेश ।।
मंगलमय अरिहंत महाप्रभु, मंगल सर्व सिद्ध लोकेश ।
मंगलमय आचार्य श्री जय मंगल उपाध्याय ज्ञानेश ।।
मंगलमय श्री सर्वसाधुगण, मंगल जिनवाणी उपदेश ।
मंगलमय सीमन्धर आदिक, विद्यमान जिन बीस परेश ।।
मंगलमय त्रैलोक्य जिनालय, मंगल जिन प्रतिमा भव्येश ।
मंगलमय त्रिकाल चौबीसी, मंगल समवसरण सविशेष ।।
मंगल पंचमेरु जिन मन्दिर, मंगल नन्दीश्वर द्वीपेश ।
मंगल सोलह कारण दशलक्षण, रत्नत्रय व्रत भव्येश ।।
मंगल सहस्त्र कूट चैत्यालय मंगल मान स्तम्भ हमेश ।
मंगलमय केवलि श्रुतकेवलि मंगल ऋद्धिधारि विद्येश ।।
मंगलमय पाँचों कल्याणक, मंगल जिन शासन उद्देश ।
मंगलमय निर्वाण भूमि, मंगलमय अतिशय क्षेत्र विशेष ।।
सर्व सिद्धि मंगल के दाता हरो अमंगल हे विश्वेश ।
जब तक सिद्ध स्वपद ना पाऊँ तब तक पूजूँ हे ब्रह्मेश ।।
स्रोत: करलो जिनवर की पूजन (पंडित सदासुख ग्रन्थमाला, अजमेर), पृष्ठ ३२ से ३४