मन्दिरों को शिक्षा का केन्द्र बनाइए ! | Mandiron Ko Shiksha Ka Kendr Banaie

मन्दिरों को शिक्षा का केन्द्र बनाइए !

-प्रो. वीरसागर जैन

प्रत्येक जैनमन्दिर में जैन-ग्रन्थों के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था अवश्य होना चाहिए। प्राचीन परम्परा भी हमारी ऐसी ही रही है और आधुनिक युग की सख्त आवश्यकता भी ऐसी ही प्रतीत होती है। मुगलकाल में जब लगभग पूरे भारत में शिक्षा का भयंकर विनाश हो गया था, तब भी उत्तरभारत में आगरा, आमेर, सांगानेर आदि अनेक स्थानों पर जैनमन्दिर ही शिक्षा के केन्द्र बने हुये थे और उनमें नित्य विद्वानों द्वारा धर्म, दर्शन, अध्यात्म आदि की महत्त्वपूर्ण शिक्षा प्रदान की जाती थी। वर्तमान में उत्तरभारत में जीवित आगम-ज्ञान का श्रेय वस्तुतः इन्हीं जैनमन्दिरों के शिक्षाकेन्द्रों को जाता है। इन शिक्षाकेन्द्रों को उस समय ‘सैली’ या ‘अध्यातम सैली’ के नाम से जाना जाता था।

जैनधर्म एक ज्ञान-ध्यान-प्रधान धर्म है। उसका दर्शनशास्त्र भी एकदम युक्तिसंगत और वैज्ञानिक है। जैन धर्म के अनुयायियों को तो उसका ज्ञान अवश्य ही होना चाहिए। तथा कार्य तभी संभव है जब मन्दिर में जैनशास्त्रों के अध्ययन-अध्यापन की सुन्दर व्यवस्था हो, वहाँ कोई एक नियमित शास्त्रसभा एवं पाठशाला आदि चलती हो।

अतः जैनमन्दिर के प्रबन्धकों या व्यवस्थापकों से मेरा विनम्र अनुरोध है कि यदि जैनधर्म को जीवित रखना है तो मन्दिर में एक स्वाध्याय-कक्ष की स्थापना अनिवार्यरूप से करनी चाहिए तथा इसमें कोई भी उपलब्ध विद्वान् नियमित रूप से जैनशास्त्रों का अध्यापन कराता रहे- ऐसी भी व्यवस्था अवश्य करनी चाहिए। इसी से हमारा आध्यात्मिक एवं सामाजिक दोनों प्रकार का संरक्षण-संवर्धन संभव होगा, अन्यथा हमारी सर्वप्रकार से महाहानि हो जाएगी।

महाकवि राजा भोज ने ‘भूपाल-जिनचतुर्विंशतिका’ में जिनमन्दिर को ‘वाग्देवी-रति-केतनं’ कहा है, जिसका अर्थ है कि मन्दिर में नित्य ही माँ सरस्वती को क्रीड़ा करते रहना चाहिए। जिस मन्दिर में माँ सरस्वती क्रीड़ा न करे अर्थात् जिसमें जिनवाणी के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था न हो, वह मन्दिर वस्तुतः पूर्ण मन्दिर नहीं माना जा सकता, अपूर्ण मन्दिर ही माना जाएगा। मन्दिर में अनिवार्य रूप से पाई जाने वाली वस्तुओं में जिनप्रतिमा के बाद दूसरे नंबर पर गिनी जानेवाली यदि कोई वस्तु है तो वह शास्त्रसभा ही है।

इसी प्रकार, शास्त्र-सभा के अतिरिक्त यदि सम्भव हो तो एक बालकक्षा/पाठशाला भी मन्दिर में अवश्य चलनी चाहिए। आजकल के बच्चे बड़े ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के होते हैं, उनको किसी अन्धविश्वास में नहीं रखा जा सकता। जैनधर्म बड़ा ही वैज्ञानिक धर्म है, उसका आचार व विचार -दोनों ही आज विज्ञान द्वारा पुष्ट हो रहे हैं। ऐसे में यदि हमारे बच्चे इनको समझ जाएँ तो उनका स्वयं का भी कल्याण होगा और आगे चलकर जब वे समाज व राष्ट्र के कर्णधार बनेंगे तो अन्य भी हजारों-लाखों लोगों का कल्याण करेंगे।

यदि यह कक्षा दैनिक रूप से सम्भव नहीं हो तो साप्ताहिक रूप में ही सही, परन्तु चलनी अवश्य चाहिए। यदि अंग्रेजी माध्यम (English Medium) वाले पब्लिक स्कूलों के बच्चे हों तो उस बाल कक्षा का नाम भी कुछ ऐसा ही रखा जा सकता है। जैसे- Sunday School for Jain Studies. इससे उनमें विशेष आकर्षण उत्पन्न होगा।

जैन बच्चों को तो जैन संस्कृति का ज्ञान अवश्य ही होना चाहिए। अन्यथा आजकल टेलिविजन पर अनेक कार्यक्रमों में ईश्वर को कर्ता-धर्त्ता-हर्त्ता बताया जाता है और रामायण-महाभारत की कथा को विपरीत प्रकार से दिखाया जाता है, उसी पर हमारे ये बच्चे विश्वास कर लेंगे और बाद में इन्हें सत्य का ज्ञान प्रदान करना बहुत कठिन हो जाएगा।

बच्चों में स्मरण करने की भी अद्भुत क्षमता होता है। वे अपनी मानसिक एकाग्रता के कारण किसी भी पाठ, स्तुति या ग्रन्थ को शीघ्र कंठस्थ कर सकते हैं, जो उनके जीवन की एक बड़ी उपलब्धि सिद्ध हो सकती है। उसके माध्यम से वे जगत् में व्याप्त दुर्व्यसनों, अन्धविश्वासों और व्यर्थ के तनावों (Tensions) से अपने को बचाकर रख सकते हैं । अन्यथा आजकल लोगों का तन और मन -दोनों ही उनकी गलत जीवनशैली के कारण एकदम बरबाद हो रहा है। उनका पारिवारिक और सामाजिक जीवन भी बिखरता चला जा रहा है। वातावरण बड़ा विषाक्त है। ऐसे में यदि एक भी बच्चे को हम इन पाठशालाओं के माध्यम से विवेकी और सच्चरित्र बना सकें तो यह केवल उस एक बच्चे का ही महान् उपकार नहीं होगा, अपितु अपने समाज और राष्ट्र की भी महान् सेवा होगी।

इसी प्रकार अन्य भी कुछ उपाय सोचकर हमें जैन मन्दिरों को शिक्षा का केन्द्र बनाना चाहिए, उन्हें केवल पूजा-पाठ आदि का ही स्थान नहीं रहने देना चाहिए । यह बहुत ही आवश्यक कार्य है, समय की प्रबल मांग है। प्राचीन काल में भी जैन मन्दिर शिक्षा के केन्द्र होते थे और उसी से जैन धर्म की रक्षा-सुरक्षा एवं प्रचार-प्रसार आदि महान् कार्य हुए हैं।