अहिंसा के पथ पर, सत्य को पहचान कर,
ब्रह्मचर्य का भाव है, आदिनाथ की राह पर,
उठते हैं ये क़दम सिर्फ जिनधर्म अनुसार अब
जिनवाणी का ज्ञान हो, कुंदकुंद मुनि की राह हो,
समयसार का साथ हो, आत्म स्वरूप मेरे पास हो,
बस यही आधार हो, आत्मा का उद्धार हो,
आत्मा का उद्धार हो,
मानवता का यही हो मर्म—
अहिंसा, संयम और जैन धर्म।
रचनाकार: सार्थक जैन (Sarthak Jain), मथुरा
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