मिला देह मानव का, ये अनमोल रत्न जीवन का,
पल-पल बीत रही ये आयु, न कोई भरोसा क्षण का।
इन आँखों से जो देखा, वह सब झूठा भ्रम है,
मोह-राग अरु द्वेष से बच रे प्राणी, इससे बहती कर्मों की धारा दुखदानी,
सत्य-असत्य के हर दृश्य का, मन पर गहरा वार है।
इन कानों से जो सुना नहीं, जिनवाणी का अमृत ज्ञान है,
कैसे मिटे अज्ञान का तम, कैसे हो आत्म-कल्याण रे।
क्षण-क्षण बीत रहा जीवन, जागो अब हे मानव प्राणी,
भक्ति, संयम, धर्म अपनाओ, सुनो सदा पावन जिनवाणी।
लोभ, मोह और क्रोध त्यागो, करुणा का दीप जलाओ,
मानव जन्म मिला दुर्लभ, इसे सफल बनाओ।
कर्मों का बंधन तोड़ सके, ऐसा शुद्ध आचार करो,
आत्मा के सच्चे स्वरूप को, हर पल हृदय में धारण करो।
मिला देह मानव का, ये अनमोल रत्न जीवन का,
जिनवाणी का सार अपनाकर, सफल करो हर क्षण जीवन का।
जो गया ये अमृतकाल तो फिर कैसे पार पा पायेंगे,
भाओ भावना ऐसी उत्तम हो समाधि गुरु चरणों में,
इन सबका ऐसा फल पाऊँ फिर न लौट इस भव में आऊँ
फिर ज्ञान का दीप जलाकर मैं सिद्ध प्रभु सम बन जाऊँ
रचनाकार: सेजल जैन (Sejal Jain), पिपरिया (म.प्र.)