मन वच तन कर शुद्ध भजो जिन
दाव भला पाया ।
अवसर फेर मिले नहिं ऐसो,
यो सत् गुरु गाया।
बस्यो अनादि निगोद निकसि,
फिर थावर देह धरी।
काल असंख्य अकाज गंवायो,
नेक न समझ परी।।
चिन्तामणि दुर्लभ लहिये,
त्यों त्रस पर्याय लही।
लट पिपील अलि आदि जन्म में,
लहो न ज्ञान कहीं।।
पंचेन्द्रिय पशु भयो कष्ट तें,
तहाँ न बोध लहो।
स्व पर विवेक रहित बिन संयम,
निश दिन भार बहो।।
चौपथ चलत रतन लहिये,
त्यों मनुष देह पाई।
सुकुल जैनवृष सत् संगति ये,
अति दुर्लभ भाई।।
यों दुर्लभ नर देह कुधी जे,
विषय संग खोबें।
ते नर मूढ़ अजान सुधारस,
पाय पाँव धोबै।।
दुर्लभ नरभव पाय सुधी जे,
जैनधर्म सेवें।
‘दौलत’ ते अनंत अविनाशी
शिव सुख को बेवे।।
Artist: Pt. Daulatram ji
स्वर: Suresh joshi