आस्रव (कर्मों के आने) का मूल कारण राग ही है और जिसे वैराग्य (राग का अभाव) होता है उसके संवर होता है इसलिए राग छोड़कर वैराग्य धारणकर। जिसने राग और वैराग्य के इस भेद को, इस तथ्य को नहीं जाना वह अपने इस मनुष्य जन्म में हार गया है अर्थात् उसका यह मनुष्य निरर्थक हो चला है।
दान, पूजा, शील, अप और तप अनेक प्रकार से भावों को सँजोने की क्रियाएँ की जाती हैं। परन्तु मोक्ष का सुख तो राग के बिना ही प्राप्त होता है, राग से तो संसार परिभ्रमण ही होता है।
जिनके राग नहीं रहा, राग चुक गया, उन्होंने क्या किया? इस बात को तू स्पष्टतः देख और समझ ले। ह्यानतराय कहते हैं वह ही तू कर यह ही सारे अनुभवों का सार है।