मन ! मेरे राग भाव निवार | Man ! Mere raag bhaav nivaar

मन ! मेरे राग भाव निवार |
राग चिक्कनतैं लागत है, कर्मधूलि अपार || टेक ||

राग आस्रव मूल है, वैराग्य संवर धार |
जिन न जान्यो भेद यह, वह गया नरभव हार || १ ||

दान पूजा शील जप तप, भाव विविध प्रकार |
राग बिन शिव सुख करत है, राग तैं संसार || २ ||

वीतराग कहा कियो, यह बात प्रगट निहार |
सोई कर सुख हेत ‘द्यानत’ शुद्ध अनुभव सार || ३ ||

Artist- पं. द्यानतराय जी

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अर्थ

आस्रव (कर्मों के आने) का मूल कारण राग ही है और जिसे वैराग्य (राग का अभाव) होता है उसके संवर होता है इसलिए राग छोड़कर वैराग्य धारणकर। जिसने राग और वैराग्य के इस भेद को, इस तथ्य को नहीं जाना वह अपने इस मनुष्य जन्म में हार गया है अर्थात् उसका यह मनुष्य निरर्थक हो चला है।

दान, पूजा, शील, अप और तप अनेक प्रकार से भावों को सँजोने की क्रियाएँ की जाती हैं। परन्तु मोक्ष का सुख तो राग के बिना ही प्राप्त होता है, राग से तो संसार परिभ्रमण ही होता है।

जिनके राग नहीं रहा, राग चुक गया, उन्होंने क्या किया? इस बात को तू स्पष्टतः देख और समझ ले। ह्यानतराय कहते हैं वह ही तू कर यह ही सारे अनुभवों का सार है।

स्रोत: द्यानत भजन सौरभ।

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