मैं भगवत, मैं भगवत, मैं भगवत!
भव भव में थका हूँ भटक-भटक,
मन में पड़ गयी है एक खटक।
चिर से निकली अब चीख चटक,
चहुँ-गतियों बीच घूम रहा ये पर्यटक।
अब नहीं -
गर्भाशय में उलट लटक,
नरकों में पड़े पटक-पटक,
देविंद्र संयम झटक-झटक,
पशुयोनी भार ढोये लटक,
चिर से निकली अब चीख चटक
चहुँ गतियों बीच घूम रहा ये पर्यटक।
बस कर दूँ अब ये उठक-पटक ,
निज स्वरूप में जाऊँ रमत,
तिर जाऊँ इस भव से परगत,
तिष्ठ हो स्वयं में करूँ स्वागत।
कुन्दकुन्द पिला गए हैं अमृत
आतमरस विभोर समय प्राभृत
मैं परभाव नहीं हूँ समझत
परिणमनशील नहीं मैं अवगत।
हो गया प्रति क्षण मैं जाग्रत,
नक्की, निर्णय, अनुभव में अब बस -
मैं भगवत, मैं भगवत, मैं भगवत!
AJ
रचनाकार: रेशु जैन (Reshu Jain), नवी मुंबई
Instagram: @ReshuJain29