महावीराष्टक पद्यानुवाद | Mahavirashtak padyanuvad

उत्पाद व्यय अरु ध्रौव्य युत् सब ही झलकते ज्ञान में ।
जीव और अजीव युगपत् जैसे झलकत काँच में ।।
सूर्य सम ही मार्ग दर्शक मुक्ति के प्रभु आप हो ।
हे वीर ! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ।।

नेत्र रूपी कमल युगलम् स्पंद लालिमा रहित ।
नष्ट करते अंतरंग व बाह्य क्रोध सर्व के ।।
आपकी स्पष्ट मुद्रा मल रहित व शांत है ।
हे वीर ! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ।।

इंद्र के प्रभु मुकुट मणि की कांति से शोभित चरण ।
स्मरण बस से नष्ट कर दें सभी दुःख संसारी के ।।
ऐसा लगता जैसे पानी शमन करता अग्नि को ।
हे वीर ! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ।।

स्वर्ग की सब संपदा अर गुण सहित सब सुख भी ।
मात्र पूजन भाव से ही प्राप्त की दर्दुर ने भी ।।
तो कौनसा आश्चर्य यदि सदभक्त मुक्ति को लहें ?
हे वीर! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ।।

हे ज्ञानमेव ! तपित स्वर्ण समान देह विमुक्त हो ।
विविध किंतु एक प्रभु , सिद्धार्थ पुत्र अजन्म हो ।।
लक्ष्मी सहित रु राग रहित अनुपम गति को प्राप्त हो ।
हे वीर ! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ।।

तुम ज्ञान की गंगा प्रभु , नय रूप लहरों से विमल ।
ज्ञान रूप समुद्र जल में स्नान करते ज्ञानी जन ।।
ज्ञानी हंस तो आज भी परिचित तुम्हारे ज्ञान से ।
हे वीर! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ॥

अनिर्वार उद्वेग जिसका, जीता जिसने लोक को ।
युवा ही में आत्मबल से किया पराजित काम को ।।
पा गए अनंत सुख अर प्रशम पद के राज्य को ।
हे वीर! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ॥

महा मोह रोग प्रशमन हेतु तुम ही वैद्य हो ।
हो महामंगल ! निरापेक्षी ! यश जगत् में ख्यात है ।।
उत्तम गुणों से युक्त तुम; भवभीरु साधु को शरण ।
हे वीर! मेरे नयन पथ पर आके मुझको दर्श दो ॥

भागचंद द्वारा रचित महावीराष्टक स्तोत्र को ।
पढ़े सुने वह शीघ्र ही मोक्ष सुख को प्राप्त हो ।।

रचनाकार: चिद्रूप जैन (Chidrup Jain), कोटा
Instagram: @Chidrup.j