महावीर निर्वाण पूजन | Mahavir Nirvan Pujan

स्थापना (दोहा)
महावीर भगवान को, मन मंदिर में धार।
कर नमोऽस्तु निर्वाण का, कर लें हम त्यौहार॥
(शंभु)
हे वीर ! तुम्हें जब मोक्ष हुआ तब, पर्व किया था देवों ने।
जब पता चला इस जग को तो, त्यौहार मनाया भक्तों ने॥
हम उसमें शामिल हो न सके, सो यथाशक्ति से आज सजें।
हे वीर ! हमारे हृदय वसो, हम महावीर निर्वाण भजें॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्र अत्र अवतर अवतर…।
अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः… । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्… । (पुष्पांजलिं…)
जग जन्म-मृत्यु में उलझा है, पर आप जगत के पार गए।
हे मृत्युंजय ! जाते-जाते, दे दीवाली त्यौहार गए॥
हम ऋणी रहेंगे जन्मों तक, पर जल तो आज चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे ॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु
विनाशनाय जलं…।
खुद ‘जियो और जीने दो’ यह, सिद्धांत तुम्हारा प्रचलित है।
सिद्धांत भुलाकर यह दुनियाँ, नित राग-द्वेष कर विचलित है।
हम चलें आपके चिह्नों पर, सो चंदन आज चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे ॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय संतारताप-विनाशनाय
चंदनं…।
क्यों नाथ ! हमें तुम छोड़ गए, क्यों सिद्ध हुए शुद्धातम के।
क्यों आकुल-व्याकुल हम भटकें, हम यही समझने आ धमके॥
हमको भी वीर बना लेना, ये अक्षत आज चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे ॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये
अक्षतान्… ।
ज्यों मोक्ष गए तो तुम अपना, चैतन्य बाग महका डाले।
हम सूख रहे काँटों जैसे, क्यों हमको नाथ! भुला डाले॥
चंदनवाला सम खिलने को, पुष्पों को आज चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय
पुष्पाणि…।
ज्यों आत्मप्रदेश विशुद्ध किए, त्यों ठोस ज्ञानघन रूप हुए।
सो मीठे लाडू चढ़ा-चढ़ा, निर्वाण महोत्सव खूब हुए॥
नैवेद्य धर्म का चखने को, यह लाडू आज चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर- जिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय
नैवेद्यं…।
तुम कार्तिक घोर अमावस में, सिद्धों की नगरी खोज लिए।
सो पर्व दिवाली मना-मना, हम दीप जलाना सीख लिए॥
हों नगर-नगर घर-घर उत्सव, ये ज्योति से ज्योति जलाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे ॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय मोहान्धकार-विनाशनाय
दीपं…।
हे सन्मति तेरे संदेशे, बस पन्नों पर छप जाते हैं।
दीवालों पर लिख जाते हैं, दीवाली पर पुत जाते हैं।
अब कहो विश्व का क्या होगा, पर हम तो धूप चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय
धूपं…।
है स्वार्थ बड़ा मजबूत यहाँ, जो सबको बाँधे रखता है।
सो वर्तमान को वर्धमान की, फिर से आवश्यकता है॥
सिद्धांत आपके अपनाने, प्रासुक फल आज चढ़ाएंगे।
हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे॥
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं…।
हे वीर प्रभु ! तुम बच निकले, सो मना रहे हम दीवाली।
वरना अस्तित्व हमारा क्या, आते खाली जाते खाली॥

पर मिला वीरशासन हमको, सो सादर अर्घ्य चढ़ाएंगे।

हम करके नमोऽस्तु वीरा को, दीवाली पर्व मनाएंगे।
ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अनर्घपद-प्राप्तये

अर्घ्यं…।

पंचकल्याणक अर्घ्य (दोहा)

षष्ठी शुक्ल अषाढ़ को, तज अच्युत सुर धाम।
माँ त्रिशला के गर्भ में, आए वीर महान्॥

ॐ ह्रीं आषाढ़शुक्लषष्ठ्यां गर्भमङ्गलमण्डिताय श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अर्घ्य…।

तेरस शुक्ला चैत्र को, वर्धमान लें जन्म।
सिद्धारथ घर आँगने, सुर-नर हुए प्रसन्न॥

ॐ ह्रीं चैत्रशुक्लत्रयोदश्यां जन्ममङ्गलमण्डिताय श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अर्घ्य…।

अगहन दसवीं कृष्ण को, सन्मति तज संसार ।
बने दिगम्बर सो करें, नमोऽस्तु बारम्बार॥

ॐ ह्रीं मगशिरकृष्णदशम्यां तपमङ्गलमण्डिताय श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अर्घ्य…।

दसें शुक्ल वैशाख को, पाया केवलज्ञान।
शासननायक बन पुजे, महावीर भगवान्॥

ॐ ह्रीं वैशाखशुक्लदशम्यां ज्ञानमङ्गलमण्डिताय श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अर्घ्यं…।

कार्तिक कृष्ण अमास को, मोक्ष गए अतिवीर।
दीवाली त्यौहार हो, पावापुर के तीर॥
ॐ ह्रीं कार्तिककृष्ण-अमावस्यायां मोक्षमङ्गलमण्डिताय श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय

अर्घ्य…।

जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अईं श्री महावीर जिनेन्द्राय नमो नमः ।

जयमाला

दोहा

उत्तम मंगलशरण हैं, णमोकार ओंकार ।

शासननायक वीर को, नमोऽस्तु बारम्बर॥

(ज्ञानोदय)
जय हो ! जय हो ! शासन नायक, महावीर भगवान की।
जय हो ! जय हो ! वर्धमान के, दीवाली निर्वाण की॥
दीवाली त्यौहार कथा की, अपनी-अपनी श्रद्धाएँ।
आओ जानें समझें क्या हैं, कैसी प्रचलित निष्ठाएँ॥१॥

हिन्दु कहते आज राम जी, लंका जय कर लौटे थे।
नरकासुर को मार श्याम जी, सिंहासन पर बैठे थे॥
दुर्गाजी अपने पति के घर, आज लौट कर आई थीं।
समुद्रमंथन में लक्ष्मी जी, आज प्रकट हो आई थीं॥२॥

सिक्ख गुरु गोविंदसिंह जी, आज मुक्त हो तन छोड़े।
रामकृष्ण जी परमहंस ने, दयानन्द ने तन छोड़े॥
हुई बोधि की प्राप्ति बुद्ध को, रामतीर्थ भी मुक्त हुए।
आद्य शंकराचार्य गुरु जी, मृत्यु शैय्या युक्त हुए॥३॥

किसकी कैसी आस्था हमने, थोड़ी सी कुछ बतलायी।
दीवाली क्यों जैन मनाते, जो तीर्थंकर अनुयायी॥
चौबीसी अंतिम तीर्थंकर, महावीर को आज सुबह ।
मोक्ष हुआ निर्वाण गए सो, लाडू चढ़ते जगह-जगह॥४॥

संध्या को अनुबद्ध रूप में, प्रथम शिष्य गौतम गणधर ।
बने केवली अतः दिवाली, भक्त मनाते हैं घर-घर॥
सोलह दीपक चौंषठ ज्योति, जला रोशनी करते हैं।
ज्ञानलक्ष्मी मोक्षलक्ष्मी, पूजा खोजा करते हैं॥५॥

घर आँगन को रोशन करने, दीप जलाते शहर नगर।
आतम घट को रोशन करने, प्रेम बाँटते घर-बाहर॥
तब रत्नत्रय रूपा लक्ष्मी, होती शीघ्र प्रसन्न अहो।
दीवाली पावापुर जैसी, स्वयं मनाकर धन्य रहो॥६॥

महावीर गौतम के जैसे, हम अपना उद्धार करें।
अतः पंचमेवा सेवा कर, दीवाली त्यौहार करें ॥
विश्व एक परिवार बनाने, ‘सुव्रत’ ज्योति जलाओ रे।
जलने के पहले जलने से, बचकर पर्व मनाओ रे॥७॥

ॐ ह्रीं निर्वाण महोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अनर्घपद-प्राप्तये
जयमाला पूर्णार्घ्य…।

दोहा

दीवाली के प्रभु करें, विश्वशान्ति कल्याण।

प्रासुक जल की धार दे, हम पूजत भगवान्॥

(शान्तये शान्तिधारा)
कल्पवृक्ष के पुष्प सम, पुष्पांजलि पद लाए।
भव दुःखों को मेंट दो, महावीर जिनराय॥
(पुष्पांजलिं…)


Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)