स्थापना (दोहा)
महावीर का जन्मदिन, वीर जयंती पर्व।
झूम-झूम हम पूज लें, करके नमोऽस्तु सर्व॥
(शंभु)
जय महावीर ! जय महावीर !, जय महावीर ! शासन स्वामी ।
सिद्धार्थ राज माँ त्रिशला के, सुत महावीर अंतर्यामी॥
जब जन्म लिए कुण्डलपुर में, तो तीन लोक में क्षणिक खुशी ।
सुर इन्द्र जन्म उत्सव करते, हम करें अर्चना हँसी खुशी॥
दोहा
प्राप्त जन्म कल्याण कर, बने वीर जिनराज ।
हृदय कमल आसीन कर, हम भी पूजें आज॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्र अत्र अत्र अवतर…। अत्र
तिष्ठ तिष्ठ… । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट्… । (पुष्पांजलिं…)
(हरीगीतिका)
हम जन्म का उत्सव मनाएँ, मृत्यु का दुख भूल के।
जब मृत्यु आती है निकट तो, शीघ्र सुध-बुध भूलते॥
अतिवीर सम कर जन्म सार्थक, भय मरण का जीत लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय जन्म-जरा-मृत्यु-विनाशनाय
जलं…।
संसार का जो ताप जीते, प्राणियों को छाँव दे।
सचमुच वही हैं वीर जग में, मुक्ति का जो गाँव दे॥
चैतन्य चंदन सा महकने, दें अभय दिल जीत लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय संसारताप-विनाशनाय
चंदनं…।
कोई सिकन्दर हो भले पर, साथ क्या ले जाएगा।
आया दिगम्बर हो दिगम्बर, राख वह हो जाएगा॥
निधि वीर सम अक्षय मिले सो, धर दिगम्बर रूप लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अक्षयपद-प्राप्तये अक्षतान्… ।
विद्वेष के कंटक हटा के, प्रेम का सिंचन करें।
परिवार यह दुनियाँ लगेगी, आत्म का चिन्तन करें॥
चारित्र का उपवन खिला के, वीर सम निज गंध लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय कामबाण-विध्वंसनाय
पुष्पाणि…।
कर निरन्तर भोज्य हम तो, आज तक भूखे रहे।
तन पुष्ट तो होता गया पर, तत्त्व से सूखे रहे॥
हो वीर सम आतम रसीली, स्वानुभव का सौख्य लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय क्षुधारोग-विनाशनाय
नैवेद्यं…।
यह वीरशासन की दिवाली, है दशहरा ज्ञान का।
फिर क्यों अँधेरे में भटकते, नाश कर अज्ञान का॥
सो वीर सम चेतन करें हम, आरती का दीप लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय मोहान्धकार-
विनाशनाय दीपं…।
जो जीतता संसार को वह, सैन्य योद्धा वीर है।
जो जीतता साधक स्वयं को, सच! वही महावीर है॥
हम वीर बन महावीर बनने, कर्महारी धूप लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय अष्टकर्म-दहनाय धूपं…।
प्रभु वीर साक्षात् ना मिले, इसका हमें तो गम रहा।
पर वीरशासन मिल गया यह, पुण्य फल क्या कम रहा॥
इस पुण्य का करके वपन, अरिहंत फल का बीज लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर-जिनेन्द्राय मोक्षफल-प्राप्तये फलं…।
प्रभु छोड़ हमको मोक्ष पहुँचे, याद में हम रो रहे।
प्रभु के बिना यह भार जीवन, व्यर्थ में हम ढो रहे॥
प्रभु थाम लो अब डोर अपनी, हम पुकारें अर्घ्य लें।
प्रभु वीर को करके नमोऽस्तु, हम जयंती पूज लें॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्रीमहावीर-जिनेन्द्राय अनर्घपद-प्राप्तये अर्घ्य… ।
जाप्यमंत्र-ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं अईं श्री महावीर जिनेन्द्राय नमो नमः ।
जयमाला (दोहा)
वीर जयन्ती पर्व का, कर लें हम त्यौहार ।
वीर भक्त बनने करें, नमोऽस्तु बारम्बार॥
जोगीरासा
जय हो ! जय हो ! वर्तमान के, वर्धमान जिन स्वामी।
महावीर जिनशासन नायक, प्रभु जी अंतर्यामी॥
पार्श्वनाथ जब मोक्ष गए तब, फैला पाप अंधेरा।
त्राहि ! त्राहि ! दुनियाँ में फैली, दिखता नहीं सबेरा॥१॥
तब श्रेष्ठी कुण्डलपुर वासी, श्री सिद्धार्थ नरेशा।
धार्मिक रानी त्रिशला देवी, देखी स्वप्न विशेषा॥
सोलह सपनों के फल जाने, रत्नों की हुई वर्षा।
महावीर का जन्म हुआ फिर, सकल विश्व यह हर्षा॥२॥
चैत्र शुक्ल की त्रयोदशी थी, कंचन जैसी काया।
शचि इन्द्राणी ने माता को, मूर्च्छा नींद सुलाया।
मायामयी एक बालक को, जल्दी वहीं सुलाया।
बालवीर को उठा गोद में, सम्यग्दर्शन पाया॥३॥
बाहर ला सौधर्म इन्द्र को, बाल वीर को सौंपा।
लेकर के सौधर्म इन्द्र फिर, सुमेरु गिरि पर पहुँचा॥
पाण्डुक तल पर शासित करके, क्षीर सिन्धु के जल से।
ढारे एक हजार आठ शुभ, बड़े-बड़े ले कलशे॥४॥
तब सौधर्म इन्द्र शंकित हो, सोच रहे कुछ ऐसे।
इतने सारे कलशों का जल, वीर सहेगा कैसे॥
बालवीर ने अवधि ज्ञान से, इसको जाना जैसे।
तनिक अँगूठा दवा दिया तो, हिला सुमेरु वैसे॥५॥
समझ गया सौधर्म इन्द्र सब, फिर अभिषेक करा के।
वीर नाम रख ताण्डव नाँचे, बाद नगर में आ के ॥
इस विध चौदह कोटि रत्न की, प्रतिदिन वर्षा होती।
पन्द्रह माहों तक भक्तों में, दुख दरिद्र सब खोती॥६॥
पर्व जन्म कल्याणक करके, सुर स्वर्गों को जाते।
भक्त मना के वीर जयंती, अपना भाग्य जगाते॥
बदले में बस यही चाहते, बनें जन्म कल्याणी।
बार-बार ना गर्भ जन्म हों, हों कल्याणक स्वामी॥७॥
माँ को अब ना अधिक रुलाएँ, हम ना आँसु बहाएँ।
धर्म अहिंसा परमो धर्मः, सूत्र वीर के गाएँ॥
जियो और जीने दो सबको, दें धार्मिक संदेशा।
‘सुव्रत’ जीवन सार्थक करने, नमोऽस्तु करें हमेशा॥
सोरठा
पर्व जन्म कल्याण, वीर जयन्ती गाइए।
करके नम्र प्रणाम, सार्थक जन्म बनाइए॥
ॐ ह्रीं जन्ममहोत्सव मण्डित श्री महावीर जिनेन्द्राय अनर्घपद-प्राप्तये
जयमाला पूर्णार्घ्य… ।
दोहा
महावीर स्वामी करें, विश्वशान्ति कल्याण।
प्रासुक जल की धार दे, हम पूजें भगवान्॥
(शान्तये शान्तिधारा)
कल्पवृक्ष के पुष्प सम, पुष्पांजलि पद लाए।
भव दुःखों को मेंट दो, महावीर जिनराय॥
(पुष्पांजलिं…)
Artist: मुनि श्री सुव्रतसागर जी महाराज
स्रोत: श्री जिनवाणी (पूजन-पाठ संग्रह)