तर्ज : नसे घातिया कर्म अर्हन्त देवा…
महावीर ने हमको संदेश दीना,
करो कार्य अब तक न जो तुमने कीना ।। टेक ।।
अनादि से बहु योनियों में गये तुम,
असहनीय पीड़ा नरक में उठाई ।
पशुगति पराधीन छेदन अरु भेदन,
क्षुधा बहु तृषा शीत गर्मी भी पाई।।
लगे चार संज्ञा में ना बोध कीना,
करो कार्य अब तक न जो तुमने कीना।।1।।
कभी पुण्य करके गति देव में जा,
विषय भोग में मग्न हो सुधि सिराई।
नरगति भी पाकर के मूरख बना यों,
नहीं की धर्म रूप धन की कमाई।।
अतीन्द्रिय को त्याग विषय सुख ही लीना,
करो कार्य अब तक न जो तुमने कीना।।2।।
पुद्गल को निज रूप स्वीकार करके,
तन-धन की चिन्ता तो दिन-रात कीनी।
पाषाण खण्डों को ही रत्न जाना,
तृष्णा उन्हीं की बढ़ी थी नवीनी।।
स्व-पर भेद-विज्ञान अब तक न कीना,
करो कार्य अब तक न जो तुमने कीना।।3।।
आश्रव के कारण शुभाशुभ विकारी,
भावों में मस्त रहे तुम तो अब तक।
अटक करके साता की अनुकूलता में,
निज भाव धारा नहीं तुमने अब तक।।
संसार-वृद्धि में रहे तुम प्रवीना,
करो कार्य अब तक न जो तुमने कीना।।4।।
जिनवाणी सुनना, पढ़ना, सुमिरना,
तत्त्वों का सम्यक् श्रद्धान करना।
वैराग्य भावना प्रतिक्षण भाकर,
मुनिव्रत धरना निज में ही रहना।।
भव ना धरो पाओ शिवपद नवीना,
करो कार्य अब तक न जो तुमने कीना।।5।।
Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह
खोज: Mahavir Sandesh