महावीर जयन्ती संदेश | Mahaveer Jayanti Sandesh

तभी वीर की है जयन्ती मनाना,
उन सम ही प्रभु हम निज को बनाएँ।
महावीर तो मोक्ष में जा पधारे,
उन जैसा निश्चिंत जीवन बनाएँ।। 1।।

वे भी रुले चार गतियों में हमसे,
नहीं आदि प्रभु का भी उपदेश माना।
मतान्तर चलाये भ्रमे चार गति में,
पुनः सिंह हो भी निजात्मा पिछाना।।2।।

तत्क्षण हुए वे अणुव्रत के धारी,
किया कुछ न संक्लेश परिणाम दुखमय।
विशुद्ध भाव से प्राण छोड़े उन्होंने,
अतः देव होकर मनुज योनि पायी।।3।।

इसी भाँति करते रहे साधना वे,
दर्शन विशुद्धयादि भावना भायी।
जगत् को न देखा, स्वयं को सुधारा,
भव दसवें तीर्थंकर पदवी पायी ।। 4।।

रत्नत्रय पथ पर चले वे तो अविचल,
न परवाह कीनी सुखों अरु दुःखों की।
तभी पूर्ण ज्ञानी सुखी वीतरागी,
हुई दिव्यध्वनि जो निधि है हितों की ।। 5 ।।

न वाणी को माने, न आत्मा पिछाने,
दया उर न धारे, परिग्रह से लागे।
सुने शास्त्र किंचित् वहीं छोड़ देवे,
अभिमान धारे, अमल में न लावे ।। 6।।

अन्याय करते, सदा द्वेष धरते,
अभक्ष्यों के भक्षण से किंचित् न डरते ।
अरे! सोचो भाई, कहा क्या प्रभु ने,
जय मात्र बोले या निजात्मा सुधारें ।। 7 ।।

अरे मित्र ! अच्छी हो कितनी ही औषधि,
सेवन बिना ज्यों नहीं रोग जाता।
इसी भाँति वाणी प्रभु वीर की भी,
माने से तत्क्षण सभी दुःख भगाता ।। 8 ।।

परन्तु दिखावा से कुछ भी न होगा,
दुर्गति ही होगी, न शान्ति मिलेगी।
यदि शान्ति चाहो, अरे भ्रात सच्ची,
तो स्वाध्याय से तृप्ति निश्चित मिलेगी ।।9।।

अतः मात्र कर्तव्य है हम सभी का,
जय ही न बोलें, वाणी भी मानें।
दृष्टि करें हम निजात्मा में प्रभु सम,
महावीर को हम निजात्मा में पा लें।।10।।


Artist: ब्र. रवीन्द्र जी ‘आत्मन्’
स्रोत: सहज पाठ संग्रह

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