महाकवि कालिदास का भाषा-दर्शन | Mahakavi Kalidas Ka Bhasha Darshan

महाकवि कालिदास का भाषा-दर्शन

-प्रो. वीरसागर जैन

भाषा-समस्या भी आधुनिक युग की एक ज्वलन्त समस्या है। न केवल आधुनिक युग की, लगता है, सदा की ही एक महती समस्या रही है। साधारण जनता ही नहीं, बड़े-बड़े विद्वान् भी इस समस्या पर आक्रामक मुद्रा धारण करते रहे हैं। अनेक विद्वानों ने तो आवेग में आकर विद्वज्जनोचित सीमा का उल्लंघन तक किया है। एक भाषा के पक्ष-व्यामोह में अन्य भाषा को भ्रष्ट, पतित, मिथ्या और उसके प्रयोक्ताओं को भी भ्रष्ट, बहिष्कृत और मिथ्यावादी कह कर माँ सरस्वती के भवन में बहुत मलिनता फैलाई है। वे भूल गये कि भाषा तो माध्यम मात्र होती है, महत्त्वपूर्ण तो उसके द्वारा प्रतिपादित भाव होते हैं। भावों के ही कारण कोई रचना (कृति) उपादेय और कोई हेय (त्याज्य) होती है। मात्र किसी भाषाविशेष में लिखे जाने के कारण नहीं। भाषा तो सभी सरस्वती-स्वरूप हैं- “सर्वभाषा सरस्वती” (-कातन्त्ररूपमाला, स्वरांत पुल्लिंग, मंगलाचरण )।

बहरहाल, महाकवि कालिदास का भाषा-दर्शन इस विषय में हम सभी का महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन कर सकता है, बशर्ते हम उस पर निष्पक्ष होकर गहराई से ध्यान दें ।

महाकवि कालिदास का समग्र भाषा-दर्शन एक स्वतंत्र शोध-प्रबन्ध की अपेक्षा रखता है, किन्तु उसका एक बिन्दु या आयाम, जिसका हमने ऊपर संकेत किया है, यहाँ उद्घाटित करना चाहते हैं और वह भी उनके ‘कुमारसम्भव’ नामक महाकाव्य के निम्नलिखित श्लोक के सन्दर्भ में-

“द्विधा प्रयुक्तेन च वाङ्मयेन,
सरस्वती तन्मिथुनं नुनाव ।
संस्कारपूतेन वरं वरेण्यं
वधू सुखग्राह्यनिबन्धनेन।।”

  • कुमारसम्भव 7/90

प्रसंग यह है कि शिव-पार्वती का विवाह हो रहा है और समस्या है कि इनके विवाह में मङ्गलाचरण कौन पढ़े ? अतः स्वयं सरस्वती माता इसके लिए उपस्थित होती है । सरस्वती माता ने वर-वधू को विवाह का आशीर्वाद देने के लिए द्विधात्मक भाषाप्रयोग से मंगल-पाठ किया, वर के लिए संस्कारित भाषा संस्कृत में और वधू के लिए सुखद भाषा प्राकृत में।

इस प्रकार यहाँ स्वयं सरस्वती माँ के मुख में संस्कृत और प्राकृत दोनों भाषाओं को डालकर महाकवि कालिदास ने न केवल अपना भाषादर्शन स्पष्ट किया है, अपितु विश्व के भाषा-दर्शन को एक क्रान्तिकारी निर्देश भी दे दिया है। अथवा कहिए कि भाषा के प्रश्न पर युद्धोत्सुक मानवों को शान्ति-सुधा का ही पान करा दिया है।

महाकवि कालिदास ने अपने सम्पूर्ण नाट्य-साहित्य में भी संस्कृत-प्राकृत से मिश्रित इसी मणिप्रवाल शैली का आश्रय लिया है जो उनके एतद्विषयक चिन्तन की स्पष्टता और दृढ़ता सिद्ध करता है। महाकवि कालिदास के हृदय में दोनों ही भाषाओं के प्रति असीम अनुराग था और किसी के भी प्रति किंचित् भी तुच्छता, लघुता या अवहेलना की भावना नहीं थी।

महाकवि कालिदास ही क्या, वस्तुतः सभी तत्त्वदर्शी महात्मा भाषिक दुराग्रह से बहुत ऊपर उठ जाते हैं, उनकी दृष्टि में सभी भाषाएँ सरस्वतीस्वरूपा एवं परम पूजनीया होती हैं, जैसा कि श्री शंकराचार्यजी ने भी स्पष्ट लिखा है-

“सम्पूर्ण जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमाः ।
गाङ्गं वारि समस्तवारिनिवहः पुण्याः समस्ताः क्रियाः ।।
वाचः प्राकृतसंस्कृतश्रुतिशिरोः वाराणसी मेदिनी ।
सर्वावस्थितिरस्य वस्तुविषये दृष्टे परमब्रह्मणि।।” - ध्वन्याष्टक, 10

भावार्थ- परमब्रह्मतत्त्व के दर्शी पुरुषों की स्थिति ऐसी हो जाती है कि वे सम्पूर्ण जगत् को नन्दन वन, सभी वृक्षों को कल्पवृक्ष, समस्त जलराशि को गङ्गाजल, समस्त क्रियाओं को पुण्यरूप, प्राकृत-संस्कृतादि सभी भाषाओं को श्रुति-हेतु शिरोधार्य और सम्पूर्ण पृथ्वी को वाराणसी के रूप में देखते-मानते हैं।

इसी प्रकार के विचार अन्य भी अनेकानेक तत्त्वज्ञों ने अभिव्यक्त किये हैं । उनके अनुसार गाय काली हो या गोरी, दूध सभी का श्वेत, मधुर और पुष्टिकारक होता है, उसमें प्रतिपादित सत्य निर्मल, हितकर और परम उपादेय होता है।