लोकोऽयं नाट्यशाला | Lokoyam Natyashala

लोकोऽयं नाट्यशाला

-प्रो. वीरसागर जैन

अध्यात्मविद्या क्या होती है -इसे सरलता से समझना हो तो नाटक का उदाहरण बहुत ही अच्छा है, श्रेष्ठ या सर्वोत्तम भी कह सकते हैं | अनेकानेक आचार्यों ने इसी के माध्यम से आध्यात्मिक जीवों का व्यक्तित्व एवं संसार का स्वरूप बताकर अध्यात्मविद्या का गहरा ज्ञान दिया है | अध्यात्मविद्या के शिखर-ग्रन्थ समयसार को तो उसके नाम में ही ‘नाटक’ लगाकर सम्बोधित किया है- ‘समयसार नाटक’ | उसके अतिरिक्त अन्य भी अनेक ग्रंथ ‘नाटक’ शीर्षक से उपलब्ध होते हैं ।

नाटक के दृष्टान्त द्वारा आचार्यों ने बहुत गहरी बातें समझाने की कोशिश की है | अध्यात्मविद्या का ज्ञाता पुरुष इस दुनिया को नाट्यशाला अथवा नाटक का एक बड़ा रंगमंच समझकर हर्ष-विषाद से परे रहता है | उसे कहीं भी आसक्ति नहीं होती है | वह सदैव अपने मूल स्वरूप में जीता हुआ आनन्द का अमृत पीता रहता है |

दुनिया को नाटक बतानेवाले कथनों में से एक निम्नलिखित श्लोक विशेष ध्यान देने योग्य है, जिसमें नाटक का पूरा ही सांगरूपक घटित करने का प्रयास किया है | यथा-

लोकोऽयं नाट्यशाला, रचितसुरचना प्रेक्षको विश्वनाथो ।

जीवोऽयं नृत्यकारी, विविधतनुधरो नाटकाचार्य कर्म ।।

तस्माद् रक्तं च पीतं, हरित सुधवलो कृष्णमेवात्र वर्ण ।

धृत्वा स्थूलं च सूक्ष्मं, नटति सुनटवन्नीचकोच्चैः कुलेषु ॥

-आचार्य सोमसेन, त्रैवर्णिकाचार, 57

अर्थ- यह दुनिया एक नाट्यशाला है | इसकी रचना अकृत्रिम (लोगो अक्किट्टमो खलु), अद्भुत एवं सौन्दर्ययुक्त है । विश्वनाथ- सर्वज्ञ इसके प्रेक्षक हैं, ज्ञाता-दृष्टा भाव से देखनेवाले हैं, जीवात्मा नृत्यकर्ता है, अनेक प्रकार के शरीर धारण करा कर नाना भूमिकाएँ निभाने वाला पाप-पुण्य कर्म नाटकाचार्य (डायरेक्टर) है । इस नाट्यभूमि में अभिनय करनेवालों का लाल, पीला, हरित, श्वेत (गोरा) और कृष्ण वर्ण है । इन वर्णों को स्थूल तथा सूक्ष्म रूप में नीच और उच्च कुलों में शरीर धारण करके (सामान्य और विशेष पात्र बनकर) यह जीव नट के समान 84 लाख योनियों में अनेक रूप लेकर जन्म-मरण के चक्कर लगाता हुआ नाच रहा है । ठीक ही है, जो नट का तमाशा करता है वह बहुत वेश धारण करता ही है ।

समयसार के टीकाकार आचार्य अमृतचन्द्र का भी निम्नलिखित श्लोक पठनीय है-

अस्मिन्ननादिनि महत्यविवेकनाट्ये,

वर्णादिमान्नटति पुद्गल एव नान्यः |

रागादिपुद्‌गलविकारविरुद्धशुद्ध-

चैतन्य धातुमयमूर्तिरयं च जीवः ||

                                                        -आचार्य अमृतचन्द्र, समयसार कलश, 44

अर्थ- यह अनादि काल का बड़ा ही अविवेकरूप नाटक है, जिसमें वर्णादिमान् पुद्गल ही नृत्य करता है, अन्य कोई नहीं । अभेदज्ञान में पुद्गल ही अनेक प्रकार दीखता है, जीव तो अनेक प्रकार नहीं है । जीव तो सर्व रागादिक पुद्गल-विकारों से विलक्षण शुद्धचैतन्य-धातुमय-मूर्ति है।

आचार्य वादीभसिंहसूरि भी जीव को नट बताते हुए क्षत्रचूडामणि में लिखते हैं-

नटवन्नैकवेषेण, भ्रमस्यात्मन्स्वकर्मतः ।

तिरश्चि निरये पापाद्, दिवि पुण्याद् द्वयान्नरे ।।

                                                                                   -आचार्य वादीभसिंह, क्षत्रचूड़ामणि, 11/36

अर्थ- हे आत्मन् ! जिस प्रकार कोई नट अपने कर्म (आजीविका) के निमित्त से तरह-तरह के भेषों को बदल कर जगह-जगह घूमा करता है, उसी प्रकार तुम भी अपने द्वारा किये गये पाप एवं पुण्य कर्म के उदय से तिर्यंच, नरक, देव और मनुष्य गतियों में परिभ्रमण करते हो ।

आध्यात्मिक व्यक्ति की अंतरंग-बहिरंग दशा को भलीभाँति समझाने के लिए आचार्यों ने नाटक के अतिरिक्त भी अनेक सटीक दृष्टान्त दिए हैं, जिनमें से कतिपय निम्नलिखित बारम्बार चिंतन-मनन के योग्य हैं-

  1. मुनीम - जिस प्रकार मुनीम दुकान पर दिनभर अपना-अपना बोलता रहता है, परन्तु कुछ भी अपना नहीं मानता, भलीभाँति जानता है कि सारा हानि-लाभ वास्तव में सेठजी का ही है, मेरा नहीं । उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि साधक जीव भी बाहर में अपना-अपना बोलता रहता है, परन्तु कुछ भी अपना नहीं मानता है, भलीभाँति जानता है कि सारा हानि-लाभ पुद्गल का ही है, मेरा नहीं है ।

  2. धर्मशाला- जिस प्रकार व्यक्ति धर्मशाला में रहता है, मेरी धर्मशाला या मेरा कमरा आदि भी बोलता है, पर उसे अपना वास्तविक घर नहीं मानता, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव अपने घर-मकान, दुकान, वाहन आदि का उपयोग करता है, उनको मेरा है -ऐसा भी कहता है, परन्तु वास्तव में अपना नहीं मानता ।

  3. पानी में कमल - जिस प्रकार कमल कीचड़/पानी में रहता है, पर कीचड़/पानी से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव भी संसार में रहता है, पर संसार से लिप्त नहीं होता, निर्लिप्त ही रहता है । “भरतजी घर ही में वैरागी” ।

  4. रेलगाड़ी (ट्रेन)- जिस प्रकार हम रेलगाड़ी में यात्रा करते हुए यह मेरा डिब्बा है या मेरी सीट है, इत्यादि बोलते हैं, सहयात्रियों से भी प्रेम करते हैं, पर वास्तव में उन्हें अपना नहीं मानते, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव भी परिजन-पुरजनों को अपना कहता है, पर अपना नहीं मानता ।

  5. पेड़ पर पक्षी - जिस प्रकार रात्रि होने पर पक्षी अलग-अलग दिशा से आकर एक ही पेड़ पर एकत्रित होकर सो जाते हैं और प्रातःकाल होने पर सब अपनी-अपनी अलग-अलग दिशा में चले जाते हैं, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव भलीभाँति जानता-मानता है कि स्त्री-पुत्रादि परिजन अलग-अलग दिशा से आकर यहाँ एक परिवार में एकत्रित हुए हैं और काल आने पर सब अपनी-अपनी अलग-अलग दिशा में चले जाएंगे, ये वास्तव में मेरे नहीं हैं ।

  6. सपना- एक बार राजा जनक ने सपना देखा कि वह रंक होकर सड़क पर खड़ा है और उसके सिर पर मुकुट आदि कुछ नहीं है, उसका राज्य उससे छिन गया है । उसकी नींद खुल गई । वह बेचैन हो गया । जैसे-तैसे तैयार होकर राजसभा में गया, पर मन नहीं लगा । उसने सभासदों से स्वप्न के बारे मे पूछा तो सबने यही कहा कि राजन् ! उस स्वप्न पर ध्यान मत दो, आप राजा हैं और हम आपके सेवक हैं यही यथार्थ है । परन्तु एक वयोवृद्ध मंत्री ने कहा- राजन् ! जिस प्रकार वह स्वप्न था और उसे सत्य मानकर आप दुखी हो गए हैं, उसी प्रकार वास्तव में अभी जो दिख रहा है, वह भी स्वप्न ही है । वह रात का स्वप्न था तो यह दिन का स्वप्न है । यदि आप इसे भी सत्य समझेंगे तो दुखी हो जाएंगे । ज्ञानी जीव संसार को स्वप्नवत् समझते हैं ।

  7. धाय माता - जिस प्रकार धाय माँ बालक को खूब खिलाती-पिलाती है, अपना दूध तक पिलाती है, पर उसे अपना पुत्र नहीं मानती है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि जीव बाहर में परिजन-पुरजनों से प्रेम करता दिखाई देता है, उनकी सेवा भी करता दिखाई देता है, पर अपने अंतरंग में उन सबसे विरक्त रहता है, किसी को भी अपना नहीं मानता है । यथा- “सम्यग्दृष्टि जीव भी, करे कुटुम्ब प्रतिपाल । अन्तर से न्यारा रहे, ज्यूँ धाय खिलाये बाल ।।

इनके अतिरिक्त अन्य भी अनेक दृष्टांत शास्त्रों में मिलते हैं । हमें इन सब दृष्टांतों के माध्यम से संसार का नाटक जैसा स्वरूप समझकर अवश्य ही अध्यात्मविद्या की आराधना करनी चाहिए । अध्यात्मविद्या ही असली विद्या है । इसी से सच्ची शांति मिलती है ।