लो रोको तूफान चला रे, पाखंडों के महल ढहाला लो रोको तूफान चला रे
(1)
सह न सका जो मिथ्या-तम की सीमा का जीवन में बंधन
रह न सका अवरूद्ध वहाँ जो बढ़ने लगा हृदय का स्पंदन
एक दिवस अन्तर-रवि जागा पुण्य जागरण बेला आई
जिसकी ज्ञान चेतना ने रे चिरनिद्रा से ली अंगड़ाई
जिसकी करवट से संशय का चिर-सिंहासन डोल चला रे
पाखंडों के…
(2)
निखिल विश्व-पथ पाये हिय में करुणा का संसार समेटे
अपनी एक श्वास में रे जो संशय-तम का मरण लपेटे
जिसकी प्रज्ञा के प्रताप से कर्तृवाद को थी हैरानी
अरे ! मृतक को मिली चेतना सुन जिसकी कल्याणी वाणी
अरे ! मुक्ति के सुन्दर पथ का करता जो जय-घोष चला रे
पाखंडों के…
(3)
बोली दुनिया "अरे अरे रे ! मात पिता का धर्म न छोड़ो
जिसमें तुमने जन्म लिया है उस पथसे अब मुँह मत मोड़ो
हरी भरी सी कीर्ति-लता है दिग् दिगंत में व्याप्त तुम्हारी
यह लो यह लो सिंहासन लो लेकिन रक्खो लाज हमारी
अरे तुम्हारे इस निश्चय से भूतल पर भूचाल मचा रे
पाखंडों के…
(4)
उत्तर मिला, "धर्म-शिशु जननी के अंचल में नहिं पलता है
और पिता की परम्परा से बंध कर धर्म नहीं चलता है
अरे लोक की सीमाओं को छोड़ धर्म का स्यंदन चलता
ज्ञान-चेतना के अंचल में प्यारा धर्म निरंतर पलता
सिंहासन क्या, धर्म देह की ममता तक को छोड़ चला रे
"पाखंडों के…
(5)
प्राणों का भीषण संकट भी उसका पथ नहिं मोड़ सका रे
कोटि-कोटि आँसू का वर्षण उसका व्रत नहिं तोड़ सका रे
रे उत्तुंग हिमाचल सा बेरोक बढ़ा वह अपने पथ पर
जिसने उसके पथ को रोका झुका उसी का मस्तक भू पर
पर्वत ने भी उसे राह दी खंड-खंड हो वज्र गिरा रे
पाखंडों के…
(6)
जिसको राह मिली, उसको अब चाह रही क्या शेष बताओ
जिसको थाह मिली उसको परवाह रही क्या शेष बताओ
उसने युग की धारा पलटी, वह अध्यात्म-क्रान्ति का सृष्टा
एक दिव्य संदेश विश्व का चेतन केवल ज्ञाता-दृष्टा
रे अणु-अणु की आजादी का शंख नाद वह फूंक चला रे
पाखंडों के…
(7)
अरे वीर के जन्म दिवस पर भूतल का अभिशाप मिट गया
अरे वीर के जन्म दिवस से एक नया इतिहास जुड़ गया
अंधकार में युग सोता था घुटती थी जीवन की श्वासें
पानी में भी पड़े हुए थे अरे मीन युग-युग के प्यासे
तेरा पावन पुनर्जन्म यह वसुधा का वरदान बना रे
पाखंडों के…