लौकिक पदों व स्वार्थों के सामने आत्मसमर्पण करता हुआ सामाजिक-नेतृत्व एवं धर्माधिकारी | Laukik Padon Va Swarthon Ke Saamne Aatmasamarpan Karta Hua Samajik Netritva Evam Dharmadhikari

लेखक: प्रो. सुदीप कुमार जैन, नई दिल्ली

एक प्राचीन घटनाक्रम है कि किसी देश का राज-ज्योतिषी किसी अपरिहार्य-कारणवश अपना देश छोड़कर वैशाली में आजीविका के निमित्त सपत्नीक जा रहा था। जंगल के रास्ते में उसे किसी मानव के पदचिह्न दिखाई दिये। अपने सामुद्रिक-विद्या के ज्ञान के बल पर उसने जाना कि ‘ये पदचिह्न अवश्य ही किसी चक्रवर्ती-सम्राट के होने चाहिये।’ उसने अपनी पत्नी को यह बात बतायी और कहा कि ‘‘संभवतः वह सम्राट मार्ग भटककर जंगल के इस भाग में हैं, अतएव नंगे पैर चल रहे हैं। हम उनकी मदद करके उनके कृपापात्र बनकर अच्छी-आजीविका पा सकते हैं।’’ इसी आशा के साथ जंगल के गहन-भाग में प्रवेश करने पर उन्हें एक शिलातल पर कायोत्सर्ग-मुद्रा में ध्यानरत मुनिराज वर्द्धमान स्वामी के दर्शन हुये। उनकी वह दिगम्बर-मुद्रा देखकर ज्योतिषी की पत्नी बोली कि ‘‘तुम्हारा सारा ज्योतिष-ज्ञान व्यर्थ ही है। तुम जिसे चक्रवर्ती-सम्राट बता रहे थे, वह तो भिखारी से भी गया बीता है, जिसके पास तन को ढँकने के लिये वस्त्रखंड तक नहीं है।’’ पत्नी की बात से आहत वह ज्योतिषी वहीं बैठ गया। इतने में कुछ सम्भ्रान्त-राजपुरुष वहाँ आये और मुनिराज वर्द्धमान स्वामी की चरणवंदना करके सविनय वहीं भूमि पर बैठ गये। तब उस ज्योतिषी ने उनसे उन दिगम्बर-मुद्रा वाले महानुभाव के विषय में पूछा। तब उन राजपुरुषों ने बताया कि ‘‘ये वैशाली-गणतन्त्र के पूर्व-राजकुमार महातपस्वी मुनिराज वर्द्धमान स्वामी हैं। हम सभी इनके दर्शन प्राप्त करके अपने को कृतार्थ अनुभव कर रहे हैं। बड़े से बड़े सम्राट भी इनकी चरणवंदना करके अपना सौभाग्य मनाते हैं।’’

यह जानते ही वह ज्योतिषी अपनी पत्नी से बोला कि ‘‘अरी भागवान्! मैं पहले ही कह रहा था कि वे पदचिह्न किसी महापुरुष के हैं। अरी भलीमानुष! सारी दुनियाँ जिनके चरणों में झुके वह राजाओं का राजा ‘सम्राट’ होता है। किन्तु बड़े से बड़े सम्राट पद को ठुकराकर जो आत्मसाधना का पवित्र-मार्ग अंगीकार करता है, वह तो ‘सम्राटों का भी सम्राट’ होता है। हमारे देश में पद और संसाधन रखने वालों का सम्मान होता है, परन्तु इन पदों व संसाधनों के मोह को ठुकराकर जो आत्मसाधना का पवित्र-मार्ग अंगीकार करता है, उसकी हमारे देश में पूजा की जाती है: यही भारतवर्ष की गरिमामयी परम्परा है।’’

इस गौरवशाली-परम्परा का परिपालन जब तक इस देश में होता रहेगा, तब तक यह देश ‘सम्पूर्ण-विश्व का गुरु’ कहा जायेगा। इसी संस्कृति की दुहाई देने वाली समाज व उसके पथ-प्रदर्शक धर्मगुरु-पदासीन महानुभावों की पूरी समिति के समक्ष अभी हाल ही में जिसतरह धर्म और संस्कृति की मर्यादा तार-तार हुई है - वह सम्पूर्ण-जैनसमाज के लिये ‘राष्ट्रीय-शर्म’ का विषय है।

अभी हाल ही में श्रवणबेलगोल-क्षेत्र पर प्रवर्तमान समारोह में राष्ट्रपति-महोदय का पदार्पण हुआ। जो भी हो, इस कार्यक्रम में राष्ट्र के शीर्षस्थ-व्यक्ति की उपस्थिति देश की जनता को गौरवास्पद प्रतीत हुई। मैं इस विषय में अपनी कोई निजी-प्रतिक्रिया नहीं देते हुये इस आलेख के माध्यम से उन विसंगतियों की ओर ध्यानाकर्षण कराना चाहता हूँ, जिनके कारण हमारी धार्मिक-मर्यादा तो तार-तार हुई ही है; यह भी स्पष्ट हो गया है कि हमारी समाज का वर्तमान-नेतृत्व कितना दिशाहीन हो चुका है? हमारे समाज के शीर्षस्थ-व्यक्ति इतना भी विवेक नहीं रख रहे हैं कि यदि महामहिम-राष्ट्राध्यक्ष महोदय आपके धर्म की, धर्मगुरु-पदासीन व्यक्तित्वों की, धार्मिक-आयोजन की मर्यादा व पवित्रता से सुपरिचित नहीं हैं; तो उन्हें इन गरिमाओं व मर्यादाओं से पहले से कैसे परिचित कराया जाये, ताकि ऐसी विषम-स्थिति उत्पन्न ही न हो।

परन्तु खेद का विषय यही रहा कि समाज के नेतृत्व ने एवं आयोजकों में से भी किसी ने इस विषय में तनिक-से भी विवेक और सावधानी का परिचय नहीं दिया। सब किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर कोरी वाहवाही लूटने में तत्पर बने रहे।

किन्तु अपार-वेदना का विषय तो यह रहा कि सपत्नीक राष्ट्रपति महोदय मंच पर ‘गंधकुटी’ में विराजमान त्रिलोकीनाथ वीतराग-जिनेन्द्रदेव एवं मंचासीन निर्ग्रन्थ-पदधारी मुनिवरों के दर्शनार्थ जूते पहिनकर आये। उनके साथ के अधिकारी भी इसी तरह मंच पर चढ़ गये। किन्तु किसी भी आयोजक, व्यवस्थापक, मठाधीश और यहाँ तक कि ‘विवेक के प्रतिमान’ कहे जानेवाले निर्ग्रन्थ-पदधारी मुनिवरों ने भी इस मर्यादा की ओर रत्ती भर भी ध्यान नहीं दिया। सब लोग धर्म की मर्यादा की चिंता छोड़कर राजसत्ता के समक्ष मानों किंकर्त्तव्यविमूढ़ होकर नतमस्तक थे। - यह बहुत बड़ी बिडम्बना की बात थी।

यह देश महान् इसलिये है कि इस देश में सत्ता और संसाधनों की पूजा नहीं की जाती है; बल्कि बड़े से बड़े सत्ताधीश व धनपति संसार-साधनों के त्याग करने वाले साधकों के चरणों में नतमस्तक होकर रहते हैं।

बहुत संभव है कि भारतवर्ष के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति महोदय कभी जैन समाज के ऐसे विशिष्ट एवं गरिमापूर्ण आयोजन में सर्वोच्च-अतिथि के रूप में सम्मिलित ही नहीं हुये हों, जिसमें विशाल-मंच पर स्वयं त्रिलोकीनाथ वीतराग-जिनेन्द्रदेव पूरी-गरिमा के साथ विराजमान हों और उनके साथ ही परम-वैराग्यपथ के पथिक त्यागमूर्ति के रूप में चिरकाल से सभी भारतीय दर्शनों एवं सांस्कृतिक-परम्परा में सर्वोच्च-सम्मान को प्राप्त निर्ग्रन्थ-पदधारी मुनिवरों की सुदीर्घ-सन्तति भी शोभायमान हो। भले ही हमारे वे निर्ग्रन्थ-पदधारी मुनिवर अपनी गुणगरिमा को पूर्णतः विस्मृत करते हुये राष्ट्राध्यक्ष-महोदय को जबरन अपना आशीर्वाद देने के लिये ऐसे लालायित दिखे, कि मानों जिसका आशीर्वाद राष्ट्राध्यक्ष-महोदय ने पहले स्वीकार कर लिया; उनका मनुष्यभव ही सफल हो जायेगा। सोशल-मीडिया में जारी चित्रों से तो कम से कम यही प्रतीत हो रहा है। वास्तविक-स्थिति संभवतः इससे भी भयावह ही रही होगी; क्योंकि सोशल-मीडिया में जारी चित्रों को तो छाँट-बीनकर अपेक्षाकृत-बेहतर चुनकर ही जारी किया गया होगा।

मुझे तो घोर-आश्चर्य उन मठाधीश महोदय पर भी है, जिन्हें ऐसे आयोजन कराने का सुदीर्घ-अनुभव है और इसतरह के लौकिक-विवेक से वे सुभिज्ञ हैं। परन्तु उनके क्षेत्र पर उन्हीं के तत्त्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में धार्मिक-मर्यादाओं का इसतरह अक्षम्यरूप से उल्लंघन होता रहा और वे मूक-दर्शक बने रहे, यह तो बिडम्बना ही कही जा सकती है। समाज के वे सभी श्रेष्ठीगण, जो जरा-सी मर्यादा के विपरीत कोई कार्य हो जाने पर पूरा राजनीतिक-बखेड़ा खड़ा करने में सिद्धहस्त माने जाते हैं, वे सभी इस प्रसंग में आँख मूँदकर क्यों चुप बैठे रहे? उनका धर्म व संस्कारों के प्रति उत्तरदायित्व किस बिल में छुपकर बैठा था और जो विद्वान् इस कार्यक्रम के संयोजन से लेकर संचालन तक में जुटे रहे, वे क्या अपने विवेक को तिलांजलि देकर इस समारोह में सम्मिलित हुये थे या फिर इन कार्यों को उनका मूक-समर्थन प्राप्त था?

किस-किस का उल्लेख करूँ? यहाँ तो कुएँ में ही भाँग पड़ी दिखाई दे रही है। समाज के ठेकेदारों से लेकर विद्वानों तक और मठाधीश महोदय से लेकर निर्ग्रन्थ-पदधारी मुनिवरों तक, कोई भी इस धार्मिक-मर्यादा के अक्षम्य-उल्लंघनरूपी अनैतिकता के दोष से अछूता प्रतीत नहीं हो रहा है।

मुझे सबसे घनघोर-आश्चर्य तो इस समारोह में सम्मिलित होने सैकड़ों-हजारों किलोमीटर तक पैदल-विहार करके पहुँचने वाले कुछ उन अपेक्षाकृत-विशुद्ध चर्यावाले मुनिपद-धारकों पर हो रहा है, जिनकी सामाजिक व धार्मिक-प्रतिष्ठा आचार्यप्रवर कुन्दकुन्द स्वामी के परमपावन मूलसंघ के आम्नाय की मर्यादाओं की रक्षा करने की रही है; वे यह जानते हुये भी कि यह सब मात्र एक मेला है, जिसमें भीड़ के अलावा कुछ भी तात्त्विक-उपलब्धि होनेवाली नहीं है; फिर भी इसमें सम्मिलित होने पहुँचे! यह जानते हुये भी कि मूलसंघ की मर्यादाओं को इस कार्यक्रम के आयोजक नहीं मानते हैं। जिस मुनिधर्म में 18000 प्रकार के शील का पालन करते हुये चित्र, लकड़ी आदि की अचित्त- स्त्री तक से दूर करने का विधान है। वे उस निर्दोष मूलसंघ के आम्नाय के अनुयायी होकर भी ऐसे कार्यक्रम में कृत-कारित-अनुमोदना के भागीदार बने, जिसका ‘लोगो’ ही ब्रह्मचर्य-महाव्रती बाहुबलि स्वामी न होकर ब्रह्मचर्य-महाव्रत में बाधक मानी जानेवाली एक स्त्री थी? जिन मूलसंघ के अनुयायियों ने कभी स्वप्न में भी स्त्री के द्वारा वीतराग-जिनेन्द्रदेव के जिनबिम्ब के स्पर्श तक की कल्पना नहीं की होगी, वे यह जानते हुये भी कि इस कार्यक्रम में परम-विरागी प्रभु बाहुबलि स्वामी के जिनबिम्ब का अभिषेक कराया जायेगा और उसके कृत-कारित-अनुमोदना से दोषी वे भी होंगे? जिन मूलसंघ के अनुयायियों ने कभी जीवन में प्रासुक निर्मल-जल के अलावा जिनबिम्ब के प्रक्षालन की कल्पना तक नहीं की होगी, वे यह जानते हुये भी कि इस कार्यक्रम में पंचामृत-अभिषेक जैसे मूलसंघ-विघातक अनुष्ठान होंगे और वे उसकी अनुमोदना के दोषी बनेंगे?

इन सब कार्यों का जीवनभर विभिन्न-मंचों पर विरोध करके मूलसंघ के गीत गाने वाले शुद्धाम्नाय के पोषक कहे जाने वाले विद्वान् क्या मुँह लेकर इस मूलसंघ-विघातक अनुष्ठान में सम्मिलित होने पहुँचे थे? क्या मात्र लड्डू-कचौड़ी का भोग लगाने? या लिफाफों के लालच में? या बड़े मंच पर नेताओं के बीच अपनी फोटो खिंचाकर अपनी मान-बढ़ाई का कुत्सित-लालच इन्हें अपने सिद्धान्तों व आदर्शों को तिलांजलि देने को विवश कर रहा था?

जिसतरह विविधप्रकार के अभिषेक के नाम पर मात्र मान-बढ़ाई के लिये कुछ विद्वानों ने जिस निर्लज्जता से इस मूलसंघ के सिद्धांतों के विपरीत आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है, वे क्या इस आयोजन में हुये गृहीत-मिथ्यात्व के पोषक कार्यों की कृत-कारित-अनुमोदना के पापभागी अपने को स्वीकार करेंगे? स्वीकार करें या नहीं, इस दृढ़तर-पापबंध के भागी तो वे हो ही चुके हैं। साथ ही मात्र मानकषाय की पूर्ति व निजी-पूर्वाग्रहों के कारण ऐसे विद्वानों का समर्थन एवं प्रकार करने वाले लोग भी इसके अपराध से बच नहीं सकते हैं। मूलसंघ के सिद्धांतों की विराधना का भीषणतम-पापबंध तो उन्होंने भी कर ही लिया है और सम्यग्दर्शन प्रकट होने की संभावना तक का विनाश उन्होंने कर लिया है। बहाने कुछ भी गढ़े जायें और कितने ही बनाये जायें, यह तय है कि इस आयोजन में कृत-कारित-अनुमोदना से किसी भी रूप में जिन लोगों ने सहभागिता की है, वे सभी गृहीत-मिथ्यात्व के बंध के प्रबल-भागीदार बने हैं। मूलसंघ के सिद्धांतों की विराधना के दोषी भी वे बने ही हैं।

अब समय समाज के उन जागरुक-पहरुओं के लिये उत्तरदायित्व निभाने का है। हमें हर स्तर पर इस कार्यक्रम में व इन जैसे सभी कार्यों में धर्म व सिद्धांतों के उल्लंघन किये जाते हैं, उनका न केवल बहिष्कार करने का संकल्प लेना होगी; बल्कि इन में सम्मिलित होने वाले श्रीमंतों, विद्वानों एवं मुनिपद-धारकों से भी पूरीतरह से विरत होने का है। साथ ही यह भी दृढ़ता पूर्वक निर्णय करने का भी है कि हम अपने लेखन व पोस्टों के सम्प्रेषण में किसी भी सूरत में ऐसे किसी भी कार्यक्रम का समर्थन, अनुमोदन नहीं करें, जिनमें हमारे परमपूज्य आचार्यप्रवर कुन्दकुन्द स्वामी एवं उनके द्वारा प्रतिपादित-तत्त्वज्ञान का किसी भी रूप में विरोध होता हो और यदि हिम्मत है, तो उसी मंच पर जाकर पूरे प्रमाणों के साथ मिथ्या-मान्यताओं का खंडन एवं शुद्धाम्नाय के सिद्धांतों का पोषण करके आयें। अन्यथा ऐसे कार्यक्रमों की प्रशंसा व पोस्टों को फॉरवर्ड करके अनादि-मिथ्यात्व के पोषण का अक्षम्य-अपराध न करें और यदि मानकषाय की पूर्ति व लौकेषणा की चाह है और उसके वशीभूत होकर ऐसे कार्यक्रमों का किसी भी रूप में समर्थन करना चाहते हैं; तो स्पष्टरूप से घोषित करें कि वे मूलसंघ के सिद्धांतों व आदर्शों के विरोधी हैं। ताकि उनकी पोस्टों को उनके कारण प्रमाणभूत मानकर समाज के भोले लोग दिग्भ्रमित नहीं होवें और उनका दुर्लभ-मनुष्यभव इनके धोखे में बरबाद न हो सके। ○○○

मूलसंघ की वास्तविकता

जो जिनेन्द्र भगवान् के साक्षात्-उपदेशों का यथावत् रीति से अनुसरण करे, उनमें कोई मिलावट या फेरबदल के बहाने नहीं तलाशे, वही मूलसंघ की पहिचान है।

जिनाम्नाय में मूलसंघ मात्र निर्ग्रन्थ-दिगम्बरत्व की निःस्पृहभावी असंग-साधना की जीवन्त-प्रस्तुति करनेवाले प्रबल-पुरुषार्थियों का परिचायक है।

इसमें परिग्रह के प्रति तनिक भी आदरभाव नहीं हो सकता एवं पुरुषार्थ की साधना में किसी तरह की बहानेबाजी की दूर तक संभावना नहीं होती।

यह जिनेन्द्र भगवान् की मूल-परम्परा का अनुयायी तो होता है, किन्तु गुरु-शिष्य-परम्परा पर आधारित न होकर यह सिद्धान्तों के नैष्ठिक-अनुसरण से पहिचाना जाता है।

स्रोत: प्रमाण बड़े या विवेक बड़ा, पृष्ठ 93-97

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