लब्धिसार क्षपणासार (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती), हिन्दी टीका सहित | Labdhisar Kshapanasar (Acharya Nemichandra)

लब्धिसार क्षपणासार (आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती), हिन्दी टीका सहित

रचयिता: आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती
सम्पादक: ब्र॰ पं॰ रतनचन्द मुख्तार, सहारनपुर
प्रकाशक: आचार्य श्री शिवसागर दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला, शान्तिवीरनगर, श्रीमहावीरजी

सम्यक्त्व और चारित्र की प्राप्ति में होने वाली लब्धियों (करणलब्धि आदि), उपशम श्रेणी तथा क्षपक श्रेणी में कर्मों के क्षय की प्रक्रिया का विवेचन, हिन्दी टीका सहित।

Labdhisar with Kshapanasar of Acharya Nemichandra Siddhantachakravarti: the labdhis for samyaktva and charitra, the upasham and kshapak shrenis, with Hindi tika.


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हर गाथा अलग, उसके नीचे उसका अर्थ, इसी ग्रन्थ के PDF से ज्यों का त्यों (स्कैन से टंकित, मिलान बाकी)।

लब्धिसार (भाग 1/3)

मंगलाचरणम्


सिद्धे जिणिंदचंदे आयरिय उवज्झाय साहुगणे ।
वंदिय सम्मद्दंसण-चरित्तलद्धिं परूवेमो ॥१॥

अर्थ: मैं नेमिचन्द्राचार्य सिद्ध-अरिहन्त-आचार्य-उपाध्याय तथा सर्वसाधुओं को नमस्कार करके सम्यग्दर्शन व सम्यक्चारित्रकी प्राप्ति (के उपाय) को कहूंगा ।


'चदुगदिमिच्छो संण्णी पुण्णो गब्भज विसुद्ध सागारो ।
पढमुवसमं स गिण्हदि पंचमवरलद्धिवरिमम्हि ॥२॥

अर्थ: चारोगतिका मिथ्यादृष्टि-सज्ञी-पर्याप्त-गर्भज-विशुद्धपरिणामी-साकारोपयोगी जीव अंतिम पंचमलब्धिका अत होनेपर प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है ।


खयउवसमियविसोही देसणपाउग्गकरणलद्धि य ।
चत्तारि वि सामण्णा करणं सम्मत्तचारित्ते ॥३॥

अर्थ: क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य व करणलब्धि ये पांच लब्धियां हैं उनमेंसे चार लब्धियां तो सामान्य हैं तथा करणलब्धिके होनेपर (उपशम) सम्यक्त्व या चारित्र अवश्य होता है ।


कम्ममलपडलसत्ती पडिसमयमणंतगुणविहीणकमा ।
होदूणुदीरदि जदा तदा खओवसमलद्धी दु ॥४॥

अर्थ: प्रतिसमय क्रमसे अनन्तगुणी हीन होकर कर्ममलपटल शक्तिकी जब उदीरणा होती है तब क्षयोपशम लब्धि होती है।


आदिमलद्धिभवो जो भावो जीवस्स सादपहुदीणं ।
सत्थाणं पयडीणं बंधणजोगो विसुद्धलद्धी सो ॥५॥

अर्थ: आदि (प्रथम) लब्धि होनेपर साताआदि प्रशस्त (पुण्य) प्रकृतियोके बन्धयोग्य जो जीवके परिणाम वह विशुद्धिलब्धि है।


छद्दव्वणवपयत्थोवदेसयरसूरिपहुदिलाहो जो ।
देसिदपदत्थधारणलाहो वां तदियलद्धी दु ॥६॥

अर्थ: छहद्रव्य और नवपदार्थका उपदेश देनेवाले,आचार्य्यादिका लाभ अथवा उपदेशित पदार्थोंको धारण करनेका लाभ, यह तृतीयलब्धि है ।


अंतोकोडाकोडी विट्ठाणे ठिदिरसाण जं करणं ।
पाउग्गलद्धिणामा भव्वाभव्वेसु सामण्णा ॥७॥

अर्थ: कर्मोंकी स्थितिको अन्त.कोडाकोड़ी तथा अनुभागको द्विस्थानिक करने को प्रायोग्यलब्धि कहते है । यह लब्धि भव्य और अभव्यके समानरूपसे होती है ।


जेट्ठवरट्ठिदिबंधे जेट्ठवरट्ठिदितियाण सत्ते य ।
ण य पडिवज्जदि पढमुवसमसम्मं मिच्छजीवो हु ॥८॥

अर्थ: उत्कृष्ट अथवा जघन्यस्थितिबन्ध करनेवाले तथा स्थिति-अनुभाग व प्रदेश इन तीनोके उत्कृष्ट या जघन्य सत्त्ववाले मिथ्यादृष्टीजीवके प्रथमोपशमसम्यक्त्व उत्पन्न नही होता ।


सम्मत्तहिमुहमित्छो विसोहिवड्ढीहि वड्ढमाणो हु ।
अंतोकोडाकोडिं सत्तण्हं बंधणं कुणदी ॥९॥

अर्थ: विशुद्धिकी वृद्धिद्वारा वर्धमान तथा प्रथमोपशमसम्यक्त्वके अभिमुख मिथ्यादृष्टिजीव सातकर्मोंका अन्त कोडाकोड़ीसागरप्रमाण स्थितिबन्ध करता है।


तत्तो उदय सदस्स य पुधत्तमेत्तं पुणो पुणोदिरिय ।
बंधम्मि पयदि बंधुच्छेदपदा होंति चोत्तीसा ॥१०॥

अर्थ: उससे अर्थात् अन्त कोड़ाकोड़ीसागर स्थितिसे पृथक्त्व सौ सागरहीन स्थितिको बाधकर पुनः पुनः पृथक्त्व १०० सागर घटाकर स्थितिबन्ध करनेपर प्रकृतिबन्ध व्युच्छित्तिके ३४ स्थान होते है।


आउ पडि णिरयदुगे, सुहुमतिये सुहुमदोण्णि पत्तेयं ।
वादरजुद दोण्णि पदे, अपुण्णजुद वितिचउसिरिणसण्णीसु ॥११॥

अट्ठ अपुण्णपदेसु वि, पुण्णेण जुदेसु तेसु तुरियपदे ।
एइंदिय आदावं, थावरणामं च मिलिदव्वं ॥१२॥

तिरिगदुगुज्जोवो वि य, णीचे अपसत्थगमणदुब्भगविए ।
हुंडासंपत्ते वि य, णउंसए वामखीलीए ॥१३॥

खुज्जद्धं णाराए, इत्थीवेदे य सादिणाराए ।
णग्गोधवज्जणारा ए मणुओरालदुगवज्जे ॥१४॥

अधिरअसुभ जस अरदी, सोयअसादे य होंति चउतीसा ।
बंधोसरगट्ठाणा, भव्वाभव्वेसु सामण्णा ॥१५॥

अर्थ (गाथा 11 से 15): आयुबन्धव्युच्छित्ति स्थानोंके पश्चात् क्रमशः नरकद्विक, सूक्ष्मादि तीन, सूक्ष्मादि दो व प्रत्येक, बादर-अपर्याप्त-साधारण, बादर-अपर्याप्त-प्रत्येक, अपर्याप्त-द्वीन्द्रिय, अपर्याप्त-त्रीन्द्रिय, अपर्याप्तचतुरिन्द्रिय, अपर्याप्त-असंज्ञी-पंचेन्द्रिय, अपर्याप्त-सज्ञीपंचेन्द्रिय ॥११॥ आठ पदोंमें अपर्याप्तके स्थानपर पर्याप्त जोड़ना चाहिए, किंतु चतुर्थपद एकेन्द्रिय-आतप-स्थावर भी मिलाना चाहिए। अर्थात् (पूर्वोक्त छठे पदसे १३वें पदतक ८ पदोंमे अपर्याप्तके स्थानपर पर्याप्त जोड़ना चाहिए) । तिर्यञ्चद्विक व उद्योत, नीचगोत्र, अप्रशस्तविहायोगति और दुर्भगादि तीन (दुर्भग-दुःस्वर-अनादेय), हुण्डसस्थान-सृपाटिकासंहनन, नपुंसकवेद, वामनसंस्थान व कीलितसंहनन । कुब्जसंस्थान-अर्धनाराचसंहनन, स्त्रीवेद, स्वातिसस्थान-नाराचसंहनन, न्यग्रोधसंस्थान-वज्रनाराच-संहनन, मनुष्यगतिद्विक (मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी)-औदारिकद्विक (औदारिक-शरीर-औदारिकअङ्गोपाङ्ग)-वज्रर्षभनाराचसंहनन । अस्थिर-अशुभ-अयशःकीर्ति-अरति-शोक व असातावेदनीयकी बन्धव्युच्छित्ति होती है। ये ३४ बन्धापसरणस्थान भव्य व अभव्यके समानरूपसे होते है।


णारतिरियाणं ओघो भवणातिसोहम्मजुगलए बिदियं ।
तिदियं अट्ठारसमं तेवीसदिमादि दसपदं चरिमं ॥१६॥

ते चेव चोद्दसपदा अट्ठारसमेण हीणया होंति ।
रयणादिपुढविक्छक्के सणक्कुमारादिदसकप्पे ॥१७॥

ते तेरस बिदिएण य तेवीसदिमेण चावि परिहीणा ।
आणदकप्पादुवरिमगेवेज्जंतोत्ति ओसरणा ॥१८॥

अर्थ (गाथा 16 से 18): मनुष्य और तिर्यंचोंमें ओघ अर्थात् चौतीसबन्धापसरण होते हैं। भवनत्रिक और सौधर्मयुगलमे दूसरा, तीसरा, अठारहवां और तेईसवां आदि दश व अन्तिम ३४वा ये १४ बन्धापसरण होते हैं। रत्नप्रभा आदि छह् नरक पृथ्वियोंमें और सनत्कुमार आदि दशकल्पो (स्वर्गों) में उपर्युक्त १४ बन्धापसरणोमे से १८वां बन्धापसरण नही होता (शेष १३ बन्धापसरण होते हैं)। आनतकल्पसे लेकर उपरिम नौवे ग्रैवेयकपर्यन्त उपर्युक्त १३ स्थानोमे से दूसरा और २३वां बन्धापसरण नही होते (शेष ११ बन्धापसरण होते हैं)।


ते चेवेक्कारपदा तदिऊणा विदियठाणसंपत्ता ।
चउवीसदिमेणू णा सत्तमिपुढविम्हि ओसरणा ॥१९॥

अर्थ: गाथा १४ मे कहे गये ११ बन्धापसरणोंमें से तीसरा व २४वा बन्धापसरण घटानेपर तथा दूसरा बन्धापसरण मिलानेपर सातवी नरकपृथ्वीमे १० बन्धापसरण होते हैं ।


घादित्ति सादं मिच्छं कसायपुं हस्सरदि भयस्स दुगं ।
अपमत्तडवीसुच्चं बंधंति विसुद्धणरतिरिया ॥२०॥

देवत्ततसवण्णअगुरुलहुचउक्कं समचउरतेजकम्मइयं ।
सग्गमणं पंचिंदी थिरादिछ णिमिणमडवीसं ॥२१॥

अर्थ (गाथा 20 से 21): विशुद्ध ( सम्यक्त्वके अभिमुख प्रायोग्यलब्धिमें स्थित मिथ्यादृष्टि ) मनुष्य या तिर्यंच तीन घातिया ( ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय ) कर्म सातावेदनीय, मिथ्यात्व, कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भयद्विक ( भय-जुगुप्सा ), अप्रमत्तगुणस्थानसम्बन्धी २८ और उच्चगोत्रको बाधता है । देवचतुष्क, त्रसचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, प्रशस्तविहायोगति, पंचेन्द्रियजाति, स्थिरादि ६ और निर्माण ये २८ प्रकृतियां अप्रमत्तगुणस्थानसम्बन्धी जानना ।


तं सुरचउक्कहीणं णरचउवज्जजुदं पयडिपरिमाणं ।
सुरछप्पुढवीमिच्छा छिण्णोसरणा हु बंधंति ॥२२॥

अर्थ: उन (उपर्युक्त ७१ प्रकृतियों) में से देवचतुष्कको कम करके मनुष्य चतुष्क (मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, औदारिकशरीर, औदारिकशरीरअंगोपांग) और वज्रर्षभनाराचसंहननको मिलानेसे इन ७२ प्रकृतियोंको, वन्धापसरण कर चुकनेपर मिथ्यादृष्टिदेव और प्रथमादि छह पृथिवियोंके नारकी वांधते हैं ।


तं णरदुगुच्चहीणं तिरियंदु णीचजुदं पयडिपरिमाणं ।
उज्जोवेण जुदं वा सत्तमिखिदिगां हु बंधंति ॥२३॥

अर्थ: उन (पूर्वोक्त ७२ प्रकृतियों) में से मनुष्यद्विक (मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी) और उच्चगोत्रको कम करनेसे तथा तिर्यंचगतिकद्विक (तिर्यंचगति, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी) व नीचगोत्रको मिलानेपर ७२ प्रकृतियां होती हैं । यदि उद्योतप्रकृति मिलाई जाती है तो ७३ प्रकृतियां हो जाती हैं। उन ७२ अथवा ७३ प्रकृतियोको (प्रथमोपशमसम्यक्त्वके अभिमुख) सातवीं पृथ्वोका मिथ्यादृष्टि नारकी बांधता है ।


अंतोकोडाकोडीठिदिं असत्थाणं सत्थगाणं च ।
बिचउट्ठाणिरसं च य बंधाणं बंधणं कुणदि ॥२४॥

अर्थ: (सम्यक्त्वके अभिमुख मिथ्यादृष्टि) बंधनेवाली प्रकृतियोंका स्थितिबंध अन्तःकोटाकोटीसागरोपमप्रमाण करता है । अप्रशस्तप्रकृतियोंका द्विस्थानीय अनुभागबन्ध करता है और प्रशस्तप्रकृतियोंका चतु स्थानीय अनुभागबन्ध करता है ।


मिच्छणथीएत्ति सुरचउ समचउजपसत्थगमणसुभगतियं ।
णीचुक्कस्सपदेसमणुक्कस्सं वा पबंधदि हु ॥२५॥

एदेहिं विहीणाणं तिण्णि महादंडएसु उत्ताणं ।
एकट्ठिपमाणाणमणुक्कस्सपदेसबंधगं कुणदि ॥२६॥

अर्थ (गाथा 25 से 26): मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्यानगृद्धित्रिकं, देवचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रर्षभनाराचसंहनन, प्रशस्तविहायोगति, सुभगादि तीन और नीच गोत्रका उत्कृष्ट व अनुत्कृष्टप्रदेशबन्ध करता हैं । इन प्रकृतियोसे रहित तीन महादण्डक अर्थात् गाथा २१-२२ व २३ मे कही गई शेष ६१ प्रकृतियोंका अनुत्कृष्टप्रदेशबन्ध करता है ।


पढमे सव्वे विदिये पण तिदिये चउ कमा अपुणरुत्ता ।
इदि पयडीणमसीदी तिदंडएसु वि अपुणरुत्ता ॥२७॥

अर्थ: क्रमशः प्रथमदण्डकमे सर्वप्रकृतिया, द्वितीयदण्डकमे पांचप्रकृतिया और तृतीयदण्डकमें चारप्रकृतियां, इसप्रकार तीनो दण्डकोमें सर्व ८० प्रकृतिया अपुनरुक्त हैं ।


उदये चउदसघादी णिद्दापयलाएमेक्कदरगं तु ।
मोहे दस सिय णामे वट्ठिठाणं सेसगे संजोगेक्कं ॥२८॥

अर्थ: तीन घातियाकर्मोंकी १४ प्रकृतियां, निद्रा या प्रचलामें से कोई एक, मोहनीयकर्मकी स्यात् (कथंचित्) १० प्रकृति, नामकर्मकी भाषापर्याप्तिकालमें उदययोग्य प्रकृतियां और शेष वेदनीय, गोत्र व आयुकर्मकी एक-एक प्रकृति भी मिला लेना चाहिए । ये सर्वप्रकृतियां उदययोग्य है ।


उदइल्लाणं उदये पत्तेक्कठिदिस्स वेदगो होदि ।
विच्चउट्ठाणमसत्थे सत्थे उदयल्लरसभुत्ती ॥२९॥

अजहण्णमणुक्करूप्पदेसमणुभवदि सोदयाणं तु ।
उदइल्लाणं पयडिचउक्काणमुदीरगो होदि ॥३०॥

अर्थ (गाथा 29 से 30): उदयवान् प्रकृतियोका उदय प्राप्त होनेपर एकस्थितिका वेदक होता है । अप्रशस्तप्रकृतियोके द्विस्थानरूप और प्रशस्तप्रकृतियोके चतु स्थानरूप उदयमान अनुभागको भोगता है । उदयरूप प्रकृतियोके अजघन्य-अनुत्कृष्टप्रदेशाग्रको अनुभव करता है । उदयस्वरूप प्रकृतियोके प्रकृति-प्रदेश-स्थिति व अनुभागका उदीरक होता है ।


दुति आउ तित्थहारचउक्कणा सम्मगेण हीणा वा ।
मिस्सेणेणा वा वि य सव्वे पयडी हवे सत्तं ॥३१॥

अर्थ: दो या तीन आयु, तीर्थकर और आहारकचतुष्क; इन प्रकृतियोसे रहित तथा सम्यक्त्वप्रकृति व सम्यग्मिथ्यात्वबिना शेष सर्वप्रकृतियोका सत्त्व होता है ।


अजहण्णमणुक्कस्सं ठिदीतियं होदि सत्तपयडीणं ।
एवं पयदिचउक्कं बंधादिसु होदि पत्तेयं ॥३२॥

अर्थ: उक्त सत्त्वप्रकृतियोका स्थितित्रिक (स्थिति-अनुभाग-प्रदेश) अजघन्य-अनुत्कृष्ट होता है । बन्धादि (बन्ध-उदय-उदीरणा) प्रत्येकमे इसीप्रकार प्रकृतिचतुष्क (प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेश) लगा लेना चाहिए ।


तत्तो अभव्वजोग्गं परिणामं बोलिऊण भव्वो हु ।
करणं करेदि कमसो अधापवत्तं अपुव्वमणिद्वियं ॥३३॥

अर्थ: उसके पश्चात् अर्थात् प्रायोग्यलब्धिके पश्चात् अभव्यके योग्य परिणामोको उल्लघकर भव्यजीव क्रमशः अधः-प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणको करता है ।


अंतोमुहुत्तकाला तिण्णिवि करणा हवंति पत्तेयं ।
उवरीदो गुणियकमा कमेण संखेज्जरूवेण ॥३४॥

अर्थ: तीनों करणोमे से प्रत्येककरणका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण काल होता है, किन्तु ऊपरसे नीचेके करणोंका काल सख्यातगुणा क्रम लिये हुए है ।


जम्हा हेट्ठिमभावा उवरिमभावेहिं सरिसगा होंति ।
तम्हा पढमं करणं अधापवत्तोत्ति णिद्दिठ्ठं ॥३५॥

अर्थ: क्योंकि अधस्तन (नीचेके) भाव उपरितनभावोंके साथ सदृश होते है अत प्रथमकरणको अध प्रवृत्तकरण कहा गया है ।


समए समए भिण्णा भावा तम्हा अपुव्वकरणो दु ।
अणियट्टीवि तहं वि य पडिसमयं एक्कपरिणामो ॥३६॥

अर्थ: प्रतिसमय भिन्न भाव होते हैं इसलिये यह अपूर्वकरण है और प्रतिसमय एक समान ही परिणाम होते हैं अत वह अनिवृत्तिकरण है ।


गुणसेढी गुणसंकम ठिदिरसखंडं च णत्थि पढमम्हि ।
पडिसमयमणंतगुणं विसोहिवुड्ढीहिं वड्ढदि हु ॥३७॥

सत्थाणमसत्थाणं चउविट्ठाणं रसं च बंधदि हु ।
पडिसमयमणंतगेण य गुणभजियकमं तु रसबंधे ॥३८॥

पल्लस्स संखभागं मुहुत्तअंतेण ओसरदि बंधे ।
संखेज्जसहस्साणि य अधापवत्तम्मि ओसरणा ॥३९॥

आदिमकरणाद्धाए पढमट्ठिदिबंधो दु चरिमेम्हि ।
संखेज्जगुणविहीणो ठिदिबंधो होइ णियमेण ॥४०॥

तच्चरिमे ठिदिबंधो आदिमसम्मेण देससंजमजं ।
पडिवज्जमाणगस्स वि संखेज्जगुणेण हीणकमो ॥४१॥

अर्थ (गाथा 37 से 41): प्रथम ( अधःकरण ) में गुणश्रेणि, गुणसंक्रमण, स्थितिखण्ड और अनुभागखण्ड नही होते, किन्तु प्रतिसमय विशुद्धिमे अनन्तगुणीवृद्धिद्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है । प्रशस्तप्रकृतियोका चतु स्थानीय (गुड, खांड, शर्करा: और अमृत) अनुभागबन्ध होता और अप्रशस्तप्रकृतियोका द्विस्थानीय (लता-दारु या निब-काजीर) अनुभागबन्ध होता है । प्रतिसमय प्रशस्तप्रकृतियोका अनन्तगुणे क्रम सहित बन्ध होता है और अप्रशस्तप्रकृतियोके अनन्तवेभागप्रमाण अनुभागबन्ध होता है । तथा एक-एक अन्तर्मुहूर्तके अन्तरालसे पल्यका सख्यातवाभाग घटता हुआ स्थितिबन्ध होता रहता है । अध प्रवृत्तकरणकालमें सख्यातहजार स्थितिबन्धापसरण होते रहते है । अध प्रवृत्तकरणके आदिमे जो प्रथम स्थितिबन्ध होता है तथा अन्तमे नियमसे उससे सख्यातगुणाहिन स्थितिबन्ध होता है । इस चरमस्थितिबन्धसे देशसंयम सहित प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करनेवाले जीवके स्थितिबन्ध सख्यातगुणाहिन होता है । इसस्थितिबन्धसे सकलसंयम सहित प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करनेवालेके सख्यातगुणाहिन स्थितिबन्ध होता है ।


आदिमकरणाद्धाए पडिसमयमसंखलोगपरिणामा ।
अहियकमा हु विसेसे मुहुत्तअंतो हु पडिभागो ॥४२॥


ताए अधापवत्तद्धाए संखेज्जभागमेत्तं तु ।
अणुकट्ठीए अद्धा णिट्ठवगणकडयं तं तु ॥४३॥


पडिसमयगपरिणामा णिट्ठवगणसमयमेत्तखंडकमा ।
अहियकमा हु विसेसे मुहुत्तअंतो हु पडिभागो ॥४४॥


पडिखंडगपरिणामा पत्तेयमसंखलोगमेत्ता हु ।
लोयाणमसंखेज्जा छट्ठाणाणी विसेसेवि ॥४५॥


पढमे चरिमे समये पढमं चरिमं च खंडमसरित्थं ।
सेसा सरिसा सव्वे अट्ठुव्वंकादिअंतगया ॥४६॥

अर्थ: प्रथमखंडके परिणामोंके साथ क्रमसे पुनरुक्तता तबतक जानना चाहिए जब जाकर प्रथमसमयसम्बन्धी अन्तिमखंडके परिणाम प्रथमनिर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिमसमयके प्रथमखण्डसम्बन्धी परिणामोंके साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते है । इसीप्रकार अधःप्रवृत्तकरणके द्वितीयादि समयोके परिणामखण्डोको भी पृथक्-पृथक् विवक्षितकरके वहाके द्वितीयादि खण्डगत परिणामोंका विवक्षितसमय [द्वितीयादिसमय] से लेकर ऊपर एक समयकम निर्वर्गणाकाण्डकप्रमाण समयपक्तियोके प्रथमखण्डसम्बन्धी परिणामोके साथ पुनरुक्तपनेका कथन करना चाहिए, किन्तु इतनी विशेषता है कि सर्वत्र प्रथमखंडके परिणाम अपुनरुक्तपनेसे अवशिष्ट जानना चाहिये । अर्थात् प्रत्येकसमयके प्रथमखंडसम्बन्धी परिणाम अगले समयके किसी भी खडसम्बन्धी परिणामोंके सदृश नही होते । इसीप्रकार द्वितीयनिर्वर्गणाकाण्डकके परिणामखण्डोका तृतीयनिर्वर्गणाकाण्डकके परिणामखडोके साथ पुनरुक्तपना जानना चाहिए, किन्तु यहा भी प्रथमखंडसम्बन्धी परिणाम ही अपुनरुक्तरूपसे अवशिष्ट रहते है । इसीक्रमसे तृतीय, चतुर्थ और पंचमादि निर्वर्गणाकाण्डकोंके भी अनन्तर उपरिम निर्वर्गणाकाण्डकोके साथ पुनरुक्तपना वहातक जानना चाहिए जब जाकर द्विचरमनिर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमादिसमयोंके सर्व परिणामखड प्रथमखंडको छोड़कर अन्तिमनिर्वर्गणाकाडकम्बन्धी परिणामोके साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते है । अब अन्तिमनिर्वर्गणाकाडकम्बन्धी परिणामोके स्वस्थानमें पुनरुक्त अपुनरुक्तपनेका अनुसन्धान परमागमके अविरोधपूर्वक करना चाहिए । अंकसदृष्टिके अनुसार अपुनरुक्तखंड अपनेसे उपरिम किसी खंडके सदृश नही है- प्रथमसमयमे जो प्रथमखण्ड है वह ऊपर किसीके साथ भी समान नही है । पुनः प्रथमसमयका दूसरा खड (४०) तथा द्वितीयसमयका प्रथमखंड (४०) दोनो सदृश ही है, तथैव प्रथमसमयका तृतीयखण्ड (४१) और द्वितीयसमयका दूसराखड (४१) समान है । इसीप्रकार आगे जाकर पुनः प्रथमसमयका अन्तिमखंड (४२) एव द्वितीयसमयका द्विचरमखण्ड (४२) सदृश है, तथैव द्वितीयसमयके परिणामखडोका और तृतीयसमयके परिणामखंडोका सन्निकर्ष करना चाहिए । एवमेव ऊपर भी पिछले की तदन्तरोके साथ सन्निकर्षविधि जानकर कहनी चाहिए । इसप्रकार अनुक्रुष्टि-प्ररूपणा समाप्त हुई । विशुद्धिसे द्वितीय निर्वर्गणाकांडकके प्रथमसमयकी (४३) जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, क्योंकि प्रथमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि ‘उर्वक’ रूपसे अवस्थित है और द्वितीयनिर्वर्गणाकांडकके प्रथमसमयकी जघन्यविशुद्धि ‘अष्टांक’ रूपसे अवस्थित है इसलिये अनन्तगुणी हो गई। उससे प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके दूसरेसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है, क्योंकि पूर्वकी जघन्यविशुद्धि दूसरे समयके अन्तिमखण्डके जघन्यपरिणामस्वरूप है और यह उत्कृष्टविशुद्धि असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानवृद्धिको उल्लंघकर स्थित हुए दूसरे समयके अन्तिमखंडकी उत्कृष्टविशुद्धि है, इसलिये यह उत्कृष्टविशुद्धि पूर्वकी जघन्यविशुद्धिसे अनन्तगुणी सिद्ध हो जाती है। इस पद्धतिसे अन्तर्मुहूर्तकालप्रमाण एक निर्वर्गणाकाण्डकको व्यवस्थित करके उपरिम और अधस्तन जघन्य और उत्कृष्टपरिणामोंसे अल्पबहुत्व जानना चाहिए। अल्पबहुत्वका यह क्रम सर्व निर्वर्गणाकाण्डकोंको क्रमसे उल्लंघकर पुनः द्विचमनिर्वर्गणाकांडकके अन्तिमसमयकी उत्कृष्ट विशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम निर्वर्गणाकांडककी जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी होकर जघन्यविशुद्धिका अन्त प्राप्त होनेतक करना चाहिए। इतनी दूर तक जो एक-एक निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तरसे जघन्य और उत्कृष्ट विशुद्धिस्थानोंका अल्पबहुत्व कहा गया है उसमें कोई भेद नहीं है। इसका स्पष्टीकरण इसप्रकार है-प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके दूसरे समयकी (४३ की) उत्कृष्टविशुद्धिसे दूसरे निर्वर्गणाकांडकके दूसरे समयकी (४४ की) जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, इससे प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके तीसरेसमयकी (४४ की) उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है, इससे द्वितीयनिर्वर्गणाकांडकके तीसरेसमयकी (४५ की) जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, इससे प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके चौथेसमयकी (४५ की) उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है। इसप्रकार दूसरे निर्वर्गणाकांडकके अंतिमसमयकी जघन्यविशुद्धिपर्यन्त अनन्तगुणत्व ले जाना चाहिए। इसीप्रकार तृतीय निर्वर्गणाकांडकके समयोंकी जघन्यविशुद्धि और द्वितीयनिर्वर्गणाकांडकके समयोंकी उत्कृष्टविशुद्धिका परस्पर अल्पबहुत्व कहना चाहिये। इसीप्रकार अनन्तर उपरिम निर्वर्गणाकांडकके जघन्यपरिणामोंका अनन्तर अधस्तन निर्वर्गणाकांडकके उत्कृष्टपरिणामोंके साथ क्रमसे अनुसन्धान करते हुए अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिमसमयकी जघन्यविशुद्धि द्विचमनिर्वर्गणाकांडकके अन्तिमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धिसे अनन्तगुणी होकर जघन्यविशुद्धियोंके अन्तको प्राप्त होती है; यहां ले जाना चाहिए। पुनः द्विचमनिर्वर्गणाकांडकके अन्तिमसमयकी (५३ की) उत्कृष्टविशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके अंतिमसमयकी


चरिमे सव्वे खंडा दुचरिमसमओत्ति अवरखंडाए ।
असरिसखंडाणोली अधापवत्तम्हि करणम्हि ॥४७॥

पढमे करणे अवरा णिठवग्गणसमयमेत्तगा तत्तो ।
अहिगदिणा वरमवरं तो वरपंती अणंतगुणिदकमा ॥४८॥

पढमे करणे पढमा उड्डगसेढी य चरिमसमयस्स ।
तिरियगखंडाणोली असरित्थाणंतगुणिदकमा ॥४९॥

अर्थ (गाथा 42 से 49): आदिकरण (अध प्रवृत्तकरण) के कालमे प्रतिसमय अधिकक्रम लिए हुए असंख्यातलोकप्रमाण परिणाम होते है । विशेष (चय) को प्राप्त करनेके लिए अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रतिभाग है । उस अध प्रवृत्तकरणकालके (समयोके) संख्यातवेभागप्रमाण अनुकृष्टिरचनाका आयाम है और जितना वह आयाम है उतने समयोका एक-निर्वर्गणाकाण्डक होता है । निर्वर्गणाकाण्डकके संमान प्रतिसमयके परिणामोंके क्रमशः खण्ड होते है, वे खण्ड अधिकक्रमवाले होते है । यहा विशेषको प्राप्त करनेका प्रतिभाग अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है । प्रत्येकखण्डमे असंख्यातलोकप्रमाण परिणाम है । प्रत्येकखण्डमे षट्स्थानपतितवृद्धि असंख्यातलोकबार होती है । एक-एक विशेष ( चय ) मे भी षट्स्थानपतितवृद्धि असंख्यातलोकबार होती है । प्रथमसमयका प्रथमखण्ड और चरमसमयका अन्तिमखण्ड ये विसदृश और शेषखण्ड सदृश है । सर्वखण्डोका आदि ‘अष्टाक’ है और अन्त ‘उर्वाक’ है । चरमसमयके सर्वखण्ड और प्रथमसमयसे लेकर द्विचरमसमयपर्यन्तका सर्वप्रथमखण्ड, यह अध प्रवृत्तकरणमे असदृशखण्डोकी पंक्ति है । प्रथम ( अध प्रवृत्त ) करणमे निर्वर्गणाकाण्डकप्रमाण समयोमे प्रत्येकसमयके प्रथमखंडके जघन्यपरिणाम ऊपर-ऊपर अनन्तगुणे क्रमसे है । निर्वर्गणाकाण्डकके चरमसमयसम्बन्धी जघन्यपरिणामसे प्रथमसमयका उत्कृष्टपरिणाम अनन्तगुणा है, उससे द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमसमयके प्रथमखण्डका जघन्यपरिणाम अनन्तगुणा है इसप्रकार जघन्यसे उत्कृष्ट और उससे जघन्य सर्पकी चालवत् अनन्तगुणेक्रमसे है । प्रथम (अध प्रवृत्त ) करणमे सर्वसमयोके प्रथमखण्डकी उर्ध्वश्रेणीरूपसे और चरमसमयके सर्वखण्डोंकी तिर्यगावलिरूपसे रचना करनेपर सर्व असदृशखण्डोकी पंक्ति हो जाती है जो अनन्तगुणित क्रमसे स्थित है ।


पढमं व विदियकरणं पडिसमयमसंखलोगपरिणामा ।
अहियकमा हु विसेसे मुहुत्तअंतो हु पडिभागो ॥५०॥

अर्थ: प्रथम अर्थात् अध प्रवृत्तकरण के समान द्वितीय अर्थात् अपूर्वकरण है । इसमे प्रतिसमय अधिक क्रमसहित असंख्यातलोक परिणाम होते हैं । विशेष (चय) के लिए अन्तर्मु हूर्तप्रमाण प्रतिभाग है ।


जम्हा उवरिमभावा हेट्ठिमभावेहिं णत्थि सारिसत्तं ।
तम्हा विदियं करणं अपुव्वकरणं त्ति णिद्दिट्ठं ॥५१॥

अर्थ: क्योंकि उपरिम समयके परिणाम नीचेले समयसम्बन्धी परिणामोके समान नही होते इसलिये इस दूसरे करणको अपूर्वकरण कहा गया है ।


विदियकरणादिसमयादंतिमसमओत्ति अत्तरावसुद्धी ।
अहिगदिणा खलु सव्वे होंति अणंतंसगुणिदक्कमा ॥५२॥

अर्थ: दूसरे अर्थात् अपूर्वकरणके प्रथमसमयसे लेकर अन्तसमयपर्यन्त प्रत्येक समयके जघन्यपरिणामसे उसी समयका उत्कृष्टपरिणाम अनन्तगुणी विशुद्धिवाला है। इस उत्कृष्टपरिणामसे अनन्तर उत्तरसमयका जघन्यपरिणाम अनन्तगुणी विशुद्धिवाला है। इसप्रकार सर्पकी चालके समान विशुद्धतासम्बन्धी अल्पबहुत्वका कथन है।


गुणसेढीगुणसंकमठिदरसखंडा अपुव्वकरणादो ।
गुणसंकमेण सम्मा मिस्साणं पूरणेत्ति हवे ॥५३॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर, गुणसंक्रमण से सम्यक्त्व-मिश्रद्वय प्रकृतिके पूरनेके कालके चरमसमयपर्यन्त गुणश्रेणि, गुणसंक्रमण, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात होते हैं ।


ठिदिबंधोसरणं पुण अधापवत्तादुपूरणेत्ति हवे ।
ठिदिबंधट्ठिदिखंडुक्कीरणकाला समा होंति ॥५४॥

अर्थ: स्थितिबन्धापसरण भी अध प्रवृत्तकरणसे लेकर सम्यक्त्व व मिश्रप्रकृतियोंके पूरणकालतक होता है । स्थितिबन्धापसरणकाल और स्थितिकाण्डकघातका उत्कीरणकाल, ये दोनो काल समान अर्थात् तुल्य होते हैं ।


गुणसेढीदीहत्तमपुव्वदुगादो दु साहियं होदि ।
गलिदवसेसे उद्यावलिबाहिरदो दु णिक्खेवो ॥५५॥

अर्थ: गुणश्रेणीकी दीर्घता अर्थात् गुणश्रेणीआयाम अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणकालसे अधिक होता है वह गुणश्रेणीआयाम गलितावशेष है तथा उदयावलीसे बाह्यनिक्षेप होता है ।


णिक्खेवो पदित्थाणं मवरं समऊणआवलितिभागं ।
तेऊणावलिमित्तं विदियावलियादिमणिसेगे ॥५६॥

अर्थ: द्वितीयावलिका आदिनिषेक अर्थात् उदयावलिसे अनन्तर उपरिमानिषेक मे से द्रव्य अपकर्षितकरके नीचे उदयावलिमे देता है तब एकसमयकम आवलिका त्रिभाग तो जघन्यनिक्षेप है तथा आवलिके शेषनिषेक जघन्यअतिस्थापना है ।


एत्तो समऊणावलितिभागमेत्तो तु तं खु णिक्खेवो ।
उवरिं आवलिवज्जिय सगट्ठिदी होदि णिक्खेवो ॥५७॥

अर्थ: इस प्रथमनिषेकसे ऊपर एकसमय कम आवलिके त्रिभागतकके निषेकोके अपकृष्टद्रव्यका निक्षेप तो पूर्वोक्त ही है । इससे ऊपर अतिस्थापनारूप आवलिको छोड़कर अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण निक्षेप होता है ।


उक्कस्सट्ठिदिबंधो समयजुदावलिदुगेण परिहीणो ।
ओक्कट्ठिदिम्मि चरिमे ठिदिम्मि उक्कस्सणिक्खेवो ॥५८॥

अर्थ: उत्कृष्टस्थितिका बन्ध होनेपर चरमस्थितिके अपकर्षितद्रव्यका समयाधिक दोआवलिहीन उत्कृष्टस्थितिप्रमाण उत्कृष्टनिक्षेप होता है ।


उक्कस्सट्ठिदि बंधिय मुहुत्तअंतेण सुज्झमाणेण ।
इगिकंडएण घादे तम्हि य चरिमस्स फालिस्स ॥५९॥

चरिमणिसेओक्कड्डे जेट्ठमदित्थावणं इदं होदि ।
समयजुदंतोकोडाकोडि विणूक्कस्सकम्मठिदी ॥६०॥

अर्थ (गाथा 59 से 60): उत्कृष्टस्थितिको बाधकर अन्तर्मुहूर्तके द्वारा विशुद्ध होता हुआ, अंतःकोड़ाकोड़िसागरप्रमाण स्थितिके अतिरिक्त शेष सम्पूर्ण उत्कृष्टस्थितिका एककांडकघातके द्वारा घात करनेवालेके कांडककी चरिमफालिके चरमनिषेकके अपकर्षितद्रव्यकी उत्कृष्टअतिस्थापना समयाधिक अन्त कोड़ाकोड़िसागरसे हीन उत्कृष्टकर्मस्थिति होती है ।


सत्तगट्ठिदिबंधो आदित्थियुक्कड्ढणे जहण्णेण ।
आवलिअसंखभागं तेत्तियमेत्तेव णिक्खिवदि ॥६१॥

अर्थ: बन्ध होनेपर सत्त्वकर्मकी अग्रस्थिति ( अन्तिमस्थितिके द्रव्य ) का उत्कर्षण होता है उस उत्कर्षणकी अतिस्थापना ( आदिस्थिति ) जघन्यसे आवलिके असंख्यातवेभाग होती है और जघन्यनिक्षेप भी उतना ही होता है ।


तत्तोदित्थावणगं वड्ढदि जावावली तदुक्कस्सं ।
उवरीदो णिक्खेवो वरं तु बंधिय ट्ठिदि जेट्ठं ॥६२॥

बोलिय बंधावलियं ओक्कड्डिय उदयदो दु णिक्खिविय ।
उवरिमसमये विदियावलिपढमुक्कड्डणे जादे ॥६३॥

तक्कालवज्जमाणे वारट्ठिदीए अदित्थियाबाहं ।
समयजुदावलियाबाहूणो उक्कस्सठिदिबंधो ॥६४॥

अर्थ (गाथा 62 से 64): उसके पश्चात् अतिस्थापना एक-एक समय बढ़ते हुए आवलिप्रमाण उत्कृष्ट अतिस्थापना हो जाती है, इसके पश्चात् निक्षेपावलिके असंख्यातवेभ से उत्कृष्टनिक्षेप प्राप्त होनेतक बढता है । उत्कृष्टनिक्षेप-उत्कृष्टस्थितिको बाघकर बधावलि बीत जानेपर उस उत्कृष्टस्थितिके अन्तिमनिषेकसम्बन्धी द्रव्यका अपकर्षणकरके उदयादि निषेकोमे निक्षेपण किया अर्थात् दिया । अनन्तर अगले समयमे द्वितीयावलि के प्रथमनिषेकका उत्कर्षण करनेके लिये उस अनन्तरसमयमें उत्कृष्टस्थितिस हेत बंधनेवाले कर्मकी उत्कृष्ट आबाधाको अतिस्थापना कर प्रथमादि निषेकोमे निक्षेपण होता है, किन्तु अन्तके एक समयाधिक आवलिप्रमाण निपेकोमे निक्षेपण नही होता । अत एकसमयाधिक आवली और आबाधाकाल इन दोनोसे न्यून उत्कृष्टस्थितिप्रमाण उत्कृष्टनिक्षेप हैं ।


अहवावलिगदुवरठ्ठिदपढमणिसेगे वरस्स बंधस्स ।
विदियणिसेगप्पहुदिसु णिक्खित्ते जेट्ठणिक्खेवो ॥६५॥

अर्थ: अथवा, आवलि व्यतीत हो जानेपर उत्कृष्टस्थिति के प्रथमनिषेकका द्रव्य बंधनेवाली उत्कृष्टस्थितिके द्वितीयादि निषेकमे निक्षेपण करनेपर उत्कृष्टनिक्षेप होता है२ ।


उक्कस्सट्ठिदिबंधे आबाहागा ससमयमावलियं ।
ओदरियणिसेगेसुक्कड्डेसु अवरमावलियं ॥६६॥

अर्थ: उत्कृष्टस्थितिका बन्ध होनेपर उस कर्मबन्धके आबाधाकालसम्बन्धी चरमसमयसे एकसमयअधिक आवलिकाल पूर्वतक जो उदय आने योग्य सत्कर्मनिषेक हैं, उनके द्रव्यका उत्कर्षण होनेपर आवलिप्रमाण जघन्यअतिस्थापना होती है ।


ओदरिय तदो बिदीयावलिपढमुक्कड्ढणे वरं हेट्ठा ।
अइच्छाएणमाबाहा समयजुदावलियपरिहीणा ॥६७॥

अर्थ: वहासे उतरकर सत्कर्मसम्बन्धी द्वितीयावलिके प्रथमनिषेक ( जो वर्तमानसमयसे आवलिकालके बाद उदयमे आवेगा ) का उत्कर्षण होनेपर अधस्तन समयाधिकआवलिसे हीन आबाधाकालप्रमाण उत्कृष्ट-अतिस्थापना होती है ।


उदयाणामावलिम्हि य उभयाणं बाहिरम्मि खिवणाट्ठं ।
लोयाणमसंखेज्जो कमसो उक्कड्ढणो हारो ॥६८॥

ओक्कड्डिदइगिभागे पत्तासंखेण भाजिदे तत्थ ।
बहुभागमिदं दव्वं उव्वरिल्लठिदीसु णिक्खिवदि ॥६९॥

सेसगभागे भजिदे असंखलोगेण तत्थ बहुभागं ।
गुणसेढीए सिंचदि सेसेगं च उदयम्हि ॥७०॥

उदयावलिस्स दव्वं आवलिभजिदे दु होदि मज्झधणं ।
रूऊणद्धाणद्धेणूणेण णिसेयहारेण ॥७१॥

मज्झिमधणमवहरिदे चयं चयं णिसेयहारेण ।
गुणिदे आदिणिसेयं विसेसहीणे कमं तत्तो ॥७२॥

ओक्कड्डिद्म्हि देदि हु असंखसमयप्पबद्धमादिम्हि ।
संखातीदगुणाक्कममसंख्यहीणं विसेसहीणकमं ॥७३॥

अर्थ (गाथा 68 से 73): उदयवान प्रकृतियोका उदयावलिमे क्षेपण करनेके लिए तथा उदय व अनुदयरूप दोनो प्रकारकी प्रकृतियोका उदयावलिसे बाहर क्षेपण करनेके लिए भागहार क्रमश असंख्यातलोक व अपकर्षणभागहारप्रमाण है । एकभागप्रमाण अपकर्षितद्रव्य को पल्यके असंख्यातवेभागसे भाजित करनेपर बहुभाग उपरितन स्थितियोमे दिया जाता है । शेष एकभावको असंख्यातलोकसे भाजित करनेपर बहुभाग गुणश्रेणिमे दिया जाता है और शेष एकभाग उदयावलिमे दिया जाता है । उदयावलिमे दिये जाने वाले द्रव्यको आवलिसे भाजित करनेपर मध्यधन होता है । एककम अद्ध्वानके आधे को निषेकभागहारमे से घटानेपर जो शेष रहे उसका मध्यमधनमे भाग देनेपर चयका प्रमाण प्राप्त होता है । चयको निषेकभागहारसे गुणा करनेपर प्रथमनिषेक प्राप्त होता है, उससे ऊपरके निषेक चयहीन-चयहीन क्रमसे है । अपकर्षितद्रव्यमे से गुणश्रेणिके प्रथमनिषेकमे असंख्यातसमयप्रबद्धप्रमाण द्रव्य देता है आगे गुणश्रेणिशीर्षतक असंख्यातगुणित क्रमसे देता है, अनन्तर असंख्यातगुणे हीन और उससे आगे क्रमसे चयहीन द्रव्य देता है ।


पडिसमयमोक्कड्डदि असंखगुणिदक्कमेण सिंचदि य ।
इदि गुणसेढीकरणं आउगवज्जाण कम्माणं ॥७४॥

अर्थ: प्रतिसमय असंख्यातगुणित क्रमसे द्रव्यका अपकर्षण करके सिंचन करता है । आयुके बिना शेष कर्मोंकी इसप्रकार गुणश्रेणि करता है ।


पडिसमयमसंखगुणं दव्वं संकमदि अप्पसत्थाणं ।
बंधुज्झियपयडीणं बंधंतसजादिपयडीसु ॥७५॥

एवंविह संकमणं पढमकसायाण मिच्छमिस्साणं ।
संजोजणखवणाए इदरेसिं उभयसेढिम्मि ॥७६॥

अर्थ (गाथा 75 से 76): प्रतिसमय बन्धरहित अप्रशस्तप्रकृतियोका द्रव्य असंख्यातगुणित क्रमसे बध्यमान स्वजाति प्रकृतियोंमें संक्रमण करता है । प्रथमअनन्तानुबन्धीकषायका ऐसा गुणसंक्रमण विसंयोजनाके कालमे होता है । मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्व का गुण-संक्रमण दर्शनमोहनीयकर्मकी क्षपणामे होता है । शेष अप्रशस्तप्रकृतियोंका गुणसंक्रमण उपशम व क्षपकश्रेणियोमे होता है ।


पढमं अवरवरट्ठिदिखंडं पल्लस्स संखभागं तु ।
सायरपुधत्तमेत्तं इदि संखसहस्सखंडाणि ॥७७॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम स्थितिखण्ड आयामका प्रमाण जघन्यसे तो पल्यका संख्यातवाभाग और उत्कृष्टसे पृथक्त्वसागरप्रमाण है । अपूर्वकरणमे संख्यातहजार स्थितिखण्ड होते हैं ।


आउगवज्जाणं ठिदिघादो पढमं दु चरिमठिदिसत्तो ।
ठिदिबंधो य अपुव्वो होदि हु संखेज्जगुणहीणो ॥७८॥

अर्थ: आयुकर्मको छोड़कर शेषकमोंका स्थितिघात होता है । अपूर्वकरणके प्रथमसमयके स्थितिसत्त्व और स्थितिबन्धसे चरमसमयमे अपूर्व स्थितिसत्त्व तथा स्थितिबन्ध संख्यातगुणाहीन होता है ।


एक्केकट्ठिदिखंडयणिवडणठिदिबंधओसरणाकाले ।
संखेज्जसहस्साणि य णिवडंति रसस्स खंडाणि ॥७९॥

अर्थ: एक स्थितिकाण्डकके पतनकालमे अथवा एक स्थितिबन्धापसरणकालमे संख्यातहजार अनुभागकाण्डकोंका पतन होता है२ ।


असुहाणं पयडीणं अणंतभागा रसस्स खंडाणि ।
सुहपयडीणं णियमा णत्थि त्ति रसस्स खण्डाणि ॥८०॥

अर्थ: अप्रशस्त प्रकृतियोके अनन्तबहुभागका घात होता है। प्रशस्त प्रकृतियो के अनुभाग का घात नियम से नही होता ।


रसगदपदेसगुणाहाणिट्ठाणगफड्डयाणि थोवाणि ।
अइत्थावणणिक्खेवे रसखंडेणंतगुणिदकमा ॥८१॥

अर्थ: अनुभागसम्बन्धी एकप्रदेश गुणहानिस्थानान्तरमे स्पर्धक स्तोक है । उनसे अतिस्थापना अनन्तगुणी है, उससे निक्षेप अनन्तगुणा और उससे अनन्तगुणा अनुभागकाडक है ।


पढमापुव्वरसादो चरिमे समये पसत्थइँदराणं ।
रससत्तमणंतगुणं अणंतगुणहीणयं होदि ॥८२॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम समय सम्बन्धी प्रशस्त-अप्रशस्त प्रकृतियो का जो अनुभाग सत्त्व है उससे अपूर्वकरण के चरम समय मे प्रशस्तप्रकृतियो का अनुभाग तो अनन्तगुणा बढता हुआ तथा अप्रशस्त प्रकृतियो का अनन्तगुणा हीन होता हुआ अनुभाग सत्त्व है ।


बिदियं व तदियकरणं पडिसमयं एक्क एक्क परिणामो ।
अण्णं ठिदिरसखंडे अण्णं ठिदिबंधमाणुवई ॥८३॥

अर्थ: दूसरे करण (अपूर्वकरण) के समान ही तृतीयकरण (अनिवृत्तिकरण) होता है, किन्तु प्रतिसमय एक-एक परिणाम होता है। अन्य स्थितिकाण्डक, अन्य अनुभागकाण्डक और अन्य स्थितिबन्ध को प्रारम्भ करता है ।


संखेज्जदिमे सेसे दंसणमोहस्स अंतरं कुणइ ।
अण्णं ठिदिरसखंडं अण्णं ठिदिबंधणं तत्थ ॥८४॥

अर्थ: (अनिवृत्तिकरणकाल का) संख्यातवाभाग शेष रह जाने पर दर्शनमोहनीयकर्मका अन्तर करता है। वहा पर अन्यस्थितिकाण्डक अन्य अनुभागकाण्डक और अन्य ही स्थितिबन्ध होता है ।


एयट्ठिदिखंडुक्कीरणकाले अंतरस्स णिप्पत्ती ।
अंतोमुहुत्तमेत्तं अंतरकरणस्स अद्धाणं ॥८५॥

अर्थ: एक स्थितिकाण्डकोत्कीरणकाल के द्वारा अन्तरकी निष्पत्ति होती है । अन्तरकरणका अध्वान अन्तर्मुहूर्त मात्र है ।


गुणसेढीए सीसं तत्तो संखगुणं उवरिमठिदिं च ।
हेट्ठुवरिम्हि य आबाहुज्झिय बंधम्हि संछुहदि ॥८६॥

अर्थ: गुणश्रेणी शीर्ष और उससे संख्यातगुणे उपरितन निषेको के मिथ्यात्व द्रव्य को ग्रहण कर नीचे प्रथम स्थिति मे और ऊपर उस समय बंधने वाले मिथ्यात्व-कर्म की आबाधा को उल्लंघ करके बंधने वाले कर्मों के निषेकों के साथ द्वितीय स्थिति मे देता है।


अंतरकदपढमादो पडिसमयमसंखगुणिदमुवसमदि ।
गुणसंकमेण दंसणमोहणियं जाव पढमठिदी ॥८७॥

अर्थ: अन्तर कर चुकने के पश्चात् प्रथम समय से प्रथमस्थिति के अन्त तकं प्रतिसमय गुणसक्रमण के द्वारा असंख्यातगुणे क्रमसे दर्शनमोह को उपशमाता है ।


पढमट्ठिदियावलिपडिआवलिसेससु णत्थि आगाला ।
पडिआगाला मिच्छत्तस्स य गुणसेढिकरणं पि ॥८८॥

अर्थ: प्रथम स्थिति मे आवली प्रत्यावली अर्थात् उदयावली और द्वितीयावली अवशेष रहने पर आगल-प्रत्यागाल तथा मिथ्यात्व की गुणश्रेणी नही होती है ।


अंतरपढमं पत्ते उवसमणामो हु तत्थ मिच्छत्तं ।
ठिदिरसखंडेण विणा उवट्टाइदूण कुणदि तिधा ॥८९॥

अर्थ: अन्तर के प्रथम समय को प्राप्त होने पर उपशम सम्यग्दृष्टिजीव वहां पर मिथ्यात्व को अपवर्तन करके स्थितिकांडकघात व अनुभागकाण्डकघात के बिना तीन प्रकार करता है ।


मिच्छत्तमिससम्मसरूवेण य तत्तिधा य दव्वादो ।
सत्तीदो य असंखाणंतेण य होंति भजियकमा ॥९०॥

अर्थ: मिथ्यात्व, मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व), सम्यक्त्व प्रकृतिरूप दर्शनमोहनीय कर्म तीन प्रकार होता है वह क्रमसे द्रव्य की अपेक्षा असंख्यातवा भाग मात्र और अनुभाग की अपेक्षा अनन्तवा भाग प्रमाण जानना२ ।


पढमादो गुणसंकमचरिमोत्ति य सम्ममिस्ससम्मित्ते ।
अहिगदिणाऽसंखगुणो विज्झादो संकमो तत्तो ॥९१॥

अर्थ: गुणसक्रम कालके प्रथम समय से अन्तिम समय पर्यन्त प्रतिसमय सर्प की गति के समान असंख्यातगुणे क्रम सहित मिथ्यात्वरूप द्रव्य है वह सम्यक्त्व और मिश्रप्रकृति रूप परिणमता है । इसके (गुणसंक्रमण के) पश्चात् विध्यात संक्रमण होता है ।


विदियकरणादिमादो गुणसंकमपूरणस्स कालोत्ति ।
वोच्छं रसखंडुक्कीरणकालादीणमप्प बहु ॥९२॥

अर्थ: अपूर्वकरण के प्रथम समय से गुणसक्रमणकाल के पूर्ण होने तक किये जाने वाले अनुभागकाण्डकोत्कीरणकालादि का अल्पबहुत्व कहेगे । (इस प्रकार प्रस्तुत गाथा मे आचार्यदेव ने आगे किये जाने वाले कथन की प्रतिज्ञा की है । )


अंतिमरसखंडुक्कीरणकालादो दु पढमओ अहियो ।
तत्तो संखेज्जगुणो चरिमट्ठिदिखंडहदिकालो ॥९३॥

अर्थ: अन्तिम अनुभागकाण्डकोत्कीरण काल से प्रथम अनुभाग काण्डकोत्कीरणकाल विशेषाधिक है । उससे अन्तिम स्थितिकाण्डक काल व स्थितिबन्धापसरणकाल सख्यातगुणा है ।


तत्तो पढमो अहिक्को पूरणगुणसेढिसीसपढमठिदी ।
संखेण य गुणियकमा उवसमगद्धा विसेसहिया ॥९४॥

अर्थ: चरम स्थितिकाण्डकोत्कीरण काल से प्रथमस्थितिकाण्डकोत्कीरण काल अधिक है। इससे सम्यक्त्वप्रकृति व सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र प्रकृति) के पूरण का काल सख्यात गुणा है। इससे गुणश्रेणीशीर्ष संख्यातगुणा है, इससे प्रथम स्थिति सख्यातगुणी है और इससे उपशम करने का काल विशेषाधिक है।


अणियट्टीसंखगुणो णियट्टिगुणसेढियायदं सिद्धं ।
उवसंतद्धा अंतर अवरवरावाह संखगुणियकमा ॥९५॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण का काल संख्यातगुणा है इससे अपूर्वकरण का काल, गुणश्रेणि का आयाम, उपशम सम्यक्त्वका काल, अन्तरायाम, जघन्य आबाधा और उत्कृष्ट आवाधा ये संख्यातगुणित क्रम से है ।


पढमापुव्वजहण्णट्ठिदिखंडमसंखसंगुणं तस्सं ।
अवरवरट्ठिदिबंधा तट्ठिदिसत्ता य संखगुण्णियकमा ॥९६॥

अर्थ: अपूर्वकरण के प्रथम समय मे जघन्य स्थितिखण्ड असंख्यातगुणा है; इससे संख्यातगुणा जघन्य स्थितिबन्ध है । इससे संख्यातगुणा उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है, इससे संख्यातगुणा जघन्य स्थितिसत्त्व तथा उससे संख्यातगुणा उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व है । इसप्रकार संख्यात गुणित क्रम से स्थान जानना ।


अंतोकोडाकोडी जाहे संखेज्जसायरसहस्से ।
ऊणा कम्माण ठिदी ताहे उवसमगुणं गहइ ॥९७॥

अर्थ: जब संख्यात हजार सागर से हीन अन्त.कोडाकोडी प्रमाण स्थिति सत्त्व होता है उस समय मे उपशमसम्यक्त्व गुण को ग्रहण करता है ।


तट्ठाणे ठिदिसत्तो आदिमसम्मेण देससयलजमं ।
पडिवज्जमाणगस्स वि संखेज्जगुणेण हीणकमो ॥९८॥

अर्थ: उसी स्थान मे यदि देशसंयम सहित प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करे तो उसके पूर्वोक्त स्थितिसत्त्व से संख्यातगुणा हीन स्थिति सत्त्व होता है और यदि सकलसंयम सहित प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करे तो उसके उससे भी संख्यातगुणा हीन स्थिति सत्त्व होता है ।


उवसमसम्मत्तद्धा छावलिमित्ता दु समयमेत्तोत्ति ।
अवसिट्ठे आसाणो अणअण्णदरुदयदो होदि ॥१००॥

अर्थ: प्रथमोपशमसम्यक्त्वके काल मे उत्कृष्टकाल छह आवलि और जघन्यकाल एक समय मात्र अवशेष रह जाने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ इन चारों मे से किसी एक के उदय होने से सम्यक्त्व की आसादना ( विराधना ) होकर सासादन गुणस्थान होता है ।


'सायारे पट्ठवगो णिट्ठवगो मज्झिमो य भजिणिज्जो ।
जोगे अण्णदरम्हि दु जहण्णए तेउलेस्साए ॥१०१॥

अर्थ: दर्शनमोहके उपशमन का प्रस्थापक जीव साकार उपयोग मे विद्यमान होता है, किन्तु उसका निष्ठापक और मध्य अवस्थावर्ती जीव भजितव्य है । तीनो योगो मे से किसी एक योग मे विद्यमान तथा तेजोलेश्या के जघन्य अंश को प्राप्त वह जीव दर्शनमोह का उपशामक होता है ।


'अंतोमुहुत्तमद्धं सव्वोवसमेण होदि उवसंतो ।
तेण परं उदओ खलु तिण्णेक्कदरस्स कम्मस्स ॥१०२॥

अर्थ: अन्तर्मुहूर्त काल तक सर्वोपशमसे उपशान्त रहता है इसके पश्चात् नियम से तीन कर्म प्रकृतियो मे से किसी एक का उदय होता है ।


उवसमसम्मतुवरिं दंसणमोहं तुरंत पूरेदि ।
उदयिल्लस्सुदयादो सेसाणं उदयबाहिरदो ॥१०३॥

अर्थ: उपशम सम्यक्त्वकाल के ऊपर जो दर्शनमोह के अन्तरायाम का शेष भाग, उसको शीघ्र ही पूरता है । उदयवान प्रकृतिके द्रव्य को तो उदयस्थिति से देना प्रारम्भ करता है और शेष दो अनुदय प्रकृति के द्रव्य को उदयावलि से बाहर देता है ।


ओक्कट्टिदट्ठइगिभागं समपउट्टीए विसेसहीणकमं ।
सेसासंखाभागे विसेसहीणेण खिवदि सव्वत्थ ॥१०४॥

अर्थ: अपकृष्ट द्रव्यका एक भाग तो चय (विशेष) हीन क्रम से उदयावलि मे देना शेष असंख्यात बहुभाग सर्वत्र विशेष (चय) हीन क्रम से दिया जाता है । अपकृष्टावशिष्ट द्रव्य कहते है, उस द्रव्यमे से, अन्तर्रायामके निषेकोका अभाव था उन निषेकोका सद्भाव करने के लिये कितना एक (कुछ) द्रव्य दिया जाता है । उस देय द्रव्यका कितना प्रमाण है यह जाननेका विधान कहते है- नानागुणहानिमे स्थित सम्यक्त्वप्रकृतिकी द्वितीयस्थितिके द्रव्यको अपकर्षण भागहारका भाग देकर एक भाग पृथक् करके अवशिष्ट बहुभागप्रमाण द्रव्यमे “द्विवड्ढगुणहाणिभाजिदे पढमा”१ इस सूत्र द्वारा साधिक डेढ़गुणहानिप्रमाणका भाग देने पर उस द्वितीय स्थितिके प्रथम निषेकका प्रमाण प्राप्त होता है, सो इसके बराबर अतरायामके सर्व निषेकोको चय रहित स्थापित करके जोडनेसे आदिधनका प्रमाण प्राप्त होता है । ‘पवहतमुखमादिधन’२ इस करण सूत्रसे अन्तर्रायामप्रमाण गच्छसे उस प्रथम निषेकको गुणा करने पर अन्तर्रायामके निषेकोका आदिधन प्राप्त हुआ । तथा द्वितीय स्थितिके नीचे अन्तर्रायामके निषेक है इसलिये द्वितीयस्थितिके आदि निषेकसे चय वृद्धि (बढ़ते) क्रमसे अन्तर्रायामके निषेक है । चयका प्रमाण प्राप्त करने की विधि कहते है- द्वितीय स्थितिकी प्रथमगुणहानिके प्रथमनिषेक से अधस्तनवर्ती अन्तर्रायाम सम्बन्धी गुणहानिके प्रथम निषेकका द्रव्य दोगुना प्रमाण युक्त चय है । इसको दो गुणहानिका भाग देनेपर अन्तर्रायाममे चयका प्रमाण प्राप्त होता है । “सैकपदाहृतपददलचयहतमुत्तरधन”३ इस सूत्रसे यहा अन्तर्रायामप्रमाण गच्छ है, सो एक अधिक गच्छसे गच्छके आधेको गुणा करके पुन: चयसे गुणा करनेपर उत्तरधन प्राप्त होता है । इसप्रकार प्राप्त आदिधन और उत्तरधन (चयधन) को जोडनेपर जो प्रमाण प्राप्त हुआ उतना द्रव्य उक्त अपकृष्टावशिष्ट द्रव्य से ग्रहणकर अन्तर्रायाममे देना । द्वितीय


मिच्छाइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि ।
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं वा अणुवइट्ठं ॥१०६॥

अर्थ (गाथा 106 से 108): मिथ्यात्व का वेदन करनेवाला जीव विपरीत श्रद्धानवाला होता है । जैसे ज्वर से पीडित मनुष्य को मधुर रस नही रुचता है वैसे ही मिथ्यादृष्टि को धर्म नहीं रुचता । मिथ्यादृष्टिजीव नियम से उपदिष्ट प्रवचन का श्रद्धान नहीं करता, उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भाव का श्रद्धान करता है ।


प्रथमोपशमसम्यक्त्व चूलिका


सव्वेहिं द्विदिविसेसेहिं उवसंता होंति तिण्णि कम्मंसा ।
एक्कम्हि य अणुभागे णियमा सव्वे द्विदि विसेसा ॥१॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्म की तीनो प्रकृतिया सभी स्थिति विशेषो के साथ उपशान्त रहती हैं तथा सभी स्थिति विशेष नियमसे एक अनुभागमे अवस्थित रहते हैं ।


सम्मत्तपढमलंभो सव्वोवसमेण तह वियट्ठेण ।
भजियव्वो य अभिवक्खं सव्वोवसमेण देसेणं ॥२॥

अर्थ: सम्यक्त्व का प्रथम लाभ सर्वोपशम से ही होता है तथा विप्रकृष्ट जीव के द्वारा भी सम्यक्त्व का लाभ सर्वोपशम से ही होता है, किन्तु शीघ्र ही पुनः पुनः सम्यक्त्व को प्राप्त करने वाला जीव सर्वोपशम और देशोपशम से भजनीय है।


मिच्छत्तपच्चयओ खलु बंधो उवसामगस्स बोद्धव्वो ।
उवसंते आसाणे तेण परं होदि भजिदव्वो ॥२॥

अर्थ: दर्शनमोहनीयका उपशम करने वाले जीवके नियम से मिथ्यात्व निमित्तक बन्ध जानना चाहिए, किन्तु उसके उपशान्त रहते हुए मिथ्यात्वनिमित्तक बन्ध नही होता तथा उपशात अवस्था के समाप्त होने के पश्चात् मिथ्यात्व निमित्तक बन्ध भजनीय है ।


मिच्छत्तवेदणीय कम्म उवसामगस्स बोद्धव्व ।
उवसंते आसाणे तेण परं होदि भजिदव्वो ॥३॥

अर्थ: दर्शनमोहनीय का उपशम करने वाले जीव के मिथ्यात्वकर्म का उदय जानना चाहिए। दर्शनमोह की उपशान्त अवस्था मे मिथ्यात्वकर्म का उदय नही होता । उपशमसम्यक्त्व की आसादना के अनन्तर उसका ( मिथ्यात्वका) उदय भजनीय है।


सम्मत्तपढमलंभस्साणंतरं पच्छदो य मिच्छत्तं ।
लभस्स अपढमस्स दु भजिदव्वो पच्छदो होदि ॥५॥

अर्थ: सम्यक्त्व के प्रथम लाभ-(उपशमसम्यक्त्व) के अनन्तर ( पच्छदो ) पूर्व मिथ्यात्व ही होता है । अप्रथमलाभ (क्षयोपशम सम्यक्त्व) के ( पच्छदो ) पूर्व मिथ्यात्व भजनीय है’ ।


मिस्सुदये सम्मिस्सं दहिगुडमिस्सं व तच्चमियरेण ।
सदहदि एक्कसमये मरणे मिच्छो व अयदो वा ॥१०७॥

अर्थ: मिश्रप्रकृति के उदय मे दधि और गुड के मिश्रित स्वादके समान एक समयमे सम्यक्त्व व मिथ्यात्व मिश्रित तत्त्व का इतर जाति ( जात्यन्तर ) रूप श्रद्धान होता है । मरणकाल मे मिथ्यात्व या असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान होता है । जो नियम से मिथ्यादृष्टि जीव है वह नियम अर्थात् निश्चय से जिनेन्द्र द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का श्रद्धान नही करता है ।


मिच्छत्तं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणं होदि ।
ण य धम्मं रोचेदि हु मधुरं खु रसं जहा जुरिदो ॥१०८॥


अथ क्षायिकसम्यक्त्व प्ररूपणा अधिकार


दंसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजो मणुसो ।
तित्थयरपायमूले केवलिसुदकेवलीमूले ॥११०॥

अर्थ: कर्मभूमि मे उत्पन्न हुआ मनुष्य तीर्थङ्कर के या अन्यकेवली अथवा श्रुतकेवली के पादमूल मे दर्शनमोहकी क्षपणा का प्रस्थापक-प्रारम्भ करनेवाला होता है।


णिट्ठवगो तट्ठाणे विमाणभोगावणीसु धम्मे य ।
किदकरणिज्जो चदुसु वि गदीसु उप्पज्जदे जम्हा ॥१११॥

अर्थ: प्रारम्भक काल के अनन्तर समय से लगाकर क्षायिकसम्यक्त्व ग्रहण के समय से पहले तक निष्ठापक होता है । यह निष्ठापक जहा दर्शनमोह की क्षपणा का प्रारम्भ हुआ वहा ही या सौधर्मादिस्वर्गोमे या कल्पातीत विमानो मे या भोगभूमिज मनुष्य-तिर्यंचो मे अथवा प्रथम धर्मानरक मे होता है; अर्थात् निष्ठापक इतनी जगह हो सकता है, क्योकि बद्धायुष्क कृतकृत्य वेदक सम्यक्त्वी मरकर चारो गतियो मे उत्पन्न होता है ।


अणियट्टीअद्धाए अणस्स चत्तारि होंति पठवाणि ।
सायरलक्खपुधत्तं पल्लं दूरावकिट्ठि उच्छिट्ठं ॥११३॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणकाल में अनन्तानुबन्धीकषायके पृथक्त्वलखसागर, पल्यप्रमाण, दूरापकृष्टिप्रमाण और उच्छिष्टावलि प्रमाणरूप चार स्थितिसत्त्व होते है ।


पल्लस्स संखभागो संखा भागा असंखगा भागा ।
ठिदिखंडा होंति कमे अणस्स पठवादु पण्वोत्ति ॥११४॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धीके स्थितिसत्त्वके प्रथम पर्वसे दूसरे पर्व पर्यन्त, दूसरे से तीसरे पर्व पर्यन्त और तीसरे से चौथे पर्व पर्यन्त जो स्थितिकाण्डक होते है उनका आयाम क्रम से पल्यका संख्यातवाभाग, पल्यका संख्यात बहुभाग और पल्यका असख्यात बहुभागमात्र है ।


अणियट्टीसंखेज्जा भागेसु गदेसु अणगठिदिसत्तो ।
उदधिसहस्सं तत्तो वियले य समं तु पल्लादी ॥११५॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणकालके संख्यात बहुभाग व्यतीत होने पर एक भाग अवशिष्ट रहनेपर अनन्तानुबन्धीका स्थितिसत्त्व एक हजारसागर प्रमाण, पश्चात् विकलेन्द्रियके बन्ध समान, पश्चात् पल्य और आदि शब्दसे दूरापकृष्ट और आवलिमात्र होता है ।


उवधिसहस्सं तु सयं पण्णं एगवीसमेक्कयं चेव ।
वियलचउक्के एगे मिच्छुक्कस्सट्ठिदी होदि ॥११६॥

अर्थ: दर्शनमोह की क्षपणाके पहले तीनकरण विधान द्वारा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ की उदयावलिसे बाह्य की स्थितिका अनिवृत्तिकरणके अन्त समयमे नियमसे विसंयोजन करता है । विकल चतुष्क अर्थात् असञ्ज्ञी पचेन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रिय के मिथ्यात्व का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध क्रमसे एकहजारसागर, सौ सागर, पचास सागर, पच्चीससागर और एक सागरप्रमाण होता है । इन्ही के समान अनन्तानुबन्धी का स्थितिसत्त्व होता है । इसका कथन पूर्व मे किया ही है ।


अंतोमुहुत्तकालं विस्समिय पुणोवि त्तिकरणं करिय ।
अणियट्टीए मिच्छं मिस्सं सम्मं कमेण णासेइ ॥११७॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धीका विसयोजन करनेके पश्चात् अन्तर्मुहूर्त तक विश्राम करके फिर तीन करणोको करता है। अनिवृत्तिकरणकालमे मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति को नष्ट करता है ॥११७॥


अणियट्टीकरणपढमे दंसणमोहस्स सेसगाण ठिदी ।
सायरलक्खपुधत्तं कोडीलक्खपुधत्तं च ॥११८॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें दर्शनमोहकी स्थिति पृथक्त्व लक्षसागरप्रमाण है और शेष कर्मोंकी स्थिति पृथक्त्व लक्षकोटिसागर प्रमाण है ॥११८॥


असंठिदिसत्तादो पुधत्तमेत्ते पुधत्तमेत्ते य ।
ठिदिखंडे य हवंति हु चउ ति दु एक्क पल्लठिदी ॥११९॥

अर्थ: विसयोजना करता है । इन करणोका लक्षण दर्शनमोहकी उपशामनामे जिसप्रकार कहा गया है उसीप्रकार यहा जानना चाहिये, क्योकि कोई विशेषता नही है । अधप्रवृत्तकरणरूप विशुद्धि द्वारा अन्तर्मुहूर्त कालतक विशुद्ध होने वाले जीवके प्रतिसमय केवल अनन्तगुणी विशुद्धि से विशुद्ध होता जाता है । अध प्रवृत्तकरण मे स्थितिघात, अनुभागघात, गुणश्रेणि और गुणसक्रमण नही होता, क्योकि अध प्रवृत्तकरणरूप विशुद्धि स्थितिघात आदि का कारण नही है । हजारो स्थितिवन्धापसरण, अशुभकर्मों का प्रतिसमय अनन्तगुणीरूप से अनुभागबन्धापसरण और शुभ कर्मोंका अनन्तगुणी वृद्धिरूप से चतु स्थानीय अनुभागबन्ध यह अध प्रवृत्तकरण विशुद्धियोका फल जानना चाहिये ।

अपूर्वकरणमे स्थितिघात, अनुभागघात, गुणश्रेणि और गुणसंक्रमण है । यहा की गुणश्रेणि सम्यक्त्वकी उत्पत्ति, सयतासयत और सयतसम्बन्धी गुणश्रेणियोसे प्रदेशोकी अपेक्षा असख्यातगुणी है तथा उनके आयामसे सख्यातगुणी हीन है । परन्तु गुणसक्रम अनन्तानुबन्धियोका ही होता है, अन्य कर्मोंका नही होता ऐसा कहना चाहिए । इसप्रकार प्रत्येक हजारो अनुभागकाडकोके अविनाभावी ऐसे स्थितिवन्धापसरणोके साथ होनेवाले हजारो स्थितिकाण्डको के द्वारा अपूर्वकरणके कालको समाप्त करता है । अपूर्वकरणके प्रथमसमयमे जो स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्म होता है उससे उसके अन्तिम समयमे स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्म सख्यातगुणा हीन होता है । तत्पश्चात् प्रथमसमयवर्ती अनिवृत्तिकरणवाला हो जाता है । तव अनन्तानुबन्धियोका स्थितसत्कर्म अन्त कोडाकोडीके भीतर लक्षपृथक्त्वसागरोपमप्रमाण होता है । शेष कर्मोंका अन्त:कोडाकोडीके भीतर होता है । फिर भी अनिवृत्तिकरणमे प्रविष्ट हुए जीवके भी इसीप्रकार स्थितिकाडक, अनुभागकाडक, स्थितिवन्धापसरण, गुणश्रेणिनिर्जरा और गुणसक्रम परिणाम व्यामोहके बिना जानना चाहिए ।

अनिवृत्तिकरण मे भी पूर्वोक्त स्थितिकाडकघात, अनुभागकाडकघात, गुणश्रेणि, गुणसक्रमण आदि कार्य होते है । दर्शनमोहकी उपशामना मे जिसप्रकार अनिवृत्तिकरणमे अन्तरकरण होता है, उसप्रकार यहा पर नही होता है, क्योकि दर्शनमोह- दर्शनमोहकी पृथक्त्व लक्षसागरप्रमाण स्थिति प्रथम समयमे सम्भव होती है उससे आगे सख्यातहजार काण्डक होने पर असंज्ञीके बन्धके समान एक हजारसागर स्थितिसत्त्व रहता है । उसके पश्चात् बहुत-बहुत स्थितिकाडक हो जाने पर क्रमसे चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रियके स्थितिबन्धके समान सौ सागर, पचाससागर, पच्चीससागर और एकसागर स्थितिसत्त्व होता है । पश्चात् बहुत स्थितिखण्ड होने पर पल्यप्रमाण स्थितिसत्त्व होता है ॥११९॥ पल्यकी स्थितिसत्त्वके बाद संख्यात बहुभाग आयामवाले संख्यातहजार स्थितिघात होजाने पर नियमसे दूरापकृष्ट संज्ञावाला स्थितिसत्त्व होता है ॥१२०॥ दूरापकृष्ट नामक स्थितिसत्त्वका प्रमाण पल्यके संख्यातवे भागमात्र है । उससे आगे पल्यमे असंख्यातका भाग देनेपर उसमेसे बहुभागप्रमाण आयामवाले संख्यातहजार स्थितिकाण्डक होनेपर सम्यक्त्वप्रकृतिके द्रव्यका अपकर्षण किया उसमे असंख्यात समयप्रबद्धप्रमाण उदीरणारूप द्रव्यको उदयावलीमे देता है । इसके पश्चात् बहुत स्थितिखण्डों के द्वारा मिथ्यात्वकी उच्छिष्टावलि अर्थात् उदयावलि मात्र स्थिति रह जाती है ॥१२१-१२२॥ जिस अवसरमे असंख्यात समयप्रबद्धकी उदीरणा होती है उस समयसे उत्तरकालमें उदयावलीमे द्रव्य देने के लिए भागहार पल्यका असंख्यातवा भागमात्र है । पूर्ववत् असंख्यातलोक मात्र नही है ॥१२३॥ मिथ्यात्वकी उच्छिष्टावलि स्थितिके बाद पल्यके असंख्यात बहुभागवाले संख्यात स्थितिखण्ड व्यतीत हो जानेपर सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका नियमसे उच्छिष्टावलिमात्र स्थितिसत्त्व रहता है ॥१२४॥ जब मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) की उच्छिष्टावलि प्रमाण स्थिति रहती है उसी समयमे रहनेके समयसे सम्यक्त्वप्रकृतिके पल्यके असंख्यात बहुभाग आयामवाले संख्यात


पल्लट्ठिदिदो उवरिं संखेज्जसहस्समेत्तठिदिखंडे ।
दूरावकिट्ठसण्णिदं ठिदिसत्तं होदि णियमेण ॥१२०॥


पल्लस्स संखभागं तस्स पमाणं तदो असंखेज्जं ।
भागपमाणे खंडे संखेज्जसहस्सगेसु तीदेसु ॥१२१॥


सम्मस्स असंखाणं समयपबद्धाणुदीरणा होदि ।
तत्तो उवरिं तु पुणो बहुखंडे मिच्छउच्छिट्ठं ॥१२२॥


जत्थ असंखेज्जाणं समयपबद्धाणुदीरणा तत्तो ।
पल्लासंखेज्जदिमो हारो णासंखलोगमिदो ॥१२३॥


मिच्छुच्छिट्ठादुवरिं पल्लासंखेज्जभागिगे खंडे ।
संखेज्जे समतीदे मिस्सुच्छिट्ठं हवे णियमा ॥१२४॥


मिस्सुच्छिट्ठे समये पल्लासंखेज्जभागिगे खंडे ।
चरिमे पडिदे चेट्ठदि सम्मस्सदवस्सठिदिसत्तो ॥१२५॥

अर्थ: स्थितिघात व्यतीत होकर यहा प्रकृत समयमें होते है । अन्तिमकांडकके पतन होनेपर सम्यक्त्वकी आठवर्षमात्र स्थिति शेष रहती है ॥१२५॥


मिच्छस्स चरमफालिं मिस्से मिस्सस्स चरिमफालिं तु ।
संछुहदि हु सम्मत्ते ताहे तेसिं च वरदव्वं ॥१२६॥

अर्थ: मिथ्यात्वप्रकृतिके अन्तिमकाण्डककी चरमफालि जिस समय सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिमे सक्रमित होती है उस समयमे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका द्रव्य उत्कृष्ट होता है । तथा सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी अन्तिमकांडककी चरमफालिका द्रव्य जिससमय सम्यक्त्वप्रकृतिमे सक्रमित होता है उस समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिका द्रव्य उत्कृष्ट होता है ॥१२६॥


जदि होदि गुणिदकम्मो दव्वमणुक्कस्स समएण्हा । तेसिं ।
अवरठिदी मिच्छदुगे उच्छिट्ठे समयदुगसेसे ॥१२७॥

अर्थ: मिश्रद्विक अर्थात् मिश्रमोहनीय (सम्यग्मिथ्यात्व) और सम्यक्त्वमोहनीय इन दोनो प्रकृतियोकी अपनी अपनी अन्तिमफालियोका द्रव्य कुछकम डेढगुणहानि गुणित समयप्रबद्धप्रमाण है । पूर्वोक्त प्रकार उन दोनो अन्तिमफालियोके द्रव्यमे पल्यके असंख्यातवेभागका भाग देने पर एक भाग गुणश्रेणी निक्षेपमे दिया जाता है । गुणश्रेणि आयामरूप अन्तर्मुहूर्तकाल कम आठवर्ष प्रमाण ऊपरकी स्थितियो मे चरमावलिपर्यन्त ? सदृश चय से हीन इस रचनारूप शेष बहुभाग द्रव्य दिया जाता है । सम्यक्त्वमोहनीय की आठ वर्ष स्थिति करनेके समयसे लेकर ऊपर सर्वत्र उदयादि अवस्थिति गुणश्रेणि आयाम है तथा सम्यक्त्वमोहनीयकी स्थितिमे स्थितिखंड का आयाम अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है । इसके आगे एक-एक स्थितिकाण्डक द्वारा अन्तर्मुहूर्त-अन्तर्मुहूर्त स्थिति घटाता है ।


मिस्सदुगचरिमफाली किंचूणादिवड्डसमयपबद्धपमा।
गुणसेढि करिय तदो असंखभागेण पुव्वं व ॥१२८॥


सेसं विसेसहीणं अडवस्सुवरिमठिदीए संखुद्धे ।
चरमाउलिं व सरिसी रयणा संजायदे एत्तो ॥१२९॥


अडवस्सादो उवरिं उदयादिअवट्ठिदं च गुणसेढी ।
अंतोमुहुत्तियं ठिदिखंडं च य होदि सम्मस्स ॥१३०॥

अर्थ: पुनः इन्ही अन्तिम दो फालिके पतन समयमे-आठवर्षकी स्थिति करनेके समयमे अनन्तगुणा हीन होकर लताके समान एक स्थानीय अनुभाग हुआ । यहासे लेकर पूर्वमे जो अन्तर्मु हूर्त कालके द्वारा अनुभागकाडकघात होता था उसका अभाव हुआ और प्रतिसमय अनन्तगुणे हीन क्रमसे अनुभागका अपवर्तन होने लगा । वहा अनन्तरवर्ती आठवर्ष स्थिति करनेके समयसे पूर्व समयमे निषेकका जो अनुभाग सत्त्व था उससे अनन्तगुणाहीन आठवर्ष स्थिति करनेके समयमे उदयावलिके ऊपरवर्ती उपरितानावलीके प्रथम निषेकका अनुभागसत्त्व अवशिष्ट रहता है । अवशिष्ट अनन्त बहुभागरूप अनुभागका विशुद्धि-विशेषसे अपवर्तन हुआ-नाश हुआ । तथा उसी समयमे उदयावलिके अन्तिम निषेकका अनुभागसत्त्व अपनेसे ऊपरवर्ती उस उपरितानावलिके ( द्वितीयावलि के ) प्रथमनिषेक सम्बन्धी अनुभाग सत्त्वसे अनन्तगुणा हीन रहता है तथा अवशिष्टका नाश होता है । पुन उससे अनन्तगुणा हीन उदयावलिके प्रथम निषेका अनुभागसत्त्व रहता है, शेषका नाश होता है । उससे अनन्तगुणाहीन आठवर्ष स्थितिकरनेके समयसे लेकर अनन्तरवर्ती आगामी समयमे अनन्तगुणाहीन अनुभागसत्त्व होता है । इसप्रकार प्रतिसमय अनन्तगुणा हीन अनुक्रमसे उच्छिष्टावलिके अन्तिम समय पर्यन्त अनुभागका अपवर्तन जानना ।


विदियावलिस्स पढमे पढमस्संते य आदिमणिसेये ।
तिट्ठाणोऽणंतगुणेणूणकमोवट्टणं चरमे ॥१३१॥

अर्थ: द्वितीयावलिके प्रथम निषेक, प्रथमावलि (उदयावलि) के अन्तिम निषेक और उदयरूप प्रथमनिषेक, इन तीनस्थानो मे सम्यक्त्वकी आठवर्षकी स्थितिसे उच्छिष्टावलि पर्यन्त सम्यक्त्वप्रकृतिके अनुभागका प्रतिसमय अनन्तगुणे घटते क्रमसे अपवर्तनघात होता है ।


अडवस्से उवरिम्मि वि दुचरिमखंडस्स चरिमफालित्ति ।
संखातीदगुणक्कम विसेसहीणक्कमं देदि ॥१३२॥

अर्थ: आठवर्ष की स्थिति करनेके अनन्तर समयसे लेकर द्विचरमकाण्डककी अन्तिमफालिके पतन समयतक उदयादि अवस्थित गुणश्रेणिआयाममे असंख्यातगुणा क्रम लिये हुए तथा ऊपर अन्तर्मुहूर्तकम आठवर्षप्रमाण स्थितियोमे विशेषहीन अर्थात् चय घटता क्रम लिये निक्षेपण होता है अर्थात् दिया जाता है ।


अडवस्से संपहियं पुव्विल्लादो असंखसंगुणियं ।
उवरिं पुण संपहियं असंखसंखं च भागं तु ॥१३३॥

ठिदिखंडाणुक्कीरण दुचरिमसमओत्ति चरिमसमये च ।
ओक्कट्टिदफालिगददव्वाणि णिसिंचदे जम्हा ॥१३४॥

अर्थ (गाथा 133 से 134): सम्यक्त्वप्रकृति की आठ वर्ष स्थिति शेष रहने के समयसे मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) और सम्यक्त्व प्रकृति सम्बन्धी काण्डक की चरमफालियो का द्रव्य, पूर्व समय के सम्यक्त्वमोहनीय के सत्त्व द्रव्य से असंख्यातगुणा है । सम्यक्त्व मोहनीय के सत्त्व द्रव्यसे, स्थितिकाण्डकोत्कीर्णकालके द्विचरम समय पर्यन्त अपकर्षित फालिद्रव्य असंख्यातवे भाग है और अन्तिम समयमें अपकर्षित फालिद्रव्य संख्यातवे भाग है । यह द्रव्य निक्षेप किया जाता है ॥१३३-३४॥


अडवस्से संपहियं गुणसेढीसीसयं असंखगुणं ।
पुव्विल्लादो णियमा उवरि विसेसाहियं दिस्सं ॥१३५॥

अर्थ: सम्यक्त्वप्रकृति की आठ वर्ष स्थिति शेष रहने के समय गुणश्रेणीशीर्ष का द्रव्य अधस्तन गुणश्रेणीशीर्षके द्रव्यसे नियमत असंख्यातगुणा है । उपरिम गुणश्रेणि शीर्षो का दृश्यमान द्रव्य अपने अपने से पूर्व गुणश्रेणिशीर्ष के द्रव्यसे विशेषाधिक है ॥ १३५ ॥


अडवस्से य ठिदीदो चरिमेदर फालिपडिददव्वं खु ।
संखासंखगुणाणं तेणुँवरिमदिस्समाणमहियं सीसे ॥१३६॥

अर्थ: सम्यक्त्वप्रकृति की आठ वर्ष प्रमाण स्थिति शेष रहने पर समस्त स्थित द्रव्य से चरम फालि का द्रव्य संख्यातगुणा हीन है और अन्य फालियो का द्रव्य असंख्यातगुणा हीन है इसलिये उपरितन गुणश्रेणिशीर्षका द्रव्य विशेष अधिक है ॥१३६॥


जदि गोउच्छविसेसं रिणं हवे तोवि धणपमाणादो ।
जम्हा असंखगुणं ण गणिज्जदि तं तदो एत्थ ॥१३७॥

अर्थ: यद्यपि अधस्तन गुणश्रेणीशीर्ष से उपरितन गुणश्रेणीशीर्ष मे गोपुच्छ-चय ऋण है अर्थात् घटता है तो भी धन ( मिलाया जाने वाला द्रव्य ) के प्रमाणसे असंख्यातगुणा हीन है । इसलिये इस चयरूप ऋण को नही गिना अर्थात् द्रव्यप्रमाण लानेमे इसको दृष्टिसे ओझल कर घटाया नही गया ॥१३७॥


तत्तक्काले दिस्सं वज्जिय गुणसेडिसीसयं एक्कं ।
उवरिमठिदीसु वट्टदि विसेसहीणक्कमेणेव ॥१३८॥

अर्थ: उस समय गुणश्रेणिशीर्ष को छोडकर उपरिम स्थितियो मे दृश्यमान द्रव्य प्रत्येक निषेकमे विशेषहीन क्रमसे वर्तन करता है ॥१३८॥


गुणसेडिसंखभागं तत्तो संखगुणं उवरिमठिदीओ ।
सम्मत्तचरिमखंडो दुचरिमखंडादु संखगुणो ॥१३९॥

अर्थ: गुणश्रेणि के संख्यात बहुभाग को और उससे संख्यातगुणी उपरितन स्थितियोको घात के लिये ग्रहण करने वाला चरम स्थितिकाण्डक, द्विचरम स्थितिकाण्डक घात से संख्यातगुणा है ।


सम्मतचरिमखंडे दुच्चरिमफालित्ति तिण्णि पढवाओ ।
संपहियपुव्वगुणसेढीसीसे सीसे य चरिमम्हि ॥१४०॥

तत्थ असंखेज्जगुणं असंखगुणहीणयं विसेसूणं ।
संखातीदगुणं विसेसहीणं च दत्तिकमो ॥१४१॥

ओक्कट्टिद बहुभागे पढमे सेसेक्कभागबहुभागे ।
बिदिए पढवेवि सेसिगभागं तदिये जहा देदि ॥१४२॥

अर्थ (गाथा 140 से 142): सम्यक्त्व प्रकृतिके अन्तिम स्थितिकाण्डककी द्विचरमफालि तक दीयमान द्रव्यके तीन पर्व (श्रेणिया) है। वर्तमान इस समयकी गुणश्रेणिशीर्ष तक, प्राचीन गुणश्रणिशीर्ष तक, अन्तिम स्थिति काण्डक के अन्त तक। प्रथम पर्व मे अपकर्षित द्रव्यका असख्यात बहुभाग असख्यातगुणे क्रमसे दिया जाता है, उससे अनन्तर स्थितिमे असंख्यातगुणा हीन द्रव्य दिया जाता है । दूसरे पर्वमे शेष असंख्यातवे भागका असंख्यातबहुभाग द्रव्य विशेष हीन क्रमसे दिया जाता है, उससे अनन्तर स्थितिमे असंख्यातगुणा हीन द्रव्य दिया जाता है । तृतीय पर्व मे शेष एकभाग प्रमाण द्रव्य विशेष हीन क्रमसे दिया जाता है ।


उदयादिगलिदसेसा चरिमे खंडे हवेज्ज गुणसेढी ।
फाडेदि चरिमफालिं अणियट्टीकरणचरिमम्हि ॥१४३॥


चरिम फालिं देदि हु पढमे पब्वे असंखगुणिदकमा ।
अंतिमसमयम्हि पुणो पल्लासंखेज्जमूलाणि ॥१४४॥

अर्थ: अन्तिमकाण्डककी अन्तिमफालिका द्रव्य प्रथम पर्व (गलितावशेष गुणश्रेणि) मे असंख्यात- गुणित क्रमसे दिया जाता है। अन्तिम समयमे पल्यके असंख्यात प्रथम वर्गमूल प्रमाण द्रव्य दिया जाता है।


चरिमे फालि दिण्णे कदकरणिज्जेत्ति वेदगो होदि ।
सो वा मरणं पावइ चउगइगमणं च तद्भागे ॥१४५॥

देवेसु देवमणुए सुरणरतिरिए चउग्गईसुं पि ।
कदकरणिज्जुप्पत्ती कमेण अंतोमुहुत्तेण ॥१४६॥

अर्थ (गाथा 145 से 146): अन्तिमफालि द्रव्य के दिये जाने पर कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि होता है । वहां मरण होवे तो चारो गतियोंमें जा सकता है । यदि अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथम भाग मे मरे तो देवगतिमे ही उत्पन्न होता है । तत्प्रमाण दूसरे भागमे मरण हो तो देव या मनुष्यो मे उत्पन्न होता है । तत्प्रमाण तृतीय भागमे मरण हो तो देव, मनुष्य या तिर्यंच (इन तीनो मे से किसी भी गति) मे उत्पन्न होता है । तत्प्रमाण चतुर्थभागमे मरण हो तो चारो गतियोमे उत्पन्न हो सकता है । सम्यक्त्वप्रकृतिके अन्तिम काण्डककी प्रथम फालिके पतन समयमे लेकर द्विचरमफालिके पतन समय पर्यन्त उदयादिगलितावशेष गुणश्रेणि आयाम जानना। अवशिष्ट अनिवृत्तिकरणकालके अन्तिम समयमे अन्तिम काण्डककी चरमफालिका पतन होता है।


करणपढमादु जावय किदुकिच्चुवरिं मुहुत्तअंतोत्ति ।
ण सुहाण परावत्ती सा धि कओदावरं तु वरिं ॥१४७॥

अर्थ: अध करण से लेकर कृतकृत्यवेदक के ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल तक शुभ लेश्या को बदलता नही अर्थात् शुभ लेश्यामे अवस्थित रहता है। अन्तर्मुहूर्त पश्चात् यदि अन्य लेश्या रूप परिणमता है तो जघन्य कापोतलेश्याका अतिक्रम नही करता है।


अणुसमओ वट्ठाणं कदकिज्जंतोत्ति पुव्वकिरियादो ।
वट्टदि उदीरणां वा असंखसमयप्पबद्धाणं ॥१४८॥

अर्थ: पूर्व प्रयोग वश कृतकृत्यवेदक कालके अन्त तक प्रतिसमय सम्यक्त्वके अनुभागका अनन्तगुणी हानिरूप से अपवर्तन होता है तथा कृतकृत्य वेदककालमें एक समय अधिक एक आवलिकाल शेष रहने तक असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा भी होती है ।


उदयवहिं ओक्कट्टिय असंखगुणमुदयआवलिम्हि खिवे ।
उवरिं विसेसहीणं कदकिज्जो जाव अट्ठठवणं ॥१४९॥

अर्थ: उदयावलिसे बाहरके द्रव्यको अपकर्षित करके उदयावलिमे असंख्यातगुणे क्रमसे दिया जाता है उससे ऊपर कृतकृत्यवेदककाल मे अतिस्थापना शेष रहने तक विशेषहीन क्रमसे द्रव्य दिया जाता है ॥१४९॥


जदि संकिलेसजुत्तो विसुद्धिसहिदो अतो वि पडिसमयं ।
दव्वमसंखेज्जगुणं ओक्कट्टदि णत्थि गुणसेढी ॥१५०॥

अर्थ: कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि चाहे संक्लेशको प्राप्त हो चाहे विशुद्धिको तो भी उसके एक समय अधिक आवलिकाल शेष रहने तक प्रतिसमय असंख्यातगुणे द्रव्यका अपकर्षण होता है, किन्तु गुणश्रेणि नही होती ॥१५०॥


जदि वि असंखेज्जाणं समयपबद्धाणुदीरणा तोवि ।
उदयगुणसेढिठिदिए असंखभागो दु पडिसमयं ॥१५१॥

अर्थ: यद्यपि असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा होती है तथापि प्रतिसमय उदय द्रव्यसे उत्कृष्ट उदीरणा द्रव्य असंख्यातवेंभाग मात्र है ॥१५१॥


विदियकरणादिमादो कदकरणिज्जस्स पढमसमओत्ति ।
वोच्छं रसखंडुक्कीरणकालादीणमप्पबहु ॥१५२॥

अर्थ: द्वितीय करण (अपूर्वकरण) के प्रथमसमय से लेकर कृतकृत्यवेदक के प्रथम समयपर्यन्त अनुभागकाण्डकोत्कीरण कालादिक के अल्पबहुत्वसम्बन्धी ३३ स्थानों का कथन आगे करेंगे ।


रसठिदिखंडुक्कीरणअद्धा अवरं वरं च अवरवरं ।
सव्वत्थोवं अहियं संखेज्जगुणं विसेसहियं ॥१५३॥


कद्दकरणसम्मखवणाणियट्टिअपुव्वद्ध संखगुणिदकमं ।
तत्तो गुणसेढिस्स य णिक्खेवो साहियो होदि ॥१५४॥


सम्मदुचरिमे चरिमे अडवस्सरूसादिमे य ठिदिखंडा ।
अवरवरावाहावि य अडवस्सं संखगुणिदकमा ॥१५५॥

अर्थ: उत्कृष्ट आबाधा संख्यातगुणी है, क्योंकि अपूर्वकरणके प्रथम समयमे होनेवाले संख्यातगुणे स्थितिबन्धकी आवाधाका ग्रहण है । ये सब अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है ॥१४॥ उससे सम्यक्त्वप्रकृतिकी आठवर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा है, क्योंकि अन्तर्मुहूर्तकालसे आठवर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा सिद्ध है ॥१५॥ (गाथा १५५)


सम्मे असंखवस्सिय चरिमट्ठिदिखंडओ असंखगुणो ।
मिस्से चरिमे खंडियमहियं अडवस्समेत्तेण ॥१५६॥

अर्थ: उससे सम्यक्त्वप्रकृतिका असंख्यातवर्षप्रमाण अन्तिम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योंकि वह पल्यके असंख्यातवेभागप्रमाण है ॥१६॥ उससे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका असंख्यातवर्षप्रमाण अन्तिम स्थितिकाँडक विशेष अधिक है । एक आवलिकम आठवर्ष विशेषका प्रमाण है, इसका कारण सुगम है ॥१७॥ (गाथा १५६)


मिच्छे खवदे सम्मदुगाणं ताणं च मिच्छसत्तं हि ।
पढमंतमठिदिखंडा असंखगुणिदा हु दुट्ठाणे ॥१५७॥

अर्थ: उससे मिथ्यात्वका क्षय होनेपर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका प्रथम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योकि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकसे द्विचरम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है । इसप्रकार त्रिचरम और चतुश्चरम आदि क्रमसे सख्यातहजार स्थितिकाण्डक नीचे जाकर मिथ्यात्व का क्षय होने पर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका तत्सम्बन्धी यह प्रथम स्थितिकाण्डक है । इसलिये यह स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है ॥१८॥ उससे मिथ्यात्व सत्कर्मवालेके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका अन्तिम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योकि मिथ्यात्व सत्कर्मवालेके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका जो अन्तिम स्थितिकाण्डक है, वह पूर्वके स्थितिकाण्डकसे अनन्तर अधस्तनवर्ती होनेसे पूर्वके स्थितिकाण्डकसे असंख्यातगुणा है ॥ १६ ॥ ( गाथा १५७, )


मिच्छंतमठिदिखंडो पल्लासंखेज्जभागमेत्तेण ।
हेट्ठिमठिदिप्पमाणेणब्भहियो होदि णियमेण ॥१५८॥

अर्थ: उससे मिथ्यात्वका अन्तिम स्थितिकाण्डक विशेष अधिक है, क्योकि मिथ्यात्वके उदयावलि बाह्य समस्त स्थितिसत्कर्मका ग्रहण होता है, परन्तु सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उस समय अधस्तन-पल्योपमके असंख्यातवेभागप्रमाण स्थितियोंको छोड़कर उपरिम बहुभागप्रमाण स्थितियोंका ग्रहण होता है । इस कारण अधस्तन असंख्यातवेभाग मात्रका प्रवेश होकर मिथ्यात्वका अन्तिम स्थितिकाण्डक विशेष अधिक हो गया है ॥२०॥- (गाथा १५८) -


दूरावकिट्ठिपढमं ठिदिखंडं संखसंगुणं तिण्णं ।
दूरावकिट्ठहेट्ठिठिदिखंडं संखसंगुणियं ॥१५९॥

अर्थ: उससे मिथ्यात्व सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके असंख्यातगुण हानिवाले स्थितिकाण्डकों में से प्रथम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योकि पूर्वके स्थितिकाण्डकसे सख्यातहजार स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणे, क्रमसे नीचे उतरकर दूरापकृष्ट संज्ञक स्थितिके असंख्यात- बहुभागके द्वारा इस स्थितिकाण्डककी प्रवृत्ति होती है ॥२१॥ उससे


पलिदोवमसंतादो विदियो पल्लस्स हेदुगो जादु ।
अवरो अपुव्वपढमे ठिदिखंडो संखगुणिदकमा ॥१६०॥


पलिदोवमसंतादो पढमो ठिदिखंडओ दु संखगुणो ।
पलिदोवमठिदिसंतं होदि विसेसाहियं तत्तो ॥१६१॥


बिदियकरणस्स पढमे ठिदिखंडविसेसयं तु तदियस्स ।
करणस्स पढमसमये दंसणमोहस्स ठिदिसंतं ॥१६२॥

लब्धिसार (भाग 2/3)

दंसणमोहूणाणं बंधो संतो य अवर वरगो य ।
संखेये गुणिदकमा तेत्तीसा एत्थ पदसंखा ॥१६३॥

अर्थ: संख्यातगुणहानिवाले स्थितिकाण्डको मे से जो अन्तिम स्थितिकाण्डक है वह संख्यातगुणा है, क्योकि दूरापकृष्टप्रमाण स्थितिसत्कर्मो को छोडकर पुन उपरिम संख्यात बहुभागके द्वारा इस स्थितिकाण्डककी प्रवृत्ति होती है ॥२२॥ (गाथा १५६)

उससे पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्कर्मके रहते हुए दूसरा स्थितिकाण्डक संख्यातगुणा है, क्योकि पूर्वके स्थितिकाण्डकसे पश्चादानुपूर्वीके अनुसार संख्यातगुणवृद्धिरूप संख्यातहजार स्थितिकाडक पीछे उतरकर यह काण्डक होता है ॥२३॥ उससे जिस स्थितिकाण्डकके नष्ट होने पर दर्शनमोहनीयका पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्कर्म शेष रहता है वह स्थितिकाण्डक संख्यातगुणा है । यद्यपि यह भी पल्योपमके संख्यातवेभागप्रमाण है, किन्तु पूर्वके स्थितिकाण्डकसे संख्यातगुणा है । गुणकार तत्प्रायोग्य संख्यात अङ्क है ॥२४॥ उससे अपूर्वकरणमे प्रथम स्थितिकाण्डक संख्यातगुणा है, क्योकि अपूर्वकरणके प्रथम समयमे ग्रहण किये गये स्थितिकाण्डकसे विशेष हीन क्रमसे तत्प्रायोग्य संख्यात अङ्कप्रमाण स्थितिकाण्डक-गुणहानिगर्भ संख्यातहजार स्थितिकाण्डकोंके व्यतीत होनेपर पूर्वका स्थितिकाण्डक उत्पन्न हुआ है और वहा पर स्थितिकाडक गुणहानियोका अस्तित्व असिद्ध भी नही है, क्योकि अपूर्वकरणके भीतर प्रथम स्थितिकाण्डकसे संख्यातगुणा हीन भी स्थितिकाण्डक होता है इसलिए यह संख्यातगुणा है ऐसा सिद्ध हुआ ॥२५॥ ( गाथा १६० )

उससे पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्कर्मके होनेपर उसके बाद होनेवाला प्रथम स्थितिकाण्डक संख्यातगुणा है, क्योकि जब तक पल्योपमप्रमाण स्थितिसत्कर्म प्राप्त नही होता तब तक अपूर्वकरणके कालमे और अनिवृत्तिकरणके कालमे प्राप्त होनेवाले सभी स्थितिकाण्डक पल्योपमके संख्यातवेभाग प्रमाण वाले होते है, परन्तु इस स्थितिकाडकमे पल्योपमके संख्यात बहु भागका घात होता है अत पूर्वके स्थितिकाडकसे यह संख्यातगुणा है ॥२६॥ उससे पल्योपम स्थितिसत्कर्म विशेषाधिक है । अधस्तन शेष संख्यातवाभाग अधिक है ॥२७॥ (गाथा १६१)

उससे अपूर्वकरणमे प्राप्त प्रथम उत्कृष्ट स्थितिकाडक विशेष संख्यातगुणा है । जघन्य स्थितिकाण्डक और उत्कृष्ट स्थितिकाण्डकके बीच विशेषका प्रमाण पल्योपमका संख्यातवाभाग हीन पृथक्त्वसागर है जो पल्यसे संख्यातगुणा है ॥२८॥ उससे अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे प्रविष्ट जीवके दर्शनमोहनीयका स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा है, क्योकि वह सागरोपम शतसहस्रपृथक्त्व प्रमाण है ॥२६॥ (गांथा १६२)


सत्तरहं पयडीणं खयाहु खइयं तु होदि सम्मत्तं ।
मेरु व णिप्पकंपं सुणिम्मलं अक्खयमणंतं ॥१६४॥

दंसणमोहे खविदे सिज्झदि तत्थेव तदियतुरियभवे ।
णादिक्कति तुरियभवे ण विणस्सति सेससम्मो व ॥१६५॥

सत्तरहं पयडीणं खयाहु अवरं तु खइयलद्धी दु ।
उक्कस्सखइयलद्धी घाइचउक्कक्खएण हवे ॥१६६॥

अर्थ (गाथा 164 से 166): अनन्तानुबन्धी चतुष्क और दर्शनमोहनीय त्रिक इन सात प्रकृतियों के क्षयसे क्षायिकसम्यक्त्व होता है सो मेरुके समान निष्कम्प अर्थात् निश्चल है, सुनिर्मल अर्थात् शङ्कादि मलसे रहित है, अक्षय अर्थात् नाश से रहित है तथा अनन्त अर्थात् अन्तसे रहित है । सादि मिथ्यादृष्टि जीव वेदकसम्यक्त्व सहित देशचारित्र को ग्रहण करता है उसके अधःकरण और अपूर्वकरण ये दो ही करण होते है, उनमें गुणश्रेणि निर्जरा नही होती है, अन्य स्थितिखंडादि सभी कार्य होते है । वह अपूर्वकरणके अंतिम समयमे वेदकसम्यक्त्व और देशचारित्रको युगपत् ग्रहण करता है, क्योकि अनिवृत्तिकरण बिना ही इनकी प्राप्ति सम्भव है । वहा प्रथमोपशमसम्यक्त्व की उत्पत्तिवत् ही करणो का अल्पबहुत्व है, इसलिए यहा अधःकरणकालसे अपूर्वकरणका काल संख्यातवेभाग-प्रमाण है तथा अपूर्वकरणके कालमे सख्यातहजार-स्थितिखण्ड होने पर अपूर्वकरणका काल समाप्त होता है । सादि मिथ्यादृष्टि जीव वेदकसम्यक्त्व सहित देशचारित्र को ग्रहण करता है उसके अध’करण और अपूर्वकरण ये दो ही करण होते है, उनमें गुणश्रेणि निर्जरा नही होती है, अन्य स्थितिखण्डादि सभी कार्य होते है । वह अपूर्वकरणके अन्तिम समयमे वेदकसम्यक्त्व और देशचारित्रको युगपत् ग्रहण करता है, क्योकि अनिवृत्तिकरण बिना ही इनकी प्राप्ति सम्भव है । वहा प्रथमोपशमसम्यक्त्व की उत्पत्तिवत् ही करणो का अल्पबहुत्व है, इसलिए यहा अध’करणकालसे अपूर्वकरणका काल संख्यातवेभागप्रमाण है तथा अपूर्वकरणके कालमे संख्यातहजार-स्थितिखण्ड होने पर अपूर्वकरणका काल समाप्त होता है । एकान्तवृद्धिकालमे असंख्यातगुणे क्रमसे द्रव्यका अपकर्षण होता है । बहुत स्थितिकाण्डक व्यतीत होनेपर स्वस्थान सयतासयत अर्थात् अध प्रवृत्त देशसयत हो जाता है ।


उवणेउ मंगलं वो भवियजणा जिणवरस्स कमकमलजुयं ।
जसकुलिसकलससत्थियससंकसंखंकुसादिलक्खणभरियं ॥१६७॥

अर्थ: मत्स्य, वज्र, कलश, स्वस्तिक चन्द्रमा, अंकुश शंख आदि नाना शुभ-लक्षणोसे सुशोभित जिनेन्द्र भगवानके चरण कमल भव्य लोगोको मगल प्रदान करे ।


अथ चारित्रलब्धि अधिकार


दुविहा चरित्तलद्धी देसे सयले य देसचारित्तं ।
मिच्छो अयदो सयलं तेवि व देसो य लब्भेई ॥१६८॥

अर्थ: चारित्र की लब्धि अर्थात् प्राप्ति, सो चारित्र देश और सकल के भेदसे दो प्रकार है। इसमे से देशचारित्रको मिथ्यादृष्टि या असंयतसम्यग्दृष्टि प्राप्त करता है और सकलचारित्रको मिथ्यादृष्टि या असंयतसम्यग्दृष्टि अथवा देशचारित्री प्राप्त होता है। उनमे सख्यातगुणा कृतकृत्यवेदकका प्रथम समयमें दर्शनमोहनीयके बिना शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिवन्ध है, क्योकि कृतकृत्यवेदकके प्रथम समयमे होनेवाला स्थितिबन्ध अन्त कोडाकोडी सागर प्रमाण है ॥३०॥ उससे उन्हीका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध सख्यातगुणा है, क्योकि अपूर्वकरणके प्रथम समयमे होनेवाला उत्कृष्ट स्थितिबन्ध यहा विवक्षित है ॥३१॥ उससे दर्शनमोहनीयके बिना शेष कर्मोंका जघन्य स्थितिसत्कर्म सख्यातगुणा है, क्योकि चारित्रमोहनीयकी क्षपणाके अतिरिक्त अन्यत्र सम्यग्दृष्टियोके उत्कृष्ट स्थितिबन्धसे भी जघन्य स्थितिसत्कर्म नियमसे सख्यातगुणा होता है ॥३२॥ उनमे उन्हीका उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म सख्यातगुणा है, क्योकि अपूर्वकरणके प्रथम समयमें सभी कर्मोंका अन्त कोडाकोडीप्रमाण उत्कृष्ट स्थितिसत्कर्म होता है । उसका अभी घात नहीं हुआ है अतः घात होकर शेष बचे हुए पूर्वके जघन्य स्थितिसत्कर्मसे इसके उक्त प्रकारसे सिद्ध होनेमे कोई बाधा नहीं आती है ॥३३॥ (गाथा १६३)


अंतोमुहुत्तकाले देसवदी होहिदित्ति मिच्छो हु ।
सोसरणो सुज्झंतो करणाणि करेदि सगजोग्गं ॥१६९॥

अर्थ: अन्तर्मुहूर्त के पश्चात् जो देशव्रती होगा ऐसे मिथ्यादृष्टिजीव प्रतिसमय अनन्तगुणीविशुद्धिसे वर्धमान होता हुआ आयु बिना सात कर्मोंका बन्ध या सत्त्व अन्तकोडाकोडी मात्र अवशेष करनेके द्वारा स्थितिबन्धापसरणाको तथा अशुभकर्मोंके अनुभागको अनन्तवाभाग मात्र करने के द्वारा अनुभागबन्धापसरणाको करता हुआ अपने करणायोग्य परिणामोंको करता है।


से काले देसवदी असंखसमयप्पबद्धमाहरियं ।
उदयावलिस्स बाहिं गुणसेढीयमवट्ठिदं कुणदि ॥१७३॥

अर्थ: देशव्रती होनेके कालमे अर्थात् प्रथमसमयमें असंख्यात समयप्रबद्धोंकों अपकर्षणकर उदयावलिबाह्य अवस्थित गुणश्रेणिकी रचना होती है ।


दव्वं असंखगुणिदक्कमेण एयंतवड्डिकालेत्ति ।
बहुठिदिखंडे तीदे अधापवत्तो हवे देसो ॥१७४॥


ठिदिरसघादो णत्थि हु अधापवत्ताभिधाणदेसस्स ।
पडिउट्ठिदे मुहुत्तं संते ण हि तस्स करणादुगा ॥१७५॥

अर्थ: अधःप्रवृत्त देशसंयतके स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात नहीं होता । यदि देशसंयतसे गिर गया और फिर भी अन्तर्मुहूर्तकाल द्वारा वापस देशसंयत हो गया उसके भी स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात नही होते तथा दो करण भी नही होते ।


देसो समये समये सुज्झंतो संकिलिस्समाणो य ।
चउवड्ढिहाणिगदवावट्ठिदं कुणदि गुणसेढिं ॥१७६॥

अर्थ: अध’प्रवृत्त देशसयतके सर्वकालमे विशुद्धि या संक्लेशको प्राप्त होने पर भी प्रति समय यथा सम्भव चतुःस्थानपतित वृद्धि-हानि को लिये गुणश्रेणि विधान होता है ।


विदीयकरणादु जावय देसस्सेयंतवड्ढि चरिमेत्ति ।
अप्पाबहुगं वोच्छं रसखंडद्वाण पहुदीणं ॥१७७॥


अंतिमरसखंडुक्कीरणकालादो दु पढमओ अहियो ।
चरिमट्ठिदिखंडुक्कीरणकालो संखगुणिदो हु ॥१७८॥

अर्थ: करणमें प्रथम अनुभागकाण्डकका उत्कीरणकाल विशेष अधिक है ॥२॥ उससे एकान्तानुवृद्धिकालका अन्तिम स्थितिकाण्डक उत्कीरणकाल व जघन्य स्थितिबन्धकाल दोनो तुल्य होकर सख्यातगुणे हैं, क्योकि एक स्थितिकाण्डकमे हजारों अनुभागकाण्डक होते है ॥३॥ (गा. १७८)


पढमट्ठिदिखंडुक्कीरणकालो साहियो हवे तत्तो ।
एयंतवड्ढिकालो अपुव्वकालो य संखगुणिदकमा ॥१७९॥

अर्थ: उससे अपूर्वकरणके प्रथम स्थितिकाडक व स्थितिबन्धकाल विशेष अधिक है ॥४॥ उससे सख्यातगुणा एकान्तानुवृद्धिकाल है । यद्यपि यह काल भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है, तथापि इस एकान्तानुवृद्धिकालमे सख्यातहजार स्थितिकाडक उत्कीरणकाल व स्थितिबन्धकाल होते है इसलिये यह सख्यातगुणा हो जाता है ॥५॥ उससे अपूर्वकरणका काल सख्यातगुणा है । यहा तत्प्रायोग्य सख्यात अक गुणाकार है । यहा पर अनिवृत्तिकरण नही है इसलिये तद्विषयक अल्पबहुत्वका विचार भी नही किया गया है ॥६॥ (गा. १७६)


अवरो मिच्छतियद्धा अविरद तह देससंजमद्धा य ।
छप्पि समा संखगुणा तत्तो देसस्स गुणसेढी ॥१८०॥

अर्थ: उस अपूर्वकरणकालसे जघन्य सम्यक्त्वकाल, मिथ्यात्वकाल, सम्यग्मिथ्यात्वकाल तथा जघन्य असंयत-देशसंयतकाल व सकल सयमकाल ये छह्नो काल परस्पर सदृश होकर भी सख्यातगुणे है ॥७॥ उससे संयमासयम (देशसयम) गुणश्रेणिकाल सख्यातगुणा है ॥८॥ (गा. १८०)


चरिमाबाहा तत्तो पढमाबाहा य संखगुणिदकमा ।
तत्तो असंखगुणिदो चरिमट्ठिदिखंडओ णियमा ॥१८१॥

पल्लस्स संखभागं चरिमट्ठिदिखंडयं हवे जम्हा।
तम्हा असंखगुणिदं चरिमट्ठिदिखंडयं होई ॥१८२॥

अर्थ (गाथा 181 से 182): उससे एकान्तानुवृद्धिकालके अन्तिम बन्धकी जघन्य आबाधा संख्यातगुणी है ॥६॥ उससे अपूर्वकरण के प्रथम समयमे होने वाले बन्धकी आबाधा सख्यातगुणी है । यह भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण होकर भी पूर्व की आबाधासे संख्यातगुणी है ॥१०॥ उससे एकान्तानुवृद्धिके अन्तिम समयमे होनेवाला पल्योपमके सख्यातवेभाग प्रमाण जघन्य स्थितिकाण्डक असख्यातगुणा है, क्योकि चरम स्थितिकांडक पल्यके सख्यातवेभाग प्रमाण है इसलिये पूर्वके अन्तर्मुहूर्तकालसे यह चरम स्थितिकांडक असख्यातगुणा है ॥ ११ ॥ (गा. १८१-८२)


पढमे अवरो पल्लो पढमुक्कस्सं य चरिमठिदिबंधो ।
पढमो चरिमं पढमट्ठिदिसंतं संखगुणिदकमा ॥१८३॥

अर्थ (गाथा 177 से 183): अपूर्वकरण से लगाकर एकान्तवृद्धिके अन्तसमय पर्यन्त सम्भव अनुभागकाण्डकोत्कीरणकाल आदिका अल्पबहुत्व कहूंगा । एकान्तानुवृद्धिकालके भीतर जो अन्तिम अनुभागका उत्कीरणकाल है वह सबसे स्तोक है ॥१॥ उससे अपूर्व- कोडाकोडीप्रमाण जघन्य स्थितिबन्धका ग्रहण है ॥१५॥ उससे अपूर्वकरणके प्रथम समयमें होनेवाला स्थितिबन्ध संख्यातगुणा ॥१६॥ उससे एकान्तानुवृद्धिकालके अन्तिम समयमें होनेवाला जघन्य स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा है ॥१७॥ उससे अपूर्वकरणके प्रथम समयसे घातके बिना प्राप्त अन्तःकोड़ाकोड़ीप्रमाण उत्कृष्ट सत्कर्म संख्यातगुणा है ॥ १८ ॥ (गा १८३)


अवरवरदेसलद्धी सेकाले मिच्छसंजमुव्वगए ।
अवरादु अणंतगुणा उक्कस्सा देसलद्धी दु ॥१८४॥

अर्थ: मिथ्यात्वके संमुख जीवके देशसंयमकी जघन्यलब्धि होती है और संयमके अभिमुख जीवके देशसंयमकी उत्कृष्टलब्धि होती है, जघन्यसे उत्कृष्ट देशसंयमलब्धि अनन्तगुणी है ।


अवरे देसट्ठाणे होंति अणंताणि फड्ढयाणि तदो ।
छट्ठाणगदा सव्वे लोयाणमसंख्यछट्ठाणा ॥१८५॥

अर्थ: सर्व जघन्य देशसंयमलब्धिस्थानमे अनन्त स्पर्धक होते है । षट्स्थानपतित वृद्धियोके द्वारा असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानपतित सर्व लब्धिस्थान होते हैं ॥१८५॥ गुणा है, क्योकि जाति विशेष कारण है । असंयत सम्यग्दृष्टि तिर्यंचके सर्वविशुद्धिसे देशसंयमको ग्रहण करनेके प्रथमसमयमे उत्कृष्ट प्रतिपद्यमानस्थान होता है जो पूर्वस्थान से अनन्तगुणा है । सर्वविशुद्ध असंयतसम्यग्दृष्टि मनुष्यके देशसंयमको ग्रहण करनेके प्रथम समयमे पूर्वस्थानसे अनन्तगुणा उत्कृष्ट प्रतिपद्यमान लब्धिस्थान होता है । जघन्य प्रतिपद्यमान स्थानवाले मनुष्यके दूसरे समयमे जघन्य अनुभयस्थान होता है । इसीप्रकार तिर्यंचके जघन्य अनुभयस्थान होता है । ये दोनो स्थान अपनेसे पूर्व-पूर्व स्थानकी अपेक्षा अनन्तगुणे हैं । सर्वविशुद्धि तिर्यंचके पूर्वस्थानसे अनन्तगुणा उत्कृष्ट अनुभयस्थान स्वस्थानमें ही होता है । सयमके अभिमुख हुए सर्वविशुद्ध देशसंयत मनुष्यके अन्तिम समयमे उत्कृष्ट अनुभयस्थान अनन्तगुणा होता है१ ।


तत्थ य पडिवायगदा पडिवज्जगदत्ति अणुभयगदत्ति ।
उवरुवरिल्लिठ्ठाणा लोयाणमसंख्यछट्ठाणा ॥१८६॥

अर्थ: देशसंयमलब्धिस्थान तीन प्रकारके हैं- १. प्रतिपातगत २. प्रतिपाद्यमानगत ३ अनुभयगत । ये लब्धिस्थान उपर्युपरि होते हुए असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानपतित है ॥ १८६ ॥


णारतिरिय तिरियणरे अवरं अवरं वरं वरं तिसुवि ।
लोयाणमसंखेज्जा छट्ठाणा होंति तम्मज्झे ॥१८७॥

अर्थ: उन प्रतिपात, प्रतिपद्यमान व अनुभय इन तीनो देशसयम लब्धिस्थानों मे प्रथम मनुष्य योग्य जघन्यस्थान होता है । पुन तिर्यंच योग्य जघन्य स्थान होता है । तत्पश्चात् तिर्यंचयोग्य उत्कृष्टस्थान होता है उसके पश्चात् मनुष्ययोग्य उत्कृष्ट स्थान होता है । उनके मध्यमे असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानपतित स्थान होते है ।


पडिवाददुगंवरवरं मिच्छे अयदे अणुभयगजहण्णं ।
मिच्छत्तरविदियसमये तत्तिरियवरं तु सट्ठाणे ॥१८८॥

अर्थ: देशसंयतसे मिथ्यात्वको जानेवाले के जघन्य प्रतिपातस्थान और असंयत-सम्यग्दृष्टिगुणस्थानको जाने वाले के उत्कृष्ट प्रतिपातस्थान होते है । इसीप्रकार मिथ्यात्वसे देशसंयम प्राप्त करनेवालेके जघन्य प्रतिपद्यमानस्थान होता है और असंयत चतुर्थगुणस्थानसे देशसंयमको प्राप्त करनेवालेके उत्कृष्ट प्रतिपद्यमानस्थान होता है । “पडिवाद दुग” से प्रतिपातस्थान व प्रतिपद्यमानस्थान इन दोनों स्थानोंका ग्रहण होता है । मिथ्यात्वसे देशसंयमको प्राप्त करनेके दूसरे समयमें जघन्य अनुभयस्थान होता है । तिर्यंचोका उत्कृष्ट अनुभयस्थान स्वस्थानमे ही होता है ।


सयलचरित्तं तिविहं खयउवसमि उवसमं च खइयं च ।
सम्मतुप्पत्तिं वा उवसमसम्मेण गिण्हदो पढमं ॥१८९॥

अर्थ: क्षयोपशम, उपशम और क्षायिकके भेदसे सकलचारित्र तीनप्रकारका है । उपशमसम्यक्त्व सहित जो क्षयोपशमचारित्रका ग्रहण होता हैं, उसका विधान प्रथमोपशमसम्यक्त्वकी उत्पत्तिके समान है ।


वेदगजोगो मिच्छो अविरददेसो य दोणिण करणेण ।
देसवदं वा गिण्हदि गुणसेढी णत्थि तक्करणे ॥१९०॥

अर्थ: वेदकसम्यक्त्वसहित क्षयोपशमचारित्रको मिथ्यादृष्टि या असंयत अथवा देशसंयतजीव देशचारित्र ग्रहण करनेके सदृश ही अधःप्रवृत्तकरण व अपूर्वकरण, इन दो करणोंके द्वारा ग्रहण करता है । उन करणोमे गुणश्रेणि नही होती है, किन्तु सकलसंयमके ग्रहण समयसे गुणश्रेणि होती है ।


एत्तो उवरिं विरदे देसो वा होदि अप्पबहुगोत्ति ।
देसोत्ति य तट्ठाणे विरदो त्ति य होदि वत्तव्वं ॥१९१॥

अर्थ: यहा से ऊपर (आगे) अल्पबहुत्व पर्यन्त, पहले देशचारित्रमे जैसा कथन किया है वैसा ही सर्वकथन यहा ( सकल चारित्रके सम्बन्ध मे ) भी जानना, किन्तु इतनी विशेषता है कि उस कथनमें जहा देशचारित्र कहा है उसके स्थान पर सकलचारित्र कहना चाहिए ।


अवरे विरदट्ठाणे होंति अणंताणि फड्ढयाणि तदो ।
छट्ठाणगया सव्वे लोयाणमसंख छट्ठाणा ॥१९२॥

अर्थ: सर्व जघन्य संयमलब्धिस्थानमें अनन्तस्पर्धक होते हैं। इसके पश्चात् सर्वोत्कृष्ट स्थान पर्यन्त षट्स्थान पतित वृद्धियोके द्वारा असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानपतित सर्वस्थान होते है ।


तत्थ य पडिवादगया पडिवज्जगयात्ति अणुभयगयात्ति ।
उवरुवरि लद्धिठाणा लोयाणमसंखछट्ठाणा ॥१९३॥

पडिवादगया मिच्छे अयदे देसे य होंति उवरुवरिं ।
पत्तेयमसंखमिदा लोयाणमसंखछट्ठ्ठाणा ॥१९४॥

अर्थ (गाथा 193 से 194): (१) प्रतिपातगत (२) प्रतिपद्यमानगत (३) अनुभयगत । ये तीनो लब्धिस्थान उपर्युपरि हैं तथा असंख्यातलोक षट्स्थानपतित प्रमाण हैं । संयमसे मिथ्यात्व, असंयम व देशसंयमको गिरने वाले संयतके ये तीनो प्रतिपातस्थान उपर्युपरि प्रत्येक असंख्यातप्रमाण हैं तथा प्रत्येकमे असंख्यातलोक षट्स्थानपतित वृद्धि होती है ।


तत्तो पडिवज्जगया अज्जमिलिच्छे मिलेच्छअज्जे य ।
कमसो अवरं अवरं वरं वरं होदि संखं वा ॥१९५॥

अर्थ: प्रतिपातस्थानोके ऊपर असंख्यातलोकप्रमाण प्रतिपद्यमान स्थान है । वे आर्य मनुष्यका जघन्य, म्लेच्छ मनुष्य का जघन्य, म्लेच्छ मनुष्यका उत्कृष्ट, आर्य मनुष्यका उत्कृष्ट इस क्रमसे है ।


तत्तोणुभयंट्ठाणे सामाइयछेदजुगलपरिहारे ।
पडिबद्धा परिणामा असंखलोगप्पमा होंति ॥१९६॥

अर्थ: प्रतिपद्यमान स्थानोके ऊपर सामायिक-छेदोपस्थापना सम्बन्धी तथा परिहारविशुद्धिसंयम सम्बन्धी असंख्यातलोकप्रमाण अनुभयस्थान हैं ।


तत्तो य सुहुमसंजम पडिवज्जयं संखसमयमेत्ता हु ।
तत्तो दु जहाखादं एयविहं संजमे होदि ॥१९७॥

अर्थ: उस सामायिक-छेदोपस्थापनाके उत्कृष्टस्थान से ऊपर असंख्यातलोकप्रमाण स्थानोका अन्तराल करके उपशमश्रेणिसे उतरते हुए अनिवृत्तिकरणके सम्मुख जीवके अपने अन्तिम समयमें होनेवाले सूक्ष्मसाम्परायका जघन्यस्थान होता है । उसके ऊपर असंख्यातसमयप्रमाण स्थान जाकर क्षपकसूक्ष्मसाम्परायके अन्त समयमे होनेवाले सूक्ष्मसाम्परायका उत्कृष्टस्थान होता है । उससे आगे असंख्यातलोकप्रमाण स्थानोका अन्तराल करके यथाख्यातचारित्रका एक स्थान होता है । यथाख्यातचारित्ररूप यह स्थान सभी सयमोसे अनन्तगुणी विशुद्धता युक्त उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय, सयोगकेवली व अयोगकेवलीके होता है । इसमे सभी कषायोका सर्वथा उपशम अथवा क्षय है अतः जघन्य, मध्यम व उत्कृष्टरूप भेद नही है ।


पडचरिमे गहणादीसमये पडिवाददुगमणुभयं तु ।
तम्मज्झे उवरिमगुणगहणाभिमुहे य देसं वा ॥१९८॥

अर्थ: संयमसे गिरते हुए चरम समयमें और संयम को ग्रहण करते समय प्रथम समयमे क्रमसे प्रतिपात और प्रतिपद्यमान ये दो स्थान होते है तथा इनके मध्यमें अथवा ऊपरके गुणस्थानके सम्मुख होनेवाले जीव के जो अनुभय स्थान होता है वह देशसंयतके समान ही यहा भी जानना चाहिये ॥१९८॥


पडिवादादीतिदयं उवरुवरिमसंखलोगगुणिदकमा ।
अंतरछक्कपमाणं असंखलोगा हु देसं वा ॥१९९॥

अर्थ: प्रतिपात आदि तीन प्रकारके स्थान अपने-अपने जघन्यसे उत्कृष्ट पर्यन्त ऊपर-ऊपर असंख्यातलोकगुणे क्रम से युक्त है । उन छहों से प्रत्येकके असंख्यातलोकप्रमाण बार षट्स्थानवृद्धि देशसंयतके समान जानना ॥१९६॥


मिच्छयददेसभिमुहे पडिवादट्ठाणे वरं अवरं ।
तप्पाउग्गकिलिट्ठे तिव्वकिलिट्ठे कमे चरिमे ॥२००॥

अर्थ: प्रतिपातस्थान तो मिथ्यात्व, असंयम और देशसंयमके सम्मुख होनेकी अपेक्षा तीन भेद वाला है । उसमें भी जघन्यस्थान संयमके चरम समयमे तीव्रसंक्लेशवाले के एव उत्कृष्टस्थान यथायोग्य मन्दकषायवालेके होता है ॥२००॥


पडिवज्जजहण्णदुगं मिच्छे उक्कस्सजुगलमविदेसे ।
उवरिं सामाइयदुगं तम्मज्झे होंति परिहारा ॥२०१॥

अर्थ: प्रतिपद्यमानस्थान आर्य व म्लेच्छकी अपेक्षा दो प्रकारका है सो उनका जघन्य स्थान तो मिथ्यादृष्टिसे संयमी होनेवाले जीवके और उत्कृष्टस्थानयुगल देशसंयतसे संयमी हुए जीवके होता है । प्रतिपद्यमानस्थानोके ऊपर जो अनुभयस्थान है वे सामायिक-छेदोपस्थापना-संयम सम्बन्धी होते है । उन दोनो संयमोके जघन्य व उत्कृष्टस्थानो के मध्य परिहारविशुद्धिसंयमके स्थान है ॥२०१॥


परिहारस्स जहण्णं सामायियदुगे पडंत चरिम्मिह ।
तज्जिट्ठ सट्ठाणे सव्वविसुद्धस्स तस्सेव ॥२०२॥

अर्थ: परिहारविशुद्धिसंयमका जघन्यस्थान संक्लेशवश सामायिक-छेदोपस्थापना संयममे गिरते हुए जीवके चरम समय मे और परिहारविशुद्धिसंयमका उत्कृष्टस्थान उनमे ही सर्वविशुद्ध अप्रमत्तजीवके एकान्तवृद्धिके चरमसमयमे होता है ॥२०२॥


सामयियदुगजहण्णं ओघं अणियट्टिखवगचरिमम्हि ।
चरिमणियट्टिसुवरिं पडंत सुहुमस्स सुहुमवरं ॥ २०३॥

अर्थ: सामायिक-छेदोपस्थापनासंयमका जघन्यस्थान मिथ्यात्वके सम्मुख हुए जीवके संयमसम्बन्धी चरमसमयमे होता है जो जघन्य संयमका स्थान ही है । सामायिक-छेदोपस्थापनासंयमका उत्कृष्टस्थान क्षपकअनिवृत्तिकरणके चरमसमयमें होता है । सूक्ष्मसाम्परायसंयमका जघन्यस्थान सूक्ष्मसाम्परायोपशमकजीव जो उपशमश्रेणिसे गिरते हुए सूक्ष्मसाम्परायके चरम समयमे अनिवृत्तिकरणके सम्मुख है, उसके होता है ॥२०३॥


खवगसुहुमस्स चरिमे वरं जहाखादमोघजेट्ठं तं ।
पडिवाददुगा सव्वे सामाइयछेदपडिबद्धा ॥२०४॥

अर्थ: असंख्यातलोकमात्र होते हैं । इनमें सर्वजघन्य प्रतिपातस्थान उत्कृष्ट संक्लेशसे असंयतसम्यक्त्वको जानेवाले संयतके अन्तिम समयमें होता है । उत्कृष्ट प्रतिपातस्थान तत्प्रायोग्य संक्लेशसे असंयतसम्यक्त्वको जानेवाले संयतके अन्तिम समयमें होता है । ००००००० ००००००००००० । अन्तर । ये संयमासंयम को जाने वाले संयतके प्रतिपातस्थान है । इनमें जघन्य प्रतिपातस्थान सर्व संक्लेशसे संयमासंयमको जानेवाले संयतके अन्तिम समयमे होता है और उत्कृष्ट प्रतिपातस्थान तत्प्रायोग्य संक्लेशसे संयमासंयमको जाने वाले संयतके अन्तिम समयमें होता है । ००००००००००००००००००००००० ०००००००००००००००००००००००००००००००० । अन्तर । ये संयमको प्राप्त होनेवाले जीवके प्रतिपद्यमान या उत्पादस्थान है । इनमें से जघन्य प्रतिपद्यमानस्थान भरतक्षेत्रनिवासी मिथ्यात्वसे पीछे आये हुए संयत (आर्य मनुष्य) के होता है । (अकर्मभूमिज अर्थात् भरतक्षेत्र निवासी म्लेच्छ मनुष्यके मिथ्यात्वसे पीछे आकर संयम ग्रहणके प्रथमसमयमे होनेवाला ) जघन्य प्रतिपद्यमान संयमस्थान पूर्व जघन्यसे अनन्तगुणा है । उक्त (म्लेच्छ) मनुष्यके ही देशविरतिसे पीछे आकर सर्वविशुद्ध संयम ग्रहण के प्रथम समयमे होनेवाला उत्कृष्ट प्रतिपद्यमानस्थान पूर्वोक्त जघन्यसे अनन्तगुणा है । इससे अनन्तगुणा कर्मभूमिमें संयमको प्राप्त करनेवाले देशविरतिसे पीछे आये हुए सर्वविशुद्धसंयत (आर्य मनुष्य) के प्रथम समयमें उत्कृष्ट प्रतिपद्यमान लब्धिस्थान होता है । यह स्थान पूर्वसे अनन्तगुणा है । ०००००००००००००००००००००००००००००० ००००००००००० । अन्तर । यहां पर उपरिम अप्रतिपात-अप्रतिपद्यमानस्थान सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धि संयतजीवके है । अधस्तन स्थान परिहारशुद्धिसंयत जीवके होते हैं । उनमेंसे परिहारशुद्धिसंयत जीवका जघन्य प्रतिपातस्थान पूर्वके स्थानसे अनन्तगुणा है । वह किसके होता है ? सामायिक-छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयमके अभिमुख हुए तत्प्रायोग्य संक्लिष्ट परिहार विशुद्धि संयतके अन्तिम समयमें होता है । उससे उसीका उत्कृष्ट अनन्तगुणा है । वह किसके होता है ? सर्वविशुद्ध परिहारसंयतके होता है । उससे सामायिक-छेदोपस्थापना यमियों का उत्कृष्ट संयमस्थान अनन्तगुणा है । यह किसके होता है ? तदनन्तर समयमे सूक्ष्मसाम्परायशुद्धि संयमको ग्रहण करनेवाले सर्वविशुद्ध उक्त संयतके होता है ।


अथ चारित्रमोहनीय उपशमनाधिकार


उवसमचरियाहिमुहो वेदगसम्मो अणं विजोयित्ता ।
अंतोमुहुत्तकालं अधापवत्तोऽपमत्तो य ॥२०५॥

अर्थ: उपशमचारित्रके सम्मुख हुआ वेदकसम्यग्दृष्टिजीव सर्वप्रथम पूर्वोक्त विधानसे अनन्तानुबन्धीका विसंयोजन करके अन्तर्मुहूर्तकाल तक अधःप्रवृत्त-अप्रमत्त अर्थात् स्वस्थान-अप्रमत्त होता है ।


तत्तो णियमविहिणा दंसणमोहं समं खु उवसमदि ।
सम्मत्तुप्पत्ति वा अण्णं च गुणसेढिकरणाविही ॥२०६॥

दंसणमोहुवसमणं तक्खवणं वा हु होदि णवरिं तु ।
गुणसंकमो ण विज्जदि विज्झद अधापवत्तं च ॥२०७॥

अर्थ (गाथा 206 से 207): अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजनाके अन्तर्मुहूर्त पश्चात् तीनकरण विधिके द्वारा तीनो दर्शनमोहनीय कर्म प्रकृतियोको एकसाथ उपशमाता है । गुणश्रेणि, करण व अन्य अर्थात् स्थितिकाण्डक, अनुभागकाण्डक आदि विधि प्रथमोपशमसम्यक्त्वोत्पत्ति के सदृश करता है । इस विधिके द्वारा दर्शनमोहनीयकर्मका उपशम या क्षय होता है, किंतु उपशम होनेमे गुणसक्रमण नही होता । विध्यातसक्रमण अथवा अध प्रवृत्तसक्रमण होता है । अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयोंके स्थितिसत्कर्मसे उन्हीके अपने-अपने अन्तिम समयमें स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणाहीन होता है । अनिवृत्तिकरणके बहुकाल बीत जाने पर दर्शनमोहनीयका उपशम-कार्य प्रारम्भ होता है ॥२०८॥


ठिदिसत्तमपुव्वदुगे संखगुणं तु पढमदो चरिमं ।
उवसामण अणियट्टीसंखाभागासु तीदासु ॥२०८॥


सम्मत्तस्स असंखेज्जा समयपबद्धाणुदीरणा होदि ।
तत्तो मुहुत्तअंते दंसणमोहंतरं कुणइ ॥२०९॥


अंतोमुहुत्तमेत्तं आवलिमेत्तं य सम्मत्तियट्ठाणं ।
मोत्तूण य पढमट्ठिदि दंसणमोहंतरं कुणदि ॥२१०॥


सम्मत्तपयडिपढमट्ठिदिम्मि संछुहदि दंसणतियाणं ।
उक्कीरयं तु दव्वं बंधाभावादु मिच्छस्स ॥२११॥


विदयट्ठिदिस्स दव्वं उक्कड्ढिय देदि सम्मपढमम्हि ।
विदयट्ठिदिम्हि तस्स अणुक्कीरिज्जंतमाणम्हि ॥२१२॥


सम्मत्तपयडिपढमट्ठिदीसु सरिसाण मिच्छमिस्साणं ।
ठिदिदव्वं सम्मस्स य सरिसणिसेयम्हि संकमदि ॥२१३॥


जावंतरस्स दुचरिमफालिं पावे इमो कमो ताव ।
चरिमतिदंसणदव्वं छुहेदि सम्मस्स पढमम्हि ॥२१४॥


विदयट्ठिदस्स दव्वं पढमट्ठिदिमेदि जाव आवलिया ।
पडिआवलिया चिट्ठदि सम्मत्तादिमठिदी ताव ॥२१५॥

अर्थ: सम्यक्त्वमोहनीयकी आदि (प्रथम) स्थितिक्षय होने पर मिथ्यात्वके द्रव्यमेसे सम्यक्त्वप्रकृति व मिश्रप्रकृतिमें गुणसक्रमण द्वारा नही, किन्तु विध्यातसंक्रमण द्वारा दिया जाता है ।


सम्मादिट्ठिदिच्छीणे मिच्छदव्वादु सम्मदम्मिस्से ।
गुणसंकमो ण णियमा विज्झादो संकमो होदि ॥२१६॥


सम्मत्तुप्पत्तीए गुणसंकमपूरणस्स कालादो ।
संखेज्जगुणं कालं विसोहिवड्ढीहिं वड्ढदि हु ॥२१७॥

अर्थ: प्रथमसम्यक्त्वको उत्पन्न करनेवाले जीवका गुणसंक्रमद्वारा जो पूरणकाल प्राप्त होता है उससे संख्यातगुणे कालतक यह उपशान्तदर्शनमोहनीय जीव विशुद्धि के द्वारा बढ़ता रहता है ।


तेण परं हायदि वा वड्ढदि तदवट्ठिदो विसुद्धीहिं ।
उवसंतदंसणत्तियो होदि पमत्तापमत्तेसु ॥२१८॥

अर्थ: दर्शनमोहनीयकी तीनो प्रकृतियोका उपशम करनेवाला द्वितीयोपशमसम्यग्दृष्टि उसके बाद (अन्तर्मुहूर्त तक विशुद्धि से बढ़ने के बाद) विशुद्धिके द्वारा कभी घटता है, कभी बढ़ता है और कभी अवस्थित रहता है। विशुद्धिकी हानि-वृद्धिके प्रमत्त और अप्रमत्तगुणस्थान होते रहते हैं।


एवंपमत्तमियर परावत्तिसहस्सयं तु कादूण ।
इगवीसमोहणीयं उवसमदि ण अण्णपयडीसु ॥२१९॥

अर्थ: इसप्रकार प्रमत्त व अप्रमत्तमे सहस्रोबार परावर्तन करके मोहनीयकी इक्कीस प्रकृतियोको उपशमाता है, अन्य कर्मोको नही उपशमाता ।


तिक्करणाबंधोसरणं कमकरणं देसघादिकरणं च ।
अंतरकरणं उवसमकरणं उवसामगो होंति ॥२२०॥

अर्थ: चारित्रमोहनीयका उपशम करनेमे आठ करण होते है । ‘तिक्करण’ अर्थात् अध प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण ये तीनकरण तथा बधापसरण, क्रमकरण, देशघातिकरण, अन्तरकरण और उपशमकरण । इसप्रकार आठकरण होते है ।


विदियकरणादिसमये उवसंततिदंसणे जहण्णेण ।
पल्लस्स संखेभागं उक्कस्सं सायरपुधत्तं ॥२२१॥

ठिदिखंडयं तु खइए वरावरं पल्लसंखभागो दु ।
ठिदिबंधोसरणं पुण वरावरं तत्तियं होदि ॥२२२॥

अर्थ (गाथा 221 से 222): द्वितीयोपशमसम्यग्दृष्टिके द्वितीय ( अपूर्व ) करणके आदि ( प्रथम ) समयमे स्थितिकाडक जघन्यसे पल्यका सख्यातवाभाग आयामवाला और उत्कृष्टसे पृथक्त्वसागरप्रमाणवाला होता है, किन्तु क्षायिकसम्यग्दृष्टिके जघन्य व उत्कृष्ट स्थितिकाडकआयाम पल्यके असख्यातवेभाग मात्र है । जघन्य व उत्कृष्ट स्थितिवधापसरण उतना ही अर्थात् पल्यके सख्यातवेभागप्रमाण है ।


असुहाणं रसखंडमणंतभागा ण खंडमियराणं ।
अंतोकोडाकोडी सत्तं बंधं च तट्ठाणे ॥२२३॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम समयमे अशुभकर्मोंके अनन्तबहुभाग अनुभागका घात करनेके लिए अनुभागकाण्डक होता है तथा इतर अर्थात् शुभ प्रकृतियोका अनुभागकाण्डक नही होता और उसी प्रथम समयमे सर्वकर्मोंका स्थितिबन्ध व स्थितिसत्त्व अन्त’कोडाकोडीसागर होता है ।


उदयावलिस्स बाहिं गलिदवसेसा अपुव्वअणियट्टी ।
सुहुमद्धादो अहिया गुणसेढी होदि तट्ठाणे ॥२२४॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम समयमे उदयावलिसे बाह्य गलितावशेष गुणश्रेणि होती है । गुणश्रेणिनिक्षेप अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरण-सूक्ष्मसाम्परायके कालसे अधिक है ।


पढमे छट्ठे चरिमे बंधे दुग तीस चदुर वोच्छिण्णा ।
छण्णोकसायउदयो अपुव्वचरिमम्हि वोच्छिण्णा ॥२२५॥

अर्थ: अपूर्वकरणकालसम्बन्धी सातभागो में से प्रथमभागमे निद्रा व प्रचला ये दो, छठे भागमे तीर्थंकर आदि तीस और सातवे भागमे हास्यादि चार, इसप्रकार ३६ प्रकृतिया बन्धसे व्युच्छिन्न हुई तथा अपूर्वकरणके चरमसमयमे हास्यादि छह नोकषाय उदयसे व्युच्छिन्न हुई है । सहस्रो स्थितकांडक व्यतीत हो जाने पर तथा अनिवृत्तिकरणकालका बहुभाग बीत जानेपर असंज्ञीके स्थितिबंधके समान स्थितिबन्ध होता है ।


अणियट्टिस्स य पढमे अण्णट्ठिदिखंडपहुदिमारवई ।
उवसामणा णिधत्ती णिकाचणा तत्थ वोच्छिण्णा ॥२२६॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरण के प्रथम समयमे अपूर्वकरणके चरमसमय सम्बन्धी स्थितिखण्ड, स्थितिबन्धापसरण, अनुभागखण्डसे अन्य ही (विलक्षण ही) स्थितिखण्ड, स्थितिबन्धापसरण, अनुभागखण्ड आरम्भ करता है । वही (अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें) सभी कर्मों के उपशम, निधत्ति और निकाचना इन तीन करणोंकी व्युच्छित्ति होती है ।


अंतोकोडाकोडी अंतोकोडी य सत्त बंधं च ।
सत्तरहं पयडीणं अणियट्टीकरणपढमम्हि ॥२२७॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमे आयु बिना सात प्रकृतियोंका स्थितिसत्त्व यथायोग्य अन्तःकोटाकोटीसागर मात्र है और स्थितिबन्ध अन्त कोडाकोडी मात्र है ।


ठिदिबंधसहस्सगदे संखेज्जा बादरे गदा भागा ।
तत्थ असणिस्स ठिदीसरिस ठिदिबंधणं होदि ॥२२८॥


एइंदियट्ठिदीदो संखासहस्से गदे दु ठिदिबंधो ।
पल्लेकदिवड्डुगे ठिदिबंधो वीसियातियाणं ॥२३०॥

अर्थ: एकेन्द्रियसदृश स्थितिबन्धसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध बीत जानेपर क्रमसे बीसिया ( नाम-गोत्र ) का एक-एक पल्य, तीसिया ( ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय कर्मों ) का डेढ़पल्य, चालीसिया ( चारित्रमोहनीय ) का दो पल्य प्रमाण स्थितिबन्ध होता है ।


पल्लस्स संखभागं संखगुणाणं असंखगुणहीणं ।
बंधोसरणं पल्लं पल्लासंखंति संखवस्संति ॥२३१॥

अर्थ: पल्यप्रमाण स्थितिबन्ध प्राप्त होने तक पल्यके संख्यातवेभाग प्रमाणवाला स्थितिबंधापसरण होता है । उसके पश्चात् पल्यके असंख्यातवेभाग स्थितिबन्ध प्राप्त होने तक पल्यके संख्यात बहुभाग प्रमाणवाला स्थितिबन्धापसरण होता है । उसके पश्चात् संख्यातहजारवर्ष स्थितिबन्ध प्राप्त होने तक पल्यका असंख्यात बहुभाग प्रमाणवाला स्थितिबन्धापसरण होता है ।


एवं पल्ले जादे बीसीया तीसिया य मोहो य ।
पल्लासंखं च कमे बंधेण य वीसियतियाओ ॥२३२॥

अर्थ: बीसीया ( नाम व गोत्र कर्म ), तीसिया ( ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय, वेदनीय ) और मोहनीय कर्मके स्थितिबन्धका जो क्रम पल्योपमप्रमाण स्थितिबन्धके समय है वही क्रम पल्यके असंख्यातवेभाग स्थितिबन्धसे भी रहता है ।


ठिदिबंधपुधत्तगदे पत्तेयं चदुर तिय वि एएदि ।
ठिदिबंधसमं होदि हु ठिदिबंधमणुक्कमेणेव ॥२३३॥

अर्थ: उसके पश्चात् प्रत्येक स्थानके लिये पृथक्त्व स्थितिबंधापसरण बीत जानेपर क्रमसे चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय व एकेन्द्रिय जीवोंके स्थितिबन्धके समान स्थितिबन्ध होता है ।


तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वेदणीयहेट्ठादु ।
तीसिय घादितियाओ असंखगुणहीणया होंति ॥२३५॥

अर्थ: उतने ही अर्थात् संख्यातहजार स्थितिबन्ध व्यतीत होनेपर ज्ञानावरणादि तीन घातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध, वेदनीयकर्मके स्थितिबन्धसे असंख्यातगुणा हीन हो जाता है ।


तत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वीसियाण हेट्ठादु ।
तीसिय घादितियाओ असंखगुणहीणया होंति ॥२३६॥

अर्थ: पल्यके असंख्यातवेभाग प्रमाणवाले संख्यातहजार स्थितिबन्ध व्यतीत हो जानेपर असंख्यात समयप्रबद्धोंकी उदीरणा होती है ।


तक्काले वेयणियं णामागोदादु साहियं होदि ।
इदि मोहतीसवीसियवेयणियाणं कमो जादो ॥२३७॥

अर्थ: उतने ही अर्थात् संख्यातहजार स्थितिबन्ध हो जाने पर तीन घातिया तीसिय अर्थात् ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, अन्तराय कर्मोंका स्थितिबन्ध वीसिय अर्थात् नाम व गोत्र कर्मोंके स्थितिबन्धसे असंख्यातगुणा हीन होता है । उसी समय नाम व गोत्रसे वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध विशेष अधिक हो जाता है । इसप्रकार मोहनीय, तीसिय, वीसिय और वेदनीयकर्मोंका क्रम होता है ।


तीदे बंधसहस्से पल्लासंखेज्जयं तु ठिदिबंधो ।
तत्थ असंखेज्जाणं उदीरणा समयपबद्धाणं ॥२३८॥


ठिदिबंधसहस्सगदे मण्णाणा तत्तियेवि ओहिदुगं ।
लाहं व पुणो वि सुदं अचक्खु भोगं पुणोच्चक्खु ॥२३९॥


पुणरवि मदिपरिभोगं पुणरवि विरयं कमेण अणुभागो ।
बधेण देसघादी पल्लासंखं तु ठिदिबंधे ॥२४०॥


तो देसघादिकरणादुवरिं तु गदेसु तत्तियपदेसु ।
इगिवीसमोहणीयाणंन्तरकरणं करेदीदि ॥२४१॥

अर्थ: उपर्युक्त देशघातिकरणसे ऊपर उतने ही अर्थात् संख्यातहजार स्थितिबन्धोके व्यतीत होनेपर मोहनीयकर्मकी इक्कीस प्रकृतियोका अन्तरकरण करता है ।


संजलणाणं एक्कं वेदाणेकं उदेदि तं दोण्हं ।
सेसाणं पढमट्ठिदि ठवेदि अंतोमुहुत्त आवलियं ॥२४२॥

अर्थ: सज्वलन कषायोंमें से जिस एक संज्वलनकषायके उदयसे तथा तीनो वेदोंमें से जिस वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उनकी प्रथमस्थिति अन्तर्मुहूर्त होती है; शेष प्रकृतियोंकी आवलिमात्र प्रथमस्थिति होती है । अन्तरकरण करनेके प्रथम समयमें अन्य स्थितिबन्ध, अन्य स्थितिकाण्डक, अन्य अनुभागकाण्डक होता है। एक काण्डकोत्कीरणकालमें अन्तर कार्यकी समाप्ति हो जाती है।


उवरिं समं उक्कीरइ हेट्ठा विसमं तु मज्झमपमाणं ।
तदुपरि पढमठिदीदो संखेज्जगुणं हवे णियमा ॥२४३॥

अर्थ: अन्तरसे ऊपरकी सर्व प्रकृतियोके निषेक सदृश है, किन्तु अन्तरके नीचे उदय व अनुदयरूप प्रकृतियोकी प्रथमस्थितिके निषेक विषम है । प्रथमस्थिति और उपरिम स्थितिके मध्यका प्रमाण अर्थात् अन्तरायाम प्रथम स्थितिसे सख्यातगुणा है ऐसा नियम है ।


अंतरपढमे अण्णो ठिदिबंधो ठिदिरसाण खंडो य ।
एयट्ठिदिखंडुक्कीरणकाले अंतरसमत्ती ॥२४४॥


अंतरहेदुक्ककिरिदद्दव्वं तं अंतरम्हि ण य देदि ।
बंधं ताणंतरजं बंधाणं विदियेगे देदि ॥२४५॥

उदयिल्लाणंतरजं सगपढमे देदि बंधविदिये च ।
उभयाणंतरद्दव्वं पढमे विदिये च संछुहदि ॥२४६॥

अणुभयगाणंतरजं बंधं ताणं च विदियेगे देदि ।
एवं अंतरकरणं सिज्झदि अंतोमुहुत्तेण ॥२४७॥

अर्थ (गाथा 245 से 247): अन्तरकरण करनेके लिए उत्कीरित द्रव्यको अन्तरायाममे नही देता है, किन्तु जो कर्मप्रकृति मात्र बंधती ही है उनके उत्कीरित द्रव्यको द्वितीय स्थितिमें देता है । जो कर्मप्रकृतियां उदय प्राप्त है उनको प्रथमस्थितिमे देता है और द्वितीय स्थितिमें भी देता है । जिन कर्मप्रकृतियोका बंध और उदय दोनो है उनके उत्कीरित द्रव्यको प्रथम और द्वितीय दोनो स्थितियोमे देता है । जिन कर्मप्रकृतियोका न तो बंध होता है और न उदय है उन प्रकृतियोके उत्कीरित द्रव्यको द्वितीय स्थितिमें देता है । इसप्रकार अन्तर्मुहूर्तकाल द्वारा अन्तरकरणकी सिद्धि (समाप्ति) होती है ।


सत्तकरणाणि यंतरकदपढमे होंति मोहणीयस्स ।
इगिठाणिय बंधुदओ ठिदिबंधो संखवस्सं च ॥२४८॥

अणुपुव्वीसंकमणं लोहस्स असंकमं च संढस्स ।
पढमोवसामकरणं छावलितीदेसुदीरणदा ॥२४९॥

अर्थ (गाथा 248 से 249): अतर कर चुकनेके प्रथम समयसे मोहनीयकर्म सम्बन्धी सातप्रकारके करण प्रारम्भ होते है-मोहनीयकर्मका एक स्थानीय बध, एक स्थानीय उदय, मोहनीयकर्मका सख्यातवर्षका स्थितिबंध, मोहनीयकर्मका आनुपूर्वीसक्रम, सज्ज्वलनलोभका असक्रम, नपु सकवेदकी उपशमक्रियाका प्रारम्भ, छह आवलियोके बीत जाने पर मोहनीयकर्मकी उदीरणा । लोभका असंक्रम यह दूसरा करण है । यहां गाथामें ‘लोहस्स’ ऐसा सामान्य निर्देश करने पर भी लोभसंज्वलनका ही ग्रहण करना चाहिए, क्योकि व्याख्यानसे विशेषकी प्रतिपत्ति होती है ऐसा न्याय है । इसलिये पहले आनुपूर्वीके बिना लोभसंज्वलनका भी शेष संज्वलन और पुरुषवेदमे प्रवृत्त होनेवाला संक्रम यहां आनुपूर्वीसंक्रमका प्रारम्भ होने पर प्रतिलोमसंक्रमका अभाव होनेसे रुक गया । यहां से लेकर लोभसंज्वलनका संक्रम नही ही होता, ऐसा ग्रहण करना चाहिये । यद्यपि आनुपूर्वीसंक्रमसे ही यह अर्थ उपलब्ध हो जाता है तथापि मन्दबुद्धिजनोका अनुग्रह करनेके लिए पृथक् निर्देश किया, इसलिए पुनरुक्त दोष प्राप्त नही होता ।

मोहनीयका एकस्थानीय बन्ध यह तीसरा करण है । इसका तात्पर्य-इससे पूर्व देशघाति द्विस्थानीयरूपसे मोहनीयका अनुभागबन्ध होता रहा, अब परिणामोके माहात्म्यवश घटकर वह एक स्थानीय हो गया ऐसा यहां ग्रहण करना चाहिए । नपुंसकवेदका प्रथम समय उपशामक यह चौथा करण यहांपर आरम्भ हुआ है, क्योकि प्रथम आयुक्तकरण (उद्यतकरण) के द्वारा नपुंसकवेदकी ही उपशामनक्रियामें यहासे प्रवृत्ति देखी जाती है । छह आवलियोके जाने पर उदीरणा इस पाचवे करण को यहा आरम्भ करता है । मोहनीयका एक स्थानीय उदय यह छठा करण है । इसका अर्थ-पहले द्विस्थानीय देशघातिरूपसे प्रवृत्त हुआ मोहनीयकर्मका अनुभागउदय अन्तरकरणके अनन्तर ही एकस्थानीयरूपसे परिणत हो गया यह उक्त कथनका तात्पर्य है । ‘मोहनीयकर्मका सख्यातवर्षप्रमाण स्थितिबन्ध’ यह सातवां करण है । इसका अर्थ-पहले मोहनीयकर्मका जो स्थितिबन्ध असंख्यातवर्षप्रमाण होता रहा उसका इस समय काफी घटकर सख्यातहजार वर्षप्रमाणरूपसे अवस्थान होता है, परन्तु शेष कर्मोंका असंख्यात वर्षप्रमाण ही स्थितिबन्ध होता है, क्योकि उनका अभी भी सख्यातवर्षप्रमाण स्थितिबंध प्रारम्भ नही हुआ है । इसप्रकार इन सातो करणोका अन्तरकर चुकनेके प्रथम समयसे ही युगपत् प्रारम्भ होता है ।

छह आवलियोके व्यतीत होनेपर उदीरणा होती है, इस करणका विशेष कथन इसप्रकार है-जैसे पहले सर्वत्र ही समयप्रबद्ध बन्धावलिके व्यतीत होनेके बाद ही नियमसे उदीरणाके लिए शक्य रहता आया है उसप्रकार यहां शक्य नहीं है, किन्तु अन्तर किये जानेके प्रथम समयसे लेकर जो कर्मबंधते है मोहनीय या मोहनीयके अतिरिक्त अन्य ज्ञानावरणादिक वे कर्म छह आवलियोके व्यतीत होनेके बाद उदीरणाके


अंतरपढमादु कमे एक्केक्कं सत्त चदुसु तिय पयडिं ।
सममुच्च सामदि णवकं समऊणावलिदुगं वज्जं ॥२५०॥

एयं णउंसयंवेदं इत्थीवेदं तहेव एयं च ।
सत्तेव णोकसाया कोहादितियं तु पयडीओ ॥२५१॥

अर्थ (गाथा 250 से 251): अन्तर हो जानेके पश्चात् प्रथम समयसे एक अन्तर्मुहूर्तमें नपुंसकवेदको उपशमाते हैं । तत्पश्चात् पुनः एक अन्तर्मुहूर्तमे स्त्रीवेदको उपशमाता है । पुनः एक अन्तर्मुहूर्तमें सात नोकषाय को, पुनः एक अन्तर्मुहूर्तमें तीन क्रोध को, पुनः एक अन्तर्मुहूर्तमे तीन मान को, पुनः एक अन्तर्मुहूर्तमे तीन माया को, तत्पश्चात् एक अन्तर्मुहूर्तद्वारा तीन लोभका उपशम करता है । वहा एक समय कम दो आवलि प्रमाण नवक प्रबद्धो को नहीं उपशमाता है ।


अंतरकदपढमादो पडिसमयमसंखगुणविहाणकमे ।
णुवसामेदि हु संडं उवसंतं जाण ण च अण्णं ॥२५२॥

अर्थ: अन्तर किये जानेके प्रथम समयसे लेकर प्रतिसमय असंख्यातगुणे क्रम विधानसे नपुंसकवेदके प्रदेशपुंजको उपशमाता है, अन्य कर्मोंको नही उपशमाता ।


संठादिमउवसमगे इट्ठस्स उदीरणा य उदओ य ।
संठादो संकमिदं उवसमियमसंखगुणियकमा ॥२५३॥

अर्थ: नपुंसकवेदके उपशम सम्बन्धी प्रथम समयमें उदय प्राप्त अन्य प्रकृतियों का उदीरणा द्रव्य, उन्हीका उदयरूप द्रव्य, नपुं सकवेदका अन्य प्रकृतियोमे संक्रमित होनेवाला द्रव्य और नपुं सकवेदका उपशमित होनेवाला द्रव्य क्रमशः असंख्यातगुणे हैं ।


थीयद्धा संखेज्जदिभागेपगदे तिघादिठिदिबंधो ।
संखतुवं रसबंधो केवलणाणोगठाणं तु ॥२५५॥

अर्थ: स्त्रीवेदके उपशानेके कालके संख्यातवे भाग व्यतीत हो जाने पर तीन घातिया (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय) कर्मोका स्थितिबन्ध संख्यातवर्ष प्रमाण होता है और केवलज्ञानावरण, केवलदर्शनावरणके अतिरिक्त तीन घातिया कर्मोकी शेष प्रकृतियोका अनुभागबन्ध एक स्थानीय (लता रूप) होता है।


वस्साणं बत्तीसादुवरिं अंतोमुहुत्तपरिमाणं ।
ठिदिबंधाणोसरणं अवरट्ठिदिबंधणं जाव ॥२५६॥

अर्थ: सज्वलनकषायका स्थितिबन्ध बत्तीस वर्षप्रमाण हो जानेपर प्रत्येक स्थितिबन्धापसरण अन्तर्मुहूर्तप्रमाणवाला होने लगता है। जबतक जघन्य स्थितिबन्ध हो तबतक स्थितिबन्धापसरण अन्तर्मुहूर्त प्रमाणवाला होता है।


ठिदिबंधाणोसरणं एवं समयप्पबद्धसहिकिच्चा ।
उत्तं णाणादो पुण ण च उत्तं अणुववत्तीदो ॥२५७॥

अर्थ: एक समयमे जितना स्थितिबन्ध कम होता है उतना स्थितिबन्धापसरण का प्रमाण कहा गया है । एक स्थितिबन्धापसरण कालतक वही प्रमाण रहता है, क्योकि प्रत्येक समयमे नाना स्थितिबन्धापसरणकी अप्राप्ति कही गई है ।


एवं संखेज्जेसु ट्ठिदिबंधसहस्सगेसु तीदेसु ।
संडुव समइत्तत्तो इत्थि च तहेव उवसमदि ॥२५८॥

अर्थ: इसप्रकार संख्यातहजार स्थितिबन्ध व्यतीत होने पर अन्तर्मुहूर्तकालके द्वारा नपुंसकवेदका उपशम होता है । तत्पश्चात् उसीप्रकार नपुंसकवेदके उपशम सदृश अन्तर्मुहूर्तकाल द्वारा स्त्रीवेदका उपशम करता है ।


थीउवसमिदाणंतरसमयादो सत्त णोकसायाणं ।
उवसमगो तस्सद्धा संखेज्जदिमे गदे तत्तो ॥२६०॥

णामदुग वेयणीयट्ठिदिबंधो संखवस्सयं होदि ।
एवं सत्तकसाया उवसंता सेसभागंते ॥२६१॥

णवरि य पुंवेदस्स य णवकं समऊणदोण्णिआवलियं ।
मुच्चा सेसं सव्वं उवसंतं होदि तच्चरिमे ॥२६२॥

अर्थ (गाथा 260 से 262): स्त्रीवेदके उपशान्त होनेपर सात नोकषाय का उपशामक होता है । सात नोकषायसम्बन्धी उपशामना कालके संख्यातवे भाग बीत जानेपर नाम, गोत्र और वेदनीयकर्मोंका संख्यातवर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है । इसप्रकार शेषभागके अन्त समयमे सात नोकषाय उपशान्त हो जाती है, किन्तु पुरुषवेदके एक समयकम दो आवलि-मात्र नवकसमयप्रबद्धको छोड अवशेष सबको उपशामाता है ।


तच्चरिमे पुंबंधो सोलसवस्साणि संजलणगाणं ।
तद्गुणाणं सेसाणं संखेज्जसहस्सवस्साणि ॥२६३॥

अर्थ: सवेद भागके अन्तिम समयमें पुरुषवेदका स्थितिबन्ध सोलह वर्षप्रमाण होता है और उससे दुगुणा अर्थात् ( १६×२ ) ३२ वर्षप्रमाण संज्वलन कषायोंका स्थितिबन्ध होता है । शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्षप्रमाण होता है ।


पुरिसस्स य पढमठिदी आवलिदोसुवरिदासु आगाला ।
पडिआगाला छिण्णा पडियावलियाहुदीरणदा ॥२६४॥

अर्थ: पुरुषवेदकी प्रथमस्थितिमें दो आवलि शेष रहने पर आगल और प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो जाती है । प्रत्यावलिमे से ही उदीरणा होती है ।


अंतरकदाहु छष्णोकसायदव्वं ण पुरिसगे देदि ।
एदि हु संजलणस्स य कोधे अणुपुव्विसंकमदो ॥२६५॥

अर्थ: अन्तर करनेके पश्चात् हास्यादि छह नोकषायोका द्रव्य पुरुषवेदमे सक्रमित नही होता, सज्वलनक्रोधमे ही सक्रमित होता है, क्योकि यहा आनुपूर्वी सक्रमण पाया जाता है ।


पुरिसस्स उत्तणवकं असंखगुणिणिक्कमेण उवसमदि ।
संकमदि हु हीणकमेणधापवत्तेण हारेण ॥२६६॥

अर्थ: पुरुषवेदके उक्त ( गाथा २६२ ) नवक समयप्रबद्ध द्रव्यको असंख्यातगुणी श्रेणिके क्रमसे उपशमाता है, परन्तु पर प्रकृतिमे अध प्रवृत्त सक्रम द्वारा हीन क्रमसे सक्रमाता है ।


पढमावेदे संजलणाणं अंतोमुहुत्तपरिहीणं ।
वस्साणं बत्तीसं संखसहस्सियरगाणठिदिबंधो ॥२६७॥

अर्थ: अपगतवेदके प्रथम समयमे चार संज्वलन कषायोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम बत्तीस वर्षप्रमाण और शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यात हजारवर्ष है । सज्वलनमें संक्रमण करता है ।


पढमावेदो तिविहं कोहे उवसमदि पुव्वपढमठिदी ।
समयाहिय आवलियं जाव य तक्कालठिदिबंधो ॥२६८॥

संजलणचउक्काणं मासचउक्कं तु सेसपयडीणं ।
वस्साणं संखेज्जसहस्साणि हवंति णियमेण ॥२६९॥

अर्थ (गाथा 268 से 269): प्रथम समयवर्ती अपगतवेदी जीव तीनप्रकारके क्रोधको उपशमाता है । इनकी वही पुरानी प्रथमस्थिति होती है । (पूर्वस्थितिमें) जब समय अधिक आवलीकाल शेष रह जाता है, उस समय स्थितिबन्ध नियमसे संज्वलन चतुष्कका चार मास और शेष कर्मोंका संख्यातहजार वर्षप्रमाण होता है ।


कोहदुगं संजलणगकोहे संछुहदि जाव पढमठिदी ।
आवलितियं तु उवरिं संछुहदि हु माणसंजलणे ॥२७०॥

अर्थ: सज्वलनक्रोधमे दो प्रकार ( अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण ) क्रोधका तब तक सक्रमण करता है जब तक क्रोधसज्वलनकी प्रथमस्थितिमें तीन आवलियां ( सक्रमावलि, उपशमनावलि, उच्छिष्टावलि ) शेष रहती हैं। उसके बाद मान प्रमाण होकर मानसंज्वलनके वेदककालसे एकआवलिप्रमाण अधिक होती है । अपकर्षित द्रव्यका असंख्यातवाभाग प्रथमस्थितिमें दिया जाता है, शेष बहुभागको द्वितीय स्थितिमें देता हुआ द्वितीयस्थितिके प्रथम निषेकमे असंख्यातगुणे हीन प्रदेशपुंजका सिंचन करता है, क्योकि प्रथमस्थितिके गुणश्रेणिशीर्खरूपसे अवस्थित अन्तिम निषेकमे असंख्यात समयप्रबद्ध निक्षिप्त करता है । परन्तु द्वितीयस्थितिके प्रथमनिषेकमें निक्षिप्त किये जाने वाले द्रव्यका प्रमाण एक समयप्रबद्धके असंख्यातवे भागप्रमाण होता है, क्योकि वह अपकर्षितद्रव्यको डेढगुणहानिसे भाजित करने पर प्राप्त हुआ है । इससे ऊपर सर्वत्र अतिस्थापनाव्रलिप्रमाण स्थितिको छोडकर अन्तिम स्थितितक विशेष ( चय ) हीन द्रव्यको निक्षिप्त करता है । इसीप्रकार मानवेदकके द्वितीयादि समयोमे प्रथम और द्वितीयस्थितिमे प्रदेशोका विन्यास क्रम होता है । इतनी विशेषता है कि प्रतिसमय असंख्यातगुणी श्रेणिरूपसे प्रदेशपुजका अपकर्षरणकर उदयादि गुणश्रेणिका जितना आयाम गलित हो जावे उससे शेष रहनेवाले आयाममे निक्षेप होता है ।

जिस समय क्रोधसंज्वलनके बन्ध-उदय व्युच्छिन्न होते है उस समय तीनप्रकार (अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण, संज्वलन) मानका प्रयुक्त (उद्यत) क्रिया द्वारा उपशामक होता है । उस समय तीन संज्वलन (संज्वलन मान-माया-लोभ) का स्थिति-बन्ध अन्तर्मुहूर्तकम चार मास होता है और शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्ष होता है, क्योकि अनन्तर पूर्व संज्वलनोका स्थितिबन्ध पूर्ण चार माह कहा गया है और बधापसरणका प्रमाण अन्तर्मुहूर्त मात्र है । शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध यद्यपि संख्यातहजार वर्षप्रमाण होता है तथापि अनन्तरपूर्वकंके स्थितिबन्धसे संख्यातगुणा हीन है । इसप्रकार तीन मानके उपशमको प्रारम्भ करके प्रतिसमय असंख्यातगुणी श्रेणिरूप से उपशमाने वालेके संख्यातहजार स्थितिबन्धोके द्वारा संज्वलनमानकी प्रथमस्थिति क्षीण होती जाती है ।


कोहस्स पढमठिदी आवलिसेसे तिकोहमुवसंतं ।
ण य णवकं तत्थंतिमबंधुदया होंति कोहस्स ॥२७१॥

अर्थ: सज्वलनक्रोधकी प्रथमस्थितिमे एक आवलि शेष रहनेपर तीनो प्रकार का क्रोध उपशान्त हो जाता है, किन्तु नवक समयप्रबद्ध उपशान्त नही हुआ उस समय सज्वलनक्रोधका अन्तिम बन्ध व उदय होता है ।


से काले माणस्स य पढमट्ठिदिकारवेदगो होदि ।
पढमट्ठिदिम्मि दव्वं असंखगुणीयक्कमे देदि ॥२७२॥

पढमट्ठिदिसीसादो विदियादिम्हि य असंखगुणहीणं ।
तत्तो विसेसहीणं जाव अइच्छावणमपत्तं ॥२७३॥

अर्थ (गाथा 272 से 273): उसी कालमे सज्वलनमानकी प्रथमस्थितिका कर्त्ता व भोक्ता होता है । प्रथमस्थितिमे द्रव्य असंख्यातगुणे क्रमसे दिया जाता है । द्वितीय स्थितिके आदिमे अर्थात् प्रथम निषेकमे द्रव्य प्रथमस्थितिके शीर्षके द्रव्यसे असंख्यातगुणा हीन दिया जाता है । उसके पश्चात् अतिस्थापनावली प्राप्त होने तक विशेषहीन क्रमसे दिया जाता है । सज्वलनमानकी प्रथमस्थितिमें आवलिकाल शेष रहनेपर नवीन समयप्रबद्धके बिना अन्य तीन मानका सर्व द्रव्य उपशान्त हो चुकता है । उसी समय सज्वलनमानकी बन्ध व उदयव्युच्छित्ति हो चुकती है ।


माणदुगं संजलणगमाणे संछुहदि जाव पढमठिदी ।
आवलितियं तु उवरिं माया संजलणे य संछुहदि ॥२७४॥


माणस्स य पढमठिदी सेसे समयाहिया तु आवलियं ।
तियसंजलणगबंधो दुमास सेसाण कोह आलावो ॥२७५॥

अर्थ: जब तक प्रथमस्थितिमे तीन आवलि शेष रहती है तब तक दो (अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण) प्रकार मानको सज्वलनमानमे संक्रमित करता है, उसके बाद सज्वलन माया मे ।


माणस्स य पढमठिदी आवलिसेसे तिमाणमुवसंतं ।
णा य णवकं तत्थंतिमबंधुदया होंति माणस्स ॥२७६॥

अर्थ: मायाकी प्रथमस्थितिमें एकसमय अधिक आवलिकाल शेष रहनेपर संज्वलनमाया और लोभका दो मासप्रमाण स्थितिबन्ध होता है तथा शेष कर्मोंका क्रोधवत् कथन जानना ।


से काले मायाए पढमट्ठिदिकारवेदगो होदि ।
माणस्स य आलावो दव्वस्स विभंजणं तत्थ ॥२७७॥

अर्थ: उसी समय (सज्वलनमानकी प्रथमस्थिति एक आवलिमात्र शेष रह जाने पर) सज्वलनमायाकी प्रथमस्थितिका कारक व वेदक होता है । सज्वलनमायाके द्रव्यका विभाजन आदि मानके आलापके समान है । मानसज्वलनकी प्रथमस्थितिमे एक समय अधिक एक आवलि शेष रहने पर तीन (मान, माया, लोभ) सज्वलनका स्थितिवन्ध दो मास प्रमाण होता है । शेषकमोंका स्थितिबन्ध क्रोधके आलाप सदृश (संख्यातहजार वर्षप्रमाण) है ।


मायाए पढमठिदी सेसे समयाहियं तु आवलियं ।
मायालोहगबंधो मासं सेसाण कोह आलावो ॥२७८॥


मायदुगं संजलणगमायाए छुहदि जाव पढमठिदी ।
आवलितियं तु उवरिं संछुहदि हु लोहसंजलणे ॥२७९॥

अर्थ: संज्वलनमायाका प्रथमस्थितिमे जबतक तीन आवलिया शेष रहती है तबतक मायाद्विक (अप्रत्याख्यान-प्रत्याख्यानरूप माया) के द्रव्यको संज्वलन मायामे ही संक्रमित करता है तथा उससे आगे संक्रमणावलीमे उनके द्रव्यका संज्वलनलोभमे संक्रमण करता है ।


मायाए पढमठिदी आवलिसेसेत्ति मायमुवसंतं ।
ण य णवकं तत्थंतिमबंधुदया होंति मायाए ॥२८०॥

अर्थ: मायाकी प्रथमस्थितिमे आवलिप्रमाण काल अवशिष्ट रहनेपर उपशमनावलिके अन्तिम समयमे नवक समयप्रबद्ध बिना अन्य सर्व मायाका द्रव्य उपशमित होता है । उसी समयमे संज्वलनमायाका बन्ध व उदय व्युच्छिन्न होता है ।


विदियद्धे लोभावरफद्दयहेट्ठा करेदि रसकिट्ठिं ।
इगिफद्दयवग्गणगद संखाणमणंतभागमिदं ॥२८३॥

अर्थ: (बादरलोभसंज्वलनकी प्रथमस्थितिके) दूसरे अर्धभागमें लोभके जघन्यस्पर्धक के नीचे अनुभागकृष्टियोंको करता है। उनका प्रमाण एक स्पर्धककी वर्गणाओके अनन्तवे भागप्रमाण है।


ओक्कड्डिदइगिभागं पल्लासंखेज्जखंडदिगिभागं ।
देदि सुहुमासु किट्टिसु फड्ढयगे सेस बहुभागं ॥२८४॥

अर्थ: (सज्वलनलोभके द्रव्यको अपकर्षण भागहारद्वारा भाजितकर उसमें से) एक भाग अपकर्षित द्रव्य है । इसको पल्यके असंख्यातवेभागसे खण्डितकर उसमे से एक भागको सूक्ष्मकृष्टियोमे देता है, शेष बहुभागको स्पर्धकोमे देता है । चयको आदिरूप स्थापित करना, क्योकि द्वितीयकृष्टिमे एक चय देना है । एक चय उत्तर ( आगे ) स्थापित करना, क्योकि, तृतीयादि कृष्टियोमे क्रमशः एक-एक चय अधिक देना है । तथा एककम पूर्वकृष्ट प्रमाण गच्छ स्थापित करना चाहिए, क्योकि प्रथमकृष्टिमे चय नही मिलाना है । ऐसे स्थापित करके “पदमेगेणविहीण” इत्यादि श्रेणिव्यवहाररूप गणितसूत्र से एक कम गच्छको दो का भाग देकर, उसको (लब्धको) उत्तरसे (जो कि एक चयरूप है, उससे) गुणा करके उसमे प्रभव अर्थात् आदिके एक चयको मिलानेपर तथा फिर गच्छसे गुणा करने पर चयधन प्राप्त होता है । अंकसदृष्टि की अपेक्षा-जैसे एक कम कृष्टिप्रमाण गच्छ ७, इसमे से एक घटाने पर छः आये । ६ मे २ का भाग देनेपर ३ आये । इसे चय ( १६ ) से गुणा करनेपर ४८ आये । इसमे प्रभव (एक चय यानी १६) को मिलाने पर ६४; पुनः इसको गच्छ (७) से गुणा करने पर ४४८ चयधन होता है । इस विधानसे जो प्रमाण आवे उतना अधस्तन शीर्ष विशेषद्रव्य जानना१ । अब जो पूर्वकृष्टिमे से प्रथमकृष्टिका प्रमाण था उसीके समान ज्यो का त्यो द्रव्य रहता है । इसका प्रमाण बतलाते है१-विवक्षित समयमें अपकृष्टद्रव्यको पल्यके असंख्यातवेभागका भाग देने पर एक भागमात्र द्रव्य कृष्टिमें देने योग्य है । इसमें से पूर्वोक्त तीन प्रकारका द्रव्य घटाने पर किंचिदून हुआ । (यही किंचिदून द्रव्य मध्यमखंड द्रव्य है ।) इतना द्रव्य सकलकृष्टियोमे देना है तो एककृष्टिमें कितना देना होगा ? ऐसी त्रैराशिकविधि करके उस द्रव्यमे पूर्व-अपूर्वकृष्टियोंके प्रमाणका भाग देने पर एककृष्टिमें देने योग्य एकखण्डका प्रमाण प्राप्त होता है । इसको सर्वकृष्टिके प्रमाणसे गुणित कर देनेपर सर्व मध्यमखण्ड द्रव्यका प्रमाण प्राप्त हो जाता है । इसप्रकार यहा विवक्षित द्वितीय समयमे कृष्टिरूप होने योग्य द्रव्यमे बुद्धिकल्पनासे अधस्तनशीर्षविशेष आदि चार प्रकारके द्रव्य भिन्न-भिन्न स्थापित किये । ऐसे ही यहां पर तृतीयादि समयोमे कृष्टिरूप होने योग्य द्रव्यमे विधान जानना । अथवा आगे क्षपकश्रेणिके वर्णनमे अपूर्वस्पर्धकका, बादरकृष्टिका या सूक्ष्मकृष्टिका वर्णन करते हुए ऐसे विधान कहेगे, वहां ऐसा ही अर्थ जघन्यकृष्टिमे बहुत द्रव्य दिया जाता है, उससे आगे अन्तिमकृष्टि पर्यन्त विशेष हीनरूपसे द्रव्य दिया जाता है । पूर्वस्पर्धककी प्रथमवर्गणामे अनन्तगुणाहीन द्रव्य दिया जाता है उससे ऊपर विशेषहीन क्रमसे द्रव्य दिया जाता है, किन्तु पूर्वकृष्टिकी प्रथमकृष्टिमे जो द्रव्य दिया जाता है वह अपूर्व अन्तिमकृष्टिमे दिये गये द्रव्यसे असंख्यातवे भाग और अनन्तवे भागहीन है, क्योकि एक अधस्तनकृष्टिका द्रव्य व उभयद्रव्य विशेषसे हीन है, ।


पडिसमयमसंखगुणा दव्वादु असंखगुणविहीणकमे ।
पुव्वगहेट्ठा हेट्ठा करेदि किट्टि स चरिमोत्ति ॥२८५॥

अर्थ: असंख्यातगुणे-असंख्यातगुणे अपकर्षित द्रव्यमे से प्रतिसमय की गई कृष्टिका प्रमाण पूर्व-पूर्व कृष्टियोके प्रमाणसे असंख्यातगुणा घटता होता है । यह क्रम अन्तिम समय तक जाता है ।


हेट्ठासीसं थोवं उभयविसेसे तदो असंखगुणं ।
हेट्ठा अणंतगुणिदं मज्झिमखंडं असंखगुणं ॥२८७॥

अर्थ: (पूर्वोक्त गाथा २८६ मे) कहे गये चारप्रकारके द्रव्योमे अधस्तनशीर्ष विशेष द्रव्य सबसे स्तोक है । इससे उभयद्रव्य विशेष असंख्यातगुणा है । इससे अधस्तनकृष्ट द्रव्य अनन्तगुणा है और इससे मध्यमखण्ड द्रव्य असंख्यातगुणा है ऐसा जानना ।


अवरे बहुगं देदि हु विसेसहीणक्कमेण चरिमोत्ति ।
तत्तो णंतगुणीणं विसेसहीणं तु फद्धयगे ॥२८८॥


णवरि असंखाणंतिमभागूणं पुव्वकिट्ठिसंधीसु ।
हेट्ठिमखंडपमाणेणेव विसेसेण हीणादो ॥२८९॥


अवरादो चरिमेत्ति य अणंतगुणिदक्कमादु सत्तीदो ।
इदि किट्टीकरणद्धा बादरलोहस्स बिदियद्धं ॥२९०॥

अर्थ: अनुभागकी अपेक्षा जघन्य अपूर्वकृष्टिके अविभाग प्रतिच्छेदोसे द्वितीयकृष्टिके अविभाग प्रतिच्छेद अनन्तगुणे है । इसी प्रकार अनन्तगुणित क्रम पूर्वकृष्टिकी अन्तिम कृष्टितक ले जाना चाहिए । इसप्रकार बादरलोभ वेदक कालका द्वितीयर्ध कृष्टिकरणकाल व्यतीत होता है ।


बिदियद्धा संखेज्जाभागेसु गदेसु लोभठिदिबंधो ।
अंतोमुहुत्तमेत्तं दिवसपुधत्तं तिघादीणं ॥२९१॥

अर्थ: लोभसज्वलन कालके तीनभागोमे से दूसरे कालके (भागके) सख्यात बहुभाग बीत जानेपर सज्वलनलोभका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तमात्र होता है शेष तीन (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय) घातिया कर्मोका स्थितिबन्ध पृथक्त्वदिनप्रमाण होता है ।


किट्टीकरणाद्धाए जाव दुचरिमं तु होदि ठिदिबंधो ।
वस्साणं संखेज्जसहस्साणि अघादिठिदिबंधो ॥२९२॥

अर्थ: कृष्टिकरणकालके द्विचर्म स्थितिबन्धतक नाम, गोत्र व वेदनीय इन तीन अघातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्षप्रमाण होता है


किट्टीयद्धाचरिमे लोहस्संतो मुहुत्तियं बंधो ।
दिवसंतो घादीणं वेवस्संतो अघादीणं ॥२९३॥

अर्थ: कृष्टिकरणकालमे अन्तिम स्थितिबन्ध लोभ सज्जवलनका अन्तर्मुहूर्त-प्रमाण, घातियाकर्मोंका कुछ कम एकदिनप्रमाण तथा अघातियाकर्मोंका कुछकम दो वर्षप्रमाण होता है ।


विदियच्छा परिसेसे समऊणावलितियेसु लोहदुगं ।
सट्ठाणे उवसमदि हु ण देदि संजलणलोहम्मि ॥२९४॥

अर्थ: दूसरे कृष्टिकरणकालमें एक समयकम तीन आवलियां शेष रहने पर दो प्रकारका लोभ (अप्रत्याख्यानावरण-प्रत्याख्यानावरण लोभ) संज्वलनलोभमें संक्रांत नही होता, स्वस्थानमें ही उपशमाया जाता है ।


बादरलोहादिठिदी आवलिसेसे तिलोहमुवसंतं ।
णवकं किट्टि मुच्चा सो चरिमो थूलसंपराओ य ॥२९५॥

अर्थ: बादरलोभकी प्रथमस्थितिमे आवलि शेष रहनेपर नवक समयप्रबद्ध और कृष्टियोको छोड़कर तीन प्रकारके लोभका द्रव्य उपशान्त हो चुकता है । वह अन्तिम समयवर्ती बादरसाम्पराय होता है ।


किट्टिं सुहुमादीदो चरिमोत्ति असंखगुणिदसेढीए ।
उवसमदि हु तच्चरिमे अवरट्ठिदिबंधणं छहं ॥२९६॥


पढमे चरिमे समये कदकिट्‍टीणग्गदो दु आदीदो ।
मुच्चा असंखभागं उदेदि सुहुमादिमे सव्वे ॥२९७॥

अर्थ: प्रथम समयमे जो कृष्टिया की गईं उनके अग्रभाग मे से असंख्यातवेभाग को छोड़कर और अन्तिम समयमे की गई कृष्टियो की जघन्य (आदि) कृष्टिसे लेकर असंख्यातवे भागको छोड़कर अन्य सकल कृष्टियां सूक्ष्मसाम्परायके प्रथम समयमे उदीर्ण होती हैं । [ सक्षेपमे १० वे गुणस्थानके प्रथम समयमे कृष्टियो के अधस्तन व उपरिम असंख्यातवेभाग को छोड़कर शेष असंख्यात बहुभाग का वेदन करता है ।


विदियादिसु समयेसु हि छंडदि पल्ला असंखभागं तु ।
आफुंददि हु अपुव्वा हेट्ठा तु असंखभागं तु ॥२९८॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायके द्वितीयादि समयोमे उदीर्ण हुई कृष्टियोके अग्राग्रसे पल्यके असंख्यातवे भागप्रमाणको छोड़ता है तथा नीचे से अपूर्व असंख्यातवे भागका स्पर्श करता है । सम्बन्धी निषेकोके साथ तद्रूप परिणमनकर उदयरूप होगा ।


से काले किट्टिस्स य पढमट्ठिदिकारवेदगो होदि ।
लोहगपढमठिदीदो अड्ढं किंचूणयं गत्थ ॥२९९॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणकालके क्षीण होने पर अनन्तर समयमें कृष्टियोंकी प्रथम स्थितिका कारक व वेदक होता है । बादर लोभकी प्रथम स्थितिके कुछकम आधेभागप्रमाण कृष्टियोंकी प्रथम स्थिति है ।


अंतोमुहुत्तमेत्तं घादितियाणं जहण्णठिदिबंधो ।
णामदुग वेयणीये सोलस चउवीस य मुहुत्ता ॥३००॥

अर्थ (गाथा 299 से 300): सूक्ष्मसाम्परायके प्रथम समयसे अन्तिम समयतक कृष्टियोंको असंख्यातगुणी श्रेणिक्रमसे उपशमाता है । अन्तिम समयमे छहकर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध होता है । तीन घातिया कर्मोंका अन्तर्मु हूर्तप्रमाण, नाम व गोत्रका १६ मुहूर्त और वेदनीयका चौबीस मुहूर्तप्रमाण जघन्य स्थितिबन्ध होता है ।


पुरिसादीणुच्छिट्ठं समऊणावलिगदं तु पच्चिहिदि ।
सोदयपढमट्ठिदिणा कोहादीकिट्टियंताणं ॥३०१॥

अर्थ: पुरुषवेदादिका एकसमयकम आवलिप्रमाण निषेकोका द्रव्य उच्छिष्टावलिरूप है वह द्रव्य क्रोधादि सूक्ष्मकृष्ट पर्यन्तके उदयरूप निषेकसे लेकर प्रथमस्थिति


पुरिसादो लोहगयं णवकं समऊण दोण्णि आवलियं ।
उवसमदि हू कोहादीकिट्टिअंतेसु ठाणेसु ॥३०२॥

अर्थ: पुरुषवेदसे लोभपर्यन्तके एक समयकम दो आवलिमात्र नवक समयप्रबद्धोका द्रव्य क्रोधादि कृष्टिपर्यन्तकी प्रथमस्थितिके कालोमे उपशमता है ।


उवसंतपढमसमये उवसंतं सयलमोहणीयं तु ।
मोहस्सुदयाभावा सव्वत्थ समाणपरिणामो ॥३०३॥

अर्थ: उपशान्तकषायके प्रथम समयमे समस्त मोहनीयकर्म उपशमरूप रहता है । मोहनीयकर्मके उदयका अभाव हो जानेसे उपशान्तकषाय गुणस्थानके सम्पूर्ण कालमे समानरूप परिणाम रहते हैं ।


अंतोमुहुत्तमेत्तं उवसंतकसायवीयरायद्धा ।
गुणसेढीदीहत्तं तस्सद्धा संखभागो दु ॥३०४॥

अर्थ: उपशातकषायवीतरागका काल श्रन्तर्मुहूर्तप्रमाण है और उसके सख्यातवेभागप्रमाण गुणश्रेणि आयाम है ।


उदयादिअवट्टिदगा गुणसेढी दव्वमवि अवट्ठिदगं ।
पढमगुणसेढिसीसे उदये जेट्ठं पदेसुदयं ॥३०५॥

अर्थ: उपशातमोह कालमे उदयादि गुणश्रेणिका आयाम अवस्थित है और द्रव्यनिक्षेप भी अवस्थित है । प्रथम गुणश्रेणि (उपशातमोहके प्रथम समयमे की गई गुणश्रेणि) के शीर्षका उदय होनेपर ज्येष्ठ अर्थात् उत्कृष्ट प्रदेशोदय होता है ।


णामधुवोदयबारस सुभगति गोदेक्क विग्धपणगं च ।
केवल णिद्दाजुयलं चेदे परिणामपच्चया होंति ॥३०६॥

तेसिं रसवेदमवट्ठाणं भवपच्चया हु सेसाओ ।
चोत्तीसा२ उवसंते तेसिं तिट्ठाण रसवेदं ॥३०७॥

अर्थ (गाथा 306 से 307): उपशान्तकषायमे उदययोग्य जो ५६ प्रकृतिया पाई जाती है उनमें तैजस-कार्मणशरीर २, वर्णादि ४, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, अगुरुलघु, निर्माण नामकर्म की ये बारह प्रकृति और सुभग, आदेय, यशस्कीर्ति, उच्चगोत्र, अन्तरायकी पांच, केवल-ज्ञानावरण, केवलदर्शनावरण, निद्रा, प्रचला ये सर्व २५ प्रकृतिया परिणामप्रत्यय है । ये २५ प्रकृतिया परिणाम प्रत्यय है इसलिये उपशान्तकषायमे उनका रसवेदन अवस्थित है । शेष ३४ प्रकृतिया भवप्रत्यय है इसलिए उन शेष ३४ प्रकृतियोके रसवेदन सबंधी तीनस्थान है । अवधिज्ञानी जीवमे अवधिज्ञानावरणका अनुभागोदय अवस्थित होता है । उससे अन्यत्र अवधिज्ञानावरणका रसोदय छहवृद्धियो, छह हानियो और अवस्थानरूपसे अनवस्थित होता है । इसीप्रकार मन पर्ययज्ञानावरण और अवधिदर्शनावरणकी अपेक्षा भी कथन करना चाहिए । शेष ज्ञानावरण और दर्शनावरणकी अपेक्षा भी आगमानुसार कथन करना चाहिए । जो नामकर्म और गोत्रकर्म परिणाम प्रत्यय होते है उनका अनुभागोदयकी अपेक्षा अवस्थितवेदक होता है । वेदी जाने वाली नामकर्मकी प्रकृतियोको ग्रहण करना चाहिए, क्योकि नही वेदी जाने वाली नामकर्मकी प्रकृतियोंका अधिकार नही है । मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, छहसस्थानोमे से कोई एक सस्थान, औदारिकशरीराङ्गोपाङ्ग, तीन सहननमें से कोई एक सहनन, वर्ण, गंध, रस, स्पर्श, अगुरुलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, दो विहायोगतियोमें से कोई एक, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुस्वर-दुःस्वरमे से कोई एक, आदेय, यशःकीर्ति, सुभग, निर्माण ये नामकर्मकी वेदी जानेवाली प्रकृतियां हैं । इनमे से तैजसशरीर, कार्मणशरीर, वर्ण, गंध, रस, शीत-उष्ण-स्निग्ध-रूक्ष स्पर्श, अगुरुलघु, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, सुभग, आदेय, यशःकीर्ति और निर्माण नामकर्म परिणामप्रत्यय है । गोत्रकर्ममे उच्चगोत्र परिणामप्रत्यय है । इसप्रकार परिणामप्रत्यय नाम व गोत्रकर्मकी उक्त प्रकृतियोकी अनुभागोदयकी अपेक्षा अवस्थित वेदना होती है, क्योकि अवस्थित परिणामविषयक होने पर दूसरा प्रकार सम्भव नही है, परन्तु यहां वेदी जानेवाली भवप्रत्यय शेष सातावेदनीय आदि अघाति प्रकृतियोकी छह वृद्धि और छह हानिके क्रमसे अनुभागको यह वेदता है । इसप्रकार उपशान्तकषाय गुणस्थानके अन्तिमसमयपर्यन्त चारित्रमोहकी इक्कीस प्रकृतियोंका उपशम विधान सम्पूर्ण हुआ ।


उपशान्तकषायगुणस्थानसे अधःपतनका कथन । “उपशान्तकषायतः अधःपतनकथनाधिकारः


उवसंते पडिवडिदे भवक्खये देवपढमसमयम्हि ।
उग्घाडिदाणि सव्ववि करणाणि हवंति णियमेण ॥३०८॥

अर्थ: भवक्षय होनेपर उपशान्तकषायसे गिरकर देवोमे उत्पन्न होनेवालेके प्रथमसमयमें नियमसे समस्तकरण उद्घाटित हो जाते है ।


सोदीरणाण दव्वं देदि हु उदयावलिम्हि इयरं तु ।
उदयावलिबाहिरगे गोपुच्छाए देदि सेढीए ॥३०९॥

अर्थ: उदयरूप प्रकृतियोका द्रव्य उदयावलिमें भी दिया जाता है, इतर


अद्धाखए पडंतो अधापवत्तोत्ति पडदि हु कमेण ।
सुज्झंतो आरोहदि पडदि हु सो संकिलिस्संतो ॥३१०॥

अर्थ: उपशान्तकालका क्षय होनेसे गिरनेपर अध प्रवृत्ततक क्रमसे गिरता है, विशुद्ध परिणामोसे पुन श्रेणिपर चढ़ता है और सक्लेश परिणामोसे उससे भी नीचे गिरता है ।


सुहुमप्पविट्ठसमएणट्ठवसामण तिलोहगुणसेढी ।
सुहुमद्धादो अहिया अवट्ठिदा मोहगुणसेढी ॥३११॥

अर्थ: उपशान्तकषायके पश्चात् सूक्ष्मसाम्परायमे प्रविष्ट हुआ, वहां प्रथम समयमें नष्ट हो गया है उपशमकरण जिनका ऐसी अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलनलोभकी गुणश्रेणि प्रारम्भ होती है । इस गुणश्रेणिआयामका प्रमाण, अवरोहक सूक्ष्मसाम्परायकालसे एक आवलि अधिक है यहां मोहकी गुणश्रेणिका आयाम अवस्थितरूप है ।


उदयाणं उदयादो सेसाणं उदयबाहिरे देदि ।
छण्ण्हं बाहिरसेसे पुव्वतिगादहियणिक्खेओ ॥३१२॥

अर्थ: ( अनुदय ) प्रकृतियोंका द्रव्य उदयावलिके बाहर तथा अन्तरायाममें गोपुच्छाकार श्रेणिरूपसे निक्षिप्त होते हैं ।


ओदरसुहुमादीए बंधो अंतोमुहुत्त बत्तीसं ।
अडदालं च मुहुत्ता तिघादिणामदुगवेयणीयाणं ॥३१३॥

अर्थ: उपशान्तकषायसे अवतरित हुए जीवके सूक्ष्मसाम्परायके आदिमें तीन घातिया कर्मोंका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण, नामद्विकका बत्तीस मुहूर्तप्रमाण और वेदनीयका अडतालीस मुहूर्तप्रमाण बन्ध होता है ।


गुणसेढीसत्थेदररसबंधो उवसमादु विवरीयं ।
पढमुदओ किट्टीएमसंखभागा विसेसअहियकमा ॥३१४॥

अर्थ: तदनन्तर समयमे ( द्वितीयादि समयोमे ) अवरोहकके गुणश्रेणि अपकृष्टद्रव्य, प्रशस्त व अप्रशस्तप्रकृतियोका अनुभागबन्ध आरोहकसे विपरीतक्रम लिये होता है । प्रथम समयमे जितनी कृष्टियोका उदय होता है, द्वितीयादि समयोमे उसके असंख्यातवेभाग विशेष अधिक क्रमसे उदय होता है । उदयगत प्रकृतियोके द्रव्यका निक्षेप उदय निषेकसे प्रारम्भ होता है, शेष कर्मोंका उदयावलिसे बाहर निक्षेप प्रारम्भ होता है । छह कर्मोंका गुणश्रेणिनिक्षेप अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय इन तीनसे विशेष अधिक है । उदयावलिके बाहर इन छह कर्मोंका गलिताशेषआयामरूप गुणश्रेणिनिक्षेप प्रवृत्त होता है ।


बादरपढमे किट्टी मोहस्स य आणुपुव्विसंकमणं ।
णट्ठं ण च उच्छिट्ठं फड्ढयलोहं तु वेदयदि ॥३१५॥

अर्थ: बादरलोभके प्रथम समय अर्थात् सूक्ष्मसाम्परायसे गिरकर बादर लोभके उदयके प्रथमसमयमें सूक्ष्मकृष्टियां नष्ट हो जाती है और मोहका आनुपूर्वीसंक्रम नष्ट हो जाता है, किन्तु उच्छिष्टावलि अर्थात् उदयावलिप्रमाण कृष्टिया नष्ट नही होती, स्पर्धकगत लोभका वेदन होता है । घातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध दो दिनसे कम, नाम-गोत्र और वेदनीय इन तीन अघातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध कुछकम चारवर्षप्रमाण होता है ।


ओदरबादरपढमे लोहस्संतो मुहुत्तियो बंधो ।
दुदिणंतो घादितियं चउवस्संतो अघादितियं ॥३१६॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायसे उतरने पर बादर लोभके प्रथमसमयमे संज्वलनलोभका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तप्रमाण, ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय इन तीन वालोंके ज्ञानावरणादिका प्रत्येक स्थितिबन्ध संख्यातगुणित वृद्धिक्रमसे होता है । चढ़ने वालोंके मोहनीयका प्रत्येक स्थितिबन्ध विशेषहीन क्रमसे होता है और गिरनेवालोके मोहनीयका प्रत्येक स्थितिबन्ध विशेष अधिक क्रमसे होता है । इसलिए यहा पर मोहनीयके अतिरिक्त अन्यकर्मोंका पुनः पुनः संख्यातगुणा स्थितिबन्ध होता है और मोहनीयका पुनः पुनः विशेष अधिक स्थितिबन्ध होता है । इस क्रमसे संख्यातहजार स्थितिबन्धोके बीतनेपर चरमसमयवर्ती मायावेदक होता है, उससमय माया और लोभ इन दो संज्वलनकषायोका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तक्रम चारमाह और ज्ञानावरणादि शेष छह कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातहजार वर्षप्रमाण होता है, क्योकि चढनेवालोके स्थितिबन्ध से उतरनेवालोका स्थितिबन्ध दो गुणा होता है ।

लब्धिसार (भाग 3/3)

ओदरमायापढमे मायातिण्हं च लोहतिण्हं च ।
ओदरमायावेदगकालादहियो दु गुणसेढी ॥३१७॥

अर्थ: ( सज्ज्वलनलोभसे ) मायामे अवतरण करनेके प्रथमसमयमें तीन प्रकारकी ( अप्रत्याख्यानावरण, प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन ) माया व तीनप्रकार के लोभकी अवतरित माया वेदककालसे अधिक आयामवाली गुणश्रेणि करता है ।


ओदरगमाणपढमे चउमासा माणपहुदिठिदिबंधो ।

ओदरमायापढमे मायालोहे दुमासठिदिबंधो ।
छण्हं पुण वस्साणं संखेज्जसहस्सवस्साणि ॥३१८॥

अर्थ: उतरने वालेके मायावेदककालके प्रथमसमयमे सज्वलनमाया व लोभ का दोमासप्रमाण तथा शेष छहकर्मोंका सख्यातहजार वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है ।


ओदरगमाणपढमे तेत्तियमाणादियाण पयडीणं ।
ओदरगमाणवेदगकालादहियं दु गुणसेढी ॥३१९॥

अर्थ: उतरनेवाला मायावेदककालके अनन्तर मानवेदकके प्रथमसमयमें मानवेदककालसे अधिक मानादि प्रकृतियोंकी गुणश्रेणि करता है ।


छएहं पुण वस्साणं संखेज्जसहस्समेत्ताणि ॥३२०॥

अर्थ: उसी उतरनेवाले मानवेदककालके प्रथमसमयमे संज्वलन मान-माया-लोभका चारमास और शेष छह कर्मका संख्यातहजार वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है ( जो चढनेकी अपेक्षा दोगुना है । )


ओदरगकोहपढमे छक्कम्मसमाणया हु गुणसेढी ।
बादरकसायणं पुण एतो गलिदावसेसं तु ॥३२१॥

अर्थ: इसके अनन्तर उतरनेवाले अनिवृत्तिकरण जीवके संज्वलनक्रोधके उदय सम्बन्धी प्रथमसमयमे अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलनक्रोध-मान-माया-लोभरूप बारह कषायोकी ज्ञानावरणादि छह कर्मोंके समान गलितावशेष गुणश्रेणि करता है ।


ओदरगकोहपढमे संजलणाणं तु अट्ठमासठिदी ।
छण्हं पुण कम्माणं संखेज्जसहस्सवस्साणि ॥३२२॥

अर्थ: उतरनेवालेके क्रोध उदयके प्रथमसमयमे संज्वलन क्रोधादि चार कषायोका आठमास और छहकर्मोका संख्यातहजार वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है ।


ओदरगपुरिसपढमे सत्तकसाया पणट्ठउवसमणा ।
उणवीसकसायाणं छक्कम्माणं समाणगुणसेढी ॥३२३॥

अर्थ: पुरुषवेदमें उतरनेके प्रथमसमयमे ( स्त्री-नपुंसकवेदके अतिरिक्त ) सात नो कषायकी प्रशस्तोपशामना नष्ट हो जाती है । उन्नीस ( १२ कषाय और ७ नोकषाय ) कषायोकी गुणश्रेणि ज्ञानावरणादि छहकर्मोंकी गुणश्रेणिके समान हो जाती है ।


पुं संजलणिदराणं वस्सा बत्तीसयं तु चउसट्ठी ।
संखेज्जसहस्साणि य तक्काले होदि ठिदिबंधो ॥३२४॥

अर्थ: उतरनेवालेके पुरुषवेदके प्रथमसमयमे पुरुषवेदका ३२ वर्ष, संज्वलन चतुष्कका ६४ वर्ष, तीन घातियाकर्मोंका संख्यातहजारवर्ष, उससे नाम व गोत्रका संख्यातगुणा तथा उससे डेढ़गुणा स्थितिबन्ध वेदनीयकर्मका होता है ।


पुरिसे दु अणुवसंते इत्थी उवसंतगोत्ति अद्धाए ।
संखाभागासु गदे ससंखवस्सं अघादिठिदिबंधो ॥३२५॥

णावरि य णामदुगाणं वीसियपडिभागदो हवे बंधो ।
तीसियपडिभागेण य बंधो पुण वेयणीयस्स ॥३२६॥

अर्थ (गाथा 325 से 326): पुरुषवेदके उदयकालमे स्त्रीवेदका उपशम जबतक नष्ट नही होता उतनेकालके संख्यात बहुभाग व्यतीत होकर एकभाग अवशिष्ट रहनेपर अघातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध असंख्यातहजार वर्षमात्र होता है । इतनी विशेषता है कि बीसिय नामद्विक ( नाम-गोत्र ) का जितना स्थिति बन्ध होता है उसके त्रैराशिक क्रमसे अर्थात् ड्योढ़ा तीसिय-वेदनीयकर्मका स्थितिवन्ध


थी अणुवसमे पढमे वीसकसायाण होदि गुणसेढी ।
संढुवसमोत्ति मज्झे संखाभागेसु तीदेसु ॥३२७॥


तक्काले दुट्ठाणं रसबंधो ताण देसघादीणं ॥३२८॥

अर्थ: स्त्रीवेदके अनुपशान्त होनेके प्रथम समयमें बीस कषायोंकी गुणश्रेणी होती है । यहांसे लेकर नपुंसकवेदके उपशान्त रहनेतक कालके संख्यात बहुभाग बीत जानेपर तीन घातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध नियमसे असंख्यातवर्षप्रमाण हो जाता है और उसीसमय उनकी देशघाति प्रकृतियोंका अनुभागबन्ध द्विस्थानिक हो जाता है ।


घादितियाणं णियमा असंखवस्सं तु होदि ठिदिबंधो ।


मोहस्स असंखेज्जा वस्सपमाणा हवेज्ज ठिदिबंधो ।
ताहे तस्स य जादं बंधं उदयं च दुट्ठाणं ॥३३०॥

अर्थ (गाथा 326 से 330): नपुंसकवेद अनुपशान्त हो जानेपर २१ प्रकृतियोंकी गुणश्रेणी होती है । यहासे अन्तरकरण करनेके स्थानको प्राप्त होनेतक जो मध्यवर्तीकाल है उसकाल के संख्यात बहुभाग बीत जानेपर मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध असंख्यातवर्षप्रमाण होने लगता है । उसीसमय मोहनीयकर्मका अनुभागबन्ध व उदय द्विस्थानीय हो जाता है ।


लोहस्स असंकमणं छावलितीदेसुदीरणत्तं च ।
णियमेण पडंताणं मोहस्सणुपुव्विसंकमणं ॥३३१॥

अर्थ: लोभका असंक्रमण, छह आवलियां बीत जानेपर उदीरणा, मोहनीय का आनुपूर्वी सक्रमण ये नियम थे, किन्तु अध.पतन होनेपर इनसे विपरीत होने लगता है ।


संड्ढुवसमे पढमे मोहिगिवीसाण होदि पुणसेढी ।
अंतरकदोत्ति मज्झे संखाभागासु तीदासु ॥३२६॥


विवरीयं पडिहण्णदि विरयादीणं च देसघादित्तं ।
तह य असंखेज्जाणं उदीरणा समयपबद्धाणं ॥३३२॥

लोयाणमसंखेज्जं समयपबद्धस्स होदि पडिभागो ।
तत्तियमेत्तद्दव्वस्सुदीरणा वट्टदे तत्तो ॥३३३॥

अर्थ (गाथा 332 से 333): ( उपशमश्रेणिसे उतरनेवालेके ) वीर्यान्तरायादि कर्मोंका देशघाति बन्ध होता था वह विपरीत होकर सर्वघाति होने लगा । असंख्यात समयप्रबद्धोंकी उदीरणाका अभाव होकर एक समयप्रबद्धके असंख्यातलोकवे भाग मात्र द्रव्यकी उदीरणा होने लगी ।


तक्काले मोहणियं तीसीयं वीसियं च वेयणियं ।
मोहं वीसिय तीसीय वेयणीय कमं हवे तत्तो ॥३३४॥

मोहं वीसिय तीसीय तो वीसिय मोहतीसयाण कमं ।
वीसिय तीसीय मोहं अप्पाबहुगं तु अविरुद्धं ॥३३५॥

अर्थ (गाथा 334 से 335): उसी काल ( समय ) मे मोहनीय, तीसिया ( ज्ञानावरण-दर्शनावरण-अन्तराय ), वीसिया ( नाम-गोत्र ) और वेदनीय इस क्रमसे उसके पश्चात् मोहनीय वीसिय, तीसिय और वेदनीय इस क्रमसे; उसके पश्चात् मोहनीय वीसिय और तीसिय इस क्रमसे; उसके पश्चात् वीसिय मोहनीय और तीसिय इस क्रमसे; उसके पश्चात् वीसिय, तीसिय, मोहनीय इन अल्पबहुत्व क्रमसे स्थितिबन्ध होता है ।


कमकरणविट्ठादो उवरिट्ठविदा विसेसअहियाओ ।
सव्वासिं तण्णद्धे हेट्ठा सव्वासु अहियकमं ॥३३६॥

अर्थ: क्रमकरण नष्ट होनेके पश्चात् (पूर्वोक्त अल्पबहुत्वके अनुसार कर्मों का परस्पर विशेष अधिक क्रमसे) जो स्थितिबन्ध होते है उनमें विशेष अधिकका प्रमाण अपनी-अपनी उत्कृष्टस्थितिके अनुपातसे होता है । उपशमश्रेणिसे गिरनेवालेके वेदनीय व अन्तरायका तीन बटे सात ( ३/७ ) तथा मोहनीयकर्मका चार बटे सात ( ४/७ ) भाग स्थितिबन्ध होता है ।


जत्तोपाये होदि हु असंखवस्सप्पमाणठिदिबंधो ।
तत्तोपाये अण्णं ठिदिबंधमसंखगुणियकमं ॥३३७॥

एवं पल्लासंखं संखं भागं च होई बंधेण ।
तत्तोपाये अण्णं ठिदिबंधो संखगुणियकमं ॥३३८॥

अर्थ (गाथा 337 से 338): जिस स्थल पर स्थितिबन्ध असंख्यातवर्षप्रमाण होता है उस स्थलसे लेकर अन्य स्थितिबंध असंख्यातगुणित क्रमसे होते है । इसक्रमसे पल्यके असंख्यातवेंभाग व पल्यके संख्यातवेभाग स्थितिबन्ध होता है । उस स्थलके ( पल्यके सख्यातवेभाग ) पश्चात् अन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणित क्रमसे होते है ।


मोहस्स य ठिदिबंधो पल्ले जादे तदा दु परिवड्ढी ।
पल्लस्स संखभागं इगिविगिलासण्णिबंधसमं ॥३३९॥

मोहस्स पल्लबंधे तीसदुगे तत्तिपादमद्धं च ।
दुतिचरुसत्तमभागा वीसतिये एयवियलठिदी ॥३४०॥

अर्थ (गाथा 339 से 340): मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध पल्यप्रमाण हो जानेपर स्थितिबन्धमें पल्यके संख्यातवेभाग वृद्धि होती है । पुनः क्रमसे एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञी पंचेन्द्रियके स्थितिबन्धके समान स्थितिबन्ध होजाता है । मोहनीयकर्मका पल्यप्रमाण स्थितिबन्ध होनेपर तीसिय (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, अन्तराय ) कर्मोंका स्थितिबन्ध ३/४ पल्य अर्थात् पौन पल्य और दोकर्म ( नाम-गोत्र ) का स्थितिबन्ध अर्ध पल्यप्रमाण होता है । एकेन्द्रिय व विकलेन्द्रियकी स्थितिके समान स्थितिबन्ध होनेपर नाम-गोत्रका दो बटे सात ( २/७ ) भाग ज्ञानावरण, दर्शनावरण,


तत्तो अणियट्टिस्स य अंतं पत्तो हु तत्थ उदधीणं ।
लक्खपुधत्तं बंधो से काले पुव्वकरणो हु ॥३४१॥

अर्थ: उसके पश्चात् श्रेणिसे गिरता हुआ अनिवृत्तिकरण गुणस्थानके अंत को प्राप्त हो जाता है उससमय लक्षपृथक्त्वसागरका स्थितिबन्ध होता है पुनः अनन्तरसमयमे अपूर्वकरण गुणस्थानको प्राप्त हो जाता है ।


उवसामणा णिधत्ती णिकाचणुग्घाडिदाणि तत्थेव ।
चदुतीसदुगाणं च य बंधो अद्धापवत्तो य ॥३४२॥

अर्थ: श्रेणिसे उतरते हुए अपूर्वकरणगुणस्थानको प्राप्त होनेपर अप्रशस्तोपशामना, निधत्ति एव निकाचना उद्घाटित-प्रगट हो जाते है और वहा पर क्रमशः चार, तीस व दो प्रकृतियोका बन्ध होने लगता है । वहासे गिरकर अधःप्रवृत्तकरणको प्राप्त हो जाता है ।


पढमो अधापवत्तो गुणसेडिमवट्ठिदं पुराणादो ।
संखगुणं तच्चंतोमुहुत्तमेत्तं करेदी हु ॥३४३॥

अर्थ: अध प्रवृत्तकरणके प्रथमसमयमे अवस्थित गुणश्रेणिको करता है जिसका आयाम पुरातन गुणश्रेणिआयामसे संख्यातगुणा होते हुए भी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है ।


ओदरसुहुमादीदो अपुव्वचरिमोत्ति गलिदसेसे व ।
गुणसेढी णिक्खेवो सट्ठाणे होदि तिट्ठाणं ॥३४४॥

अर्थ: श्रेणिसे उतरते हुए सूक्ष्मसाम्परायकी आदिसे लेकर अपूर्वकरणके अन्त पर्यन्त गलितावशेष गुणश्रेणि निक्षेप होता है, किन्तु स्वस्थानसयमीके गुणश्रेणिके तीन स्थान होते है ।


सट्ठाणे तावदियं संखगुणं तु उवरि चडमाणे ।
विरदाविरदाहिमुहे संखेज्जगुणं तदो तिविहं ॥३४५॥

अर्थ: उपशमश्रेणिसे उतरनेवालेके स्वस्थान संयत होनेपर भी गुणश्रेणि आयाम उतना ही रहता है । पुन ऊपर चढनेपर गुणश्रेणि-आयाम संख्यातगुणाहीन हो जाता है । विरताविरतके अभिमुख होनेपर गुणश्रेणिआयाम सख्यातगुणा हो जाता है ।


करणे अधापवत्ते अधापवत्तो दु संकमो जादो ।
विज्झादमबंधाणे णट्ठो गुणसंकमो तत्थ ॥३४६॥

अर्थ: गिरते हुए अध प्रवृत्तकरणमे गुणसक्रमरण नष्ट हो जाता है और अधःप्रवृत्तसक्रमण होने लगता है । अबन्ध प्रकृतियोका विध्यातसक्रमण होता है ।


चडणोदरकालादो पुव्वादो पुव्वगोत्ति संखेगुणं ।
कालं अधापवत्तं पालदि सो उवसमं सम्मं ॥३४७॥

अर्थ: द्वितीयोपशम सम्यक्त्वसहित जीव चढते हुए अपूर्वकरणके प्रथमसमय से लेकर उतरते हुए अपूर्वकरणके अन्तिमसमयपर्यन्त जितनाकाल हुआ उससे संख्यातगुणाकाल अधःप्रवृत्तकरणसहित इस द्वितीयोपशम सम्यक्त्वको पालता है ।


तस्सम्मतद्धाए असंजमं देससंजमं वापि ।
गच्छेज्जावलिछक्के सेसे सासणगुणं वापि ॥३४८॥

अर्थ: इस द्वितीयोपशमसम्यक्त्वके कालमें गिरकर असंयमको प्राप्त हो जावे अथवा देशसंयमको प्राप्त हो जावे अथवा छह आवलियोंके शेष रहनेपर सासादनगुणस्थानको भी प्राप्त हो जावे ।


जदि मरदि सासणो सो णिरयतिरिक्खं णरं ण गच्छेदि ।
णियमा देवं गच्छदि जइवसहमुणिंदवयणेण ॥३४९॥

णरतिरियक्खणराउगसत्तो सक्को ण मोहमुवसमिदुं ।
तम्हा तिसुवि गदीसु ण तस्स उप्पज्जणं होदि ॥३५०॥

अर्थ (गाथा 349 से 350): उपशमश्रेणिसे उतरा हुआ जो सासादन जीव है वह आयु नाशसे मरण करे तो नरक, तिर्यंच व मनुष्यगतिको प्राप्त नही होता नियमसे देवगतिको ही प्राप्त होता है । इसप्रकार उपशमश्रेणिसे उतरनेवाले जीवके सासादनगुणस्थानकी प्राप्ति और उसके मरण होनेका विशेष कथन कषायप्राभृतग्रन्थके चूर्णिसूत्रोमे यतिवृषभाचार्यने प्रतिपादित किया है उसीके अनुसार यहा कथन किया गया है । बध्यमान नरकायु, तिर्यंचायु और मनुष्यायुके सत्त्ववाले मनुष्यके मोहनीयकर्म का उपशम होना शक्य नही है इसलिए इन तीन गतियोमे उसका उत्पाद नही होता ।


उवसमसेढीदो पुण ओदिरिण्णो सासणं ण पाउणदि ।
भूदबलिणाहणिम्मलसुत्तस्स फुडोवदेसेण ॥३५१॥

अर्थ: उपशमश्रेणिसे उतरता हुआ सासादनगुणस्थानको प्राप्त नही होता ऐसा श्री भूतबलिमुनिनाथ द्वारा विरचित निर्मलसूत्रका प्रगट उपदेश है ।


जस्सुदयेणारूढो सेढिं तस्सेव ठविदि पढमठिदिं ।
सेसाणावलिमित्तं मोत्तूण करेदि अंतरं णियमा ॥३५४॥

अर्थ (गाथा 353 से 354): पुरुषवेद सहित क्रोधोदयसे श्रेणि चढनेवालेके क्रोध-मान-माया-लोभकी पृथक्-पृथक् प्रथमस्थिति होती है । मानोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेके क्रोधका उदय न होने से क्रोध और मान इन दोनोंकी प्रथमस्थितिप्रमाण मानकी प्रथमस्थिति होती है । मायोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेके क्रोध मानका उदय नही अतः क्रोध-मान-माया इन तीन प्रथमस्थितिप्रमाण मायाकी प्रथमस्थिति होती है । लोभोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेके क्रोध-मान-मायाका उदय नही अतः लोभकी प्रथमस्थितिका प्रमाण क्रोध-मान-माया-लोभ इन चारकी प्रथमस्थितिके तुल्य है ॥३५३॥ जिस कषायके या वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उसकी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथमस्थितिको छोड़कर और शेष अनुदयरूप वेद व कषायोकी आवलिमात्र स्थितिको छोड़कर ‘अन्तर’ करता है’ ॥३५४॥ जिस


जस्सुदयेणारूढो सेढिं तत्कालपरिसमत्तीए ।
पढमट्ठिदिं करेदि हु अणंतरवरुदयमोहस्स ॥३५५॥

अर्थ (गाथा 353 से 355): पुरुषवेद सहित क्रोधोदयसे श्रेणि चढनेवालेके क्रोध-मान-माया-लोभकी पृथक्-पृथक् प्रथमस्थिति होती है । मानोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेके क्रोधका उदय न होने से क्रोध और मान इन दोनोंकी प्रथमस्थितिप्रमाण मानकी प्रथमस्थिति होती है । मायोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेके क्रोध मानका उदय नहीं अतः क्रोध-मान-माया इन तीन प्रथमस्थितिप्रमाण मायाकी प्रथमस्थिति होती है । लोभोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेके क्रोध-मान-मायाका उदय नहीं अतः लोभकी प्रथमस्थितिका प्रमाण क्रोध-मान-माया-लोभ इन चारकी प्रथमस्थितिके तुल्य है ॥३५३॥ जिस कषायके या वेदके उदयसे श्रेणि चढ़ता है उसकी अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथमस्थितिको छोड़कर और शेष अनुदयरूप वेद व कषायोकी आवलिमात्र स्थितिको छोड़कर ‘अन्तर’ करता है’ ॥३५४॥ जिस कषायोदयसे श्रेणि चढता है उसका ( प्रथमस्थिति ) काल समाप्त होनेपर उपरि अनन्तरवर्त्ती उदयमे आनेवाली मोह ( कषाय ) की प्रथमस्थिति करता है ॥३५५॥


माणेादएण चडिदो कोहं उवसमदि कोह अद्धाए।
मायोदएण चडिदो कोहं माएं सगद्धाए ॥३५६॥

अर्थ: मानोदयसे श्रेणि चढनेवाला उदयरहित क्रोधको उसके काल में उपशमाता है, और मायासे श्रेणि चढनेवाला उदयरहित क्रोध और मानको उनके कालमे उपशमाता है ॥३५६॥


लोहोदएण चडिदो कोहं माएं च मायमुवसमदि ।
अप्पप्पण अद्धाणे ताणं पढमट्ठिदी णत्थि ॥३५७॥

अर्थ: लोभोदयसे श्रेणि चढनेवाला अनुदय स्वरूप क्रोध-मान-मायाको अपने-अपने कालमे उपशमाता है, उदयरहित कषायोकी प्रथमस्थिति नही होती ॥३५७॥


माणोदयचडपडिदो कोहोदयमाणमेत्तमाणुदओ ।
माणतियाणं सेसे सेससमं कुणदि गुणसेढी ॥३५८॥

अर्थ: मानोदयसे श्रणि चढकर गिरनेवालेके क्रोध व मानके उदयकालप्रमाण मानोदयकाल होता है । त्रिविध मानकी गलितावशेष गुणश्रेणि होती है ॥३५८॥


माणादितियाणुदये चडपडिदे सगसगुदयसंपत्ते ।
णावच्छत्तिकसायाणं गलिदवसेसं करेदि गुणसेढी ॥३५९॥

अर्थ: मान या माया अथवा लोभके उदयसे श्रेणि चढकर गिरनेवालेके अपनी-अपनी कषायके उदय होनेपर नव, छह, तीन कषायोकी गलितावशेष गुणश्रेणि होती है ॥३५६॥


जस्सुदएण य चडिदो तम्हि य उक्कट्टियम्हि पडिऊण ।
अंतरमाऊरेदि हु एवं पुरिसोदए चडिदो ॥३६०॥

अर्थ: जिस कषायोदयसहित चढकर गिरा हुआ जीव उस कषायको अपकर्षित कर अन्तरको पूरता है । यह पुरुषवेदोदयसहित जीवका कथन है ॥३६०॥


थी उदयस्स य एवं अवगदवेदो हु सत्त कम्मंसे ।
सममुवसामदि संढस्सुदए चडिदस्स वोच्छामि ॥३६१॥

अर्थ: स्त्रीवेदोदयसे श्रेणिपर आरोहण करनेवाला जीव अपगतवेदी होकर सात नोकषायोंको एकसाथ उपशमाता है । नपु सक वेदोदयसे श्रेणि चढ़नेवालेका आगे कथन किया जावेगा ।


संढुदयंतरकरणो संढद्धाएम्हि अणुवसंत’से ।
इत्थिस्स य अद्धाए संढं इत्थिं च समगमुवसमदि ॥३६२॥

ताहे चरिमसवेदो अवगदवेदो हु सत्तकम्मंसे ।
सममुवसामदि सेसा पुरिसोदयचडिदभंगा हु ॥३६३॥

अर्थ (गाथा 362 से 363): नपुंसकवेदोदयसे उपशमश्रेणि चढ़नेवाला अन्तरकरणके पश्चात् नपुंसकवेदको उपशमाता हुआ भी पुरुषवेदोदयवालेके नपुंसक-उपशान्तकालमें पूर्ण नही उपशमाता अत जो अनुप्रशांत अंश रह जाता है उसको स्त्रीवेद उपशांतकालमें स्त्रीवेद के साथ उपशमाता हुआ सवेदभागके चरम समयको प्राप्त हो जाता है । अनन्तर अपगतवेदी होकर सातकर्मोंको एक साथ उपशमाता है । शेष पुरुषवेदोदय सहित श्रेणि चढनेवालेके समान भङ्ग है ।


पुंकोहस्स य उदए चडपडिदेऽपुव्वदो अपुव्वोत्ति ।
एदिस्से अद्धाणं अप्पाबहुगं तु वोच्छामि ॥३६४॥

अर्थ: पुरुषवेद और क्रोधकषायोदय सहित श्रेणि चढकर गिरनेवाला जीवके आरोहक अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर अवरोहक अपूर्वकरणके चरमसमयपर्यंत इस मध्यवर्ती कालमें जो काल संयुक्त पद हैं, उनके अल्पबहुत्व स्थानोंका आगे कथन करेंगे ।


अवरादो वरमहियं खंडुक्कीरणस्स अद्धाणं ।
संखगुणं अवरट्ठिदिखंडस्सुक्कीरणो कालो ॥३६५॥

अर्थ: जघन्य अनुभाग काण्डोत्कीरण कालसे (१) उत्कृष्ट अनुभागकाण्डोत्कीरणकाल विशेष अधिक है (२) इससे जघन्य स्थितिकाण्डोत्कीरण काल संख्यातगुणा है । (३) कांडकोत्कीरण जानना और मोहनीयकर्मका अन्तर करते हुए अन्तिम अनुभाग काण्डकोत्कीरणकाल जानना (१) । इससे उत्कृष्ट अनुभाग काण्डकोत्कीरणकाल विशेष अधिक है सो यह भी सर्व कर्मोके आरोहक-अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें सम्भव है (२) । इससे सूक्ष्मसाम्परायकी अन्तिम अवस्था में पाया जानेवाला ज्ञानावरणादि कर्मोंका जघन्य स्थितिकाण्डकोत्कीरणकाल व स्थितिबन्धकाल और अनिवृत्तिकरणकी अन्तिम अवस्थामे मोहनीयकर्मका जघन्य स्थितिबन्धकाल सख्यातगुणा है तथा दोनों परस्पर समान हैं (३) । अनिवृत्तिकरणके अन्तिमसमयके पश्चात् मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध नही होता ।


पडणजहण्णट्ठिदिबंधद्धा तह अंतरस्स करणद्धा ।
जेट्ठट्ठिदिबंधठिदीउक्कीरद्धा य अहियकमा ॥३६६॥

अर्थ: इससे गिरते हुएका जघन्य स्थितिबन्धकाल विशेष अधिक है (४) । इससे अन्तर करनेका विशेष अधिक है (५) । इससे उत्कृष्ट स्थितिबन्धकाल व उत्कृष्ट स्थितिकाण्डकोत्कीरणकाल दो तुल्य होकर विशेष अधिक है (६) । प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (१६) । उतरनेवालेके लोभवेदककाल विशेष अधिक है (१७) । उसीके लोभकी प्रथमस्थिति विशेषाधिक है (१८) ।


सुहमंतिमगुणसेढी उवसंतकसायगस्स गुणसेढी ।
पडिवदसुहुमद्धावि य तिण्णिवि संखेज्जगुणिदकमा ॥३६७॥

अर्थ: ( इससे ) चरमसमयवर्ती सूक्ष्मसाम्परायिकका गुणश्रेणि निक्षेप सख्यातगुणा है (७) । इससे उपशान्तकषायका गुण-श्रेणिनिक्षेप सख्यातगुणा है (८) । इससे गिरनेवाले सूक्ष्मसाम्परायका काल सख्यातगुणा है (९) । ये तीनों क्रमसे सख्यातगुण हैं ।


तग्गुणसेढी अहिया चलसुहुमो किट्टिउवसमद्धा य ।
सुहुमस्स य पढमठिदी तिण्णिवि सरिसा विसेसाहिया ॥३६८॥

अर्थ: इससे उतरनेवाले सूक्ष्मसाम्परायिककी गुणश्रेणि विशेष अधिक है (१०) । इससे चढनेवालेका सूक्ष्मसाम्परायकाल, कृष्टि उपशमानेका काल और


तम्मायावेदद्धा पडिवडंतहंपि खित्तगुणसेढी ।
तम्माणवेदगद्धा तस्स णावहंपि गुणसेढी ॥३७१॥

अर्थ: उतरनेवालेके मायावेदककाल विशेष अधिक है (१९) । उतरनेवालेके छह कर्मोंका गुणश्रेणिनिक्षेप विशेष अधिक है (२०) । उतरनेवालेका मान वेदककाल विशेष अधिक है (२१) । उन्हींके नौ कर्मोंका गुणश्रेणिनिक्षेप विशेष अधिक है (२२) । ( हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा ) का उपशामनकाल विशेष अधिक है (३०) । पुरुषवेदका उपशामनकाल विशेष अधिक है (३१) । स्त्रीवेदका उपशामनकाल विशेष अधिक है (३२) । नपुंसकवेदका उपशामनकाल विशेषाधिक है (३३) । क्षुद्रभव विशेष अधिक है (३४) । इस प्रकार २१ पद विशेष अधिक क्रमसे है ।


चडमायावेदट्ठा पढमट्ठिदिमायउवसमद्धा य ।
चलमाणवेदगट्ठा पढमट्ठिदिमाणउवसमद्धा य ॥३७२॥

अर्थ: चढ़नेवालेके मायावेदककाल विशेष अधिक है (२३) ।- मायाकी प्रथमस्थिति विशेषाधिक है (२४) । मायाका उपशामनकाल विशेषाधिक है (२५)। चढनेवालेका मानवेदककाल विशेषाधिक है (२६)। मानकी प्रथमस्थिति विशेषाधिक है (२७) । मानका उपशामनकाल विशेष अधिक है (२८) ।-


कोहोवसामणद्धा छप्पुरिसित्थीण उवसमाणं च ।
खुद्दभवग्गहणं च य अहियकमा एक्कवीसपदा ॥३७३॥

अर्थ: क्रोधका उपशामनकाल विशेष अधिक है (२६)। छह नोकषायो उपशामनकालोंसे अधिक है (३८) । ३६-३७ व ३८वा ये तीन पद अधिकक्रमसे हैं ।


उवसंतद्धा दुगुणा तत्तो पुरिसस्स कोहपढमठिदी ।
मोहोवसामणद्धा तिण्णिवि अहियक्कमा होंति ॥३७४॥

अर्थ: उपशान्तकाल दुगुणा है (३५) । पुरुषवेदकी प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (३६) । क्रोधकी प्रथमस्थिति विशेष अधिक है (३७) मोहनीयका उपशामन काल विशेष अधिक है (३८) । तीनपद अधिक क्रमसे हैं ।


पडणस्स असंखाणं समयपबद्धाणुदीरणाकालो ।
संखगुणो चडणस्स य तक्कालो होदि अहिया य ॥३७५॥

अर्थ: उससे गिरनेवालेके असंख्यात समयप्रबद्धकी उदीरणा होनेका काल सख्यातगुणा है (३६) । उससे चढनेवालेके असंख्यात समयप्रबद्धकी उदीरणा होनेका काल अन्तर्मुहूर्तमात्र अधिक है (४०) । गुणी है (५०) । दर्शनमोहनीयकी अन्तरस्थितिया सख्यातगुणी हैं (५१) ।


पडणाणियट्टियद्धा संखगुणा चडणगा विसेसहिया ।
पडमाण पुव्वद्धा संखगुणा चडणगा अहिया ॥३७६॥

अर्थ: उससे गिरनेवालेके अनिवृत्तिकरणकाकाल सख्यातगुणा है, क्योंकि पूर्वोक्त सर्वपद अनिवृत्तिकरणके सख्यातवेभाग है (४१) । उससे चढनेवालेके अनिवृत्तिकरणका काल अन्तर्मुहूर्तमात्रसे अधिक है (४२) । उससे गिरनेवालेके अपूर्व-


'पडिवडवरगुणसेढी चढमाणापुव्वपढमगुणसेढी ।
अहियकमा उवसामगकोहस्स य वेदगद्धा हु ॥३७७॥

अर्थ: गिरनेवालेका उत्कृष्ट गुणश्रेणिनिक्षेप विशेष अधिक है (४५) । चढनेवालेका अपूर्वकरणके प्रथम समयमे गुणश्रेणिनिक्षेप विशेष अधिक है (४६) । उपशामकके क्रोधवेदककाल संख्यातगुणा है (४७) ।


संजदअधापवत्तगुणसेढी दंसणोवसंतद्धा ।
चारित्तंतरठिदी दंसणमोहंतरठिदीओ ॥३७८॥

अर्थ: अधःप्रवृत्तसंयतका गुणश्रेणिनिक्षेप सख्यातगुणा है (४८) । दर्शनमोहनीयका उपशान्तकाल संख्यातगुणा है (४६) । चारित्रकी आन्तरिक स्थितिया सख्यात-


अवरा जेट्ठाबाहा चडपडमोहस्स अवरठिदिबंधो ।
चडपडतिघादि अवरट्ठिदिबंधंतो मुहुत्तो य ॥३७९॥

अर्थ: जघन्य आबाधा सख्यातगुणी है (५२) । उत्कृष्ट आबाधा संख्यातगुणी है (५३) । चढनेवालेके मोहनीयका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (५४) । उतरनेवालेके मोहनीयका जघन्य स्थितिबन्ध सख्यातगुणा है (५५) । चढनेवालेके तीन घातियाकर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध सख्यातगुणा है (५६) । उतरनेवालेके तीन घातियाकर्मोंका जघन्य स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (५७) । अन्तर्मुहूर्त सख्यातगुणा है । करणका काल संख्यातगुणा है (४३) । उससे चढनेवालेके अपूर्वकरणका काल (अन्तमुहूर्त) अधिक है।


चडमाणस्स य णामागोदजहण्णट्ठिदीण बंधो य ।
तेरसपदासु कमसो संखेण य होंति गुणिदकमा ॥३८०॥

अर्थ: चढनेवालेके नाम व गोत्रका जघन्य स्थितिबन्ध सख्यातगुणा है ( ५९ ) । ये १३ पद क्रमशः सख्यातगुणे है । है । उससे उतरनेवालेके वहां संख्यातवर्षकी स्थितिवाला अन्तिम स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (७३-७८)


चडतदियअवरबंधं पडणामागोदुअवरठिदिबंधो ।
पडतदियस्स य अवरं तिण्णि पदा होंति अहियकमा ॥३८१॥

अर्थ: चढनेवालेके तीसरे ( वेदनीय ) कर्मका जघन्य स्थितिवन्ध विशेष अधिक है (६०) । गिरनेवालेके नाम-गोत्रकर्मका जघन्य स्थितिवन्ध विशेष अधिक है (६१) । गिरनेवालेके (वेदनीय) तीसरे कर्मका जघन्य स्थितिवन्ध विशेष अधिक है (६२) । ये तीनों पद अधिकक्रम वाले हैं ।


चडमायमाणकोहो मासादीदुगुण अवरठिदिबंधो ।
पडणे ताणं दुगुणं सोलसवस्साणि चडणपुरिसस्स ॥३८२॥

पडणस्स तस्स दुगुणं संजलणाणं तु तत्थ दुट्ठाणे ।
बत्तीसं चउसट्ठी वस्सपमाणेण ठिदिबंधो ॥३८३॥

अर्थ (गाथा 382 से 383): चढनेवालेके माया, मान व क्रोधका जघन्य स्थितिवन्ध एक मासको आदिकरके दुगुणा-दुगुणा है (६३-६४-६५) । गिरते हुए के उनका जघन्य स्थितिवन्ध द्विगुणा है (६६-६७-६८) । चढनेवालेके पुरुषवेदका जघन्य स्थितिवन्ध सोलहवर्ष है (६६) । गिरनेवालेके पुरुषवेदका जघन्यस्थितिवन्ध द्विगुणा है (७०) । पुरुषवेदके दोनो स्थानोंपर सज्ज्वलनकषायोका स्थितिवन्ध ३२ व ६४ वर्षप्रमाण है (७१-७२) ।


चडपडणामोहपढमं चरिमं चरिमं तु तह। तिघादियादीणं ।
संखेज्जवस्स बंधो संखेज्जगुणक्कमो छण्हं ॥३८४॥

अर्थ: चढनेवालेके मोहनीयकर्मका संख्यात वर्षवाला प्रथम स्थितिबन्ध और गिरनेवालेके संख्यातवर्षवाला अंतिम स्थितिबन्ध तथा चढनेवालेके तीन घातियाकर्मोंका संख्यातवर्षवाला प्रथमस्थितिबन्ध व उतरनेवालेके संख्यातवर्षकी स्थितिवाला अन्तिम स्थितिबन्ध एव चढनेवालेके तीन अघातिया कर्मोंका संख्यातवर्षकी स्थितिवाला प्रथमस्थितिबन्ध और उतरनेवालेके तीन अघातिया कर्मोंका अन्तिम स्थितिबन्ध ( ७३ से ८ ) ये छहों स्थान संख्यातगुणे क्रमवाले हैं ।


चडपडणे मोहचरिमं पढमं तु तहा तिघादियादीणं ।
असंखेज्जवस्सबंधोऽसंखेजगुणक्कमो छण्हं ॥३८५॥

अर्थ: चढनेवालेके मोहनीयकर्मका असंख्यातवर्षवाला अन्तिम स्थितिबन्ध और गिरनेवालेके असंख्यातवर्षवाला प्रथम स्थितिबन्ध (७९-८०) तथा चढ़नेवालेके तीन घातियाकर्मोका असंख्यातवर्षवाला अंतिम स्थितिबन्ध और उतरनेवालेका असंख्यात वर्षवाला प्रथमस्थितिबन्ध (८१-८२) एव चढनेवालेके तीन अघातियाकर्मोका असंख्यात वर्षवाला अन्तिम स्थितिबन्ध तथा उतरनेवालेके असंख्यात वर्षवाला प्रथम स्थितिबन्ध (८३-८४) ये छहों स्थान असंख्यातगुणे क्रमवाले हैं । चरम स्थितिकाण्डक सख्यातगुणा है (५८) । स्थितिबन्ध घटाकर पल्यप्रमाण स्थितिबन्ध करनेके लिए जो स्थितिबन्धापसरणरूप पल्यका संख्यातवांभाग है वह संख्यातगुणा है (५९) । पल्य संख्यातगुणा है (६०) । चढ़नेवालेके बादरलोभ के स्थितिबन्ध संख्यातगुणा है (६१) । उतरनेवालेके बादरलोभ ( अनिवृत्तिकरण ) के अन्तिम स्थितिबन्ध सख्यातगुणा है (६२) ।


चडपडअपुव्वपढमो चरिमो ठिदिबंधओ य पडणस्से ।
तच्चरिमं ठिदिसंतं संखेज्जगुणक्कमा अट्ठ ॥३८६॥

अर्थ: चढ़नेवालेके अपूर्वकरणका प्रथम स्थितिबंध संख्यातगुणा है (६३) । गिरनेवालेके अपूर्वकरणका अंतिम स्थितिबंध सख्यातगुणा है (६४) । गिरनेवालेके अपूर्वकरणका अन्तिम स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है (६५) । गाथा ३८५ व ३८६ में कहे गए आठस्थान संख्यातगुणेक्रमवाले हैं ।


तीसियचउण्ह पढमो पलिदोवम संखभागठिदिबंधो ।
मोहस्सवि दोण्णि पदा विसेस अहियक्कमा होंति ॥३८७॥

अर्थ: चढ़नेवालेके तीसिया चतुष्कका पल्योपमके संख्यातवेभागवाला प्रथमस्थितिबन्ध (८६) तथा मोहनीयकर्मका पल्योपमके संख्यातवेभागवाला प्रथम स्थितिबंध (८७) ये दोनों स्थान विशेष अधिक क्रमवाले है ।


ठिदिखंडयं तु चरिमं बंधोसरणट्ठिदी य पल्लंसं ।
पल्लं चडपडवादरपढमो चरिमो य ठिदिबंधो ॥३८८॥


चडणे णामदुगाणं पढमो पलिदोवमस्स संखेज्जो ।
भागो ठिदिस्स बंधो हेट्ठिल्लादो असंखगुणो ॥३८९॥

अर्थ: उससे चढनेवालेके नाम-गोत्रकर्मका पल्यके संख्यातवेभागमात्र हुआ प्रथम स्थितिबन्ध नीचेके अघातित्रयके स्थितिबन्धसे असंख्यातगुणा है (८५) ।


तप्पढमट्ठिदिसत्तं पडिवडअणियट्टिचरिमठिदिसत्तं ।
अहियकमा चडबादरपढमट्ठिदिसत्तयं तु संखगुणं ॥३९०॥

अर्थ: उसी गिरनेवाले अपूर्वकरणका स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है (९६) । उससे गिरनेवाले अनिवृत्तिकरणका अंतिम स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है (९७) । उससे चढ़नेवाले बादरलोभ अर्थात् अनिवृत्तिकरणका प्रथम स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है (९८) ।


चडमाणअपुव्वस्स य चरिमट्ठिदिसत्तयं विसेसहियं ।
तस्सेव य पढमठिदीसत्तं संखेज्जसंगुणियं ॥३९१॥

अर्थ: चढ़नेवाले अपूर्वकरणके अंतिम स्थितिसत्त्व विशेषअधिक है (९९) । उसीका प्रथमस्थितिसत्त्व सख्यातगुणा है (१००) ।

क्षपणासार (भाग 1/2)

मंगलाचरणम्


सुसुदेवयाए भत्ती सुदोवजोगोवभाविओ सम्मं ।
आवहइ णाणसिद्धिं णाणफलं चावि णिव्वाणं ॥२॥


तो सुयदेवयमिणमो तिक्खुत्तो पणमियूण भत्तीए ।
वोच्छामि जहासुत्तं चरित्तमोहस्स खवणविहिं ॥३॥


मुणियपरमत्थवित्थरमुणिवरवीरेहिं सिद्धविज्जेहिं ।
जा संथुआ भयवदी पसियउ सुयदेवया मज्झं ॥१॥

तिकरणसुभयोसरणं कमकरणं खवणदेसमंतरयं ।
संकम अपुव्वफड्डयकिट्टीकरणाणुभवणखवणाए ॥१॥३६२॥

अर्थ: अध करण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणरूप तीनकरण; बंधापसरण और सत्त्वापसरंण ये दो अपसरण तथा क्रमकरण, आठ (अप्रत्याख्यानावरण-प्रत्याख्यानावरण) कषाय और १६ प्रकृतियोकी क्षपणा, देशघातिकरण, अन्तरकरण, संक्रमण, अपूर्वस्पर्धककरण, कृष्टिकरण, कृष्ट्यनुभवन इसप्रकार चारित्रमोहकी क्षपणा मे अधिकार जानना ॥१॥


गुणसेढी गुणसंकमठिदरसखंडाण णत्थि पढमम्हि ।
पडिसमयमणंतगुणं विसोहि वड्डीहिं वड्ढदि हु ॥२॥३६३॥

अर्थ: पहले अधःप्रवृत्तकरणमें गुणश्रेणि, गुणसंक्रम, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात सम्भव नही है अत. जीव समय-समयप्रति अनन्तगुणे क्रमसहित विशुद्धताकी वृद्धिद्वारा वर्धमान होता है ॥२॥


सत्थाणमसत्थाणं चउव्विट्ठाणं रसं च बंधदि हु ।
पडिसमयमणंतगुणा य गुणभजियकमं तु रसबंधे ॥३॥३६४॥

अर्थ: जो जीव समय-समयप्रति प्रशस्तप्रकृतियोका अनन्तगुणेक्रम से चतुःस्थानिक अनुभागबन्ध करता है और अप्रशस्तप्रकृतियोका अनन्तवे भागरूप क्रमसे द्विस्थानिक बन्ध करता है ॥३॥


पल्लस्स संखभागं मुहुत्तअंतेण ओसरदि बंधे ।
संखेज्जसहस्साणि य अधापवत्तम्हि ओसरणा ॥४॥३६५॥

अर्थ: पूर्वस्थितिबन्धमेसे पल्यका असंख्यातवांभागमात्र स्थितिबन्ध घटाते हुए एक अन्तर्मुहूर्त कालपर्यन्त प्रतिसमय समानबन्ध होता है सो यह एक स्थितिबन्धापसरण हुआ ऐसे सख्यातहजार स्थितिबधापसरण अधःप्रवृत्तकरणमे होते हैं ॥४॥


आदिमकरणाद्धाए पढमट्ठिदिबंधदो दु चरिमम्हि ।
संखेज्जगुणविहीणो ठिदिबंधो होदि णियमेण ॥५॥३६६॥

अर्थ: इसप्रकार स्थितिबन्धापसरण होनेसे अधःप्रवृत्तकरणकालमें प्रथमसमयसम्बन्धी जो स्थितिबन्ध है उससे सख्यातगुणा हीन स्थितिबन्ध अन्तसमयमे नियमसे होता है । ऐसे इस अधःप्रवृत्तकरणमे आवश्यक होते हैं ॥५॥


संकामणपट्ठवगस्स परिणामो केरिसो भवे । जोगे कसाय उवजोगो लेस्सा वेदो य को भवे ॥१॥


काणि वा पुव्वबद्धाणि के वा अंसे णिवंधदि । कदि आवलियं पविंसंति कहिण्हं वा पवेसगो ॥२॥


के अंसे खीयदे पुव्वं बंधेण उदएण वा । अंतरं वा कहिं किच्चा के के संकामगो कहिं ॥३॥

अर्थ: बन्धसे व्युच्छिन्न हैं, क्योकि उनके बन्धकारणोंको उल्लंघनकर क्षपकश्रेणिके अधःप्रवृत्तकरणसम्बन्धी तत्प्रायोग्य विशुद्धिमे वर्तन कर रहा है । नामकर्मकी परिवर्तमान सभी अशुभप्रकृतियोकी पूर्वमे ही बन्धसे व्युच्छित्ति हो जाती है । तरकगति, तिर्यञ्चगति, एकेन्द्रियादि चार जाति, पाच अशुभसंस्थान, पांच अशुभसंहनन, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, अप्रशस्तविहायोगति, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुस्वर, अनादेय, अयशस्कीर्ति नामकर्मकी ये प्रकृतिया यथासम्भव नीचले गुणस्थानोमे बन्धसे व्युच्छिन्न हो जाती हैं । नामकर्मकी केवल इतनी ही प्रकृतियोकी बन्धव्युच्छित्ति नही होती, किन्तु मनुष्यगतिद्विक, औदारिकद्विक, वज्रवृषभनाराचसंहनन इन शुभ प्रकृतियोकी असयतसम्यग्दृष्टियोके भी बधव्युच्छित्ति देखी जाती है । आतप और उद्योत इन दो शुभ प्रकृतियोकी बन्धव्युच्छित्ति यथाक्रम मिथ्यादृष्टि व सासादनगुणस्थानमे हो जाती है । वहांपर (क्षपकश्रेणिमे) नामकर्मकी इतनी प्रकृतियोकी बन्धव्युच्छित्ति पायी जाती है । गोत्रकर्ममे नीचगोत्र बन्धसे व्युच्छिन्न है, क्योकि सासादनगुणस्थानसे आगे इसका बन्ध नही होता है । अन्तरायकर्मकी एकभी प्रकृति बन्धसे व्युच्छिन्न नही है । उदयसे व्युच्छिन्नप्रकृतिया निम्नप्रकार हैं- स्त्यानगृद्धित्रिक पूर्वमे ही उदयसे व्युच्छिन्न हो जाती हैं । यहापर निद्रा और प्रचला उदयसे व्युच्छिन्न नही होतीं, क्योंकि उनका उदय क्षीणकषाय गुणस्थानके द्विचरमसमयतक सम्भव है । शेष मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, १२ कषाय, मनुष्यायुके अतिरिक्त तीन आयु, नरकगति, तिर्यञ्चगति, देवगति और इनके प्रायोग्य अर्थात् नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यञ्चगत्यानुपूर्वी, देवगत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रिय-विकलेन्द्रियजाति, वैक्रियकशरीर, वैक्रियकअंगोपाग, आतप, उद्योत, स्थावर, सूक्ष्म-साधारणशरीर, आहारकद्विक, वज्रवृषभनाराचसंहननको छोडकर शेष पाचसंहनन मनुष्यगत्यानुपूर्वी, अशुभत्रिक (दुर्भग, अनादेय, अयशस्कीर्ति), अपर्याप्त, नीचगोत्र ये प्रकृतियां उदयसे पूर्वमे ही व्युच्छिन्न हो जाती हैं । तीर्थङ्करप्रकृतिकी ,कदाचित् उदयव्युच्छित्ति होती है कदाचित् नही ।


किं ट्ठिदियाणि कम्माणि अणुभागेसु केसु वा । ओवट्ठेदूण सेसाणि क ठाणं पडिवज्जदि ॥४॥

अर्थ: संक्रमण प्रस्थापकके अर्थात् कषायकी क्षपणापर आरूढ चारित्रमोहादि कर्मकी प्रकृतियोको अन्य प्रकृतिरूप संक्रमित करता है। उसके परिणाम किसप्रकारके होते हैं? (उसके परिणाम इसप्रकारके होते हैं, ऐसी प्ररूपणाको विभाषा कहते हैं।) उसके परिणाम विशुद्ध होते हैं और कषायोका क्षपण प्रारम्भ करनेके भी अन्तर्मुहूर्त पहलेसे अनन्तगुणी विशुद्धिके द्वारा विशुद्ध होते आ रहे हैं। शुभपरिणाम कहनेसे अशुभपरिणामका निषेध हो जाता है। शुभपरिणामकी प्रणालीबिना इतने विशुद्धपरिणामोंका होना असम्भव है।
योग कौनसा होता है ? कषायोकी क्षपणा करनेवाला चारो मनोयोगोमे से किसी एक मनोयोगवाला अथवा चारो वचनयोगोंमे से एक वचनयोगवाला अथवा औदारिककाययोगी होता है, इन ९ योगोंके अतिरिक्त अन्ययोग सम्भव नही है। शंका:-क्षपकके मनोयोग तो सम्भव है, क्योंकि छद्मस्थके ध्यानावस्थामें मनकी एकाग्रता होती है, किन्तु चारों वचनयोग कैसे सम्भव है, क्योंकि ध्यानावस्थामें समस्त बहिरङ्गव्यापार रुक जाता है, जिसका वचनप्रवृत्तिके साथ विरोध है । समाधान:-यह दोष नही है, क्योंकि ध्यानयुक्तके भी अवक्तव्यरूपसे वचनयोगकी प्रवृत्तिके विप्रतिषेधका अभाव है । इसीप्रकार औदारिककाययोग भी सम्भव है, क्योंकि ध्यानावस्थामें उसके सम्बन्धसे जीवप्रदेशोंका परिस्पदन संभव है । कषाय कौनसी होती है ? क्रोध-मान-माया और लोभ इन चारकषायरूप परिणामोंमें से किसी एक कषायरूप प्रवृत्तिका विरोध नही है । शंका:-कषायरूप परिणाम वर्धमान होते हैं या हीयमान होते हैं ? समाधान:-कषायपरिणाम हीन होते हैं, वर्धमान नही, क्योकि विशुद्धपरिणामोंका वर्धमानकषायपरिणामोसे विरुद्ध स्वभाव है । उपयोग कौनसा होता है ? अर्थात् अर्थग्रहणरूप आत्मपरिणाम उपयोग है, वह साकार व अनाकारके भेदसे दो प्रकारका है । मति-श्रुत-अवधि-मनःपर्यय और केवल इन पांचज्ञानरूप व कुमति-कुश्रुत-विभङ्ग इन तीन कुज्ञानरूप इसप्रकार आठभेदवाला साकारोपयोग और चक्षु-अचक्षु-अवधि-केवलरूप चार प्रकारका अनाकार उपयोग होता है । क्षपकश्रेणि चढनेवालेके एक श्रुतज्ञानोपयोग होता है, क्योंकि पृथक्त्ववितर्कवीचार संज्ञक प्रथम शुक्लध्यानके अभिमुख चौदह या दस अथवा नौ पूर्वधारीके श्रुतज्ञानोपयोग अवश्यभावी है । द्वितीय उपदेशानुसार श्रुतज्ञान, मतिज्ञान, चक्षुदर्शन या अचक्षुदर्शन इन चारमे से कोई एक उपयोग होता है, क्योकि वह अन्तरौय (अन्य) नही है, मात्र कारणरूप है मतिज्ञानके होनेपर चक्षुदर्शन व अचक्षुदर्शनके होनेमे भी कोई विरोध नही आता, क्योंकि चक्षुदर्शन व अचक्षुदर्शनके बिना मतिज्ञान नही हो सकता । शंका:-मतिज्ञान-श्रुतज्ञान-चक्षुदर्शन-अचक्षुदर्शन इन चार उपयोगोके समान अवधिज्ञान-मनःपर्ययज्ञान और अवधिदर्शन भी क्यों नही होते ? समाधान:-ऐसी आशंका नही करनी चाहिए, क्योकि इस सूत्रके द्वारा उनका विरोध कर दिया गया है तथा एकाग्रचित्तानिरोध लक्षणरूप ध्यानसे अवधिज्ञानादिका विरुद्ध स्वभाव है ।


गुणसेढी गुणसंकम ठिदिखंडमसत्थगाण रसखंडं ।
विदियकरणादिसमए अण्णं ठिदिबंधमारवई ॥६॥३६७॥

अर्थ: द्वितीय अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें गुणश्रेणि, गुणसंक्रमण, स्थितिखण्डन और अप्रशस्तप्रकृतियोंका अनुभागखण्डन होता है तथा अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिमसमयमें जो स्थितिबन्ध होता था उससे पल्यके असंख्यातवेभाग मात्र घटते हुए अन्य स्थितिबन्धको प्रारम्भ करता है, क्योकि यहा एक स्थितिवंधापसरण होनेके कारण इतने प्रमाण स्थितिबन्धको घटाता है ।


गुणसेढीदीहत्तं अपुव्वचउक्ककादु साहियं होदि ।
गलिदवसेसे उदयावलिबाहिरदो दु णिक्खेत्तो ॥७॥३६८॥

अर्थ: यहा गुणश्रेणिआयामका प्रमाण अपूर्वकरण-अनिवृत्तिकरण-सूक्ष्मसाम्पराय और क्षीणकषाय इन चारों गुणस्थानोके कालसे साधिक है, सो अधिकका प्रमाण क्षीणकषायगुणस्थानके कालके सख्यातवेभागमात्र है अत. उदयावलिसे बाहर गलितावशेषरूप जो यह गुणश्रेणिआयाम है उसमे अपकर्षण किये हुए द्रव्यका निक्षेपण होता है ।


पडिसमयं उक्कट्टदि असंखगुणिदक्कमेण संचदि य ।
इदि गुणसेडीकरणं पडिसमयमपुव्वपढमादो ॥८॥३६६॥

अर्थ: प्रथमसमयमे अपकर्षण किए हुए द्रव्यसे द्वितीयादि समयोमे असंख्यातगुणा क्रम लिए हुए प्रतिसमय द्रव्यका अपकर्षण करता है और सिंचित अर्थात् उदयावलि, गुणश्रेणीआयाम और उपरितनस्थितिमे निक्षेपण करता है । इसप्रकार अपूर्वकरणगुणस्थानके प्रथमसमयसे लेकर प्रतिसमय गुणश्रेणि होती है ।


पडिसमयमसंखगुणं दव्वं संकमदि अप्पसत्थाणं ।
बंधुज्झियपयडीणं बंधंतसजादिपयडीसु ॥९॥४००॥

अर्थ: अपूर्वकरणगुणस्थानके प्रथमसमयसे लेकर प्रतिसमय असंख्यातगुणेक्रमसे युक्त (यहा जिनका बन्ध नही होता) अप्रशस्तप्रकृतियोका जो द्रव्य है वह (यहां जिन प्रकृतियोंका बन्ध पाया जाता है ऐसी) स्वजातीय प्रकृतियोंमें संक्रमण करता है अर्थात् तद्रूप परिणमन कर जाता है ।


२ओवट्टणा जहण्णा आउलियाऊणिया तिभागेण ।
एसा द्विदीसु जहण्णा तहाणुभागे असंखेत्तु ॥१०॥४०१॥

अर्थ: जघन्य अपवर्तनाका प्रमाण त्रिभागसे हीन आवलिप्रमाण है । यह जघन्यअपवर्तना स्थितिके विषयमे ग्रहण करना चाहिए, किन्तु अनुभागविषयक जघन्य अपवर्तना अनन्तस्पर्धकोंसे प्रतिबद्ध है ।


संकामेदुक्कड्डिदे जे अंसे ते अवट्ठिदा होंति ।
आवलियं से काले तेण परं होंति भजिदव्वा ॥११॥४०२॥

अर्थ: जो कर्मप्रदेश संक्रमित व उत्कर्षित किये जाते है वे एक आवलिकालतक अवस्थित रहते हैं उसके पश्चात् अनन्तरसमयमे भजितव्य है ।


ओक्कड्ढिदे जे अंसे से काले ते च होंति भजिदव्वा ।
वड्ढीए अवट्ठाणे हाणीए संकमे उदए ॥१२॥४०३॥

अर्थ: जो कर्मप्रदेशाग्र अपकर्षित किये जाते हैं वे अनन्तर अगले समयमें वृद्धि-हानि, अवस्थान, संक्रमण व उदयके लिए भजितव्य हैं ।


एक्कं च ट्ठिदिविसेसं तु असंखेज्जेसु ट्ठिदि विसेसेसु ।
वड्ढेदि हरस्सेदि व तहाणुभागे अणंतेसु ॥१३॥४०४॥

अर्थ: एक स्थितिविशेषको असंख्यात स्थितिविशेषोमे बढाता भी है और घटाता भी है । इसीप्रकार अनुभागविशेषको अनन्त अनुभागस्पर्धकोमे बढाता और घटाता है ।


पल्लस्स संखभागं वरं पि अवरादु संखगुणिदं तु ।
पढमे अपुव्वखवगे ठिदिखंडपमाणयं होदि ॥१४॥४०५॥

अर्थ: क्षपक अपूर्वकरणके प्रथमस्थितिखण्ड अर्थात् स्थितिकाण्डकायामका जघन्य और उत्कृष्टप्रमाण यद्यपि पल्यके संख्यातवेंभागमात्र है तथापि जघन्यसे उत्कृष्टका प्रमाण संख्यातगुणा है ।


आउगवज्जाणं ठिदिघादो पढमदु चरिमठिदिसंतो ।
ठिदिबंधो य अपुव्वे होदि हु संखेज्जगुणहीणो ॥१५॥४०६॥

अर्थ: आयुकर्म बिना शेष सातकर्मोंका स्थितिकाण्डकायाम, स्थितिसत्त्व और स्थितिबन्ध ये तीनो अपूर्वकरण के प्रथमसमयमें जो पाये जाते हैं उनसे अपूर्वकरणके चरमसमयमें संख्यातगुणे कम होते हैं ।


अंतोकोड़ाकोड़ी अपुव्वपढमम्हि होदि ठिदिबंधं
बंधादो पुण सत्तं संखेज्जगुणं हवे तत्थ ॥१६॥४०७॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथमसमयमें स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ीप्रमाण अर्थात् पृथक्त्वलक्षकोटिसागर प्रमाण है तथा स्थितिसत्त्व भी यद्यपि अन्तःकोटाकोटी प्रमाण है तथापि स्थितिबन्धसे संख्यातगुणा है ।


एक्केक्कट्ठिदिखंडय णिव्वडणट्ठिदिओसरणकाले ।
संखेज्जसहस्साणि य णिव्वडंति रसस्स खंडाणि ॥१७॥४०८॥

अर्थ: एक-एक स्थितिखण्डके पतन होनेमें अथवा एक स्थितिबन्धापसरणके कालमें संख्यातहजार अनुभागकाण्डकका पतन होता है ।


असुहाणं पयडीणं अणंतभागा रसस्स खंडाणि ।
सुहपयडीणं णियमा णत्थित्ति रसस्स खंडाणि ॥१८॥४०९॥

अर्थ: अशुभ प्रकृतियोके अनुभागकाण्डकका प्रमाण अनन्तबहुभागमात्र है तथा प्रशस्तप्रकृतियोका अनुभागखण्ड नियमसे नही होता है, क्योकि विशुद्धपरिणामोके द्वारा शुभप्रकृतियोका अनुभागघात सम्भव नही है ।


पढमे छट्ठे चरिमे भागे दुग तीस चदुर वोच्छिण्णा ।
बंधेण अपुव्वस्स य से काले बादरो होदि ॥१९॥४१०॥

अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथमभागमे दो प्रकृतियां, छठे भागमें ३० प्रकृतियां और अन्तिमभागमे ४ प्रकृतिया बन्धसे व्युच्छिन्न होती हैं । अपूर्वकरणसे अनन्तरसमयमें बादर साम्पराय होता है ।


अणियट्टस्स य पढमे अण्णं ठिदिखंडपहुदिमारवई ।
उवसामणा णिवत्ती णिकाचणा तत्थ वोच्छिण्णा ॥२०॥४११॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें अन्य ही स्थितिखण्डादिक प्रारम्भ करता है उनमे अपूर्वकरणके अन्तिम समयवर्ती स्थितिकाण्डकायामसे भिन्न ही स्थितिकाण्डकायाम, इसके पश्चात् अवशिष्ट जो अनुभाग उसका अनन्तबहुभागमात्र अन्य ही अनुभागकाण्डक होता है और अपूर्वकरणके अन्तिमसमयके स्थितिबन्धसे पल्यके संख्यातवेंभागमात्र घटता हुआ अन्य ही स्थितिबन्ध यहां होता है तथा यही अप्रशस्तोपशम, निधत्ति व निकाचनारूप तीन करणोकी व्युच्छित्ति भी हुई है । अतः अब सर्व कर्म उदय, संक्रमण, उत्कर्षण, अपकर्षण करने योग्य हुए हैं ।


बादरपढमे पढमं ठिदिखंडं विसरिसं तु विदिआदि ।
ठिदिखंडयं समाणं सव्वस्स समाणकालम्हि ॥२१॥४१२॥

पल्लस्स संखभागं अवरं तु वरं तु संखभागहियं ।
घादादिमठिदिखंडो सेसा सव्वस्स सरिसा हु ॥२२॥४१३॥

अर्थ (गाथा 21 से 22): अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमें जो प्रथमस्थितिखण्ड है सो तो विस है, नानाजीवोके समान नही है तथा जो द्वितीयादि स्थितिखण्ड हैं वे समानकालमें स जीवोके समान हैं । प्रथम स्थितिखण्ड जघन्यसे तो पल्यका संख्यातवांभाग तथा उत्कृ इससे संख्यातवाभाग अधिक है और अवशेष द्वितीयादि स्थितिखण्ड सभी जीवो समान हैं ।


उदधिसहस्सपुधत्तं लक्खपुधत्तं तु बंध संतो य ।
अणियट्टीसादीए गुणसेढीपुव्वपरिसेसा ॥२३॥४१४॥

अर्थ: पूर्वमें जो स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ीसागरप्रमाण था वह अपूर्वकरण में होनेवाले संख्यातहजार स्थितिबन्धापसरणोसे घटते हुए अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयमे स्थितिबन्ध पृथक्त्वहजारसागरप्रमाण हो जाता है तथा पूर्वमे जो अन्तकोड़ाकोड़ीसागरप्रमाण स्थितिसत्त्व था वह अपूर्वकरणमे होनेवाले संख्यातहजार स्थितिकाण्डकघातोके द्वारा घटते हुए पृथक्त्व लक्षसागरप्रमाण हो जाता है । जघन्य या उत्कृष्ट परिणामोके कारण जो जघन्य या उत्कृष्ट गुणश्रेणीनिक्षेप अपूर्वकरणमे प्रारम्भ किया था वह गुणश्रेणिआयाम अपूर्वकरणका काल व्यतीत होनेके पश्चात् जितना शेष रहा वही यहां जानना । समय-समयप्रति असंख्यातगुणे क्रमसहित पूर्ववत् गुणश्रेणी और गुणसंक्रमण वर्तता है । ये सब प्रथमसमयवर्ती अनिवृत्तिकरणके आवश्यक हैं । तदनन्तरकालमे ये उपर्युक्त ही आवश्यक होते हैं, विशेषता केवल यह है कि यहां गुणश्रेणि असंख्यातगुणी होती है, शेष-शेष (गलितावशेष) मे निक्षेप होता है, विशुद्धि अनन्तगुणी वृद्धिरूप है ।


ठिदिबंधसहस्सगदे संखेज्जा बादरे गदा भागा ।
तत्थासणिणस्सट्ठिदिसदिसं ठिदिबंधणं होदि ॥२४॥४१५॥

अर्थ: इसप्रकार संख्यातहजार स्थितिबन्ध हो जानेपर अनिवृत्तिकरणकालके संख्यातबहुभाग तो व्यतीत हो जाते है तथा एकभाग शेष रहनेके अवसरमें असंज्ञीपञ्चेन्द्रियकी स्थितिके समान स्थितिबन्ध होता है।


ठिदिबंधसहस्सगदे पत्तेयं चदुरतियविगइंद्री।
ठिदिबंधसमं होदि हु ठिदिबंधमणुक्कमेणेव ॥२५॥४१६॥

अर्थ: पूर्वोक्तक्रम लीये सख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर अनुक्रमसे चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रियके समान स्थितिबन्ध होता है। इनमें चतुरिन्द्रियके समान तो १०० सागर, त्रीन्द्रियके समान ५० सागर, द्वीन्द्रियके समान २५ सागर, एकेन्द्रियके समान एकसागरका ४/७ वां भाग मोहनीयका, ३/७ वां भाग ज्ञानावरणादि चार तीसीय कर्मोंका, ३/७ भागमात्र नाम-गोत्र बीसिय कर्मोंका स्थितिबंध होता है। एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंज्ञीके ७० कोड़ाकोड़ीसागर स्थितिवाले मिथ्यात्वकर्मका क्रमसे एक, पचीस, पचास, सौ और एकहजार सागरका स्थितिबन्ध होता है तो क्रमशः चालीस, तीस व बीस कोड़ाकोड़ीरूप उत्कृष्टस्थितिवाले मोहनीय, ज्ञानावरणादि चार और नाम व गोत्रकर्मका कितना बन्ध होगा ? इसप्रकार त्रैराशिक करनेपर पूर्वोक्त स्थितिबन्धका प्रमाण प्राप्त होता है। यही त्रैराशिकक्रम आगे भी जानना।


एइंदियट्ठिदीदो संखसहस्से गदे हु ठिदिबंधे ।
पल्लेकदिवड्ढदुगं ठिदिबंधो वीसियतियाणं ॥२६॥४१७॥

अर्थ: एकेन्द्रियके समान स्थितबन्धसे आगे संख्यातहजार स्थितिबन्ध जानेपर नाम-गोत्रका (वीसियका) एक पल्य, तीसीयाकर्मोंका १ १/२ पल्य और मोहनीयका दो पल्य स्थितिबन्ध होता है। इस अनुक्रमसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर मोहनीयकर्मका पल्यमात्र स्थितिबन्ध होता है । यहा छह कर्मोंका स्थितिबन्ध पल्यके संख्यातवेंभागमात्र है ऐसे वीसीय, तीसीय और मोहनीयका पल्यमात्र स्थितिबन्ध होनेका क्रम जानना तथा इसके अनन्तर जब मोहनीयकर्मका पल्यके संख्यातबहुभागवाला एक स्थितिबन्धापसरण होता है तब सातो ही कर्मोंका स्थितिबन्ध पल्यके संख्यातवेंभागमात्र हो जाता है यहां नाम-गोत्रका स्तोक उससे तीसीयकर्मोंका सख्यातगुणा और उससे मोहनीयकर्मका स्थिति-बन्ध सख्यातगुणा जानना । इस अनुक्रमसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर नाम व गोत्रकर्मका दूरापकृष्टि नामक पल्यके संख्यातवेभागवाला अन्तिम स्थितिबन्ध होता है । इसके अनन्तर पल्यका असख्यात बहुभागमात्र एक स्थितिबन्धापसरण होनेसे जब नाम व गोत्रका पल्यके असंख्यातवेभागमात्र स्थितिबन्ध होता है वहां अन्यकर्मोंका पल्यके सख्यातवेंभागमात्र ही स्थितिबन्ध है, क्योकि दूरापकृष्टिका उलघन होनेसे इनके स्थितिबन्ध पल्यके संख्यातवेंभागप्रमाण और स्थितिबन्धापसरण पल्यके सख्यातबहुभाग-


तक्काले ठिदिसंतं लक्खपुधत्तं तु होदि उवहीणं ।
बंधोसरणा बंधो ठिदिखंडं संतमोधरदि ॥२७॥४१८॥

अर्थ: उस कालमें कर्मोंका स्थितिसत्त्व पृथक्त्वलक्षसागरप्रमाण होता है सो अनिवृत्तिकरणके प्रथमसमयसम्बन्धी स्थितिबन्धसे संख्यातगुणक्रम जानना “स्थितिबन्धापसरणके द्वारा स्थितिबन्ध घटता है और स्थितिकाण्डकोसे स्थितिसत्त्व कम होता है” ऐसा सर्वत्र जानना।


पल्लस्स संखभागं संखगुणं असंखगुणीणं ।
बंधोसरणे पल्लं पल्लासंखं असंखवस्साणि ॥२८॥४१९॥

अर्थ: अन्तःकोड़ाकोड़ीसागर स्थितिबन्धसे जबतक पल्यमात्र स्थितिबन्ध होता है तबतक स्थितिबन्धापसरणका प्रमाण पल्यके संख्यातवेंभाग है उसके पश्चात् पल्यके असंख्यातवेंभागरूप स्थितिबन्धपर्यन्त पल्यके संख्यात बहुभागवाले स्थितिबन्धापसरण होते हैं अर्थात् प्रत्येक स्थितिबन्धापसरणमें स्थितिबन्ध पल्यका संख्यातबहुभाग घटता हुआ होता है । दूरापकृष्टसे लेकर जबतक संख्यातहजारवर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है वहो प्रत्येक स्थितिबन्धापसरण द्वारा पल्यका असंख्यातबहुभाग घटता स्थितिबन्ध होता है ।


एवं पल्लं जादा वीसीया तीसीया य मोहो य ।
पल्लासंखं च कमं बंधेण य वीसियतियाओ ॥२९॥४२०॥

अर्थ: इसप्रकार (२० कोड़ाकोड़ीसागरकी स्थितिवाले) बीसीयकर्मोंका पल्यमात्र स्थितिबन्ध होनेतक बीसीयकर्मोंसे डेढ़गुना तीसीयका और दोगुना मोहका स्थितिबन्ध है, ऐसा ही क्रम जानना । इसके अनन्तर एक स्थितिबन्धापसरण होनेसे बीसीयकर्मोंका स्थितिबन्ध तो संख्यातगुणाकम होता जाता है । पल्यको संख्यातका भाग देनेपर उसमेंसे बहुभाग घटानेसे एकभागमात्र स्थितिबन्ध रहता है तथा अन्य कर्मोंका जबतक पल्यमात्र स्थितिबन्ध नहीं हो जाता उससे पूर्वबन्धसे पल्यका संख्यातवेंभागमात्र विशेषसे हीन स्थितिबन्ध होता है । यहां बीसीयकर्मोंका स्थितिबन्ध स्तोक है उससे ज्ञानावरणादि चार तीसीयोंका स्थितिबन्ध तुल्य होकर संख्यातगुणा है क्योंकि बीसीयकर्मोंका स्थितिबन्ध तो पल्यके संख्यातवेंभाग और तीसीयकर्मोंका साधिक पल्यमात्र है एवं तीसीयोंसे मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध विशेष अधिक है इसप्रकार अल्पबहुत्व जानना । इसक्रमसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर ज्ञानावरणादि तीसीयकर्मोंका पल्यमात्र स्थितिबन्ध हो जाता है । तीसीयकर्मोंके स्थितिबन्धसे तीसराभाग अधिक मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध होता है, क्योकि तीसीयका पल्यमात्र स्थितिबन्ध होता है, तो चालीसीयका कितना स्थितिबन्ध होता है इसप्रकार त्रैराशिक करनेपर त्रिभाग अधिक पल्यमात्र मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध प्राप्त होता है । इसके अनन्तर तीसीयकर्मोंका एक स्थितिबन्धापसरण द्वारा पूर्व स्थितिबन्धसे पल्यका संख्यातबहुभागमात्र घटता अर्थात् संख्यातगुणा घटता स्थितिबन्ध होता है । यहां नाम व गोत्रका स्थितिबन्ध सबसे स्तोक उससे तीसीयोंका संख्यातगुणा और उससे मोहनीयकर्मका संख्यातगुणा स्थितिबन्ध होता है ।


उदधिसहस्सपुधत्तं अब्भंतरदो दु सदसहस्सस्स ।
तक्काले ठिदिसंतो आउगवज्जाण कम्माणं ॥३०॥४२१॥

अर्थ: उस मोहनीयकर्मका पल्यके असंख्यातवेंभागमात्र स्थितिबन्ध होनेके कालमें आयुबिना अन्यकर्मोंका स्थितिसत्त्वपृथक्त्व हजारसागर प्रमाण होता है सो पृथक्त्वहजार शब्दसे यहां लक्षके भीतर यथासम्भव प्रमाण जानना। पहले पृथक्त्वलक्षागरका स्थितिसत्त्व था सो संख्यातहजार स्थितिकाण्डकघातोंके द्वारा यहां इतना शेष रहा है।


मोहगपल्लासंखट्ठिदिबंधसहस्सगेसु तीदेसु ।
मोहो तीसिय हेट्ठा असंखगुणसीसयं होदि ॥३१॥४२२॥

अर्थ: मोहनीयकर्मका पल्यके असंख्यातवेंभागमात्र स्थितिबन्ध होनेके कालमें नाम व गोत्रका स्थितिबन्ध सबसे स्तोक, उससे असंख्यातगुणा ज्ञानावरणादि चार तीसीयकर्मोंका और उससे असंख्यातगुणा मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध होता है। इस प्रकारके अल्पबहुत्वसहित संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर नाम व गोत्रकर्मका स्तोक उससे मोहनीयकर्मका असंख्यातगुणा तथा उससे भी असंख्यातगुणा ज्ञानावरणादि चार तीसीयकर्मोंका, ऐसे अन्यप्रकार स्थितिबन्ध होता है। यहां विशुद्धताके निमित्तसे तीसीयकर्मोंके नीचे अतिअप्रशस्त मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध विशेषघातके वशसे असंख्यातगुणा कम हो जाता है।


तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वीसियाण हेट्ठादु ।
एक्कसराहे मोहे असंखगुणहीणयं होदि ॥३२॥४२३॥

अर्थ: पूर्व गाथोक्त अल्पबहुत्वके क्रमसहित उतने ही संख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर एक ही बार अन्यप्रकारसे स्थितिबन्ध होता है वहां मोहनीयकर्मका सबसे स्तोक, नाम व गोत्रकर्मका असंख्यातगुणा और उससे ज्ञानावरणादि चारों तीसीयकर्मोंका असंख्यातगुणा स्थितिबन्ध होता है। यहां विशुद्धताके बलसे अति अप्रशस्तमोहका स्थितिबन्ध बीसीयकर्मोंके नीचे असंख्यातगुणा कम हो जाता है।


तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वेदणीय हेट्ठादु ।
तीसियघादितियाओ असंखगुणहीणया होंति ॥३३॥

अर्थ: इसप्रकार उपर्युक्त क्रमसे उतने ही संख्यातहजारस्थितिबन्ध व्यतीत होनेपर अन्य ही प्रकार स्थितिबन्ध होता है। तब मोहनीयकर्मका सबसे स्तोक, उससे नाम व गोत्रका असंख्यातगुणा और उससे तीन घातियाकर्मोंका असंख्यातगुणा तथा उससे असंख्यातगुणा वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध होता है । यहां विशुद्धता होनेसे तीसीयकर्मोंमें भी वेदनीयकर्मसे नीचे अप्रशस्त तीन घातियाकर्मोंका असंख्यातगुणा घटते हुए स्थितिबन्ध हो जाता है ।


तेत्तियमेत्ते बंधे समतीदे वीसियाण हेट्ठा दु ।
तीसियघादितियाओ असंखगुणहीणया होंति ॥३४॥४२५॥

अर्थ: इसी उपर्युक्तक्रमसे संख्यातहजार स्थितिबन्ध व्यतीत होनेपर पूर्वस्थितिबन्धसे अन्यप्रकार स्थितिबन्ध होता है तब मोहनीयकर्मका सबसे स्तोक, उससे तीन घातियाकर्मोंका असंख्यातगुणा, उससे नाम व गोत्रकर्मका असंख्यातगुणा और उससे साधिक वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध होता है । यहां विशुद्धताके बलसे वीसीय (नाम-गोत्र) कर्मोंके नीचे अतिअप्रशस्त तीन घातियाकर्मोंका असंख्यातगुणा घटते हुए स्थितिबन्ध होता है ।


तक्काले वेदणियं णामागोदादु साहियं होदि ।
इदि मोहतीसवीसियवेदणियाणं कमो बंधे ॥३५॥४२६॥

अर्थ: उस (विशुद्धतावश अप्रशस्त तीन घातियाकर्मोंका असंख्यातगुणा घटते हुए स्थितिबन्धके) कालमे वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध नाम व गोत्रके स्थितिबन्धसे साधिक है अर्थात् नाम व गोत्रके स्थितिबन्धसे आधाप्रमाण अधिक (१२ गुणा) है, क्योंकि वीसीयकर्मोंके स्थितिबन्धसे तीसीयकर्मोंका स्थितिबन्ध डेढगुणा त्रैराशिकविधिसे सिद्ध होता है । इसप्रकार मोहनीय, तीसीय, वीसीय और वेदनीयकर्मका क्रमसे बन्ध सो ही क्रमकरण जानना । नाम और गोत्रकर्मसे वेदनीयका डेढगुणा स्थितिबन्धरूप बन्धमें अल्पबहुत्व होना ही क्रमकरण कहलाता है ।


बंधे मोहादिकमे संजादे तेत्तियेहिं बंधेहिं ।
ठिदिसंतमसणिएत्तमं मोहादिकमं तहा संते ॥३६॥४२७॥

अर्थ: मोहादिके क्रम लीये जो क्रमकरणरूप बन्ध हुआ उससे आगे इसीक्रमसे उतने ही सख्यातहजार स्थितिबन्ध होनेपर असंज्ञीपञ्चेन्द्रियके समान स्थितिसत्त्व होता है तथा उससे आगे जिसप्रकार मोहादिकसम्बन्धी स्थितिबन्धका व्याख्यान क्रमकरणपर्यन्त किया गया है वैसे ही स्थितिसत्त्वका व्याख्यान अनुक्रमसे जानना । सूक्ष्म, साधारण) प्रकृतियोका स्थितिसत्त्व पृथक्त्वस्थितिखण्डोके कालद्वारा परप्रकृतिरूप संक्रमण होता है, उच्छिष्टावलीप्रमाण स्थितिसत्त्व शेष रह जाता है ।


तीदे बंधसहस्से पल्लासंखेज्जयं तु ठिदिबंधे ।
तत्थ असंखेज्जाणं उदीरणा समयबद्धाणं ॥३७॥४२८॥

अर्थ: इस क्रमकरणसे आगे संख्यातहजार स्थितिबन्ध बीत जानेपर पल्यके असंख्यातवेंभागमात्र स्थितिबन्ध होता है तब असंख्यात समयप्रबद्धोंकी उदीरणा होती है ।


ठिदिबंधसहस्सगदे, अट्ठकसायाण होदि संकमगो ।
ठिदिखंडपुधत्तेण य, तट्ठिदिसंतं तु आवलियविद्धं ॥३८॥

अर्थ: तत्पश्चात् संख्यातहजार स्थितिबन्ध बीत जानेपर आठ (अप्रत्याख्यानावरण ४, प्रत्याख्यानावरण ४) कषायोंका पृथक्त्वस्थितिखण्डसम्बन्धी कालके द्वारा संक्रमण होता है तथा उच्छिष्टावलीमात्र स्थितिसत्त्व शेष रह जाता है ।


'ठिदिबंधपुधत्तगदे सोलसपयडीण होदि संकमगो ।
ठिदिखंडपुधत्तेण य तट्ठिदिसंतं तु आवलिपविट्ठं ॥३९॥४३०॥

अर्थ: तत्पश्चात् पृथक्त्वस्थितिकाण्डक व्यतीत हो जानेपर सोलह (स्त्यानगृद्धित्रिक, नरकद्विक, तिर्यञ्चगतिद्विक, एकेन्द्रियादि चारजाति, आतप, उद्योत, स्थावर,


'ठिदिबंधपुधत्तगदे मणदाणा तत्तियेवि ओहि दुगं ।
लाभं च पुणोवि सुदं 'अचक्खुभोगं पुणो चक्खू ॥४०॥४३१॥

पुणरवि मदिपरिभोगं पुणरवि विरयं कमेण अणुभागो।
बंधेण देसघादी पल्लासंखे तु ठिदिबंधो ॥४१॥४३२॥

अर्थ (गाथा 40 से 41): (सोलह प्रकृतियोंके संक्रसणसे आगे) पृथक्त्व स्थितिकाण्डक बीत जानेपर मनःपर्ययज्ञानावरण और दानान्तराय कर्मोका अनुभागबन्ध देशघातिरूप हो जाता है पुनः इतने ही स्थितिबन्ध बीत जानेपर अवधिज्ञानावरण, अवधिदर्शनावरणरूप अवधिद्विक और लाभान्तरायका अनुभागबन्ध देशघातिरूप हो जाता है । इसीप्रकार पृथक्त्वस्थितिबन्धोंको पुनः पुनः व्यतीतकर क्रमशः श्रुतज्ञानावरण, अचक्षुदर्शनावरण और भोगान्तराय इन तीन कर्मोंका पश्चात् चक्षुदर्शनावरणका फिर मतिज्ञानावरण एवं उपभोगान्तराय इन दोनोंकर्मोंका पुनः वीर्यान्तरायकर्मका अनुभागबन्ध देशघाति हो हो जाता है, किन्तु स्थितिबन्ध पल्योपमके असख्यातवेभागप्रमाण ही होता है । इसप्रकार प्रकृतिगत अनुभाग स्तोक होनेसे देशघातिबन्ध होनेका यह क्रम है । यहा स्थितिबन्ध यथासम्भव पल्यका असंख्यातवांभागमात्र ही जानना ।


'ठिदिखंडसहस्सगदे चदुसंजलणाण णो कसायाणं ।
एयट्टिदिखंडुक्कीरणकाले अंतरं कुणदि ॥४२॥४३३॥

अर्थ: देशघातिकरणके आगे संख्यातहजार स्थितिकाण्डक व्यतीत हो जानेपर एकस्थितिकाण्डकोत्कीरणकालके द्वारा चार संज्वलन और नव नोकषायका अन्तर करता है अन्यका अन्तर नही होता है ।


'संजलणाणं एक्कं वेदाणेक्कं उदेदि तद्दोण्हं ।
सेसाणं पढमट्ठिदि ठवेदि अंतोमुहुत्तमावलियं ॥४३॥४३४॥

अर्थ: सञ्ज्वलनचतुष्कमेसे कोई एक और तीनो वेदोंमेंसे कोई एक इस प्रकार उदयरूप दो प्रकृतियोंकी तो अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथमस्थिति स्थापित करता है । इनके बिना जिनका उदय नही पाया जाता ऐसी ११ प्रकृतियोंकी प्रथमस्थिति आवलिप्रमाण स्थापित करता है ।


'उक्कीरिदं तु दव्वं संत्ते पढमट्ठिदिम्हि संथुहदि ।
बंधेवि य आबाधमदित्थिय उक्कड्ढदे णियमा ॥४४॥४३५॥

अर्थ: अन्तररूप निषेकोंके द्रव्यको सत्त्वमेसे अपकर्षणकरके प्रथमस्थितिमें निक्षेपण करता है और जिन कर्मोंका बन्ध होता है उनके अपकर्षितद्रव्यको आबाधा छोडकर बन्धरूप निषेकोमे भी निक्षेपण करता है ।


सत्त करणाणि णंतरकरणपढमे ताणि मोहणीयस्स ।
इगिठाणियबंधुदओ तस्सेव य संखेवस्सठिदिबंधो ॥४५॥४३६॥

तस्साणुपुव्विसंकम लोहस्स असंक्रमं च संढस्स ।
आवेत्तकरणसंकम छावलितीदेसुदीरणदा ॥४६॥४३७॥

अर्थ (गाथा 45 से 46): अन्तर करनेकी क्रिया समाप्त हो जानेके पश्चात् अनन्तर प्रथम सात-करण होते है–(१-२) मोहनीयकर्मका एक स्थानीय अर्थात् लतारूप अनुभागका बन्ध व उदय (३) मोहनीयकर्मका संख्यातवर्षवाला स्थितिबन्ध (४) मोहनीयकर्मकी प्रकृतियो का आनुपूर्वीसंक्रमण (५) संज्वलन लोभका असंक्रमण (६) नपुंसकवेदका आयुक्तकरण संक्रमण (७) छह आवलियोके बीत जानेपर उदीरणा³ ।


संछुहदि पुरिसवेदे इत्थीवेदं णउंसयं चेव ।
सत्तेव णोकसाए णियमा कोहम्हि संछुहदि ॥४७॥४३८॥

कोहं च छुहदि माणे माणं मायाए णियमसा छुहदि ।
मायं च छुहदि लोहे पडिलोमो संकमो णत्थि ॥४८॥४३६॥

अर्थ (गाथा 47 से 48): स्त्रीवेद और नपुंसकवेदसम्बन्धी द्रव्य तो पुरुषवेदमें ही संक्रमण करता है अन्यत्र नही । पुरुषवेद और हास्यादि छह ये सात नोकषायोका द्रव्य संज्वलनक्रोधमें संक्रमण करता है । क्रोधकषायका द्रव्य मानमें ही संक्रमण करता है, मानकषायका द्रव्य मायामें, मायाका द्रव्य लोभमे संक्रमण करता है । इसप्रकार संक्रमणके द्वारा अन्य-रूप परिणमनकर स्वय नाशको प्राप्त होता है, यही आनुपूर्वीसंक्रमण जानना । प्रतिलोभ अर्थात् अन्यथा प्रकार संक्रमण अब नही होता है ।


ठिदिबंधसहस्सगदे संढो संकामिदो हवे पुरिसे ।
पडिसमयमसंखगुणं संकामगचरिमसमओत्ति ॥४९॥४४०॥

अर्थ: हजारो स्थितिवंधापसरण व्यतीत हो जानेपर नपुंसकवेदका संक्रमण पुरुषवेदमे हो जाता है । चरमसमयतक प्रतिसमय असंख्यातगुणे द्रव्यका संक्रमण होता है और चरमसमयमे सर्वसंक्रमण द्वारा नपुंसकवेदका सम्पूर्णद्रव्य पुरुषवेदमे संक्रान्त हो जाता है ।


'बंधेण होदि उदओ अहिओ उदएण संकमो अहिओ ।
गुणसेढि असंखेज्जापदेसग्गेण बोधव्वा ॥५०॥४४१॥

अर्थ: बधसे उदय अधिक होता है और उदयसे संक्रम अधिक होता है । इसप्रकार प्रदेशाग्रकी अपेक्षा गुणश्रेणि असंख्यातगुणी जानना चाहिए । (गुणकाररूपसे पंक्तिकी अपेक्षा गुणश्रेणिका प्रयोग हुआ है ।)


'गुणसेढिअसंखेज्जा पदेसअग्गेण संकमो उदओ ।
से काले से काले भज्जो बंधो पदेसग्गे ॥५१॥४४२॥

अर्थ: प्रदेशाग्रकी अपेक्षा संक्रमण और उदय उत्तरोत्तर कालमें असंख्यातगुणश्रेणिरूपसे होते हैं, किन्तु प्रदेशाग्रमे बन्ध भजनीय है !


'इदि संढं संकामियं से काले इत्थिवेदसंकमगो ।
अण्णं ठिदिरसखंडं अण्णं ठिदिबंधमारंबई ॥५२॥४४३॥

थी अद्धा संखेज्जाभागेपगदे तिघादिठिदिबंधो ।
वस्साणं संखेज्जं थी संकंतअपगंछंते ॥५३॥४४४॥

ताहे संखसहस्सं वस्साणं मोहणीयठिदिसंतं ॥पूर्वा.गा.५४॥४४५॥

अर्थ (गाथा 52 से 54): इसप्रकार नपुंसकवेदको संक्रमाकर तदनन्तरकालमें स्त्रीवेदका संक्रामक प्रथमसमयवर्ती आयुक्तक्रियाके द्वारा होता है । उससमयमें अन्यस्थितिकाण्डक, अन्य ही अनुभागकाण्डक और अन्य स्थितिबन्धका प्रारम्भ करता है । पश्चात् (स्थितिकाण्डकपृथक्त्वसे) स्त्रीवेदके क्षपणकालका संख्यातवांभाग व्यतीत होनेपर तीन घातिया (ज्ञानावरण, दर्शनावरण व अन्तराय) कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातवर्ष प्रमाणवाला होता है, तदनन्तर (स्थितिकाण्डक पृथक्त्वके द्वारा) स्त्रीवेदका जो शेष स्थितिसत्त्व है वह सब क्षपणाके लिये ग्रहण हो जाता है । (शेष कर्मोंके स्थितिसत्त्वका असंख्यातबहुभाग क्षपणाके लिए ग्रहण हो जाता है । उस समय मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व संख्यातहजार वर्षप्रमाण हो जाता है । शेषकर्मोंका स्थितिसत्त्व पल्यके असंख्यातवेंभागप्रमाण है) अन्तमें स्थितिकाण्डकके पूर्ण होनेपर संक्रम्यमान स्त्रीवेद संक्रान्त हो जाता है । इसप्रकार पुरुषवेदमें संक्रान्त होकर स्त्रीवेदका क्षय हो जाता है ।


ताहे मोहो थोवो संखेजगुणं तिघादित्ठिदिबंधो ।
तत्तो असंखगुणियो णामदुगं साहियं तु वेयणियं ॥५५॥

ताहे असंखगुणिंयं मोहादु तिघादिपयदिठिदिसंतं ।
तत्तो असंखगुणिंयं णामदुगं साहियं तु वेयणियं ॥५६॥

अर्थ (गाथा 54 से 56): स्त्रीवेदकी क्षपणाके अनन्तरसमयमें (प्रथमसमयवर्ती) सात नोकषाय (पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा) का संक्रामक होता है । उस प्रथमसमयमे मोहनीयकर्मका स्थितिवन्ध स्तोक, तीन घातिया (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय) कर्मोका स्थितिबन्ध सख्यातगुणा, नामद्विक (नाम-गोत्र) कर्मोंका स्थितिबन्ध असख्यातगुणा और वेदनीयकर्मका स्थितिबन्ध विशेष अधिक अर्थात् डेढ़गुणा है। उसी प्रथमसमयमे मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व स्तोक, तीन घातिया (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय) कर्मोंका स्थितिसत्त्व असख्यातगुणा, नामद्विक (नाम-गोत्र) का स्थितिसत्त्व असख्यातगुणा और वेदनीयकर्मका स्थितिसत्त्व विशेष अधिक है ।


सत्तण्हं पढमट्ठिदिखंडे पुण्णे दु मोहठिदिसंतं ।
संखेज्जगुणविहीणं सेसाणमसंखगुणहीणं ॥५७॥४४८॥

अर्थ: सात (पुरुषवेद, हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा) प्रकृतियोका प्रथमस्थितिकाण्डकघात पूर्ण होनेपर मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा हीन और शेषकर्मोका स्थितिसत्त्व असंख्यातगुणाहीन हो जाता है ।


सत्तण्हं पढमट्ठिदिखंडे पुण्णेति घादिट्ठिदिबंधो ।
संखेज्जगुणविहीणं अघादितियाणं असंखगुणहीणं ॥५८॥४४९॥

अर्थ: सातकर्मोंका प्रथमस्थितिकाण्डक पूर्ण होनेपर घातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातगुणाहीन और तीन अघातियाकर्मोंका असंख्यातगुणाहीन हो जाता है ।


'ठिदिबंधपुधत्तगदे संखेज्जिदिमं गदं तदद्धाए ।
एत्थ अघादितियाणं ठिदिबंधो संखवस्सं तु ॥५९॥४५०॥

अर्थ: पृथक्त्व स्थितिबन्धापसरणोंके हो जानेपर सात नोकषायके क्षपणकालका संख्यातवांभाग व्यतीत हो जाता है तब तीनअघातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातवर्षवाला हो जाता है ।


'ठिदिखंडपुधत्तगदे संखाभागा गदा तदद्धाए ।
घादितियाणं तत्थ य ठिदिसंतं संखवस्सं तु ॥६०॥४५१॥

अर्थ: पृथक्त्वस्थितिखण्डोंके हो जानेपर सात नोकषायोंके क्षपणाकालका संख्यातबहुभाग व्यतीत हो जाता है उससमय तीनघातिया कर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातवर्षप्रमाण रह जाता है ।


पडिसमयं असुहाणं रसबंधुदया अणंतगुणहीणा ।
बंधोवि य उदयादो तदणंतरसमय उदयोत्थ ॥६१॥४५२॥

अर्थ: अशुभप्रकृतियोंका अनुभागबन्ध व अनुभाग उदय प्रतिसमय अनन्तगुणाहीन होता है । अनुभागउदयसे अनुभागबन्ध अनन्तगुणाहीन होता है, किन्तु इस बन्धसे अनन्तरसमयमें होनेवाला उदय अनन्तगुणाहीन होता है ।


बंधेण होदि उदओ अहियो उदयेण संकमो अहियो ।
गुणसेढि अणंतगुणा बोधव्वा होदि अणुभागे ॥६२॥४५३॥

अर्थ: बन्धसे अधिक उदय और उदयसे अधिक संक्रमण होता है । इसप्रकार अनुभागके विषयमें अनंतगुणित गुणश्रेणि जानना चाहिए अर्थात् यहां अधिकका प्रमाण अनन्तगुणा है ।


गुणसेढि अणंतगुणेणूणा य वेदगो दु अणुभागो ।
गणणादियंतसेढी पदेसअग्गेण बोधव्वा ॥६३॥४५४॥

अर्थ: अप्रशस्तप्रकृतियोके अनुभागका प्रतिसमय अनन्तगुणितहीन गुणश्रेणिरूपसे वेदक होता है, किन्तु प्रदेशाग्रकी अपेक्षा गणनातिक्रान्त अर्थात् असंख्यातगुणित श्रेणिरूपसे वेदक जानना चाहिए ।


'बंधोदएहिं णियमा अणुभागो होदि णंतगुण हीणो ।
से काले से काले भज्जो पुण संकमो होदि ॥६४॥४५५॥

अर्थ: तदनन्तरकालमें बन्ध और उदयकी अपेक्षा अनुभाग नियमसे अनन्तगुणितहीन होता है, किन्तु संक्रमण भजनीय है।


२संकमणं तदवट्ठं जाव दु अणुभागखंडयं पडिदि ।
अण्णाणुभागखंडे आढ़ंते णंतगुणहीणं ॥६५॥४५६॥

अर्थ: अनुभागकाण्डकघातके पतन होनेतक तदवस्थ अर्थात् अवस्थितसंक्रमण होता है, अन्य अनुभागखंडके प्रारम्भ होनेपर पूर्वसे अनन्तगुणा घटता अनुभागसंक्रमण होता है।


'सत्तण्हं संकामगचरिमे पुरिसस्स बंधमडवस्सं ।
सोलस संजलणाणं संखसहस्साणि सेसाणं ॥६६॥४५७॥

अर्थ: सातकर्मोंके संक्रमणके अन्तिमसमयमें पुरुषवेदका आठवर्षप्रमाण, संज्वलनकषायोंका १६ वर्षप्रमाण एवं शेष छहकर्मोंका संख्यातहजारवर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है ।


'ठिदिसंतं घादीणं संखसहस्साणि होंति वस्साणं ।
होंति अघादितियाणं वस्साणमसंखमेत्ताणि ॥६७॥४५८॥

अर्थ: उसीसमय घातियाकर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्ष होता है और अघातियाकर्मोंका असंख्यातवर्ष होता है ।


'पुरिसस्स य पढमट्ठिदि, आवलिदोसुवरिदासु आगाला ।
पडिआगाला छिण्णा, पडिआवलियाहुदीरणदा ॥६८॥४५६॥

अर्थ: पुरुषवेदकी प्रथमस्थितिमें दोआवलिमात्र शेष रह जानेपर आगाल व प्रत्यागालकी व्युच्छित्ति हो जाती है और मात्र प्रत्यावलि शेष रह जानेपर उदीरणा व्युच्छिन्न हो जाती है ।


अंतरकदपढमादो कोहे छण्णोकसाययं लुहदि ।
पुरिसस्स चरिमसमए पुरिसवि एगेण सव्वयं लुहदि ॥६९॥४६०॥

समऊणदोण्णिआवलिपमाणसमयप्पबद्धणवबंधो ।
बिदिये ठि दिये अत्थि हु पुरिसस्सुदयावली च ॥७०॥४६१॥

अर्थ (गाथा 69 से 70): अन्तरकृत अर्थात् अन्तरकरण कर चुकनेके पश्चात् प्रथमसमयसे लेकर छह नोकषायोंको संज्वलनक्रोधमें स्थापित करता है । पुरुषवेदके अन्तसमयमें छह नोकषायोंका सर्वद्रव्य संक्रमणको प्राप्त हो चुकता है और उसीसमय पुरुषवेदका भी पुरातन सर्वद्रव्य संज्वलनक्रोधमें संक्रान्त हो जाता है, किन्तु एकसमयकम दोआवलिप्रमाण नवकसमयप्रबद्ध द्वितीयस्थितिमें है और उदयावलि भी है ।


'से काले ओवट्टणिउव्वट्टण अस्सकरण आदोलं ।
करणं तियसण्णगदं संजलणारसेसु वट्टिहिदि ॥७१॥४६२॥

अर्थ: (अन्तिमसमयवर्ती पुरुषवेदके) “से काले” अनन्तरसमयमें अपवर्तन-उद्वर्तन, अश्वकर्णकरण, आदोलकरण ऐसा तीन नामवाला करण संज्वलनकषायके अनुभागमे प्रवृत्त होता है ।


ताहे संजलणाणं ठिदिसंतं संखवस्ससहस्सं ।
अंतोमुहुत्तहीणो सोलसवस्साणि ठिदिबंधो ॥७२॥४६३॥

अर्थ: ‘ताहे’ वहां अश्वकर्णकरणके प्रथमसमयमें संज्वलनकषायोंका स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्ष है और स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम सोलहवर्ष है ।


रससंतं आगहिदं खंडेण समं तु माणे कोहे ।
मायाए लोभेवि य अहियकमा होंति बंधेवि ॥७३॥४६४॥

अर्थ: अश्वकर्णकरणको प्रारम्भ करनेवालेने अनुभागखण्डके द्वारा अनुभागको घातकरनेके लिए जिस अनुभागसत्त्वको ग्रहण किया है वह अनुभागसत्त्व मान, क्रोध, माया और लोभमे विशेषअधिक क्रमसे हैं । अनुभागबन्धभी इसी क्रमसे होता है ।


रसखंडफड्ढयाओ कोहादीया हवंति अहियकमा ।
अवसेसफड्ढयाओ लोहादि अणंतगुणिदकमा ॥७४॥४६५॥

अर्थ: अनुभागखण्डके लिए ग्रहण किये गए स्पर्धक क्रोधादि कषायोंमें विशेषाधिक क्रमसे होते हैं, किन्तु घात होनेके पश्चात् शेष रहे स्पर्धक लोभादिकषायोंमें अनन्तगुणितक्रमसे होते हैं।


'ताहे संजलणाणं देसावरफड्डयस्स हेट्ठादो ।
णंतगुणाणमपुव्वं फड्डयमिह कुणदि हु अणंतं ॥७५॥४६६॥

अर्थ: वहा अर्थात् अश्वकर्णकरणके प्रथमसमयमे ही सज्वलनकषायोके देशघाति जघन्यस्पर्धकके नीचे अनन्तगुणितहानिके क्रमसे अनन्त अपूर्वअनुभागस्पर्धको को करता है ।


गणनादेय पदेसगुणहाणिठ्ठाणफड्डयाणं तु ।
होदि असंखेज्जदिमं अवरादु परं अणंतगुणं ॥७६॥४६७॥

अर्थ: गणनाकी अपेक्षा अपूर्वस्पर्धक प्रदेशगुणहानि स्थानान्तरके स्पर्धकोंके असंख्यातवेभागप्रमाण हैं। जघन्यअपूर्वस्पर्धकके अविभागप्रतिच्छेदोंसे उत्कृष्ट अपूर्वस्पर्धकमे अनुभागसम्बन्धी अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं ।


पुव्वाण फड्ढयाणं छेत्तूण असंखभागदव्वं तु ।
कोहादीणमपुव्वं फड्ढयमिह कुणदि अहियकमं ॥७७॥४६८॥

अर्थ: सञ्ज्वलनक्रोध-मान-माया व लोभके पूर्वस्पर्धकद्रव्यको असंख्यातसे भाग देकर मात्र एकभाग द्रव्यसे क्रोधादिके अपूर्वस्पर्धक करता है । वे स्पर्धक अधिकक्रमसे होते हैं ।


समखंडं सविसेसं णिक्खिविय ओकट्टिदादु सेसधणं ।
पक्खेवकरणसिद्धं इगिगोउच्छेण उभयत्थ ॥७८॥४६९॥

ओकट्टिदं तु होदि अपुव्वदिवग्गणाउ हीणकमं ।
पुव्वादिवग्गणाए असंखगुणहीणयं तु हीणकमा ॥७९॥४७०॥

अर्थ (गाथा 78 से 79): अपकर्षितद्रव्यमेसे अपूर्वस्पर्धककी आदिवर्गणासे लेकर विशेषहीनक्रमसे द्रव्य दिया जाता है, किन्तु पूर्वस्पर्धककी आदिवर्गणामें संख्यातगुणाहीन द्रव्य दिया जाता है उसके पश्चात् विशेषहीनक्रमसे द्रव्य दिया जाता है । अपूर्वस्पर्धककी वर्गणाओंमें विशेषसहित समखण्डद्रव्य देकर शेषद्रव्यको इसप्रकार दिया जाता है जिससे पूर्व और अपूर्व दोनों स्पर्धकोंका एक गोपुच्छाकार सिद्ध हो जावे ।


'कोहादीणमपुव्वं जेट्ठं सरिसं तु अवरमसरित्थं ।
लोहादिआदिवग्गणअविभागा होंति अहियकमा ॥८०॥४७१॥

सगसगफद्धयएहिं सगजेट्ठे भाजिदे सगीआदि ।
मज्झेवि अणंताओ वग्गणाओ समाणाओ ॥८१॥४७२॥

जे हीणा अवहारे रूवा तेहिं गुणित्तु पुव्वफलं ।
हीणवहारेणहिये अच्छं पुव्वं फलेणहियं ॥८२॥४७३॥

कोहदुसेसेणहिदकोहे तक्कंडयं तु माणतिए ।
रूपहियं सगकडयहिदकोहादी समाणसला ॥८३॥४७४॥

अर्थ (गाथा 80 से 83): क्रोधादि चार सञ्ज्वलनकषायोंके अपूर्वस्पर्धकोंमें उत्कृष्ट (अन्तिम) स्पर्धककी आदिवर्गणा सदृश हैं और जघन्य (प्रथम) स्पर्धककी आदिवर्गणा विसदृश है । लोभादि कषायोंके अपूर्वस्पर्धकोंकी आदिवर्गणामें अविभागप्रतिच्छेद अधिकक्रम लिए हुए हैं ॥८०॥ अपने-अपने उत्कृष्टस्पर्धककी आदिवर्गणाको अपने-अपने स्पर्धकोंकी संख्यासे भाग देनेपर अपनी-अपनी आदिवर्गणा प्राप्त होती है । अन्तिमस्पर्धकके समान मध्यमे भी चारोंकषायोंकी अनन्तवर्गणा समान होती है ॥८१॥ जिसका पूर्वफल अर्थात् आदिवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेद हीन है उसको अधिक अवहारकाल (स्पर्धकसंख्या) से गुणा करना चाहिए और पूर्वफल (आदिवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेद) अधिक है उसको हीन अवहारकालसे गुणा करना चाहिए ॥८२॥ क्रोधकी अपूर्वस्पर्धकसंख्याको मान-कषायकी अपूर्वस्पर्धकसंख्यामेंसे घटानेपर जो शेष रहे उससे क्रोधकी अपूर्वस्पर्धक संख्या को भाग देनेपर क्रोधके काण्डकोंका प्रमाण प्राप्त होता है । उस काण्डकप्रमाणमें एक एक अधिक करनेसे मान-माया व लोभ इनतीन काण्डकोंका प्रमाण प्राप्त होता है । अपने-अपने काण्डकोंसे अपनी-अपनी अपूर्वस्पर्धकसंख्याको भाग देनेपर समानशलाका प्राप्त होती हैं ॥८३॥


ताहे दव्ववहारो पदेसगुणहाणि फड्डयवहारो ।
पल्लस्स पढममूलं असंखगुणिदक्कमा होंति ॥८४॥४७५॥

अर्थ: अश्वकर्णकरणके प्रथमसमयमें द्रव्यके अवहारसे प्रदेशगुणहानिस्पर्धकका अवहार असंख्यातगुणा है, उससे पल्योपमका प्रथमवर्गमूल असंख्यातगुणा है ।


ताहे अपुव्वफड्ढयपुव्वस्सादीदणंतिमुवदेहिं ।
बंधो हु लताणंतिसभागोत्ति अपुव्वफड्ढयदो ॥८५॥४७६॥

अर्थ: उस कालमें अपूर्व और पूर्वस्पर्धकोंकी आदिसे लेकर अनन्तवेभागस्पर्धकोंका उदय होता है तथा लताके अनन्तवेंभाग अनुभागसहित अपूर्वस्पर्धक होकर बन्धको प्राप्त होते हैं ।


विदियादिसुसमयेसु वि पढमं व अपुव्वफड्डयाण विही ।
णवरि अणंतगुणं हीणो अनुभाग पडिसमयं ॥८६॥४७७॥

अर्थ: द्वितीयादि समयोंमें भी अपूर्वस्पर्धकविधि प्रथमसमयके समान है, किन्तु अनुभागबन्ध प्रतिसमय अनन्तगुणाहीन होता है।


णवफड्डयाण करणां पडिसमयं एवमेव णवरिं तु ।
दव्वमसंखेज्जगुणं फड्ढयमाणां असंखगुणहीणं ॥८७॥४७८॥

अर्थ: (अश्वकर्णकरणके) प्रथमसमयके समान ही प्रत्येकसमयमें नवीन स्पर्धकोंकी रचना होती है, किन्तु इतनी विशेषता है कि यहां द्रव्य तो क्रमसे असंख्यात गुणा बढता हुआ अपकर्षण करता है और नवीनस्पर्धकोंकी रचना असंख्यातगुणी-असंख्यातगुणीहीन होती है।


'पढमादिसु दिज्जकमं तक्कालजफड्ढयाण चरिमोत्ति ।
हीणकमं से काले असंखगुणहीणयं तु हीणकमं ॥८८॥४७६॥

अर्थ: उसी समय (काल) में रचे गए नवीनअपूर्वस्पर्धकोंकी आदिवर्गणासे अन्तिमवर्गणातक प्रदेशाग्र हीनक्रमसे दिये जाते हैं तदनन्तर पूर्वसमयोंमें रचे गये अपूर्वस्पर्धकोंकी आदिवर्गणामें असंख्यातगुणाहीन द्रव्य दिया जाता है और द्वितीयादि वर्गणाओं में विशेषहीन क्रमसे दिया जाता है ।


पढमादिसु दिस्सकमं तक्कालजफड्डयाण चरिमोत्ति ।
हीणकमं से काले हीणं हीणं कमं तत्तो ॥८९॥४८०॥

अर्थ: उस विवक्षितसमयमें रचे गए नवीनअपूर्वस्पर्धकोंकी प्रथमवर्गणासे लेकर अन्तिमवर्गणातक हीनक्रमसे और उस विवक्षितसमयसे पूर्वसमयोंके अपूर्व-पूर्व-स्पर्धकोंकी वर्गणाओमे भी अनन्तर क्रमशः हीन-हीन प्रदेशाग्र दिखाई देते हैं ।


पढमाणुभागखंडे पडिदे अणुभागसंतकम्मं तु ।
लोभादणंतगुणिदं उवरिं वि अणंतगुणिदकमं ॥९०॥४८१॥

अर्थ: प्रथमअनुभागखण्डके पतन होनेपर लोभकषायसे ऊपर अनन्तगुणा अनुभाग होता है । इसप्रकार अनुभागसत्कर्ममें अनन्तगुणा क्रम हो जाता है ।


आदोलस्स य पढमे णिव्वत्तिदअपुव्वफड्डयाणि बहू ।
पडिसमयं पलिदोवममूलासंखेज्जभागभजियकमा ॥९१॥४८२॥

अर्थ: आंदोल अर्थात् अश्वकर्णकरणके प्रथमसमयमें निर्वर्तित अपूर्वस्पर्धक बहुत हैं उसके आगे प्रतिसमय पल्योपमके वर्गमूलके असंख्यातवेभागसे भाजित क्रमसे हैं ।


आदोलस्स य चरिमे अपुव्वादिमवग्गणाविभागादो ।
दोच्चादीणमदीदो चडिदव्वा मेत्तणंतगुणा ॥९२॥४८३॥

अर्थ: आंदोलकरण अर्थात् अश्वकर्णकरणकालके अन्तिमसमयमे प्रथमस्पर्धक की आदिवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेदसे द्वितीयादि स्पर्धकोकी आदिवर्गणाके अविभाग- प्रतिच्छेद दुगुणे आदि हैं। अन्तिमस्पर्धककी प्रथमवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं।


आदोलस्स य पढमे रसखंडे पाडिदे अपुव्वादो ।
कोहादी अहियकमा पदेसगुणहाणिफड्डया तत्तो ॥९३॥४८४॥

होदि असंखेजगुणं इगिफड्डयवग्गणा अणंतगुणा ।
तत्तो अणंतगुणिदा कोहस्स अपुव्वफड्ढयाणं च ॥९४॥४८५॥

माणादीणहियकमा लोभगपुव्वं च वग्गणा तेसिं ।
कोहोति य अट्ठपदा अणंतगुणिदक्कमा होंति ॥९५॥४८६॥

अर्थ (गाथा 93 से 95): आंदोलकरण अर्थात् अश्वकर्णकरणके प्रथम अनुभागखण्डके पतित होनेपर क्रोधादिके अपूर्वस्पर्धक विशेषअधिक क्रमसे हैं। प्रदेशगुणहानिके स्पर्धक उससे असंख्यातगुणे हैं, एक स्पर्धकसम्बन्धोवर्गणा अनन्तगुणी हैं, उससे अनन्तगुणी क्रोधकी अपूर्वस्पर्धकवर्गणाएं हैं इससे मानादि कषायोंमें विशेषअधिक क्रमसे हैं, लोभके पूर्वस्पर्धक और उनकी वर्गणाओंसे क्रोधपर्यन्त आठपद अनन्तगुणित क्रमसे हैं ।


रसठिदिखंडाणेयं संखेज्जसहस्सगाणि गंतूणं ।
तत्थ य अपुव्वफड्डयकरणविही णिट्ठिदा होदी ॥९६॥४८७॥

अर्थ: इसप्रकार संख्यातहजार अनुभागकाण्डकघात व स्थितिकाण्डकघात व्यतीत हो जानेपर वहां अपूर्वस्पर्धककरणकी विधि पूर्ण होती है ।


हयकण्णकरणचरिमे संजलणाणट्ठवस्सठिदिबंधो ।
वस्साणं संखेज्जसहस्साणि हवंति सेसाणं ॥९७॥४८८॥

अर्थ: अश्वकर्णकरणके अन्तिमसमयमें संज्वलनकषायोंका आठवर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है और शेषकर्मोंका संख्यातहजारवर्षवाला स्थितिबन्ध होता है ।


ठिदिसत्तमघादीणं असंखवस्साण होंति घादीणं ।
वस्साणं संखेज्जसहस्साणि हवंति नियमेण ॥९८॥४८९॥

अर्थ: अघातियाकर्मोंका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षप्रमाण और घातियाकर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्षका नियमसे होता है ।


छक्कम्मे संलुद्धे कोहे कोहस्स वेदगद्धा जा ।
तस्स य पढमतिभागो होंदि हु हयकण्णकरणद्धा ॥९९॥४६०॥


विदियत्तिभागो किट्टीकरणद्धा किट्टिवेदगद्धा हु ।
तदियत्तिभागो किट्टीकरणो हयकण्णकरणं च ॥१००॥४६१॥

अर्थ: (छह नोकषायोंको संज्वलनक्रोधमें संक्रमणकरके नाश करनेके अनन्तरवर्ती समयसे लेकर अन्तर्मुहूर्तमात्र जो क्रोधवेदककाल है उसमें संख्यातका भाग देकर बहुभागके समानरूपसे तीन भाग करते हैं तथा अवशेष एकभागको संख्यातका भाग देकर उनमेंसे बहुभागको प्रथम त्रिभागमे एवं अवशिष्ट एकभागमें संख्यातका भाग देकर बहुभाग दूसरे त्रिभागमे तथा अवशेष एक भागको तृतीय त्रिभागमें जोड़ते हैं ।) इसप्रकार करते हुए प्रथमत्रिभाग कुछ अधिक हुआ और वह अपूर्वस्पर्धक सहित अश्वकर्णकरणका काल है सो पहले हो ही गया । द्वितीयत्रिभाग किंचित् ऊन है सो चार संज्वलनकषायोंका कृष्टि करनेका काल है जो अब प्रवृत्तमान है एव तृतीयत्रिभाग किंचित् ऊन है जो कि क्रोधकृष्टिका वेदककाल है जो आगे प्रवृत्तमान होगा । इस कृष्टिकरणकालमे भी अश्वकर्णकरण पाया जाता है, क्योंकि यहां भी अश्वकर्णके आकाररूप सज्वलनकषायोंका अनुभागसत्त्व या अनुभागकाण्डक होता है अतः यहां कृष्टिसहित अश्वकर्णकरण पाया जाता है ।


कोहादीणं सगसगपुव्वापुव्वगदफड्ढयेहिंतो ।
उक्कड्डिदूण दव्वं ताणं किट्टी करेदि कमे ॥१०१॥४६२॥

अर्थ: क्रोधादिके अपने-अपने पूर्व-अपूर्व स्पर्धकोंसे अपकर्षित द्रव्यके द्वारा क्रमसे कृष्टियां करता है ।


उक्कट्टिददव्वस्स य पल्लासंखेजभागबहुभागो ।
बादरकिट्टिणिबद्धो फड्ढयगे सेसइगिभागो ॥१०२॥४६३॥

अर्थ: अपकर्षितद्रव्यको पल्यके असंख्यातवेंभागसे भाजितकर उसमेंसे बहुभागद्रव्य बादरकृष्टियोंमें दिया जाता है और एकभाग पूर्व-अपूर्वस्पर्धकोंमें दिया जाता है ।


किट्टीओ इगिफड्ढयवग्गणा संखाणणंतभागो दु ।
एक्केक्कम्हि कसाए तियंति अहवा अणंता वा ॥१०३॥४६४॥

अर्थ: कृष्टियोंकी संख्या एक स्पर्धककी वर्गणाओंके अनन्तवेंभाग है१ । एक-एक कषायकी तीन-तीन कृष्टियां अथवा अनन्तकृष्टियां हैं ।


अकसायकसायाणं दव्वस्स विभंजणं जहा होदी ।
किट्टिस्स तहेव हवे कोहो अकसायपडिबद्धं ॥१०४॥४६५॥

अर्थ: अकषाय अर्थात् नोकषाय और कषायमें द्रव्य (समयप्रबद्ध) का जिस प्रकार विभाजन होता है उसीप्रकार कृष्टियोंमें भी द्रव्यका विभाजन होता है, किन्तु अकषायका द्रव्य क्रोधकृष्टिमैं सम्मिलित होता है ।


पढमादिसंगहाओ पल्लासंखेज्ज भागहीणाओ ।
कोहस्स तदीयाए अकसायाणं तु किट्टीओ ॥१०५॥४६६॥

अर्थ: संग्रहकृष्टिकरणकी प्रथम (जघन्य) संग्रहकृष्टिसे लेकर आगे-आगे क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टितक द्रव्य हीन होता गया है । प्रथमसंग्रहकृष्टिके द्रव्यको पल्यके असंख्यातवेभागसे भाग देनेपर जो प्रमाण आवे उतना द्रव्य द्वितीयसंग्रहकृष्टि कम है । कृष्टिकरणकी अपेक्षा क्रोधकी तृतीयकृष्टि (उदयापेक्षा क्रोधकी प्रथमकृष्टि) में नोकषायका द्रव्य मिल जाता है ।


कोहस्स य माणस्स य मायालोभोदएण चडिदस्स ।
बारस णव छ तिण्णि य संगहकिट्टी कमे होंति ॥१०६॥४६७॥

अर्थ: क्रोध-मान-माया अथवा लोभके उदयसे क्षपकश्रेणि चढ़नेवाले के क्रम से १२-६-६ व ३ संग्रहकृष्टियां होती हैं ।


संगहगे एक्केक्के अंतरकिट्टी हवंदि हु अणंता ।
लोभादि अणंतगुणा कोहादि अणंतगुणहीणा ॥१०७॥४६८॥

अर्थ: एक-एक संग्रहकृष्टिमें अन्तरकृष्टियां अनन्त हैं तथा उन सग्रहकृष्टियोमें लोभकषायसे, लेकर क्रमसे, अनन्तगुणा- बढ़ते हुए और क्रोधकषायसे लेकर- क्रमसे घटता हुआ अनुभाग जानना ।


लोभादी कोहोत्ति य सट्ठाणंतरमणंतगुणिदकमं ।
तत्तो बादरसंगहकिट्टी अंतरमणंतगुणिदकमं ॥१०८॥४६६॥

अर्थ: लोभकपायसे क्रोधकषायपर्यन्त स्वस्थान अन्तर ३ अनन्तगुणा क्रम लीये है तथा उम स्वस्थानअन्तरसे बादरसंग्रहकृष्टिअन्तर अनन्तगुणा क्रमसहित है ।


'लोहस्स अवरकिट्ठिगदव्वादो कोधजेट्ठकिट्ठिस्स ।
दव्वोत्ति य हीणकमं देदि अणंतेण भागेण ॥१०९॥५००॥

लोहस्स अवरकिट्ठिगदव्वादो कोधजेट्ठकिट्ठिस्स ।
दव्वं तु होदि हीणं असंखभागेण२ जोगेण ॥११०॥जुम्मं॥५०१॥

अर्थ (गाथा 109 से 110): लोभकषायकी जघन्यकृष्टिसे लेकर क्रोधकषायकी उत्कृष्टकृष्टिपर्यन्त द्रव्य अनन्तवेंभागहीन क्रमसे दिया जाता है तथा लोभकषायकी जघन्यकृष्टिके द्रव्यसे क्रोधकषायकी उत्कृष्टकृष्टिका द्रव्य अनन्तवेंभागहीन है ।


पडिसमयमसंखगुणं कमेण उक्कड्डिदूण दव्वं खु ।
संगहहेट्ठपासे अपुव्वकिट्ठी करेदी हु ॥१११॥५०२॥

हेट्ठा असंखभागं फासे वित्थारदो असंखगुणं ।
मज्झिमखंडं उभयं दव्वविसेसे हवे फासे ॥११२॥जुम्मं॥५०३॥

अर्थ (गाथा 111 से 112): प्रथमसमयसे द्वितीयादि समयोंमें असंख्यातगुणे क्रमयुक्त द्रव्यको अपकर्षणके द्वारा संग्रहकृष्टिके नीचे अथवा पार्श्वमें अपूर्वकृष्टिको करता है । संग्रहकृष्टिके नीचे की हुई कृष्टियोंका प्रमाण तो सर्वकृष्टियोंके प्रमाणके असंख्यातवेंभागमात्र है तथा पार्श्वमें की हुई कृष्टियोका प्रमाण नीचे की हुई कृष्टियोंके प्रमाणसे असंख्यातगुणा है । यहां पार्श्वमें की हुई कृष्टियोंमें मध्यमखण्ड और उभयद्रव्य विशेष पाये जाते हैं ।


'पुव्वादिम्हि अपुव्वा पुव्वादि अपुव्वपढमगे सेसे ।
दिज्जदि असंखभागेणूणं अहियं अणंतभागूणं ॥११३॥५०४॥

वारेक्कारमणंतं पुव्वादि अपुव्वआदि सेसं तु ।
तेवीस उंटकूडा दिज्जे दिस्से अणंतभागूणं ॥११४॥५०५॥

अर्थ (गाथा 113 से 114): अपूर्वकृष्टिकी अन्तिमकृष्टिसे पहले जो पुरातनकृष्टि है उसकी प्रथमकृष्टिमं तो असंख्यातवेंभाग घटता द्रव्य देता है तथा पूर्वकृष्टिकी अन्तिमकृष्टिसे द्वितीयसग्रहकृष्टिके नीचे अपूर्वकृष्टिकी प्रथमकृष्टिमैं असंख्यातवांभागमात्र अधिक द्रव्य देता है एव अवशिष्ट सर्वकृष्टियोंमें पूर्वकृष्टिसे उत्तरकृष्टिमैं अनन्तवांभागमात्र घटते हुए द्रव्य देता है । यहां पुरातन (प्रथम) कृष्टियां १२ और अपूर्वप्रथमकृष्ट ११ तथा अवशेष कृष्टियां अनन्त जाननी । दृश्यमानमें लोभकषायकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी नवीन (अपूर्व) जघन्यकृष्टिसे लेकर क्रोधकषायकी तृतीयसंग्रहकृष्टिसम्बन्धी पुरातन (पूर्व) अन्तिमकृष्टिपर्यन्त अनन्तवेंभागमात्र घटते हुए क्रमसे द्रव्य जानना चाहिए ।


कित्तीकरणद्धाए चरिमे अंतोमुहुत्तसुज्जुत्तो ।
चत्तारि होंति मासा संजलणाणं तु ठिदिबंधो ॥११५॥५०६॥

सेसाणं वस्साणं संखेजसहस्सगाणि ठिदिबंधो ।
मोहस्स य ठिदिसंतं अडवस्संतोमुहुत्तहियं ॥११६॥५०७॥

घादितियाणं संखं वस्ससहस्साणि होदि ठिदिसंतं ।
वस्साणमसंखेज्जसहस्साणि अघादितिराणं तु ॥११७॥कु.॥५०८॥

अर्थ (गाथा 115 से 117): अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कृष्टिकरणकालके अन्तिमसमयमें अन्तर्मुहूर्तअधिक चारमासप्रमाण संज्वलनचतुष्कका स्थितिबन्ध है। यह स्थितिबन्ध अपूर्वस्पर्धककरणकालके चरमसमयमें आठवर्षप्रमाण था सो एक-एक स्थितिबन्धापसरणमें अन्तर्मुहूर्तप्रमाण घटकर इतना अवशेष रहता है। शेष कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातहजारवर्षमात्र है, पूर्वमें भी संख्यातहजारवर्षमात्र ही था सो संख्यातगुणेहीन क्रमरूप संख्यातहजार स्थितिबन्धापसरण हो जातेपर भी आलापसे इतना ही कहा है तथा मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व पहले संख्यातहजारवर्षप्रमाण था सो घटकरके यहां अन्तर्मुहूर्तअधिक आठ- वर्षमात्र रह गया । तीन घातिया (ज्ञानावरण, दर्शनावरण और अन्तराय) कर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्षप्रमाण है, क्योंकि जिसप्रकार मोहनीयकर्मके स्थितिसत्त्वका विशेष घात होता है वैसा विशेषघात शेष तीन घातियाकर्मोंका नहीं पाया जाता है । तीनअघातियाकर्मोंका सत्त्व यद्यपि असंख्यातगुणहानियों द्वारा अपवर्तनघात होता है तथापि उनका स्थितिसत्त्व यहां असंख्यातहजारवर्षप्रमाण ही है ।


पडिपदमणंतगुणिदा किट्टीओ फड्डया विसेसहिया ।
किट्टीण 'फड्डयाणं लक्खणमणुभागमासेज ॥११८॥५०९॥

अर्थ: यहां सर्वकृष्टियां तो प्रतिपद अनन्तगुणा अनुभाग लीये हैं अर्थात् प्रथमकृष्टिके अनुभागसे द्वितीयकृष्टिका अनुभाग अनन्तगुणा है । उससे तृतीयकृष्टिका अनुभाग अनन्तगुणा है । इसप्रकार चरमकृष्ट पर्यन्त क्रमसे अनन्तगुणा अनुभाग पाया जाता है तथा जो स्पर्धक हैं वे प्रतिपद विशेषअधिक अनुभाग लीए हैं । अर्थात् स्पर्धकोंकी प्रथमवर्गणासे द्वितीयवर्गणामें और द्वितीयवर्गणासे तृतीयवर्गणामें, इसप्रकार अनन्तवर्गणा पर्यन्त क्रमसे विशेषअधिक अनुभाग पाया जाता है । इसप्रकार अनुभागका आश्रयकरके कृष्टि और स्पर्धकोंका लक्षण कहा । द्रव्यकी अपेक्षा तो चय घटता क्रम कृष्टि और स्पर्धक इन दोनोंमें ही है, किन्तु अनुभाग क्रमकी अपेक्षा कृष्टि और स्पर्धकका लक्षण पृथक्-पृथक् है ।


'पुव्वापुव्वप्फड्डयमणुहवदि हु किट्टिकारओ णियमा ।
तस्सद्धा णिठ्ठायदि पढमट्ठिदि आवलीसेसे ॥११९॥५१०॥

अर्थ: कृष्टि करनेवाला कृष्टिकरणकालमें पूर्व-अपूर्वस्पर्धकोके उदयको नियमसे अनुभवता है । जैसे अपूर्वस्पर्धकोंको करते हुए पूर्वस्पर्धकके साथ अपूर्वस्पर्धकका अनुभव करता है वैसे 'कृष्टि करते हुए कृष्टिको नही भोगता है । इसप्रकार संज्वलनक्रोधकी प्रथमस्थितिमें उच्छिष्टावलिप्रमाण काल शेष रहनेपर कृष्टिकरणकालकी निष्ठापना (समाप्ति) करता है । यह कथन उत्पादअनुच्छेदकी अपेक्षासे है ।


अथ कृष्टिवेदनाधिकार


'से काले किट्टीओ अणुहवदि हु चारिमासमडवस्सं ।
बंधो, संतं मोहे पुव्वालात्वं तु सेसाणं ॥१२०॥५११॥

अर्थ: कृष्टिकरणकालके अनन्तरसमयमें अपने कृष्टिवेदककालमें कृष्टियोंके उदयका अनुभव करता है। द्वितीयस्थितिके निषेकोंमें रहती हुई कृष्टियोंको अपकर्षण-करके प्रथमस्थितिमे उदयावलिके निषेकोंमें प्राप्त करके भोगता है और उस भोगनेका नाम ही वेदना है। उससमय प्रथमस्थिति आवलिमात्र शेष रह जाती है, किन्तु आवलिका प्रथमनिषेक स्तुविकसंक्रमण द्वारा कृष्टिरूपसे उदयमें आता है। उसकाल (उदयकाल) के प्रथमसमयमें चारसंज्वलनरूप मोहनीयकर्मका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त्तअधिक चारमासको घटकर चारमास हो जाता है और स्थितिसत्त्व आठवर्षमात्र है। यह स्थितिसत्त्व पहले अन्तर्मुहूर्त्तअधिक आठवर्ष था सो अन्तर्मुहूर्त्त कमकरके इतना रह गया। अवशेष कर्मोंका भी स्थितिबन्ध और स्थितिसत्त्व यद्यपि कम हुआ है तथापि आलापद्वारा पूर्वोक्तप्रकार तीनघातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध व स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्ष एव वेदनीय, नाम व गोत्रकर्मका स्थितिबन्ध संख्यातहजारवर्ष और स्थितिसत्त्व असंख्यातहजारवर्ष जिसप्रकार कृष्टिकरणकालके अन्तिमसमयमें कहा था वैसे ही यहाँ भी जानना ।


'ताहे कोहुच्छिट्ठं सव्वं घादी हु देसघादी हु ।
दोसमऊणदुआवलिणवकं ते फड्ढयगदाओ ॥१२१॥५१२॥

अर्थ: संज्वलनक्रोधका जो अनुभागसत्त्व उदयावलिके भीतर उच्छिष्टावलिरूपसे अवशिष्ट अवस्थित है वह सत्त्व सर्वघाति है और संज्वलनचतुष्कके जो दोसमय- कम दोआवलि प्रमाण नवकसमयप्रबद्ध हैं वे देशघाति हैं तथा उनका वह अनुभागसत्त्व स्पर्धकस्वरूप है ।


लोहादो कोहादो कारउ वेदउ हवे किट्टी ।
आदिमसंगहकिट्टीं वेदयदि ण विदीयं तियं च ॥१२२॥५१३॥

अर्थ: कृष्टिकारक तो लोभसे लेकर क्रमवाले हैं और कृष्टिवेदन क्रोधसे लेकर क्रमवाले हैं । यहा पहले क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका ही अनुभव करता है द्वितीय-तृतीयसंग्रहकृष्टिका अनुभव नही करता है ।


किट्टीवेदगपढमे कोहस्स य पढमसंगहादो दु ।
कोहस्स य पढमठिदी पत्तो उव्वट्टगो मोहे ॥१२३॥५१४॥

अर्थ: कृष्टिवेदककालके प्रथमसमयमें क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे क्रोधकी प्रथमस्थिति प्राप्त करता है तथा मोहनीयकर्मका अपवर्तनघात करता है ।


पढमस्स संगहस्स य असंखभागा उदेदि कोहस्स ।
बंधेवि तहा चेव य माणतियाणं तहा बंधे ॥१२४॥५१५॥

अर्थ: कृष्टिवेदककालके प्रथमसमयमें क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसम्बन्धी अन्तरकृष्टियोंके प्रमाणको असंख्यातका भाग देनेपर उसमेंसे बहुभागमात्रकृष्ट उदयमें आती है । यहाँ जो बहुभागमात्र कहा गया है वह एकभागप्रमाण उपरितन व अधस्तन कृष्टिको छोड़कर मध्यवर्ती कृष्टियोंका प्रमाण है । प्रथम, द्वितीयादि कृष्टियोंको तो अधस्तन और चरम व उपांतआदि कृष्टियोंको उपरितनकृष्ट कहते हैं । उदयरूप नहीं होती ऐसी अधस्तनकृष्ट तो अनन्तगुणेरूपसे बढ़ते हुए अनुभागरूप होकर तथा उपरितन- कृष्ट अनन्तगुणेरूप घटते हुए अनुभागरूप होकर मध्यवर्तीकृष्टिरूप परिणमनकरके उदयमें आती हैं । बंधमे भी असंख्यातवेंभागप्रमाण अधस्तन व उपरतनकृष्ट छोड़कर बीचकी असंख्यातबहुभागप्रमाण कृष्टि जानना । उदयरूप कृष्टियोंमें जो उपरतन अनुदयकृष्टियोंका प्रमाण है उससे साधिक दुगुणे प्रमाणसहित अधस्तन व उपरतन कृष्टियोंका प्रमाण घटानेपर बन्धरूप कृष्टियोंका प्रमाण होता है, इनका यहां बन्ध होता है । यहां मानादिको अपनी-अपनी प्रथमसग्रहकृष्टिकी अधस्तन व उपरतनकृष्टिप्रमाणका असंख्यातवेंभागमात्र कृष्टियोको नीचे और ऊपर छोड़कर मध्यकी बहुभागमात्र कृष्टि बंधती है, किन्तु मानादिको तीनो ही संग्रहकृष्टियोंका उदय नही है तथा क्रोधकी द्वितीय व तृतीयसग्रहकृष्टिका बन्ध व उदय दोनो ही नही है । इसीप्रकार मान-माया व लोभका कथन भी जानना ।


'कोहस्स पढमसंगहकिट्टिस्स य हेट्ठिमणुभयट्ठाणा ।
तत्तो उदयट्ठाणा उवरिं पुण अणुभयट्ठाणा ॥१२५॥५१६॥

उवरिं उदयट्ठाणा चत्तारि पदाणि होंति अहियकमा ।
मज्झे उभयट्ठाणा होंति असंखेजसंगुणिदा ॥१२६॥५१७॥

अर्थ (गाथा 125 से 126): क्रोधकी प्रथमसग्रहकृष्टिकी अन्तरकृष्टियोंमें अधस्तन अर्थात् प्रथम, द्वितीयादि अधस्तन अनुभयस्थानरूप (जिनका उदय और बन्ध दोनो ही नही हैं) अधस्तनकृष्टियोंका प्रमाण स्तोक है उसी (पूर्वोक्त अधस्तन अनुभयस्थानरूप कृष्टियोके प्रमाणको पल्यके असंख्यातवेंभागका भाग देकर उसमेसे एकभागप्रमाण विशेषरूप अधिक अनुभयकृष्टियोके ऊपरितनवर्ती जो अधस्तन उदयस्थानरूप (जिनका उदय तो पाया जाता है बन्ध नही पाया जाता) कृष्टिका प्रमाण है पश्चात् उसीको पल्यके असंख्यातवेभागका भाग देनेपर उसमेसे एकभागप्रमाण विशेषसे अधिक उपरतन अर्थात् अन्त व उपान्तादि उपरतन अनुभयस्थानरूप (बन्ध व उदयरहित) कृष्टिका प्रमाण है पश्चात् उसीको पल्यके असंख्यातवेंभागका भागदेकर उसमे एकभागप्रमाण विशेषसे अधिक उन कृष्टियोंके नीचे पाये जानेवाले उपरतन उदयस्थानरूप (उदयसहित व बन्धरहित) कृष्टियोंका प्रमाण है इसप्रकार चारपद तो अधिकक्रमसहित हैं तथा उससे असंख्यातगुणे मध्यके उभयस्थानरूप (जिनका बन्ध व उदय दोनों पाये जाते हैं) कृष्टियोंका प्रमाण है’ । क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं पायी जानेवाली कृष्टियोंके प्रमाणको पल्यके असंख्यातवेंभागका भाग देकर उसमें बहुभागमात्र तो मध्यकी उभयकृष्टियोका प्रमाण है तथा अवशेष जो एकभाग रहा उसको [“प्रक्षेपयोगोदुघृतमिश्रपिण्डः” इत्यादि सूत्रविधानसे अंकसंदृष्टिकी अपेक्षा २-३-४ व ७ शालाकाओंको जोड़नेपर (२+३+४+७) १६ लब्ध आया] इससे भाग देकर जो एकभागका प्रमाण आया उसको अपनी-अपनी दो आदि शलाकाओंसे गुणा करनेपर अधस्तन व उपरितन अनुभयादि कृष्टियोंका प्रमाण प्राप्त होता है । इसप्रकार बारहसंग्रहकृष्टियोंके वेदककालके प्रथमसमयमें अल्पबहुत्व जानना ।


'विदियादिसु चउठाणा पुढिवल्लेहिं असंखगुणहीणा ।
तत्तो असंखगुणिदा उवरिमणुभया तदो उभया ॥१२७॥५१८॥

अर्थ: द्वितीयादि समयोंमें चारोंस्थान पूर्वसे असंख्यातगुणे हीन हैं, उससे असंख्यातगुणे ऊपरितन अनुभयस्थान तथा उससे असंख्यातगुणे उभयस्थान हैं ।


पुव्विल्लबंधजेट्ठा हेट्ठासंखेज्जभागमोदरिय ।
संपडिगो चरिमोदयवरमवरं अणुभयाणं च ॥१२८॥५१६॥

अर्थ: पूर्वसमयसम्बन्धी बन्धकी उत्कृष्ट (चरम) कृष्टिसे लेकर पूर्वसमयसम्बन्धी उभयकृष्टियोके असंख्यातवेंभागप्रमाण कृष्टियां नीचे उतरकर वर्तमानमें उत्तरसमयसम्बन्धी केवल उदयरूप अन्तिमकृष्टि उत्कृष्टकृष्टि होती है और इसके अनन्तर ऊपर अनुभयकृष्टिकी जघन्यकृष्टि पाई जाती है। उत्कृष्ट उदयकृष्टिसे नीचे पूर्वसमयसम्बन्धी उदयकृष्टिके असंख्यातवेंभागप्रमाण कृष्टि नीचे उतरकर वर्तमानमें उदयकी जघन्यकृष्टि होती है, उसके अनन्तर नीचे उभयकृष्टिसम्बन्धी उत्कृष्टकृष्टि होती है। ऐसा ही विधान उपरिम कृष्टियोंमे भी जानना।


हेट्ठिमणुभयवरादो असंखबहुभागमेत्तोदरिय ।
संपडिबंधजहण्णं उदयुक्कस्सं च होदित्ति ॥१२९॥५१७॥

अर्थ: पूर्वसमयसंबंधी अनुभयकृष्टिकी उत्कृष्ट (चरम) कृष्टिसे पूर्वसमयसंबंधी अनुभयकृष्टियोके असंख्यातबहुभागप्रमाण कृष्टि नीचे उतरकर संप्रति बन्धकृष्टिकी जघन्यकृष्टि होती है उसके अनन्तर नीचेकी केवल उदयरूप उदयकृष्टियोंकी उत्कृष्टकृष्टि है, उससे लेकर पूर्वसमयसम्बन्धी उदयकृष्टियोंके असंख्यातवेभागमात्र कृष्टि नीचे उतरकर संप्रति उदयकृष्टिकी जघन्यकृष्ट होती है । उसके नीचे पूर्वसमयसम्बन्धी अनुभयकृष्टियोंके असंख्यातवेंभागप्रमाण कृष्टिं नीचे उतरकर वर्तमानमें जघन्यअनुभय-कृष्ट होती है, वही सर्वकृष्टियोंमें जघन्यकृष्ट है । इसप्रकार अधस्तनकृष्टियोंमें विधान जानना । ऐसे प्रतिसमय पूर्वसमयसम्बन्धी अधस्तन अनुभयरूप उदयकृष्ट और उपरितन उदय व अनुदयरूप कृष्टियोंके प्रमाणसे उत्तरसमयसम्बन्धी कृष्टियोंका प्रमाण असंख्यात-गुणा कम है और मध्यवर्ती उभयकृष्टियोंका प्रमाण विशेषाधिक होता है ऐसा जानना ।


'पडिसमयं अहिगदिणा उदये बंधे च होदि उक्कस्सं ।
बंधुदये च जहण्णं अणंतगुणहीणया किट्टी ॥१३०॥५२१॥

अर्थ: प्रतिसमय सर्पकी गतिवत् उदय व बन्धमें तो उत्कृष्टकृष्ट तथा बन्ध व उदयमें जघन्यकृष्ट अनुभागअपेक्षा अनन्तगुणे घटते हुए क्रमसहित जाननी ।


संकमदि संगहाणं दव्वं सगहेट्ठिमस्स पढमोत्ति ।
तदणुदये संखगुणं इदरेसु हवे जहाजोग्गं ॥१३१॥५२२॥

अर्थ: विवक्षित स्वकीयकषायके अधस्तनवर्ती कषायकी प्रथमसंग्रहकृष्टिपर्यंत संग्रहकृष्टियोंका द्रव्य संक्रमण करता है। यहा जिस संग्रहकृष्टिको भोगता है उस संग्रहकृष्टिके अपकर्षित द्रव्यसे संख्यातगुणा द्रव्य उस कृष्टिके अनन्तर भोगने योग्य जो संग्रहकृष्टि है उसमे संक्रमित होता है तथा अन्यकृष्टियोंमें यथायोग्य संक्रमण करता है।


‘पडिसमयमसंखेज्जदिभागं’ णासेदि कंडयेण विणा ।
बारससंगहकिट्ठीणग्गादो किट्टिवेदगो णियमा ॥१३२॥५२३॥

अर्थ: कृष्टिवेदकजीव काण्डकबिना ही बारहसंग्रहकृष्टियोके अग्रभागसे सर्व-कृष्टियोके असंख्यातवेभागप्रमाण कृष्टियोको नियमसे नष्ट करता है ।


णासेदि परट्ठाणिय, गोउच्छं अग्गकिट्टीघादादो ।
सट्ठाणियगोउच्छं, संकमदव्वादु घादेदि ॥१३३॥५२४॥

अर्थ: अग्रकृष्टिघातके द्वारा तो परस्थानगोपुच्छको नष्ट करता है और संक्रमद्रव्यरूप (अन्यसंग्रहरूप) पूर्वोक्त व्ययद्रव्यसे स्वस्थानगोपुच्छको नष्ट करता है ।


आयादो वयमहियं, हीणं सरिसं कहिंवि अण्णं च ।
तम्हा आयद्दव्वा, ण होदि सट्ठाणगोउच्छं ॥१३४॥५२५॥

अर्थ: किसी संग्रहकृष्टिमैं आयद्रव्यसे व्ययद्रव्य अधिक है तो किसीमें हीन है और किसी संग्रहकृष्टिमैं आय-व्ययद्रव्य समान भी है । किसी संग्रहकृष्टिमैं आयद्रव्य तो है, किन्तु व्ययद्रव्य नही है और किसीमें व्ययद्रव्य तो है आयद्रव्य नही है इसलिए आयद्रव्यसे स्वस्थानगोपुच्छका होना मानना ठीक नही है ।


घादयदव्वादो पुण वय आयदखेत्तदव्वगं देदि ।
सेसासंखाभागे अणंतभागूणयं देदि ॥१३५॥५२६॥

अर्थ: घातक द्रव्यसे व्यय और आयतक्षेत्रद्रव्यको देनेसे एक गोपुच्छ होता है तथा शेष असंख्यात भागमें अनन्तभाग ऊण द्रव्य दिया जाता है ।

क्षपणासार (भाग 2/2)

उदयगदसंगहस्स य मज्झिमखंडादिकरणभेदेन ।
दव्वेण होदि णियमा एवं सव्वेसु समयेसु ॥१३६॥५२७॥

अर्थ: उदयको प्राप्त संग्रहकृष्टिका इस घातद्रव्यद्वारा मध्यमखंडादि किये जाते हैं यह विधान सभी समयोंमें होता है ।


हेट्ठाकिट्ठिप्पहुदिसु संकमिदासंखभागमेत्तं तु ।
सेसा संखाभागा अंतरकिट्ठिस्स दव्वं तु ॥१३७॥५२८॥

अर्थ: संक्रमणद्रव्यको असंख्यातका भाग देनेपर उसमेंसे एकभागमात्र द्रव्य तो अधस्तनकृष्टियादिमें देता है अर्थात् इस एकभागप्रमाण द्रव्यसे क्रोधकी प्रथमकृष्टिके अतिरिक्त शेष ११ संग्रहकृष्टियोंके अधस्तन अपूर्वकृष्ट करता है तथा अवशेष असंख्यातबहुभागप्रमाण अन्तरकृष्टिसम्बन्धी द्रव्य है, इससे अन्तरकृष्टियोंके अन्तरमें अपूर्वकृष्टियों को करता है । इस गाथाका विशेष अर्थ जाननेके लिये गाथा १४३का विशेषार्थ देखना चाहिए ।


बंधट्ठव्वाणंतमभागं पुण पुव्वकिट्ठिपडिबद्धं ।
लेसाणंता भागा अंतरकिट्ठिस्स दव्वं तु ॥१३८॥५२९॥

अर्थ: बन्धको प्राप्त द्रव्यमें अनन्तका भाग देनेपर एकभागप्रमाण तो पूर्वकृष्टिसम्बन्धी द्रव्य है अतः इस एकभागप्रमाण द्रव्यका पूर्वोक्त कृष्टियोमे निक्षेपण करता है तथा अवशिष्ट अनन्तबहुभागप्रमाण द्रव्य अन्तरकृष्टिसम्बन्धी है, इससे नवीन अन्तरकृष्टियोको करता है । इस गाथाके सम्बन्धमे विशेषकथन गाथा १४२के विशेषार्थसे जानना चाहिए ।


कोहस्स पढमकिट्टी मोत्तूणएक्कारसंगहाणं तु ।
बंधणसंकमदव्वादपुव्वकिट्ठिं करेदी दु ॥१३९॥५३०॥

अर्थ: क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिके बिना अवशेष ग्यारह संग्रहकृष्टियोंके यथासम्भव बन्ध व संक्रमणरूप द्रव्यसे अपूर्वकृष्टियोंको करता है । क्रोधकी प्रथमसग्रहकृष्टि मे संक्रमणद्रव्यका अभाव होनेसे मात्र बन्धद्रव्यसे ही अपूर्वकृष्ट करता है ।


बंधणदव्वादो पुण चउसट्ठाणेसु पढमकिट्टीसु ।
बंधुप्पण्णकिट्ठीदो संकमकिट्टी असंखगुणा ॥१४०॥५३१॥

संखातीदगुणाणि य पल्लस्सादिमपदाणि गंतूण ।
एक्केक्कबंधकिट्ठी किट्टीणं अंतरे होदि ॥१४१॥५३२॥

अर्थ (गाथा 140 से 141): क्रोधादि चारकषायोंकी प्रथमसंग्रहकृष्टिरूप चारस्थानोंमें बन्धद्रव्यसे अपूर्वकृष्टिको करता है । संक्रमणद्रव्यसे पहले ग्यारहस्थानोंमें कृष्टि रचना कही गई है । बन्धद्रव्यसे होनेवाली अपूर्वकृष्टियोंसे संक्रमणद्रव्यके द्वारा उत्पन्न कृष्टियां पल्यके असंख्यातवेंभागगुणी है । असंख्यातपल्यके प्रथमवर्गमूल जाकर एक-एक अपूर्वकृष्टि बन्धती है यही कृष्टिगत अन्तर है ।


दिज्जदि अणंतभागेणएकमं बंधगे य अंतगुणं ।
तएणंतरे अंतगुणं तत्तोअंतभागूणं ॥१४२॥५३३॥

अर्थ: बध्यमानद्रव्य पहले अनन्तवेंभागहीन क्रमसे दिया जाता है पुनः अनन्तगुणा द्रव्य दिया जाता है उसके अनन्तर अनन्तगुणाहीन दिया जाता है तदनन्तर अनन्तभागहीन द्रव्य क्रमसे दिया जाता है ।


संकमदो किट्टीणं संगहकिट्टी णमंतरं होदि ।
संगह अंतरजादो किट्टी अंतरभवा असंखगुणा ॥१४३॥५३४॥

अर्थ: संक्रमणरूप द्रव्यसे उत्पन्न हुई अपूर्वकृष्टियोंमें से कुछ कृष्टियां तो संग्रहकृष्टियोंके नीचे उत्पन्न होती हैं और कुछ कृष्टियां पूर्वमे जो अवयवकृष्ट थी उनके अन्तरालोंमें होती हैं । यहां संग्रहकृष्टियोंके अन्तरालमें नीचे उत्पन्न हुई कृष्टियोंसे अवयवकृष्टियोंके अन्तरालमें उत्पन्न हुईं कृष्टि असंख्यातगुणी हैं ।


संगहअंतरजाणं अपुव्वकिट्टिं व बंधकिट्टिं वा ।
इदराणमंतरं पुण पल्लपदासंखभागं तु ॥१४४॥५३५॥

अर्थ: सग्रहकृष्टिरन्तरालोंमें जो अपूर्वकृष्टियोंकी रचना की जाती है उसका विधान कृष्टिकरणमे निर्वर्त्यमानकृष्टियोंके विधान जैसा जानना चाहिए। ‘इदराणाम’ अर्थात् कृष्टिअन्तरालोंमें रची जानेवाली अपूर्वकृष्टियोंका विधान बध्यमानप्रदेशाग्रसे निर्वर्त्यमान अपूर्वकृष्टियोके विधान (गाथा १४१-४२) जैसा यहां भी जानना चाहिए, किन्तु यहां अपूर्वकृष्टिगत अन्तर पल्योपमके प्रथमवर्गमूलके असंख्यातवेंभाग है ।


कृष्टियोंके घातका कथन


कोहादिकिट्टिवेदगपढमे तस्स य असंखभागं तु ।
णासेदि हु पडिसमयं तत्तासंखेज्जभागकमं ॥१४५॥५३६॥

कोहस्स य जे पढमे संग्रहकिट्ठिम्हि णट्ठकिट्टीओ ।
बंधुज्झियकिट्ठीणं तस्स असंखेज्जभागो हु ॥१४६॥५३७॥

अर्थ (गाथा 145 से 146): क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका वेदकजीव प्रथमसमयमें सर्वकृष्टियोंका असंख्यातवेंभागमात्र कृष्टियोंको नष्ट करता है तथा द्वितीयसमयमें उसके असंख्यातवेंभागप्रमाण कृष्टियोंका घात करता है । इसी क्रमसे प्रतिसमय असंख्यातवेंभागप्रमाणरूप क्रमसे कृष्टियोंका घात करता है । क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिके सर्ववेदककालमें जो कृष्टियां नष्ट हुई हैं वे क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसम्बन्धी अबध्यमानकृष्टियोंके असंख्यातवेंभागप्रमाण हैं ।


क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी प्रथमस्थितिमें समयाधिक आवलीकाल शेष रहनेकी अवस्थाका कथन


कोहादिकिट्टियादिट्ठिदिम्हि समयाहियावलीसेसे ।
ताहे जहण्णुदीरइ चरिमो पुण वेदगो तस्स ॥१४७॥५३८॥

ताहे संजलणाणं बंधो अंतोमुहुत्तपरिहीणो ।
सत्तोवि य सददिवसा अडमासब्भहियछव्वरिसा ॥१४८॥५३९॥

घादितियाणं बंधो दसवासंतोमुहुत्तपरिहीणा ।
सत्तं संखं वस्सा सेसाणं संखऽसंखवस्साणि ॥१४९॥५४०॥

अर्थ (गाथा 147 से 149): क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी प्रथमस्थितिमें समयअधिक आवली अवशेष रहनेपर जघन्यस्थितिकी उदीरणा करनेवाला होता है । आवलीके ऊपर जो एकसमय है उस समयसम्बन्धी निषेकको अपकर्षितकरके उदयावलिमें निक्षेपण करता है तथा वही क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिवेदकका चरमसमय होता है । वहा (पूर्वोक्त समयाधिक आवलिकाल शेष रह जानेपर) संज्वलनका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम १०० दिन और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम आठमाह अधिक ६ वर्ष है । तीव्रघातिया कर्मोंका स्थिति- बन्ध अन्तर्मुहूर्तकम १० वर्ष है और स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्ष है। शेष (तीन अघातिया) कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातवर्ष और स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्ष है’ ।


से काले कोहस्स य विदियादो संगहादु पढमठिदी ।
कोहस्स विदियसंगहकिट्टिस्स य वेदगो होदि ॥१५०॥५४१॥

कोहस्स पढमसंगहकिट्टिस्सावलिपमाण पढमठिदी ।
दोसमऊणदुश्रावलिमत्तकं च वि चेउदे ताहे ॥१५१॥५४२॥

अर्थ (गाथा 150 से 151): उसके (क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिवेदकके चरमसमयके) अनन्तरसमयमें क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे प्रथमस्थिति करके क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका वेदक होता है । उससमय क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसम्बन्धी आवलिप्रमाण प्रथमस्थितिका द्रव्य और दोसमयकम दोआवलिप्रमाण नवकसमयप्रबद्ध शेष रह जाता है और उसीकालमें क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका द्रव्य १४ गुणा हो जाता है ।


पढमादिसंगहाणं चरिमे फालिं तु विदियपहुदीणं ।
हेट्ठा सव्वं देदि हु मज्झे पुव्वं व इगिभागं ॥१५२॥५४३॥

अर्थ: प्रथमादि संग्रहकृष्टियोंके अन्तिमसमयमें जो संक्रमणद्रव्यरूप फालि है उसका (बहुभाग) द्रव्य तो द्वितीयादि संग्रहकृष्टियोंके नीचे सर्वत्र देता है और एकभाग-रूप द्रव्य पूर्ववत् मध्यमे देता है ।


कोहस्स विदियकट्टी वेदयमाणस्स पढमकट्टिं वा ।
उदओ बंधो णासो अपुव्वकट्टीए करणं च ॥१५३॥५४४॥

अर्थ: क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका वेदन करनेवालेके उदय, बन्ध, घात तथा संक्रमण व अन्य द्रव्यसे अपूर्वकृष्टियोंका करना आदि विधान प्रथमसंग्रहकृष्टिवत् ही जानना ।


कोहस्स विदियसंगहकट्टी वेदंतयस्स संकमणं ।
सट्ठाणे तदियोत्ति य तदणंतरहेट्ठिमस्स पढमं च ॥१५४॥५४५॥

अर्थ: क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिवेदकके स्वस्थान अर्थात् विवक्षित कषायमें ही संक्रमण तो तृतीयसंग्रहकृष्टिमैं होता है और परस्थान अर्थात् अन्यकषायमें जो संक्रमण होता है वह उसके नीचे जो (मान) कषाय है उसकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं होता है ।


पढमो विदिये तदिये हेट्ठिम पढमे च विदियगो तदिये ।
हेट्ठिमपढमे तदियो हेट्ठिमपढमे च संकमदि ॥१५५॥५४६॥

अर्थ: विवक्षित कषायकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका द्रव्य तो अपनी द्वितीय, तृतीय और अधस्तनवर्ती कषायकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं संक्रमण करता है, द्वितीयसंग्रहकृष्टिका (विवक्षितकषायकी) द्रव्य अपनी तृतीय व अधस्तनवर्ती कषायकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं संक्रमण करता है तथा (विवक्षितकषायकी) तृतीयसंग्रहकृष्टिका द्रव्य अधस्तनवर्ती कषायकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं ही सक्रमण करता है। [नोट–इस गाथाका सम्बन्ध गाथा १३१ से है]


कोहस्स पढमकिट्टी सुण्णोत्ति ण तस्स अत्थि संकमणं ।
लोभंतिमकिट्टिस्स य णत्थि पडित्थावणाभादो ॥१५६॥५४७॥

अर्थ: क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टि तो शून्य हो गई (नास्तिरूप हो गई) अतः उसका संक्रमण नही होता तथा लोभकी तृतीयसंग्रहकृष्टिका भी संक्रमण नही है, क्योंकि अतिस्थापनाका अभाव है ।


जस्स कसायस्स जं किट्टिं वेदयदि तस्स तं चेव ।
सेसाण कसायाणं पढमं किट्टिं तु बंधदि हु ॥१५७॥५४८॥

अर्थ: जिसकषायकी जिस संग्रहकृष्टिका वेदन करता है उस कषायकी उसी संग्रहकृष्टिका बन्ध करता है तथा अन्यकषायोंकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका बन्ध करता है ।


माणतिय कोहतदिये मायालोहस्स तिय तिये सहिया ।
संखगुणं वेदिज्जे अंतरकिट्टी पदेसो य ॥१५८॥५४९॥

अर्थ: यहां संग्रहकृष्टियोंमें अवयवकृष्टियोंके द्रव्यका अल्पबहुत्व कहते हैं-मानकी तीन, क्रोधकी एक तृतीयकृष्ट तथा माया व लोभकी तीन-तीन, इन संग्रहकृष्टियोंमें तो विशेष अधिक और वेद्यमान क्रोधकी द्वितीयकृष्टिमें कृष्टियोंका और प्रदेशोंका संख्यातगुणाप्रमाण क्रमसे है ।


वेदिज्जादिट्ठिदिए समयाहिय आवलीयपरिसेसे ।
ताहे जहण्णुदीरणचरिमो पुण वेदगो तस्स ॥१५९॥५५०॥

अर्थ: वेद्यमान कृष्टिकी प्रथमस्थितिमें समयाधिक आवलिकाल शेष रहनेपर जघन्य उदीरणा होती है और विवक्षित कृष्टिके वेदककालका चरमसमय होता है ।


ताहे संजलणाणं बंधो अंतोमुहुत्तपरिहीणो ।
सत्तोवि य दिणसीदी चउमासब्भहियपणवस्सा ॥१६०॥५५१॥

घादितियाणं बंधो वासपुधत्तं तु सेसपयडीणं ।
वस्साणं संखेज्जसहस्साणि हवंति णियमेण ॥१६१॥५५२॥

घादितियाणं सत्तं संखसहस्साणि होंति वस्साणं ।
तिण्हं वि अघादीणं वस्साणि असंखमेत्ताणि ॥१६२॥५५३॥

अर्थ (गाथा 160 से 162): वहां (क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिवेदकके चरमसमयमें) संज्वलनचतुष्कका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम ८० दिन मात्र है और उनका स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम चारमासअधिक पांचवर्षप्रमाण है । तीनघातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध पृथक्त्ववर्षप्रमाण तथा शेष रहे अघातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध नियमसे संख्यातहजारवर्षप्रमाण है । तीन घातियाकर्मोंका स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्षप्रमाण है तथा (आयुबिना) तीन अघातियाकर्मोंका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षमात्र है ।


से काले कोहस्स य तदियादो सग्गहादु पढमठिदि ।
अंते संजलणाणं बंधं सत्तं दुमास चउवस्सा ॥१६३॥५५४॥

अर्थ: पूर्वोक्त क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टि वेदनके चरमसमयसे अनन्तर समयमें 'क्रोधकी तृतीयसंग्रहकूष्टिके प्रदेशाग्रसे प्रथमस्थिति होती है उसके अन्तिमसमयमें संज्वलनचतुष्कका बन्ध दोमाह और स्थितिसत्त्व ४ वर्ष होता है ।


से काले माणस्स य पढमादो संगहादु पढमठिदी ।
माणोदयअद्धाए तिभागमेत्ता हु पढमठिदी ॥१६४॥५५५॥

अर्थ: क्रोधवेदककालके अनन्तरसमयमें मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे मानकी प्रथमस्थितिको करता है जिसका काल मानोदयकालके तृतीयभागमात्र है ।


२कोहपढमं व माणो चरिमे अंतोमुहुत्तपरिहीणो ।
दिणमासपण्णचत्तं बंधं सत्तं तिसंजलणाणं ॥१६५॥५५६॥

अर्थ: क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिको जिस विधीसे वेदता है उसी विधिसे मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिका वेदन करता है । मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिवेदकके चरमसमयमें संज्वलनत्रयका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम ५० दिन और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम ४० माह होता है ।


२विदियस्स माणचरिमे चत्तं बत्तीसदिवसमासाणि ।
अंतोमुहुत्तहीणा बंधो सत्तो तिसंजलणाणं ॥१६६॥५५७॥

अर्थ: इसके अनन्तर मानकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका वेदक होता है और उसके चरमसमयमें तीन संज्वलनकषायोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम ४० दिन और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम बत्तीसमासप्रमाण है ।


२तदियस्स माणचरिमे तीसं चउवीस दिवसमासाणि ।
तिण्हं संजलणाणं ठिदिबंधो तह य सत्तो य ॥१६७॥५५८॥

अर्थ: उसके पश्चात् मानकी तृतीयसंग्रहकृष्टिका वेदक होता है, उसके चरमसमयमें तीन संज्वलनकषायोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम ३० दिन ओर स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम २४ माहप्रमाण होता है ।


पढमगमायाचरिमे पणवीसं वीसदिवसमासाणि ।
अंतोमुहुत्तहीणा बंधो सत्तो दु संजलणाणं ॥१६८॥५५६॥

अर्थ: उसके अनन्तर मायाकषायकी प्रथमसग्रहकृष्टिका वेदक होता है, इसका वेदककाल मायाके सम्पूर्ण वेदककालका त्रिभागमात्र है । इसके चरमसमयमें संज्वलन-माया व लोभका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम २५ दिव और स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तकम २० साहप्रमाण होता है ।


विदियगमायाचरिमे वीसं सोलं च दिवसमासाणि ।
अंतोमुहुत्तहीणा बंधो सत्तो दु संजलणाणं ॥१६९॥५६०॥

अर्थ: उसके पश्चात् मायाकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका वेदक होता है उसके चरमसमयमें दो संज्वलनकषायोंका स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तकम २० दिन और स्थितिसत्त्व अंतर्मुहूर्तकम १६ माहप्रमाण होता है ।


२तदियगमायाचरिमे पण्णरवासय दिवसमासाणि ।
दोण्हं संजलणाणं ठिदिबंधो तह य सत्तो य ॥१७०॥५६१॥

मासपुधत्तं वासा संखासहस्साणि बंध सत्तो य ।
घादितियाणिदराणं संखमसंखेज्जवस्साणि ॥१७१॥जुम्मं॥५६२॥

अर्थ (गाथा 170 से 171): उसके अनन्तर मायाकी तृतीयसंग्रहकृष्टिका वेदक होता है, इसके अन्तिमसमयमे दो संज्वलनकषायोंका स्थितिबन्ध १५ दिन और स्थितिसत्त्व १२ मास प्रमाण होता है और वही तीन घातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध पृथक्त्वमासप्रमाण है एवं स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्षमात्र है। तथैव तीन अघातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध संख्यातवर्षप्रमाण व स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षप्रमाण है।


लोहस्स पढमचरिमे, लोहस्संतोमुहुत्त बंधदुगे ।
दिवस पुधत्तं वासा, संखसहस्साणि घादितिये ॥१७२॥५६३॥

सेसाणं पयडीणं, वासपुधत्तं तु होदि ठिदिबंधो ।
ठिदिसत्तमसंखेज्जा, वस्साणि हवंति णियमेण ॥१७३॥जुम्मं॥५६४॥

अर्थ (गाथा 172 से 173): लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिके चरमसमयमें लोभका स्थितिबन्ध व स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है और तीन घातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध पृथक्त्वदिवस तथा स्थितिसत्त्व संख्यातहजारवर्षप्रमाणं है । शेष तीन अघातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध वर्षपृथक्त्व और स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्ष होता है ऐसा नियमसे जानना ।


से काले लोहस्स य विदियादो संगहादु पढमठिदी ।
ताहे सुहुमं किट्टिं करेदि तव्विदियतदियादो ॥१७४॥५६५॥

अर्थ: अनन्तरवर्तीकालमें लोभकी द्वितीयकृष्टिमैं से प्रथमस्थितिको करता है और उसी कालमें द्वितीय व तृतीय कृष्टिसे सूक्ष्मकृष्टि करता है ।


लोहस्स तदियसंगहकिट्टीए हेट्ठदो अवट्ठाणं ।
सुहुमाणं किट्टीणं कोहस्स य पढमकिट्टीणं ॥१७५॥५६६॥

अर्थ: उन सूक्ष्मकृष्टियोंका अवस्थान लोभकी तृतीयसंग्रहकृष्टिके नीचे है तथा वे सूक्ष्मकृष्टियां क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिके समान होती हैं ।


२कोहस्स पढमकिट्टी कोहे लुद्धे दु माणपढमं च ।
माणे लुद्धे मायापढमं मायाए संलुद्धे ॥१७६॥५६७॥

लोहस्स पढमकिट्टी आदिमसमयकदसुहुमकिट्टी य ।
अहियकमा पंचपदा सगसंखेज्जदिमभागेण ॥१७७॥जुम्मं॥५६८॥

अर्थ (गाथा 176 से 177): क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी अन्तरकृष्टियां सबसे कम हैं (क्योंकि उनके आयामका प्रमाण १/३ है ।) क्रोधके संक्रमित होनेपर अर्थात् क्रोधकी तृतीयसंग्रहकृष्टिको मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिम प्रक्षिप्त करनेपर मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी अन्तर- कृष्टियां विशेषअधिक हैं (क्योंकि उनका प्रमाण १६/२४ है ।) मानके संक्रमित होनेपर मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टिकी अन्तरकृष्टियां विशेषअधिक हैं (क्योंकि उनका प्रमाण १९/२४ है ।) मायाके संक्रमित होनेपर लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसम्बन्धी अन्तरकृष्टियां विशेषअधिक हैं (क्योंकि उनका प्रमाण २२/२४ है ।) प्रथमसमयमें की गईं सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टियां विशेषअधिक हैं (क्योंकि उनका प्रमाण २५/२४ है ।) इसप्रकार चारकषाय और पांचवी सूक्ष्मसाम्परायिककृष्ट अपनेसे अनन्तरपूर्वसे सख्यातवेंभागअधिक क्रमवाले हैं ।


सुहुमाओ किट्टीओ पडिसमयमसंखगुणविहीणाओ ।
दव्वमसंखेज्जगुणं विदियस्स य लोहचरिमोत्ति ॥१७८॥५६६॥

अर्थ: सूक्ष्मकृष्टियां प्रतिसमय असंख्यातगुणे हीनक्रमसे की जाती हैं तथा द्वितीयसमयसे लोभकषायके चरमसमयतक द्रव्य असंख्यातगुणे क्रमसे दिया जाता है ।


दव्वं पढमे समये देदि हु सुहुमेसणंतभागूणं ।
थूलपढमे असंखगुणं तत्तो अणंतभागूणं ॥१७९॥५७०॥

अर्थ: सूक्ष्मकृष्टिकरणकालके प्रथमसमयमें सूक्ष्मकृष्टिकी जघन्यकृष्टिसे उत्कृष्ट सूक्ष्मकृष्टिपर्यन्त अनन्तभाग-अनन्तभाग घटते हुए क्रमसहित द्रव्य दिया जाता है तदनन्तर जघन्यबादरकृष्टिमं असंख्यातगुणा घटता द्रव्य दिया जाता है उसके पश्चात् अनन्तगुणे घटते क्रमसे द्रव्य दिया जाता है ।


विदियादिसु समयेसु अपुव्वाओ पुव्वकट्ठि हेट्ठाओ ।
पुव्वाणमंतरेसुवि अंतरजणिदा असंखगुणा ॥१८०॥५७१॥

अर्थ: द्वितीयादि समयोंमें नवीन अपूर्वसूक्ष्मकृष्टिको पूर्वसमयमें की गई सूक्ष्मकृष्टिके नीचे और उनके बीच-बीचमें करता है । इनमें अधस्तनकृष्टियोंका प्रमाण स्तोक है और उनसे असंख्यातगुणा अन्तरकृष्टियोंका प्रमाण है ।


दव्वगपढमे सेसे देदि अपुव्वेसणंतभागूणं ।
पुव्वांपुव्वंपवेसे असंखभागूणमहियं च ॥१८१॥५७२॥

अर्थ: द्वितीयादि समयोंमें प्रथमसमयवत् द्रव्य देता है, किन्तु इतनी विशेषता है सूक्ष्मकृष्टिसम्बन्धी द्रव्यको अधस्तन अपूर्वकृष्टियोंमें अनन्तवेंभागरूप हीनक्रमसे तथा पूर्व-अपूर्वकृष्टियोंके प्रवेशमें क्रमशः असंख्यातवेंभागहीन व असंख्यातवेंभागप्रमाण अधिक अर्थात् पूर्वकृष्टियोंके प्रवेशमें असंख्यातवेभागहीनरूपसे द्रव्य दिया जाता तथा अपूर्वकृष्टियोंके प्रवेशमें असंख्यातवेंभागप्रमाण अधिकद्रव्य दिया जाता है ।


२पढमादिसु दिस्सक्रमं सुहुमेसु अणंतभागहीणकमं ।
बादरकिट्ठिपदेसो असंखगुणिदं तदो हीणं ॥१८२॥५७३॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टिकारकके प्रथमसमयमे दृश्यमानक्रम सूक्ष्मकृष्टियोंमें अनन्तवेभागहीनरूपसे घटता हुआ द्रव्य है, उसके अनन्तर बादरकृष्टिमैं असंख्यातगुणा तथा उसके पश्चात् अनन्तवेंभागहीन द्रव्य है ।


४लोहस्सतदियादो सुहुमगदं विदियदो दु तदियगदं ।
विदियदो सुहुमगदं दव्वं संखेज्जगुणिदकमं ॥१८३॥५७४॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टिकारक लोभकी द्वितीय व तृतीयसंग्रहकृष्टियोंमें से असंख्यातवेंभाग प्रदेशाग्रका अपकर्षण करके संक्रमणके द्वारा सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टिरूप संक्रमित करता है । इसप्रकार संक्रमण करनेवाला तृतीयबादरसाम्परायिककृष्टिसे अपकर्षणकरके जो प्रदेशाग्र सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टिरूप संक्रमण करता है वे प्रदेशाग्र थोड़े हैं, उससे संख्यातगुणे प्रदेशाग्र लोभकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे तृतीयसंग्रहकृष्टिमँ संक्रमण करता है, क्योंकि लोभकी तृतीयसंग्रहकृष्टिके प्रदेशाग्रसे द्वितीयसंग्रहकृष्टिके प्रदेशाग्र संख्यातगुणे हैं । लोभकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे जो प्रदेशाग्र तृतीयसंग्रहकृष्टिरूप संक्रमित किये जाते हैं उनसे संख्यातगुणे प्रदेशाग्र द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे सूक्ष्मसाम्परायिकरूप संक्रामित होते हैं, क्योंकि लोभके तृतीयसंग्रहकृष्टियामसे सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टिका आयाम संख्यातगुणा है और आयामके अनुसार ही प्रदेशाग्रोंकी संख्याका प्रमाण जानना चाहिए । प्रतिग्राह्यके अल्पबहुत्वके अनुसार ‘पडिगेज्झमाणं’ अर्थात् प्रतिग्राह्य संक्रमणद्रव्यका अल्पबहुत्व कहना चाहिए ।


किट्टीवेदगपढमे कोहस्स य विदियदो दु तदियादो ।
माणस्स य पढमगदो माणतियादो दु मायपढमगदो ॥१८४॥५७५॥

मायतियादो लोभस्सादिमंगदो लोभपढमदो विदियं ।
तदियं च गदा दव्वा दसपदमच्छियकमा होंति ॥१८५॥५७६॥

कोहस्स य पढमादो माणादी कोहतदियविदियगदं ।
तत्तो संखेज्जगुणं अहियं संखेज्जसंगुणियं ॥१८६॥त्तियलं॥५७७॥

अर्थ (गाथा 184 से 186): कृष्टिवेदकके प्रथमसमयमे क्रोधकी द्वितीयकृष्टिसे जो प्रदेशाग्र मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे सक्रमण होता है वह स्तोक है । क्रोधका तृतीयसग्रहकृष्टिसे जो प्रदेशाग्र मानकी प्रथमसग्रहकृष्टिमँ सक्रमित होता है वह विशेषाधिक है, मानकी प्रथमसंग्रह कृष्टिसे मायाकी प्रथमसग्रहकृष्टिमे विशेषाधिक प्रदेशाग्रका सक्रमण होता है, मानकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं विशेषअधिक प्रदेशाग्रका संक्रमण होता है, तथा मानकी तृतीयसंग्रहकृष्टिसे मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं विशेष अधिक प्रदेशाग्र संक्रमित होते हैं । मायाकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमैं विशेष अधिक प्रदेशाग्र संक्रमित होते हैं, मायाकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे लोभकी प्रथमसग्रहकृष्टिमैं विशेषअधिक प्रदेशाग्र संक्रर्मित होते हैं, मायाको तृतीयसंग्रहकृष्टिसे लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमै विशेषअधिक प्रदेशाग्र संक्रमित होते हैं । लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे लोभकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिमे विशेषअधिक प्रदेशाग्रका सक्रमण होता है, लोभकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे लोभकी तृतीयसंग्रहकृष्टि मे विशेषअधिक प्रदेशाग्रका संक्रमण होता है । अधिकक्रमसे द्रव्यका संक्रमण करनेवालेके ये दशस्थान हैं । क्रोधकी प्रथमसंग्रहकृष्टिसे मानकी प्रथमसंग्रहकृष्टिमै (पूर्वोक्त सक्रमणसे) संख्यातगुणित प्रदेशाग्रका सक्रमण होता है । क्रोधको ही प्रथमसंग्रहकृष्टिसे क्रोधकी ही तृतीयसंग्रहकृष्टिमै विशेषअधिक प्रदेशाग्रका संक्रमण होता है । क्रोधकी प्रथमसग्रहकृष्टिसे क्रोधकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिमे संख्यातगुणे प्रदेशाग्रका सक्रमण होता है ।


लोहस्स विदियकिट्ठिं वेदयमाणस्स जाव पढमठिदी ।
आवलितियमवसेसं आगच्छदि विदियदो तदियं ॥१८७॥५७८॥

अर्थ: इस प्रकार लोभकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिको वेदते हुए जीवके द्वितीयसंग्रहकृष्टिकी प्रथमस्थितिमे तीनआवलीप्रमाणकाल शेष रहने तक द्वितीयसंग्रहकृष्टिसे तृतीयसंग्रहकृष्टिमे द्रव्य संक्रमणरूप होकर प्राप्त होता है ।


तत्तो सुहमं गच्छदि समयाहियआवलीयसेसाए ।
सव्वं तदियं सुहुमे जाव उच्छिट्ठं विहाय विदियं च ॥१८८॥५७९॥

अर्थ: बादरलोभकी प्रथमस्थितिमे एकसमयाधिक आवलिकाल शेष रहनेपर लोभकी तृतीयसंग्रहकृष्टिका सर्वद्रव्य सूक्ष्मकृष्टिरूप संक्रमण कर जाता है । नवकसमयप्रबद्ध व उच्छिष्टावलिके द्रव्यको छोड़कर लोभकी द्वितीयसंग्रहकृष्टिका शेषद्रव्य भी सूक्ष्मकृष्टिरूप संक्रमण कर जाता है ।


२लोहस्स तिघादीणं, ताहे अघादीतियाण ठिदिबंधो ।
अंतो दु मुहुत्तस्स य दिवसस्स य होदि वरिसस्स ॥१८९॥५८०॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणके चरमसमयमें संज्वलनलोभका जघन्यस्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्तप्रमाण, तीनघातियाकर्मोंका कुछकम एकदिन तथा तीन अघातियाकर्मोंका कुछकम १ वर्षप्रमाण स्थितिबन्ध होता है ।


४ताणं पुण ठिदिसंतं कमेण अतोमुहुत्तयं होदि ।
वस्साणं संखेज्जसहस्साणि असंखवस्साणि ॥१९०॥५८१॥

अर्थ: अनिवृत्तिकरणगुणस्थानके चरमसमयमें स्थितिसत्त्व क्रमसे लोभका अन्तर्मुहूर्त, तीन घातियाकर्मोंका यथायोग्य संख्यातहजारवर्ष और तीन अघातियाकर्मोंका यथायोग्य असंख्यातवर्षप्रमाण है’ ।


सूक्ष्मसाम्परायका कथन


२से काले सुहुमगुणं पडिवज्जदि सुहुमकिट्टिठिदिखंडं ।
आणायदि तद्दव्वं उक्कड्ढिय कुणदि गुणसेढि ॥१९१॥५८२॥

अर्थ: बादरकृष्टिवेद्यमानकाल समाप्त होनेके अनन्तरसमयमें सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानको प्राप्त होता है वहांपर सूक्ष्मकृष्टियोंका स्थितिकाण्डकघात करता है और लोभके सूक्ष्मकृष्टिद्रव्यका अपकर्षणकरके गुणश्रेणिरूपसे निक्षेप करता है ।


गुणसेढि अंतरट्ठिदि विदियट्ठिदि इदि हवंति पव्वतिया ।
सुहुमगुणादो अहिया अवट्ठिदुदयादि गुणसेढी ॥१९२॥५८३॥

अर्थ: गुणश्रेणि, अन्तरस्थिति और द्वितीयस्थिति ये तीन पर्व होते हैं । सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके कालसे उदयादि अवस्थित गुणश्रेणिका आयाम अधिक है ।


ओकट्टिदइग्गिभागं गुणसेढीए असंखबहुभागं ।
अंतरहिदं विदियठिदी संखसलागा हि अवरहिया ॥१९३॥५८४॥

गुणिद्य चउरादिखंडे अंतरसयलट्ठिदिम्हि णिक्खिवदि ।
सेसबहुभागमावलिहीणे बितियट्ठिदीएसु ॥१९४॥५८५॥

अर्थ (गाथा 193 से 194): अपकर्षितद्रव्यका असंख्यातवां एकभाग गुणश्रेणि आयाममें दिया जाता है और शेष असंख्यातबहुभाग अन्तरस्थिति व द्वितीयस्थितिमें दिया जाता है । अन्तरस्थितिसे द्वितीयस्थितिको भाग देनेसे जो संख्यातशलाकारूप लब्ध प्राप्त हो उसका भाग असंख्यातबहुभाग द्रव्यमे देनेसे जो प्राप्त हो उसका चतुरादि खण्डमें गुणा करनेपर जो द्रव्य प्राप्त हो वह द्रव्य समस्त अन्तरस्थितियोमे निक्षिप्त किया जाता है और शेष बहुभाग अतिस्थापनावलीहीन द्वितीय स्थितियोमे दिया जाता है । (नोट-यहां जो ‘चतुरादि’ संख्या दी गई है वह अङ्कसन्दृष्टिकी अपेक्षासे है ।)


अंतरपढमठिदित्ति य असंखगुणिदक्कमेण दिज्जदि हु ।
हीणकमं संखेज्जगुणं हीणक्कमं तत्तो ॥१९५॥५८६॥

अर्थ: अन्तरायामकी प्रथमस्थिति पर्यन्त तो असंख्यातगुणे क्रमसे द्रव्य दिया जाता है और उसके ऊपर हीनक्रमसे (गोपुच्छ विशेषहीन) द्रव्य दिया जाता है । उसके पश्चात् संख्यातगुणाहीन द्रव्य दिया जाता है ।


अंतरपढमठिदित्ति य असंखगुणिदक्कमेण दिस्सदि हु ।
हीणकमेण असंखेज्जेण गुणं तो विहीणकमं ॥१९६॥५८७॥

अर्थ: अन्तरकी प्रथमस्थिति पर्यन्त प्रदेशाग्र असंख्यातगुणे क्रमसे दिखाई देते हैं, इससे आगे चरमअन्तरस्थितितक विशेषहीन क्रमसे प्रदेशाग्र दिखाई देते हैं, तदनन्तर असंख्यातगुणे और तत्पश्चात् विशेषहीन क्रमसे प्रदेशाग्र दिखाई देते हैं ।


कंडयगुणचरिमठिदी सविसेसा चरिमफालिया तस्स ।
संखेज्जभागमंतरठिदीहि सव्वे तु बहुभागं ॥१९७॥५८८॥

अर्थ: चरमस्थितिको काण्डक आयामसे गुणाकरके उसमें विशेष (चय) द्रव्य मिलानेसे चरमफालिका द्रव्य होता है उसका संख्यातवां भाग अन्तरस्थितियोंमें देता है और बहुभाग सर्वस्थितियोंमें देता है ।


अंतरपढमठिदित्ति य असंखगुणिदक्कमेण दिज्जदि हु ।
हीणं तु मोहविदियट्ठिदिखंडयदो दुघादोत्ति ॥१९८॥५८६॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानमें मोहनीयकर्मसम्बन्धी द्वितीयस्थितिकाण्डकघातसे लेकर द्विचरमकाण्डकघातपर्यन्त अन्तरायामकी प्रथमस्थितिपर्यन्त असंख्यातगुणे क्रमसे द्रव्य दिया जाता है तथा उसके ऊपर एक-एक चयरूप हीनद्रव्य दिया जाता है ।


अंतरपढमठिदित्ति य असंखगुणिदक्कमेण दिस्सदि हु ।
हीणं तु मोहविदियट्ठिदिखंडयदो दुघादोत्ति ॥१९९॥५९०॥

अर्थ: मोहनीयकर्मका प्रथमस्थितिकाण्डक निर्लेपित होनेपर द्वितीयस्थितिकाण्डकघातसे द्विचरमकाण्डकघातपर्यन्त दृश्यमान द्रव्य गुणश्रेणिके प्रथमनिषेकमें स्तोक है, उससे गुणश्रेणिशीर्षके ऊपरवर्ती अन्तरायामकी प्रथमस्थिति पर्यन्त असंख्यातगुणे क्रमसहित है और उसके ऊपर चरमसमयपर्यन्त विशेष घटते हुए क्रमसे दृश्यमान द्रव्य है, क्योंकि प्रथमकाण्डककी चरमफालिका पतनसमयसे गुणश्रेणीसे ऊपर सर्वस्थितिका एक गोपुच्छ होता है ।


पढमगुणसेढिसीसं पुव्विल्लादो असंखसंगुणिदं ।
उवरिमसमये दिस्सं विसेसअहियं हवे सीसे ॥२००॥५९१॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानसम्बन्धी प्रथमस्थितिकाण्डकके निर्लेपित होनेके पश्चात् अर्थात् द्वितीयस्थितिकाण्डकके प्रथमसमयमें गुणश्रेणिशीर्ष पूर्वसमयके गुणश्रेणीशीर्षसे असंख्यातगुणा दिखाई देता है, किन्तु आगे द्वितीयादि समयोंमें गुणश्रेणिशीर्ष पूर्व समयवर्ती गुणश्रेणिशीर्षसे अधिक दिखाई देता है ।


सुहुमद्धादो अहिया गुणसेढी अंतरं तु तत्तो दु ।
पढमे खंडं पढमे संतो मोहस्स संखगुणिदकमा ॥२०१॥५६२॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कालसे उसीके असंख्यातवेंभागसे अधिक सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके प्रथमसमयमे मोहनीयकर्मका गुणश्रेणीआयाम है, उससे अन्तरायाम संख्यातगुणा, उससे सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके मोहनीयकर्मका प्रथमस्थितिकाण्डकायाम संख्यातगुणा तथा उससे सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानके प्रथमसमयमें मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व संख्यातगुणा है। सर्वत्र गुणाकार तत्प्रायोग्य संख्यातगुणा है।


एदेणप्पाबहुगविधाणेण विदीयखंडयादीसु ।
गुणसेडिमुज्झियेया गोपुच्छा होदि सुहुमम्हि ॥२०२॥५६३॥

अर्थ: इस अल्पबहुत्व विधानके द्वारा साम्परायगुणस्थानमें द्वितीयस्थितिकाण्डकोंके कालमें गुणश्रेणिको छोड़कर उसके ऊपरवर्ती सर्वस्थितिका एक गोपुच्छ होता है ।


सुहुमाणं किट्टीणं हेट्ठा अणुदिण्णगा हु थोवाओ ।
उवरिं तु विसेसहिया मज्झे उदया असंखगुणा ॥२०३॥५६४॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायिककृष्टियोंके अधस्तनभागमें अनुदीर्णकृष्टियां स्तोक है, उपरिमभागमें अनुदीर्ण सूक्ष्मकृष्टिया विशेषअधिक हैं । मध्यमे उदीर्ण सूक्ष्मकृष्टियां असंख्यातगुणी हैं ।


सुहुमे संखसहस्से खंडे तीदे वसाणखंडेण ।
आगायदि गुणसेढी आगादो संखभागे च ॥२०४॥५६५॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायमें संख्यातहजार स्थितिकाण्डक व्यतीत होनेपर अन्तिमस्थितिकाण्डकसे पूर्वगुणश्रेणि आयामके संख्यातवेंभागमात्र आयाममें गुणश्रेणि करता है ।


एत्तो सुहुमंतोत्ति य, दिज्जस्स य दिस्समाणगस्स कमो ।
सम्मत्तचरिमखंडे, तक्कदिकज्जेवि उत्तं च ॥२०५॥५६६॥

अर्थ: इसप्रकार यहांसे लेकर सूक्ष्मसाम्परायिकगुणस्थानके चरमसमयपर्यन्त देयद्रव्य और दृश्यमानद्रव्यका क्रम जानना । जैसे क्षायिकसम्यक्त्वविधानमें सम्यक्त्वमोहनीयके चरमस्थितिकाण्डकमे अथवा उसकी कृत्यकृत्यावस्था में (कृतकृत्यवेदक सम्यक्त्वकी अवस्था मे) कहा था वैसे ही जानना ।


उक्किरणे अवसाणे खंडे मोहस्स णत्थि ठिदिघादो ।
ठिदिसत्तं मोहस्स य सुहुमद्धासेसपरिमाणं ॥२०६॥५६७॥

अर्थ: इसप्रकार मोहराजाके मस्तकसदृश लोभके चरमकाण्डकका घात करते हुए अब मोहनीयकर्मका स्थितिघात नही होता है । सूक्ष्मसाम्परायका जितनाकाल अवशेष रहा है उतना ही मोहनीयकर्मका स्थितिसत्त्व शेष रहा, जो कि प्रतिसमय अपवर्तमान सूक्ष्मकृष्टिरूप अनुभागको प्राप्त होता है उसके एक-एक निषेकको एक-एक समयमे भोगते हुए सूक्ष्मसाम्परायके चरमसमयको प्राप्त होता है ।


णामदुगे वेदणीये अडवारमुहुत्तयं तिघादीणं ।
अंतोमुहुत्तमेत्तं ठिदिबंधो चरिम सुहमम्हि ॥२०७॥५९८॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायके चरमसमयमें नाम व गोत्रकर्मका आठ मुहूर्तप्रमाण, वेदनीयकर्मका बारह मुहूर्तप्रमाण तथा तीनघातियाकर्मोंका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितिबन्ध होता है ।


तिण्हं घादीणं ठिदिसंतो अंतोमुहुत्तमेत्तं तु ।
तिण्हमघादीणं ठिदिसंतमसंखेज्जवस्साणि ॥२०८॥५९९॥

अर्थ: सूक्ष्मसाम्परायके चरमसमयमें तीनघातिया (ज्ञानावरण, दर्शनावरण व अन्तराय) कर्मोंका स्थितिसत्त्व अन्तर्मुहूर्तप्रमाण तथा तीन अघातिया (वेदनीय, नाम व गोत्र) कर्मोंका स्थितिसत्त्व असंख्यातवर्षप्रमाण है ।


से काले सो खीणकसायो ठिदिरसबंधपरिहीणो ।
सम्मत्तट्ठवस्सं वा गुणसेढी दिज्जइ सेसं च ॥२०९॥६००॥

अर्थ: जो अनन्तर अगले समयमें क्षीणकषाय हो जाता है उसके स्थितिबन्ध व अनुभागबन्ध नहीं होता है । दर्शनमोहकी क्षपणामे जब सम्यक्त्वप्रकृतिकी आठवर्ष- प्रमाण स्थिति रह जाती है तब जिसप्रकार गुणश्रेणीनिर्जरा, देयद्रव्य व दृश्यमानद्रव्य कथन है उसीप्रकार यहां भी जानना ।


घादीणं मुहुत्तंतं अघादियाणं असंखगा भागा ।
ठिदिखंडं रसखंडो अणंतभागा असत्थाणं ॥२१०॥६०१॥

अर्थ: क्षीणकषायगुणस्थानमे तीनघातियाकर्मोंका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण और तीनअघातिया कर्मोंका पूर्वसत्त्व असंख्यातबहुभागमात्र स्थितिकाण्डकायाम है तथा अप्रशस्तप्रकृतियोके पूर्व अनुभागको अनन्तका भाग देनेपर उसमें से बहुभागप्रमाण अनुभागकाण्डकायाम है ।


बहुठिदिखंडे तीदे संखा भागा गदा तदद्धाए ।
चरिमं खंडं गिरहदि लोभं वा तत्थ दिज्जादि ॥२११॥६०२॥

अर्थ: पूर्वोक्तक्रमसे बहुत (संख्यातहजार) स्थितिकाण्डक व्यतीत हो जानेपर क्षीणकषायकालके संख्यातबहुभाग चले जानेके पश्चात् जब एकभाग अवशेष रहा तब तीन घातियाकर्मोंके चरमकाण्डकको ग्रहण करता है । वहां देयआदि द्रव्यका विधान सूक्ष्मलोभके समान जानना ।


चरिमे खंडे पडिदे कदकरणिज्जोत्ति भण्णदे एसो ।
तस्स दुचरिमे णिद्दा पयला सत्तूदयवोच्छिण्णा ॥२१२॥६०३॥

अर्थ: अन्तिमकाण्डकके पतित होनेपर कृतकृत्य छद्मस्थ कहलाता है । क्षीणकषायके द्विचरमसमयमें निद्रा और प्रचला सत्त्व-उदयसे व्युच्छिन्न हो जाते हैं ।


कोहस्स य पढमठिदीजुत्ता कोहादिएक्कदोतीहिं ।
खवणद्धाएहिं कमसो माणतियाणं तु पढमठिदी ॥२१३॥६०४॥

माणतियाणुदयमहो कोहादि तिदुतियं खवियपणिधम्हि ।
हयकरणकिट्ठिकरणं किच्चा लोहं विणासेदि ॥२१४॥६०५॥

अर्थ (गाथा 213 से 214): क्रोधकी प्रथमस्थितिसहित क्रोधादि एक-दो-तीन कषायोंका क्षपणाकाल क्रमसे मानादि तीनकषायोंकी प्रथमस्थिति होती है । मानादि तीनकषायोंसहित श्रेणी चढनेवाला जीव क्रमसे क्रोधादि एक-दो-तीन कषायोंके क्षपणाकालके निकट अश्वकर्ण-सहित कृष्टिकरणको करके लोभको नष्ट करता है ।


पुरिसोदएण चडिदस्सित्थी खवणट्ठउत्ति पढमठिदी ।
इत्थिस्स सत्तकम्मं अवगदवेदो समं विणासेदि ॥२१५॥६०६॥

अर्थ: पुरुषवेदोदयसे श्रेणीपर चढ़ा हुआ जिस कालतक स्त्रीवेदका क्षय करता है वहां तक स्त्रीवेदके उदयसे श्रेणीपर चढ़े हुए जीवके स्त्रीवेदकी प्रथमस्थिति है । अपगतवेदी होनेपर सातकर्मों (सात नोकषाय) का एकसाथ क्षय करता है ।


'थीपढमट्ठिदिमेत्ता संढस्सवि अंतरादु सेढेक्क ।
तस्सद्धाति तदुवरिं संढा इत्थिं च खवदि थीचरिमे ॥२१६॥६०७॥

अवगदवेदो संतो सत्त कसाये खवेदि कोहुदये ।
पुरिसुदये चडणविही सेसुदयाणं तु हेट्ठुवरिं ॥२१७॥६०८॥

अर्थ (गाथा 216 से 217): नपुंसकवेदोदयसे चढ़े क्षपकके प्रथमस्थितिका काल उतना ही है जितना स्त्रीवेदोदयसे श्रेणि चढ़े क्षपकके प्रथमस्थितका काल है। अंतरके पश्चात् नपुंसकवेदके क्षपणाकाल है उसके ऊपर स्त्रीवेदका क्षपणाकाल उसके कालमें नपुंसक और स्त्रीवेदकी क्षपणा करता हुआ प्रथमस्थितिके चरमसमयमें नपुंसकवेदसहित स्त्रीवेदका क्षय करता है तथा अपगतवेदी होकर सात नोकषायका क्षय करता है, इससे नीचे और ऊपरकी विधि पुरुषवेद व क्रोधोदयसे श्रेणी चढ़े क्षपकके समान है।


चरिमे पढमं विग्धं चउदंसण उदयसत्तवोच्छिण्णा ।
से काले जोगिजिणो सव्वण्हू सव्वदरसी य ॥२१८॥६०९॥

अर्थ: क्षीणकषायगुणस्थानके अन्तसमयमें प्रथम अर्थात् ज्ञानावरण, अन्तराय और चारदर्शनावरण, ये कर्मप्रकृतियां सत्त्वसे व्युच्छिन्न होती हैं और अनन्तरकालमें सयोगिजिन सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाते हैं ।


खीणे घादिचउक्के णंतचउक्कस्स होदि उप्पत्ती ।
सादी अपज्जवसिदा उक्कस्साणंतपरिसंखा ॥२१९॥६१०॥

अर्थ: घातियाकर्म चतुष्टयका नाश होनेपर अनन्तचतुष्टयकी उत्पत्ति होती है, यह अनन्तचतुष्टय सादि व अपर्यवसित (अविनाशी) है तथा उत्कृष्टअनन्त संख्यावाला है ।


आवरणदुगाण खये केवलणाणं च दंसणं होदि ।
विरियंतरायियस्स य खएण विरियं हवे णंतं ॥२२०॥६११॥

अर्थ: दोनों आवरणोंके क्षयसे केवलज्ञान व केवलदर्शन तथा वीर्यान्तरायकर्मके क्षयसे अनन्तवीर्य होता है ।


णवणोकसायविग्धचउक्काणं च य खयादणंतसुहं ।
अणुवममव्वावाहं अप्पसमुत्थं णिरावेक्खं ॥२२१॥६१२॥

अर्थ: नवनोकषाय और दानादि अन्तरायचतुष्कके क्षयसे अनन्तसुख होता है और वह सुख अनुपम, अव्याबाध, अन्यकी अपेक्षासे रहित आत्मासे उत्पन्न है ।


सत्तरहं पयडीणं खयादु खइयं तु होदि सम्मत्तं ।
वरचरणं उवसमदो खयदो दु चरित्तमोहस्स ॥२२२॥६१३॥

अर्थ: सातप्रकृतियोंके क्षयसे क्षायिकसम्यक्त्व तथा चारित्रमोहनीयकर्मके क्षयसे या उपशमसे उत्कृष्ट-यथाख्यातचारित्र होता है।


जं णोकसायविग्धचउक्काण बलेण दुक्खपहुदीणं ।
असुहपयडिणुदयभवं इंदियखेदं हवे दुक्खं ॥२२३॥६१४॥

अर्थ: नोकषाय और अन्तरायचतुष्कके उदयके बलसे दुःखरूप असातावेदनीयादि अशुभप्रकृतियोंके उदयसे उत्पन्न इन्द्रियोंके खेदरूप आकुलताका नाम दुःख है’ और वह दु ख केवलीभगवानके नहीं पाया जाता है ।


जं णोकसाय विग्धं चउक्काण बलेण साद पहुदीणं ।
सुहपयडीणुदयभवं इंदियतोसं हवे सोक्खं ॥२२४॥६१५॥

अर्थ: नोकषाय और अन्तरायचतुष्कके उदयके बलसे सातावेदनीयादि शुभप्रकृतियोंके उदयसे उत्पन्न इन्द्रियोंके सन्तुष्टिरूप कुछ निराकुलसुख भी केवलीभगवानके नही पाया जाता है । क्योंकि–


णट्ठा य रागदोसा इंदियणाणं च केवलिम्हि जदो ।
तेण दु सादासादजसुहदुक्खं णत्थि इंदियजं ॥२२५॥६१६॥

अर्थ: केवलीभगवानके राग-द्वेष नष्ट हो गए हैं तथा इन्द्रियजनित ज्ञान भी नष्ट हुआ है इसलिए साता-असातावेदनीयके उदयसे उत्पन्न सुख-दुःख नहीं है’ ।


समयट्ठिदिगो बंधो सादस्सुदयप्पिगो जदो तस्स ।
तेण असादस्सुदओ सादसरूवेण परिणमदि ॥२२६॥६१७॥

अर्थ: एकसमयप्रमाण स्थितिवाला सातावेदनीयकर्म बंधता है जो कि उदयरूप ही है इसलिए उनके (केवलीभगवानके) असाताका उदय भी सातारूप होकर परिणमन करता है ।


पडिसमयं दिव्वतमं जोगी णोकम्मदेहपडिबद्धं ।
समयपबद्धं बंधादि गलिदवसेसाउमेत्तठिदी ॥२२७॥६१८॥

अर्थ: सयोगिजिन प्रतिसमय औदारिकशरीररूप नोकर्मसम्बन्धी आहारवर्गणारूप समयप्रबद्धको बांधते हैं जिसकी स्थिति सयोगिजिनसे पूर्व अवस्थामें व्यतीत हुई आयुके बिना शेष बची आयुप्रमाण जानना ।


णव्वरि समुग्घादगदे पदरे तह लोगपूरणे पदरे ।
णत्थि तिसमये णियमा णोकम्माहारयं तत्थ ॥२२८॥६१९॥

अर्थ: इतनी विशेषता है कि केवलीसमुद्घातको प्राप्त केवलीभगवान्में प्रतरके दो, लोकपूरणके एक इन तीनसमयोंमें नोकर्मका आहार नहीं है अन्यसर्वकालमें नोकर्मका आहार पाया जाता है ।


अंतोमुहुत्तमाऊ परिसेसे केवली समुग्घादं ।
दंड कवाडं पदरं लोगस्स य पूरणं कुणदी ॥२२९॥६२०॥

हेट्ठा दंडस्संतोमुहुत्तमावज्जिदं हवे करणं ।
तं च समुग्घादस्स य अभिमुहभावो जिणिंदस्स ॥२३०॥६२१॥

सट्ठाणे आवज्जिदकरणेवि य णत्थि ठिदिरसाण हदी ।
उदयादि अवट्ठिदया गुणसेढी तस्स दव्वं च ॥२३१॥६२२॥

जोगिस्स सेसकाले गयजोगी तस्स संखभागो य ।
जावदियं तावदिया आवज्जिदकरणगुणसेढी ॥२३२॥६२३॥

ठिदिखंडमसंखेज्जे भागे रसखंडमप्पसत्थाणं ।
हणदि अणंता भागा दंडादी चउसु समएसु ॥२३३॥६२४॥

चउसमएसु रसस्स य अणुसमओवट्टणा अपसत्थाणं ।
ठिदिखंडस्सि गणि समयिगघादो अंतोमुहुत्तुवरिं ॥२३४॥६२५॥

जगपूरणम्हि एक्का जोगस्स य वग्गणा ठिदी तत्थ ।
अंतोमुहुत्तमेत्ता संखगुणा आउआ होदि ॥२३५॥६२६॥

एत्तो पदर कवाडं दंडं पच्चा चउत्थसमयम्हि ।
पाविसिय देहं तु जिणो जोगणिरोधं करेदीदि ॥२३६॥कुलयं॥६२७॥

अर्थ (गाथा 229 से 236): अन्तर्मुहूर्तप्रमाण आयु शेष रहनेपर केवलीभगवान् समुद्घातक्रिया दंड, कपाट, प्रतर व लोकपूरणरूपसे करते हैं। दंडसमुद्घात करनेके समयमें अन्तर्मुहूर्तकालतक अधः (पहले) आवर्जितकरण होता है। जिनेन्द्रभगवानका समुद्घात करनेके सम्मुख होना ही आवर्जितकरण कहलाता है। आवर्जितकरणकरनेके पहले जो स्वस्थान है उसमें और आवर्जितकरणमें सयोगकेवलीके स्थिति व अनुभागघात नहीं है तथा उदयादि अवस्थितरूप गुणश्रेणि आयाम है एवं उस गुणश्रेणिआयामका द्रव्य भी अवस्थित है। आवर्जितकरण करनेके पहले समयमें जो सयोगकेवलीका अवशिष्टकाल और अयोगकेवलीके सर्वकालका संख्यातवांभाग इन दोनोंको मिलानेपर जितना प्रमाण आवे उतने प्रमाण आवर्जितकरणकालका अवस्थितगुणश्रेणिआयाम जानना। दंडादिसमुद्घातके चारसमयोंमें स्थिति तो असंख्यातबहुभागप्रमाण और अप्रशस्तकर्मोंका अनुभागका अनंत- बहुभागप्रमाण घात होता है। इसप्रकार चारसमयोंमें अप्रशस्तप्रकृतियोंके अनुभागका प्रतिसमय अपवर्तन तथा स्थितिखंडका एकसमयवाला घात हुआ। एक-एकसमयमें जो एक-एकस्थितिकाण्डकघात किया सो यह समुद्घात क्रियाका माहात्म्य है। लोकपूरणके अनन्तर अन्तर्मुहूर्तप्रमाण स्थितिकाण्डक या अनुभागकाण्डकका आयाम (उत्कीरणकाल) होता है। लोकपूरण समुद्घातमें योगकी समानता हो जानेपर योगकी एकवर्गणा हो जाती है। -यहां आयुसे संख्यातगुणी अन्तर्मुहूर्तप्रमाणस्थितिको स्थापित करता है। लोकपूरणके अनन्तर प्रथमसमयमें लोकपूरणको समेटकर आत्मप्रदेशोंको कपाटरूप करता है तथा तृतीयसमयमें कपाटको समेटकर दण्डरूप आत्मप्रदेशोंको करता है, इसके अनन्तर चतुर्थसमयमें दण्डको समेटकर सर्वआत्मप्रदेश मूलशरीरमें प्रवेश कर जाते हैं। यहांसे अन्तर्मुहूर्त जाकर जिन (अर्हन्तभगवान) योगका निरोध करते हैं।


बादरमण वचि उस्सास कायजोगं तु सुहुमजचउक्कं ।
रुंभदि कमसो बादरसुहुमेण य कायजोगेण ॥२३७॥६२८॥

सण्णिविसुहुमाणि पुणो जहण्णमणावयणाकायजोगादो ।
कुणदि असंखगुणं सुहुमणिपुणवरदोवि उस्सासं ॥२३८॥६२६॥

एक्कक्कस्स णिट्ठंभणकालो अंतोमुहुत्तमेत्तो हु ।
सुहुमं देहणिमाणमाणं हियमाणि करणाणि ॥२३९॥६३०॥

अर्थ (गाथा 237 से 239): बादर काययोगद्वारा मनोयोग-वचनयोग-उच्छ्वास-काययोग, इन चारों को क्रमसे नष्ट करता है तथा सूक्ष्मकाययोगरूप होकर उन चारों सूक्ष्म योगोंको क्रमसे नष्ट करता है । संज्ञीपर्याप्तिके जो जघन्यमनोयोग पाया जातां है उससे असंख्यातगुणाहीन सूक्ष्ममनोयोग करता है और द्वीन्द्रियपर्याप्तिके जो जघन्य वचनयोग पाया जाता उससे असंख्यातगुणाहीन सूक्ष्मवचनयोग करता है तथा सूक्ष्मनिगोद पर्याप्तिके जघन्य काययोगसे असंख्यातगुणाहीन सूक्ष्मकाययोग करता है तथा सूक्ष्मनिगोदिया पर्याप्तिके जघन्यउच्छ्वाससे असंख्यातगुणाहीन सूक्ष्म उच्छ्वास करता है । एक-एकबादर व सूक्ष्म मनोयोगादिके निरोधकरनेका काल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण जानना तथा सूक्ष्मकाययोगमें स्थित रहते हुए सूक्ष्मउच्छ्वासको नष्टकरनेके अनन्तर सूक्ष्मकाययोगको नष्ट करनेके लिए प्रवृत्त होता है ।


सुहुमस्स य पढमादो मुहुत्तअंतोत्ति कुणदि दु अपुव्वे ।
पुव्वगफड्ढगहेट्ठा सेढिस्स असंखभागमिदो ॥२४०॥६३१॥

पुव्वादिवग्गणाणं जीवपदेसा विभागपिंडादो ।
होदि असंखं भागं अपुव्वपढमम्हि ताण दुगं ॥२४१॥६३२॥

ओक्कट्टदि पडिसमयं जीवपदेसे असंखगुणीय कमे ।
कुणदि अपुव्वफड्ढयं तग्गुणहीणक्कमेणेव ॥२४२॥६३३॥

सेढिपदस्स असंखं भागं पुव्वाण फड्ढयाणं वा ।
सव्वे होंति अपुव्वा हु फड्ढया जोगपडिवद्धा ॥२४३॥कुलयं॥६३४॥

अर्थ (गाथा 240 से 243): सूक्ष्मयोग होनेके प्रथमसमयसे अन्तर्मुहूर्त व्यतीतकर पूर्वस्पर्धकोंके नीचे जगच्छ्रेणीके असंख्यातवेभागप्रमाण अपूर्वस्पर्धक करते हैं । पूर्वस्पर्धकसम्बन्धी जीवप्रदेशके असंख्यातवेभागप्रमाण जीवप्रदेशोद्वारा प्रथमसमयमें अपूर्वस्पर्धकोंकी रचना होती है जिनमे पूर्वस्पर्धककी आदिवर्गणाके असंख्यातवेंभागप्रमाण अविभागप्रतिच्छेद होते हैं । प्रतिसमय असंख्यात-असंख्यातगुणे क्रमसे जीवप्रदेशोका अपकर्षण करते हैं, किन्तु नवीन अपूर्वस्पर्धक असंख्यातगुणेहीन क्रमसे रचे जाते हैं । योगसम्बन्धी सर्व अपूर्वस्पर्धक जगच्छ्रेणीके प्रथमवर्गमूलके असंख्यातवेभागप्रमाण अथवा सर्व पूर्वस्पर्धकोंके असंख्यातवेंभागप्रमाण होते हैं ।


एत्तो करेदि किट्टिं मुहुत्तअंतोत्ति ते अपुव्वाणं ।
हेट्ठादु फड्ढयाणं सेढिस्स असंखभागमिदं ॥२४४॥६३५॥

अपुव्वादिवग्गणाणं जीवपदेसाविभागपिंडादो ।
होंति असंखं भागं किट्टीपढमम्हि ताण दुगं ॥२४५॥६३६॥

ओक्कट्टदि पडिसमयं जीवपदेसे असंखगुणिदक्कमे ।
तग्गुणहीणक्कमेण य करेदि किट्टिं तु पडिसमए ॥२४६॥६३७॥

सेढिपदस्स असंखं भागमपुव्वाण फड्ढयाणं व ।
सव्वाओ किट्टीओ पल्लस्स असंखभागगुणिदकमा ॥२४७॥६३८॥

अर्थ (गाथा 244 से 247): इसके अनन्तर अन्तर्मुहूर्तकालपर्यन्त अपूर्वस्पर्धकोंके नीचे सूक्ष्मकृष्ट करता है, उन सूक्ष्मकृष्टियोंका प्रमाण जगच्छ्रेणिके असंख्यातवेंभागमात्र है । अपूर्व-स्पर्धक सम्बन्धी सर्व जीवप्रदेश और अपूर्वस्पर्धककी प्रथमवर्गणाके अविभागप्रतिच्छेद इन दोनोंके असंख्यातवेंभागप्रमाणकृष्ट प्रथमसमयमें होती हैं । द्वितीयादि समयोंमें प्रतिसमय असंख्यातगुणे क्रमसे जीवप्रदेशोंका अपकर्षण करता है तथा प्रतिसमय की गईं कृष्टियोंके नीचे असंख्यातगुणेहीन क्रमसहित नवीनकृष्टियां करता है । सर्वसमयोंमें की गई कृष्टियोंका प्रमाण जगच्छ्रेणिके असंख्यातवेभागप्रमाण है अथवा अपूर्वस्पर्धकोंके प्रमाणका असंख्यातवेभागप्रमाण है । सर्वकृष्टियां पल्यके असंख्यातवेंभागगुणित क्रमसे हैं ।


एत्थापुव्वविहाणं अपुव्वफड्ढयविहिं च संजलणे ।
बादरकिट्टिविहिं वा करणं सुहुमाण किट्टीएं ॥२४८॥६३६॥

अर्थ: योगोंके अपूर्वस्पर्धक करनेका विधान जैसे पहले संज्वलनकषायके अपूर्वस्पर्धक करनेका विधान कहा है उसीप्रकार जानना तथा योगोंकी सूक्ष्मकृष्टि करनेका विधान भी पहले कहे हुए सञ्ज्वलनकषायकी बादरकृष्टि करनेके विधान सदृश ही जानना ।


किट्टीकरणे चरमे से काले उभयफड्ढये सव्वे ।
णासेदि मुहुत्तं तु किट्टीगदवेदगो जोगी ॥२४९॥६४०॥

पढमे असंखभागं हेट्ठुव्वरिं णासिदूण विदियादी ।
हेट्ठुव्वरिमसंखगुणं कमेण किट्टिं विणासेदि ॥२५०॥६४१॥

मज्झिम बहुभागुदया किट्टिं वक्किय विसेसहीणकमा ।
पडिसमयं सत्तीदो असंखगुणहीणया होंति ॥२५१॥६४२॥

अर्थ (गाथा 249 से 251): कृष्टिकरणकालके चरमसमयके अनन्तर कालमें सर्व पूर्व-अपूर्वस्पर्धकरूप प्रदेशोंको नष्ट करता है तथा अन्तर्मुहूर्तकालमें कृष्टिको प्राप्त योगका अनुभव करता है । इसप्रकार प्रदेशोंमें जो कृष्टिरूप योगशक्ति हुई वह अब प्रगटरूप परिणमन करती है । कृष्टिवेदककालके प्रथमसमयमें स्तोक अविभागप्रतिच्छेदयुक्त अधस्तन और बहुत अविभागप्रतिच्छेदयुक्त उपरितनकृष्टियोंको मध्यकी कृष्टिरूप परिणमाकर नष्ट करता है, उनका प्रमाण सर्वकृष्टियोंके असंख्यातवेभागप्रमाण है तथा द्वितीयादि समयोंमें उनसे असंख्यातगुणे क्रमसहित उपरितन कृष्टियोंको उसीप्रकार नष्ट करता है । सर्व कृष्टियोंको असंख्यातका भाग देनेपर उसमेसे बहुभागप्रमाण मध्यवर्तीकृष्टियां उदयरूप होती हैं । वे कृष्टियां प्रथमसमयसे द्वितीयादि समयोंमे विशेषहीन क्रमसहित जानना चाहिए । इसप्रकार सहयोगीके अविभागप्रतिच्छेदरूप शक्तिकी अपेक्षा प्रथमसमयसे द्वितीयादि चरमसभयपर्यन्त असंख्यातगुणेहीन क्रमसहित योग पाया जाता है ।


किट्टिगजोगी झाणं झायदि तदियं खु सुहुमकिरियं तु ।
चरिमे असंखभागे किट्टीणं णासदि सजोगी ॥२५२॥६४३॥

अर्थ: सूक्ष्मकृष्टिवेदक सयोगिजिन तृतीय सूक्ष्मक्रियाऽप्रतिपाति नामक शुक्लध्यानको ध्याता है । सयोगिगुणस्थानके चरमसमयमें कृष्टियोके असंख्यातबहुभागप्रमाण मध्यकी जो कृष्टि अवशेष रही उनको नष्ट करता है, क्योंकि इसके अनन्तर अयोगी होना है ।


जोगिस्स सेसकालं मोत्तूण अजोगिसव्वकालं य ।
चरिमं खंडं गेण्हदि सीसेण य उवरिमठिदीओ ॥२५३॥६४४॥

तत्थ गुणसेढिकरणं दिज्जादिकमो य सम्मखवणं वा ।
अंतिमफालीपडगं सजोगगुणठाणचरिमम्हि ॥२५४॥६४५॥
से काले जोगिजणो ताहे आउगसमा हि कम्माणि ।

अर्थ (गाथा 253 से 254): सयोगकेवलीगुणस्थानके शेषकाल तथा अयोगकेवलीके सर्वकाल इन दोनों कालोंको छोड़कर शेष सर्वस्थितिको गुणश्रेणीशीर्षसहित उपरिमस्थितिका घात करनेके लिए अघातियाकर्मोंके चरमस्थितिकाण्डकमें ग्रहण करता है। वहां गुणश्रेणिका करना और देयद्रव्यादिका क्रम सम्यक्त्वप्रकृतिकी क्षपणाविधिके समान है। सयोगकेवली गुणस्थानके चरमसमयमें अन्तिमफालिका पतन होता है तथा वही पर सयोगीजिनके (नाम-गोत्र व वेदनीय) कर्मोंकी स्थिति आयुकर्मके समान हो जाती है।


तुरियं तु समुच्छिण्णं किरियं भायदि अजोगिजिनो ॥२५५॥६४६॥

सीलेसिं संपत्तो णिरुद्धणिस्सेसआसवो जीवो ।
बंधरयविप्पमुक्को गयजोगो केवली होदि ॥२५६॥६४७॥

अर्थ (गाथा 255 से 256): अयोगिजिन समुच्छिन्नक्रियानिवृत्ति नामक चतुर्थ शुक्लध्यानको ध्याते हैं तथा शैलेश्यभावको प्राप्त करके निःशेष (सम्पूर्ण) आस्रवका निरोधकर बन्धरूपी रजसे मुक्त होकर योगरहित केवली हो जाते हैं।


वाहत्तरिपयडीओ दुच्चरिमगे तेरसं य चरिमम्हि ।
झाणजलणेण कवलिय सिद्धो सो होदि से काले ॥२५७॥६४८॥

अर्थ: अयोगकेवलीगुणस्थानके द्विचरमसमयमे (अनुदयरूप) ७२ प्रकृतियोंको तथा चरमसमयमे (उदयरूप) १३ प्रकृतियोंको शुक्लध्यानरूपी अग्निद्वारा कवलित (ग्रासीभूत) करता है अर्थात् नष्ट करता है और अनन्तरवर्तीसमयमे सिद्ध होता है।


तिहुवणसिहरेण मही वित्थारे अट्ठजोयणुदयथिरे ।
धवलच्छत्तायारे मणोहरे ईसिपब्भारे ॥२५८॥६४६॥

अर्थ: तीनलोकके शिखरमें ४५ लाखयोजन विस्तृत एवं ८ योजन ऊंची, स्थिर, श्वेतवर्णवाली, छत्राकार ईषत्प्राग्भारनामक मनोहरपृथ्वी है ।


पुव्वगहस्स तिजोगो संतो खीणो य पढमसुक्कं तु ।
विदियं सुक्कं खीणो इगिजोगो झायदे झाणी ॥२५९॥६५०॥

अर्थ: पूर्वं अर्थात् ग्यारहअङ्ग व १४ पूर्वके ज्ञाताके तथा तीनोंयोगवालोके उपशान्तमोह और क्षीणमोहगुणस्थानमे प्रथमशुक्लध्यान होता है एवं क्षीणमोहगुणस्थानवर्ती और एकयोगवाले द्वितीयशुक्लध्यानको ध्याते हैं ।


सो मे तिहुणमहिदो सिद्धो बुद्धो णिरंजणो णिच्चो ।
दिसदु वरणाणदंसणचरित्तसुद्धिं समाहिं च॥२६०॥६५१॥

अर्थ: तीनलोकसे पूजित, बुद्ध, निरंजन, नित्य ऐसे सिद्धभगवान् मुझे उत्कृष्ट ज्ञान-दर्शन व चारित्रकी शुद्धि तथा समाधि देवें ।


वीरिंदणंदिवच्छेणप्पसुदेण भयणंदिसिस्सेण ।
दंसणचरित्तलद्धी सुसूचिदा-णेमिचंदेण ॥२६१॥६५२॥

अर्थ: इस प्रकार वीरनन्दि और इन्द्रनन्दि आचार्यके वत्स तथा अभयनन्दि आचार्यके शिष्य मुझ अल्पज्ञ नेमिचन्द्रने दर्शन व चारित्रलब्धिको भले प्रकार से कहा है ।


जस्स य पायपसाएणणंतसंसारजलहिमुत्तिण्णो ।
वीरिंदणंदिवच्छो णमामि तं अभयणंदिगुरुं ॥२६२॥६५३॥

अर्थ: वीरनन्दि और इन्द्रनन्दि आचार्यका वत्स मैं नेमिचन्द्राचार्य जिनके चरणप्रसादसे अनन्तसंसारसमुद्रसे पार हुआ उन अभयनन्दिनामक गुरुको नमस्कार करता हूँ ।

क्षपणासार चूलिका

अह खवणाहियार – चूलिया


अण मिच्छ मिस्स सम्मं अट्ठणवुंसित्थिवेदछक्कं च ।
पुंवेद च खवेदि हु कोहादीए च संजलणे ॥१॥

अर्थ: अनन्तानुबन्धी, मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति, आठकषाय, नपुंसकवेद, स्त्रीवेद, छह नोकषाय, पुरुषवेद और तत्पश्चात् क्रोधादि चार संज्वलनकषायका क्षय करता है।


अह थीणगिद्धिकम्मं णिद्दाणिद्दा य पयलपयला य ।
अह णिरय-तिरियणामा खीणा संखोहणादीसु ॥२॥

अर्थ: स्त्यानगृद्धि, निद्रा-निद्रा, प्रचला-प्रचला, नरकगति-तिर्यञ्चगति और सहचरी नामकर्मकी प्रकृतियोका अन्य प्रकृतियोमें संक्रमण करके नाश करता है ।


सव्वस्स मोहणीयस्स आणुपुव्वी य संकमो होइ ।
लोभकसाए णियमा असंकमो होइ बोद्धव्वो ॥३॥

संछुहदि पुरिसवेदे इत्थीवेदं णवुंसयं चेव ।
सत्तेव णोकसाए णियमा कोहम्हि संछुहदि ॥४॥

कोहस्स छुहइ माणे माणं मायाए णियमसा छुहइ ।
मायं च छुहइ लोहे पडिलोमो संकमो णत्थि ॥५॥

अर्थ (गाथा 3 से 5): अन्तरकरण करनेके पश्चात् द्वितीयसमयसे सर्व मोहनीयकर्मका आनुपूर्वीसंक्रमण होता है । लोभकषायका नियमसे असंक्रामक होता है ऐसा जानना चाहिए । स्त्रीवेद और नपुंसकवेदके द्रव्यको पुरुषवेदमें संक्रमित करता है । सात (पुरुषवेद व छह नोकषाय) नोकषायके द्रव्यको नियमसे क्रोधमे सक्रमित करता है । क्रोधके द्रव्यको मानमें, मानके द्रव्यको मायामें और मायाके द्रव्यको लोभमें संक्रमित करता है । प्रतिलोम संक्रमण नही होता ।


जो जम्हि संछुहंतो णियमा बंधम्हि होई संछुहणा ।
बंधेण हीणदरगे अहिए वा संकमो णत्थि ॥६॥

अर्थ: जो जीव जिसप्रकृतिका संक्रमण करता है वह नियमसे बध्यमान प्रकृतिमें संक्रमण करता है । जिस स्थितिको बांधता है उसके सदृशस्थितिमें अथवा उससे हीन स्थितिमें संक्रमण करता है, किन्तु अधिक स्थितिमे संक्रमण नही करता ।


बंधेण होइ उदओ अहिय उदएण संकमो अहिओ ।
गुणसेढि असंखगुणा बोद्धव्वो होइ अणुभागो ॥७॥

बंधेण होइ उदओ अहिओ उदएण संकमो अहिओ ।
गुणसेढि असंखेज्जा य पदेसग्गेण बोद्धव्वा ॥८॥

उदओ य अणंतगुणो संपहि बंधेण होइ अणुभागो ।
से काले उदयादो संपहि बंधो अणंतगुणो ॥९॥

अर्थ (गाथा 7 से 9): बन्धसे अधिक उदय होता है और उदयसे अधिक संक्रमण होता है । इसप्रकार अनुभागके विषयमें अनन्तगुणित गुणश्रेणि जानना चाहिए । बंधसे अधिक उदय होता है ओर उदयसे अधिक संक्रमण होता है। इसप्रकार प्रदेशके विषयमें असंख्यातगुणश्रेणी जानना चाहिए । अनुभागविषयक साम्प्रतिकबन्ध अनन्तगुणा होता है ।


चरिमे बादररागे णामा-गोदाणि वेदणीयं च ।
वरिसस्संतो बंधदि दिवसस्संतो य जं सेसे ॥१०॥

अर्थ: बादरसाम्परायके चरमसमयमें नाम-गोत्र-वेदनीय इन तीन अघातियाकर्मोंका स्थितिबन्ध अन्तःवर्षप्रमाण और शेष तीन घातिया कर्मोंका स्थितिबन्ध अन्तःदिवस प्रमाण होता है।


जं चावि संलुहंतो खवेदि किट्टिं अबंधगो तिरुस्से ।
सुहुमम्हि संपराए अबंधगो बंधगियराणं ॥११॥

अर्थ: जिस कृष्टिको भी संक्रमण करता हुआ क्षय करता है उसका अबन्धक होता है। सूक्ष्मसाम्परायमें भी अबन्धक होता है, किन्तु इतरकृष्टियोंके वेदन व क्षपणाकालमें उनका बन्धक होता है।


जाव ण छदुमत्थादो तिण्हं घादीण वेदगो होइ ।
अहऽणंतरेण खइया सव्वण्हू सव्वदरिसी य ॥१२॥

अर्थ: जबतक क्षीणकषायवीतरागसंयतछद्मस्थ अवस्थासे नही निकलता तबतक वह तीनघातियाकर्मोंका वेदक होता है। इसके पश्चात् अनन्तर समयमें तीनघातियाकर्मोंका क्षय करके सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाता है ।