लब्धिसार (भाग 1/3)
मंगलाचरणम्
सिद्धे जिणिंदचंदे आयरिय उवज्झाय साहुगणे ।
वंदिय सम्मद्दंसण-चरित्तलद्धिं परूवेमो ॥१॥
अर्थ: मैं नेमिचन्द्राचार्य सिद्ध-अरिहन्त-आचार्य-उपाध्याय तथा सर्वसाधुओं को नमस्कार करके सम्यग्दर्शन व सम्यक्चारित्रकी प्राप्ति (के उपाय) को कहूंगा ।
'चदुगदिमिच्छो संण्णी पुण्णो गब्भज विसुद्ध सागारो ।
पढमुवसमं स गिण्हदि पंचमवरलद्धिवरिमम्हि ॥२॥
अर्थ: चारोगतिका मिथ्यादृष्टि-सज्ञी-पर्याप्त-गर्भज-विशुद्धपरिणामी-साकारोपयोगी जीव अंतिम पंचमलब्धिका अत होनेपर प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करता है ।
खयउवसमियविसोही देसणपाउग्गकरणलद्धि य ।
चत्तारि वि सामण्णा करणं सम्मत्तचारित्ते ॥३॥
अर्थ: क्षयोपशम, विशुद्धि, देशना, प्रायोग्य व करणलब्धि ये पांच लब्धियां हैं उनमेंसे चार लब्धियां तो सामान्य हैं तथा करणलब्धिके होनेपर (उपशम) सम्यक्त्व या चारित्र अवश्य होता है ।
कम्ममलपडलसत्ती पडिसमयमणंतगुणविहीणकमा ।
होदूणुदीरदि जदा तदा खओवसमलद्धी दु ॥४॥
अर्थ: प्रतिसमय क्रमसे अनन्तगुणी हीन होकर कर्ममलपटल शक्तिकी जब उदीरणा होती है तब क्षयोपशम लब्धि होती है।
आदिमलद्धिभवो जो भावो जीवस्स सादपहुदीणं ।
सत्थाणं पयडीणं बंधणजोगो विसुद्धलद्धी सो ॥५॥
अर्थ: आदि (प्रथम) लब्धि होनेपर साताआदि प्रशस्त (पुण्य) प्रकृतियोके बन्धयोग्य जो जीवके परिणाम वह विशुद्धिलब्धि है।
छद्दव्वणवपयत्थोवदेसयरसूरिपहुदिलाहो जो ।
देसिदपदत्थधारणलाहो वां तदियलद्धी दु ॥६॥
अर्थ: छहद्रव्य और नवपदार्थका उपदेश देनेवाले,आचार्य्यादिका लाभ अथवा उपदेशित पदार्थोंको धारण करनेका लाभ, यह तृतीयलब्धि है ।
अंतोकोडाकोडी विट्ठाणे ठिदिरसाण जं करणं ।
पाउग्गलद्धिणामा भव्वाभव्वेसु सामण्णा ॥७॥
अर्थ: कर्मोंकी स्थितिको अन्त.कोडाकोड़ी तथा अनुभागको द्विस्थानिक करने को प्रायोग्यलब्धि कहते है । यह लब्धि भव्य और अभव्यके समानरूपसे होती है ।
जेट्ठवरट्ठिदिबंधे जेट्ठवरट्ठिदितियाण सत्ते य ।
ण य पडिवज्जदि पढमुवसमसम्मं मिच्छजीवो हु ॥८॥
अर्थ: उत्कृष्ट अथवा जघन्यस्थितिबन्ध करनेवाले तथा स्थिति-अनुभाग व प्रदेश इन तीनोके उत्कृष्ट या जघन्य सत्त्ववाले मिथ्यादृष्टीजीवके प्रथमोपशमसम्यक्त्व उत्पन्न नही होता ।
सम्मत्तहिमुहमित्छो विसोहिवड्ढीहि वड्ढमाणो हु ।
अंतोकोडाकोडिं सत्तण्हं बंधणं कुणदी ॥९॥
अर्थ: विशुद्धिकी वृद्धिद्वारा वर्धमान तथा प्रथमोपशमसम्यक्त्वके अभिमुख मिथ्यादृष्टिजीव सातकर्मोंका अन्त कोडाकोड़ीसागरप्रमाण स्थितिबन्ध करता है।
तत्तो उदय सदस्स य पुधत्तमेत्तं पुणो पुणोदिरिय ।
बंधम्मि पयदि बंधुच्छेदपदा होंति चोत्तीसा ॥१०॥
अर्थ: उससे अर्थात् अन्त कोड़ाकोड़ीसागर स्थितिसे पृथक्त्व सौ सागरहीन स्थितिको बाधकर पुनः पुनः पृथक्त्व १०० सागर घटाकर स्थितिबन्ध करनेपर प्रकृतिबन्ध व्युच्छित्तिके ३४ स्थान होते है।
आउ पडि णिरयदुगे, सुहुमतिये सुहुमदोण्णि पत्तेयं ।
वादरजुद दोण्णि पदे, अपुण्णजुद वितिचउसिरिणसण्णीसु ॥११॥
अट्ठ अपुण्णपदेसु वि, पुण्णेण जुदेसु तेसु तुरियपदे ।
एइंदिय आदावं, थावरणामं च मिलिदव्वं ॥१२॥
तिरिगदुगुज्जोवो वि य, णीचे अपसत्थगमणदुब्भगविए ।
हुंडासंपत्ते वि य, णउंसए वामखीलीए ॥१३॥
खुज्जद्धं णाराए, इत्थीवेदे य सादिणाराए ।
णग्गोधवज्जणारा ए मणुओरालदुगवज्जे ॥१४॥
अधिरअसुभ जस अरदी, सोयअसादे य होंति चउतीसा ।
बंधोसरगट्ठाणा, भव्वाभव्वेसु सामण्णा ॥१५॥
अर्थ (गाथा 11 से 15): आयुबन्धव्युच्छित्ति स्थानोंके पश्चात् क्रमशः नरकद्विक, सूक्ष्मादि तीन, सूक्ष्मादि दो व प्रत्येक, बादर-अपर्याप्त-साधारण, बादर-अपर्याप्त-प्रत्येक, अपर्याप्त-द्वीन्द्रिय, अपर्याप्त-त्रीन्द्रिय, अपर्याप्तचतुरिन्द्रिय, अपर्याप्त-असंज्ञी-पंचेन्द्रिय, अपर्याप्त-सज्ञीपंचेन्द्रिय ॥११॥ आठ पदोंमें अपर्याप्तके स्थानपर पर्याप्त जोड़ना चाहिए, किंतु चतुर्थपद एकेन्द्रिय-आतप-स्थावर भी मिलाना चाहिए। अर्थात् (पूर्वोक्त छठे पदसे १३वें पदतक ८ पदोंमे अपर्याप्तके स्थानपर पर्याप्त जोड़ना चाहिए) । तिर्यञ्चद्विक व उद्योत, नीचगोत्र, अप्रशस्तविहायोगति और दुर्भगादि तीन (दुर्भग-दुःस्वर-अनादेय), हुण्डसस्थान-सृपाटिकासंहनन, नपुंसकवेद, वामनसंस्थान व कीलितसंहनन । कुब्जसंस्थान-अर्धनाराचसंहनन, स्त्रीवेद, स्वातिसस्थान-नाराचसंहनन, न्यग्रोधसंस्थान-वज्रनाराच-संहनन, मनुष्यगतिद्विक (मनुष्यगति-मनुष्यगत्यानुपूर्वी)-औदारिकद्विक (औदारिक-शरीर-औदारिकअङ्गोपाङ्ग)-वज्रर्षभनाराचसंहनन । अस्थिर-अशुभ-अयशःकीर्ति-अरति-शोक व असातावेदनीयकी बन्धव्युच्छित्ति होती है। ये ३४ बन्धापसरणस्थान भव्य व अभव्यके समानरूपसे होते है।
णारतिरियाणं ओघो भवणातिसोहम्मजुगलए बिदियं ।
तिदियं अट्ठारसमं तेवीसदिमादि दसपदं चरिमं ॥१६॥
ते चेव चोद्दसपदा अट्ठारसमेण हीणया होंति ।
रयणादिपुढविक्छक्के सणक्कुमारादिदसकप्पे ॥१७॥
ते तेरस बिदिएण य तेवीसदिमेण चावि परिहीणा ।
आणदकप्पादुवरिमगेवेज्जंतोत्ति ओसरणा ॥१८॥
अर्थ (गाथा 16 से 18): मनुष्य और तिर्यंचोंमें ओघ अर्थात् चौतीसबन्धापसरण होते हैं। भवनत्रिक और सौधर्मयुगलमे दूसरा, तीसरा, अठारहवां और तेईसवां आदि दश व अन्तिम ३४वा ये १४ बन्धापसरण होते हैं। रत्नप्रभा आदि छह् नरक पृथ्वियोंमें और सनत्कुमार आदि दशकल्पो (स्वर्गों) में उपर्युक्त १४ बन्धापसरणोमे से १८वां बन्धापसरण नही होता (शेष १३ बन्धापसरण होते हैं)। आनतकल्पसे लेकर उपरिम नौवे ग्रैवेयकपर्यन्त उपर्युक्त १३ स्थानोमे से दूसरा और २३वां बन्धापसरण नही होते (शेष ११ बन्धापसरण होते हैं)।
ते चेवेक्कारपदा तदिऊणा विदियठाणसंपत्ता ।
चउवीसदिमेणू णा सत्तमिपुढविम्हि ओसरणा ॥१९॥
अर्थ: गाथा १४ मे कहे गये ११ बन्धापसरणोंमें से तीसरा व २४वा बन्धापसरण घटानेपर तथा दूसरा बन्धापसरण मिलानेपर सातवी नरकपृथ्वीमे १० बन्धापसरण होते हैं ।
घादित्ति सादं मिच्छं कसायपुं हस्सरदि भयस्स दुगं ।
अपमत्तडवीसुच्चं बंधंति विसुद्धणरतिरिया ॥२०॥
देवत्ततसवण्णअगुरुलहुचउक्कं समचउरतेजकम्मइयं ।
सग्गमणं पंचिंदी थिरादिछ णिमिणमडवीसं ॥२१॥
अर्थ (गाथा 20 से 21): विशुद्ध ( सम्यक्त्वके अभिमुख प्रायोग्यलब्धिमें स्थित मिथ्यादृष्टि ) मनुष्य या तिर्यंच तीन घातिया ( ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय ) कर्म सातावेदनीय, मिथ्यात्व, कषाय, पुरुषवेद, हास्य, रति, भयद्विक ( भय-जुगुप्सा ), अप्रमत्तगुणस्थानसम्बन्धी २८ और उच्चगोत्रको बाधता है । देवचतुष्क, त्रसचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुरुलघुचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, प्रशस्तविहायोगति, पंचेन्द्रियजाति, स्थिरादि ६ और निर्माण ये २८ प्रकृतियां अप्रमत्तगुणस्थानसम्बन्धी जानना ।
तं सुरचउक्कहीणं णरचउवज्जजुदं पयडिपरिमाणं ।
सुरछप्पुढवीमिच्छा छिण्णोसरणा हु बंधंति ॥२२॥
अर्थ: उन (उपर्युक्त ७१ प्रकृतियों) में से देवचतुष्कको कम करके मनुष्य चतुष्क (मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी, औदारिकशरीर, औदारिकशरीरअंगोपांग) और वज्रर्षभनाराचसंहननको मिलानेसे इन ७२ प्रकृतियोंको, वन्धापसरण कर चुकनेपर मिथ्यादृष्टिदेव और प्रथमादि छह पृथिवियोंके नारकी वांधते हैं ।
तं णरदुगुच्चहीणं तिरियंदु णीचजुदं पयडिपरिमाणं ।
उज्जोवेण जुदं वा सत्तमिखिदिगां हु बंधंति ॥२३॥
अर्थ: उन (पूर्वोक्त ७२ प्रकृतियों) में से मनुष्यद्विक (मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वी) और उच्चगोत्रको कम करनेसे तथा तिर्यंचगतिकद्विक (तिर्यंचगति, तिर्यंचगत्यानुपूर्वी) व नीचगोत्रको मिलानेपर ७२ प्रकृतियां होती हैं । यदि उद्योतप्रकृति मिलाई जाती है तो ७३ प्रकृतियां हो जाती हैं। उन ७२ अथवा ७३ प्रकृतियोको (प्रथमोपशमसम्यक्त्वके अभिमुख) सातवीं पृथ्वोका मिथ्यादृष्टि नारकी बांधता है ।
अंतोकोडाकोडीठिदिं असत्थाणं सत्थगाणं च ।
बिचउट्ठाणिरसं च य बंधाणं बंधणं कुणदि ॥२४॥
अर्थ: (सम्यक्त्वके अभिमुख मिथ्यादृष्टि) बंधनेवाली प्रकृतियोंका स्थितिबंध अन्तःकोटाकोटीसागरोपमप्रमाण करता है । अप्रशस्तप्रकृतियोंका द्विस्थानीय अनुभागबन्ध करता है और प्रशस्तप्रकृतियोंका चतु स्थानीय अनुभागबन्ध करता है ।
मिच्छणथीएत्ति सुरचउ समचउजपसत्थगमणसुभगतियं ।
णीचुक्कस्सपदेसमणुक्कस्सं वा पबंधदि हु ॥२५॥
एदेहिं विहीणाणं तिण्णि महादंडएसु उत्ताणं ।
एकट्ठिपमाणाणमणुक्कस्सपदेसबंधगं कुणदि ॥२६॥
अर्थ (गाथा 25 से 26): मिथ्यात्व, अनन्तानुबन्धीचतुष्क, स्त्यानगृद्धित्रिकं, देवचतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, वज्रर्षभनाराचसंहनन, प्रशस्तविहायोगति, सुभगादि तीन और नीच गोत्रका उत्कृष्ट व अनुत्कृष्टप्रदेशबन्ध करता हैं । इन प्रकृतियोसे रहित तीन महादण्डक अर्थात् गाथा २१-२२ व २३ मे कही गई शेष ६१ प्रकृतियोंका अनुत्कृष्टप्रदेशबन्ध करता है ।
पढमे सव्वे विदिये पण तिदिये चउ कमा अपुणरुत्ता ।
इदि पयडीणमसीदी तिदंडएसु वि अपुणरुत्ता ॥२७॥
अर्थ: क्रमशः प्रथमदण्डकमे सर्वप्रकृतिया, द्वितीयदण्डकमे पांचप्रकृतिया और तृतीयदण्डकमें चारप्रकृतियां, इसप्रकार तीनो दण्डकोमें सर्व ८० प्रकृतिया अपुनरुक्त हैं ।
उदये चउदसघादी णिद्दापयलाएमेक्कदरगं तु ।
मोहे दस सिय णामे वट्ठिठाणं सेसगे संजोगेक्कं ॥२८॥
अर्थ: तीन घातियाकर्मोंकी १४ प्रकृतियां, निद्रा या प्रचलामें से कोई एक, मोहनीयकर्मकी स्यात् (कथंचित्) १० प्रकृति, नामकर्मकी भाषापर्याप्तिकालमें उदययोग्य प्रकृतियां और शेष वेदनीय, गोत्र व आयुकर्मकी एक-एक प्रकृति भी मिला लेना चाहिए । ये सर्वप्रकृतियां उदययोग्य है ।
उदइल्लाणं उदये पत्तेक्कठिदिस्स वेदगो होदि ।
विच्चउट्ठाणमसत्थे सत्थे उदयल्लरसभुत्ती ॥२९॥
अजहण्णमणुक्करूप्पदेसमणुभवदि सोदयाणं तु ।
उदइल्लाणं पयडिचउक्काणमुदीरगो होदि ॥३०॥
अर्थ (गाथा 29 से 30): उदयवान् प्रकृतियोका उदय प्राप्त होनेपर एकस्थितिका वेदक होता है । अप्रशस्तप्रकृतियोके द्विस्थानरूप और प्रशस्तप्रकृतियोके चतु स्थानरूप उदयमान अनुभागको भोगता है । उदयरूप प्रकृतियोके अजघन्य-अनुत्कृष्टप्रदेशाग्रको अनुभव करता है । उदयस्वरूप प्रकृतियोके प्रकृति-प्रदेश-स्थिति व अनुभागका उदीरक होता है ।
दुति आउ तित्थहारचउक्कणा सम्मगेण हीणा वा ।
मिस्सेणेणा वा वि य सव्वे पयडी हवे सत्तं ॥३१॥
अर्थ: दो या तीन आयु, तीर्थकर और आहारकचतुष्क; इन प्रकृतियोसे रहित तथा सम्यक्त्वप्रकृति व सम्यग्मिथ्यात्वबिना शेष सर्वप्रकृतियोका सत्त्व होता है ।
अजहण्णमणुक्कस्सं ठिदीतियं होदि सत्तपयडीणं ।
एवं पयदिचउक्कं बंधादिसु होदि पत्तेयं ॥३२॥
अर्थ: उक्त सत्त्वप्रकृतियोका स्थितित्रिक (स्थिति-अनुभाग-प्रदेश) अजघन्य-अनुत्कृष्ट होता है । बन्धादि (बन्ध-उदय-उदीरणा) प्रत्येकमे इसीप्रकार प्रकृतिचतुष्क (प्रकृति-स्थिति-अनुभाग-प्रदेश) लगा लेना चाहिए ।
तत्तो अभव्वजोग्गं परिणामं बोलिऊण भव्वो हु ।
करणं करेदि कमसो अधापवत्तं अपुव्वमणिद्वियं ॥३३॥
अर्थ: उसके पश्चात् अर्थात् प्रायोग्यलब्धिके पश्चात् अभव्यके योग्य परिणामोको उल्लघकर भव्यजीव क्रमशः अधः-प्रवृत्तकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणको करता है ।
अंतोमुहुत्तकाला तिण्णिवि करणा हवंति पत्तेयं ।
उवरीदो गुणियकमा कमेण संखेज्जरूवेण ॥३४॥
अर्थ: तीनों करणोमे से प्रत्येककरणका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण काल होता है, किन्तु ऊपरसे नीचेके करणोंका काल सख्यातगुणा क्रम लिये हुए है ।
जम्हा हेट्ठिमभावा उवरिमभावेहिं सरिसगा होंति ।
तम्हा पढमं करणं अधापवत्तोत्ति णिद्दिठ्ठं ॥३५॥
अर्थ: क्योंकि अधस्तन (नीचेके) भाव उपरितनभावोंके साथ सदृश होते है अत प्रथमकरणको अध प्रवृत्तकरण कहा गया है ।
समए समए भिण्णा भावा तम्हा अपुव्वकरणो दु ।
अणियट्टीवि तहं वि य पडिसमयं एक्कपरिणामो ॥३६॥
अर्थ: प्रतिसमय भिन्न भाव होते हैं इसलिये यह अपूर्वकरण है और प्रतिसमय एक समान ही परिणाम होते हैं अत वह अनिवृत्तिकरण है ।
गुणसेढी गुणसंकम ठिदिरसखंडं च णत्थि पढमम्हि ।
पडिसमयमणंतगुणं विसोहिवुड्ढीहिं वड्ढदि हु ॥३७॥
सत्थाणमसत्थाणं चउविट्ठाणं रसं च बंधदि हु ।
पडिसमयमणंतगेण य गुणभजियकमं तु रसबंधे ॥३८॥
पल्लस्स संखभागं मुहुत्तअंतेण ओसरदि बंधे ।
संखेज्जसहस्साणि य अधापवत्तम्मि ओसरणा ॥३९॥
आदिमकरणाद्धाए पढमट्ठिदिबंधो दु चरिमेम्हि ।
संखेज्जगुणविहीणो ठिदिबंधो होइ णियमेण ॥४०॥
तच्चरिमे ठिदिबंधो आदिमसम्मेण देससंजमजं ।
पडिवज्जमाणगस्स वि संखेज्जगुणेण हीणकमो ॥४१॥
अर्थ (गाथा 37 से 41): प्रथम ( अधःकरण ) में गुणश्रेणि, गुणसंक्रमण, स्थितिखण्ड और अनुभागखण्ड नही होते, किन्तु प्रतिसमय विशुद्धिमे अनन्तगुणीवृद्धिद्वारा वृद्धिको प्राप्त होता है । प्रशस्तप्रकृतियोका चतु स्थानीय (गुड, खांड, शर्करा: और अमृत) अनुभागबन्ध होता और अप्रशस्तप्रकृतियोका द्विस्थानीय (लता-दारु या निब-काजीर) अनुभागबन्ध होता है । प्रतिसमय प्रशस्तप्रकृतियोका अनन्तगुणे क्रम सहित बन्ध होता है और अप्रशस्तप्रकृतियोके अनन्तवेभागप्रमाण अनुभागबन्ध होता है । तथा एक-एक अन्तर्मुहूर्तके अन्तरालसे पल्यका सख्यातवाभाग घटता हुआ स्थितिबन्ध होता रहता है । अध प्रवृत्तकरणकालमें सख्यातहजार स्थितिबन्धापसरण होते रहते है । अध प्रवृत्तकरणके आदिमे जो प्रथम स्थितिबन्ध होता है तथा अन्तमे नियमसे उससे सख्यातगुणाहिन स्थितिबन्ध होता है । इस चरमस्थितिबन्धसे देशसंयम सहित प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करनेवाले जीवके स्थितिबन्ध सख्यातगुणाहिन होता है । इसस्थितिबन्धसे सकलसंयम सहित प्रथमोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करनेवालेके सख्यातगुणाहिन स्थितिबन्ध होता है ।
आदिमकरणाद्धाए पडिसमयमसंखलोगपरिणामा ।
अहियकमा हु विसेसे मुहुत्तअंतो हु पडिभागो ॥४२॥
ताए अधापवत्तद्धाए संखेज्जभागमेत्तं तु ।
अणुकट्ठीए अद्धा णिट्ठवगणकडयं तं तु ॥४३॥
पडिसमयगपरिणामा णिट्ठवगणसमयमेत्तखंडकमा ।
अहियकमा हु विसेसे मुहुत्तअंतो हु पडिभागो ॥४४॥
पडिखंडगपरिणामा पत्तेयमसंखलोगमेत्ता हु ।
लोयाणमसंखेज्जा छट्ठाणाणी विसेसेवि ॥४५॥
पढमे चरिमे समये पढमं चरिमं च खंडमसरित्थं ।
सेसा सरिसा सव्वे अट्ठुव्वंकादिअंतगया ॥४६॥
अर्थ: प्रथमखंडके परिणामोंके साथ क्रमसे पुनरुक्तता तबतक जानना चाहिए जब जाकर प्रथमसमयसम्बन्धी अन्तिमखंडके परिणाम प्रथमनिर्वर्गणाकाण्डकके अन्तिमसमयके प्रथमखण्डसम्बन्धी परिणामोंके साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते है । इसीप्रकार अधःप्रवृत्तकरणके द्वितीयादि समयोके परिणामखण्डोको भी पृथक्-पृथक् विवक्षितकरके वहाके द्वितीयादि खण्डगत परिणामोंका विवक्षितसमय [द्वितीयादिसमय] से लेकर ऊपर एक समयकम निर्वर्गणाकाण्डकप्रमाण समयपक्तियोके प्रथमखण्डसम्बन्धी परिणामोके साथ पुनरुक्तपनेका कथन करना चाहिए, किन्तु इतनी विशेषता है कि सर्वत्र प्रथमखंडके परिणाम अपुनरुक्तपनेसे अवशिष्ट जानना चाहिये । अर्थात् प्रत्येकसमयके प्रथमखंडसम्बन्धी परिणाम अगले समयके किसी भी खडसम्बन्धी परिणामोंके सदृश नही होते । इसीप्रकार द्वितीयनिर्वर्गणाकाण्डकके परिणामखण्डोका तृतीयनिर्वर्गणाकाण्डकके परिणामखडोके साथ पुनरुक्तपना जानना चाहिए, किन्तु यहा भी प्रथमखंडसम्बन्धी परिणाम ही अपुनरुक्तरूपसे अवशिष्ट रहते है । इसीक्रमसे तृतीय, चतुर्थ और पंचमादि निर्वर्गणाकाण्डकोंके भी अनन्तर उपरिम निर्वर्गणाकाण्डकोके साथ पुनरुक्तपना वहातक जानना चाहिए जब जाकर द्विचरमनिर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमादिसमयोंके सर्व परिणामखड प्रथमखंडको छोड़कर अन्तिमनिर्वर्गणाकाडकम्बन्धी परिणामोके साथ पुनरुक्त होकर समाप्त होते है । अब अन्तिमनिर्वर्गणाकाडकम्बन्धी परिणामोके स्वस्थानमें पुनरुक्त अपुनरुक्तपनेका अनुसन्धान परमागमके अविरोधपूर्वक करना चाहिए । अंकसदृष्टिके अनुसार अपुनरुक्तखंड अपनेसे उपरिम किसी खंडके सदृश नही है- प्रथमसमयमे जो प्रथमखण्ड है वह ऊपर किसीके साथ भी समान नही है । पुनः प्रथमसमयका दूसरा खड (४०) तथा द्वितीयसमयका प्रथमखंड (४०) दोनो सदृश ही है, तथैव प्रथमसमयका तृतीयखण्ड (४१) और द्वितीयसमयका दूसराखड (४१) समान है । इसीप्रकार आगे जाकर पुनः प्रथमसमयका अन्तिमखंड (४२) एव द्वितीयसमयका द्विचरमखण्ड (४२) सदृश है, तथैव द्वितीयसमयके परिणामखडोका और तृतीयसमयके परिणामखंडोका सन्निकर्ष करना चाहिए । एवमेव ऊपर भी पिछले की तदन्तरोके साथ सन्निकर्षविधि जानकर कहनी चाहिए । इसप्रकार अनुक्रुष्टि-प्ररूपणा समाप्त हुई । विशुद्धिसे द्वितीय निर्वर्गणाकांडकके प्रथमसमयकी (४३) जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, क्योंकि प्रथमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि ‘उर्वक’ रूपसे अवस्थित है और द्वितीयनिर्वर्गणाकांडकके प्रथमसमयकी जघन्यविशुद्धि ‘अष्टांक’ रूपसे अवस्थित है इसलिये अनन्तगुणी हो गई। उससे प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके दूसरेसमयकी उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है, क्योंकि पूर्वकी जघन्यविशुद्धि दूसरे समयके अन्तिमखण्डके जघन्यपरिणामस्वरूप है और यह उत्कृष्टविशुद्धि असंख्यातलोकप्रमाण षट्स्थानवृद्धिको उल्लंघकर स्थित हुए दूसरे समयके अन्तिमखंडकी उत्कृष्टविशुद्धि है, इसलिये यह उत्कृष्टविशुद्धि पूर्वकी जघन्यविशुद्धिसे अनन्तगुणी सिद्ध हो जाती है। इस पद्धतिसे अन्तर्मुहूर्तकालप्रमाण एक निर्वर्गणाकाण्डकको व्यवस्थित करके उपरिम और अधस्तन जघन्य और उत्कृष्टपरिणामोंसे अल्पबहुत्व जानना चाहिए। अल्पबहुत्वका यह क्रम सर्व निर्वर्गणाकाण्डकोंको क्रमसे उल्लंघकर पुनः द्विचमनिर्वर्गणाकांडकके अन्तिमसमयकी उत्कृष्ट विशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिम निर्वर्गणाकांडककी जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी होकर जघन्यविशुद्धिका अन्त प्राप्त होनेतक करना चाहिए। इतनी दूर तक जो एक-एक निर्वर्गणाकाण्डकके अन्तरसे जघन्य और उत्कृष्ट विशुद्धिस्थानोंका अल्पबहुत्व कहा गया है उसमें कोई भेद नहीं है। इसका स्पष्टीकरण इसप्रकार है-प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके दूसरे समयकी (४३ की) उत्कृष्टविशुद्धिसे दूसरे निर्वर्गणाकांडकके दूसरे समयकी (४४ की) जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, इससे प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके तीसरेसमयकी (४४ की) उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है, इससे द्वितीयनिर्वर्गणाकांडकके तीसरेसमयकी (४५ की) जघन्यविशुद्धि अनन्तगुणी है, इससे प्रथमनिर्वर्गणाकांडकके चौथेसमयकी (४५ की) उत्कृष्टविशुद्धि अनन्तगुणी है। इसप्रकार दूसरे निर्वर्गणाकांडकके अंतिमसमयकी जघन्यविशुद्धिपर्यन्त अनन्तगुणत्व ले जाना चाहिए। इसीप्रकार तृतीय निर्वर्गणाकांडकके समयोंकी जघन्यविशुद्धि और द्वितीयनिर्वर्गणाकांडकके समयोंकी उत्कृष्टविशुद्धिका परस्पर अल्पबहुत्व कहना चाहिये। इसीप्रकार अनन्तर उपरिम निर्वर्गणाकांडकके जघन्यपरिणामोंका अनन्तर अधस्तन निर्वर्गणाकांडकके उत्कृष्टपरिणामोंके साथ क्रमसे अनुसन्धान करते हुए अधःप्रवृत्तकरणके अन्तिमसमयकी जघन्यविशुद्धि द्विचमनिर्वर्गणाकांडकके अन्तिमसमयकी उत्कृष्टविशुद्धिसे अनन्तगुणी होकर जघन्यविशुद्धियोंके अन्तको प्राप्त होती है; यहां ले जाना चाहिए। पुनः द्विचमनिर्वर्गणाकांडकके अन्तिमसमयकी (५३ की) उत्कृष्टविशुद्धिसे अधःप्रवृत्तकरणके अंतिमसमयकी
चरिमे सव्वे खंडा दुचरिमसमओत्ति अवरखंडाए ।
असरिसखंडाणोली अधापवत्तम्हि करणम्हि ॥४७॥
पढमे करणे अवरा णिठवग्गणसमयमेत्तगा तत्तो ।
अहिगदिणा वरमवरं तो वरपंती अणंतगुणिदकमा ॥४८॥
पढमे करणे पढमा उड्डगसेढी य चरिमसमयस्स ।
तिरियगखंडाणोली असरित्थाणंतगुणिदकमा ॥४९॥
अर्थ (गाथा 42 से 49): आदिकरण (अध प्रवृत्तकरण) के कालमे प्रतिसमय अधिकक्रम लिए हुए असंख्यातलोकप्रमाण परिणाम होते है । विशेष (चय) को प्राप्त करनेके लिए अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रतिभाग है । उस अध प्रवृत्तकरणकालके (समयोके) संख्यातवेभागप्रमाण अनुकृष्टिरचनाका आयाम है और जितना वह आयाम है उतने समयोका एक-निर्वर्गणाकाण्डक होता है । निर्वर्गणाकाण्डकके संमान प्रतिसमयके परिणामोंके क्रमशः खण्ड होते है, वे खण्ड अधिकक्रमवाले होते है । यहा विशेषको प्राप्त करनेका प्रतिभाग अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है । प्रत्येकखण्डमे असंख्यातलोकप्रमाण परिणाम है । प्रत्येकखण्डमे षट्स्थानपतितवृद्धि असंख्यातलोकबार होती है । एक-एक विशेष ( चय ) मे भी षट्स्थानपतितवृद्धि असंख्यातलोकबार होती है । प्रथमसमयका प्रथमखण्ड और चरमसमयका अन्तिमखण्ड ये विसदृश और शेषखण्ड सदृश है । सर्वखण्डोका आदि ‘अष्टाक’ है और अन्त ‘उर्वाक’ है । चरमसमयके सर्वखण्ड और प्रथमसमयसे लेकर द्विचरमसमयपर्यन्तका सर्वप्रथमखण्ड, यह अध प्रवृत्तकरणमे असदृशखण्डोकी पंक्ति है । प्रथम ( अध प्रवृत्त ) करणमे निर्वर्गणाकाण्डकप्रमाण समयोमे प्रत्येकसमयके प्रथमखंडके जघन्यपरिणाम ऊपर-ऊपर अनन्तगुणे क्रमसे है । निर्वर्गणाकाण्डकके चरमसमयसम्बन्धी जघन्यपरिणामसे प्रथमसमयका उत्कृष्टपरिणाम अनन्तगुणा है, उससे द्वितीय निर्वर्गणाकाण्डकके प्रथमसमयके प्रथमखण्डका जघन्यपरिणाम अनन्तगुणा है इसप्रकार जघन्यसे उत्कृष्ट और उससे जघन्य सर्पकी चालवत् अनन्तगुणेक्रमसे है । प्रथम (अध प्रवृत्त ) करणमे सर्वसमयोके प्रथमखण्डकी उर्ध्वश्रेणीरूपसे और चरमसमयके सर्वखण्डोंकी तिर्यगावलिरूपसे रचना करनेपर सर्व असदृशखण्डोकी पंक्ति हो जाती है जो अनन्तगुणित क्रमसे स्थित है ।
पढमं व विदियकरणं पडिसमयमसंखलोगपरिणामा ।
अहियकमा हु विसेसे मुहुत्तअंतो हु पडिभागो ॥५०॥
अर्थ: प्रथम अर्थात् अध प्रवृत्तकरण के समान द्वितीय अर्थात् अपूर्वकरण है । इसमे प्रतिसमय अधिक क्रमसहित असंख्यातलोक परिणाम होते हैं । विशेष (चय) के लिए अन्तर्मु हूर्तप्रमाण प्रतिभाग है ।
जम्हा उवरिमभावा हेट्ठिमभावेहिं णत्थि सारिसत्तं ।
तम्हा विदियं करणं अपुव्वकरणं त्ति णिद्दिट्ठं ॥५१॥
अर्थ: क्योंकि उपरिम समयके परिणाम नीचेले समयसम्बन्धी परिणामोके समान नही होते इसलिये इस दूसरे करणको अपूर्वकरण कहा गया है ।
विदियकरणादिसमयादंतिमसमओत्ति अत्तरावसुद्धी ।
अहिगदिणा खलु सव्वे होंति अणंतंसगुणिदक्कमा ॥५२॥
अर्थ: दूसरे अर्थात् अपूर्वकरणके प्रथमसमयसे लेकर अन्तसमयपर्यन्त प्रत्येक समयके जघन्यपरिणामसे उसी समयका उत्कृष्टपरिणाम अनन्तगुणी विशुद्धिवाला है। इस उत्कृष्टपरिणामसे अनन्तर उत्तरसमयका जघन्यपरिणाम अनन्तगुणी विशुद्धिवाला है। इसप्रकार सर्पकी चालके समान विशुद्धतासम्बन्धी अल्पबहुत्वका कथन है।
गुणसेढीगुणसंकमठिदरसखंडा अपुव्वकरणादो ।
गुणसंकमेण सम्मा मिस्साणं पूरणेत्ति हवे ॥५३॥
अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम समयसे लेकर, गुणसंक्रमण से सम्यक्त्व-मिश्रद्वय प्रकृतिके पूरनेके कालके चरमसमयपर्यन्त गुणश्रेणि, गुणसंक्रमण, स्थितिकाण्डकघात और अनुभागकाण्डकघात होते हैं ।
ठिदिबंधोसरणं पुण अधापवत्तादुपूरणेत्ति हवे ।
ठिदिबंधट्ठिदिखंडुक्कीरणकाला समा होंति ॥५४॥
अर्थ: स्थितिबन्धापसरण भी अध प्रवृत्तकरणसे लेकर सम्यक्त्व व मिश्रप्रकृतियोंके पूरणकालतक होता है । स्थितिबन्धापसरणकाल और स्थितिकाण्डकघातका उत्कीरणकाल, ये दोनो काल समान अर्थात् तुल्य होते हैं ।
गुणसेढीदीहत्तमपुव्वदुगादो दु साहियं होदि ।
गलिदवसेसे उद्यावलिबाहिरदो दु णिक्खेवो ॥५५॥
अर्थ: गुणश्रेणीकी दीर्घता अर्थात् गुणश्रेणीआयाम अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरणकालसे अधिक होता है वह गुणश्रेणीआयाम गलितावशेष है तथा उदयावलीसे बाह्यनिक्षेप होता है ।
णिक्खेवो पदित्थाणं मवरं समऊणआवलितिभागं ।
तेऊणावलिमित्तं विदियावलियादिमणिसेगे ॥५६॥
अर्थ: द्वितीयावलिका आदिनिषेक अर्थात् उदयावलिसे अनन्तर उपरिमानिषेक मे से द्रव्य अपकर्षितकरके नीचे उदयावलिमे देता है तब एकसमयकम आवलिका त्रिभाग तो जघन्यनिक्षेप है तथा आवलिके शेषनिषेक जघन्यअतिस्थापना है ।
एत्तो समऊणावलितिभागमेत्तो तु तं खु णिक्खेवो ।
उवरिं आवलिवज्जिय सगट्ठिदी होदि णिक्खेवो ॥५७॥
अर्थ: इस प्रथमनिषेकसे ऊपर एकसमय कम आवलिके त्रिभागतकके निषेकोके अपकृष्टद्रव्यका निक्षेप तो पूर्वोक्त ही है । इससे ऊपर अतिस्थापनारूप आवलिको छोड़कर अपनी-अपनी स्थितिप्रमाण निक्षेप होता है ।
उक्कस्सट्ठिदिबंधो समयजुदावलिदुगेण परिहीणो ।
ओक्कट्ठिदिम्मि चरिमे ठिदिम्मि उक्कस्सणिक्खेवो ॥५८॥
अर्थ: उत्कृष्टस्थितिका बन्ध होनेपर चरमस्थितिके अपकर्षितद्रव्यका समयाधिक दोआवलिहीन उत्कृष्टस्थितिप्रमाण उत्कृष्टनिक्षेप होता है ।
उक्कस्सट्ठिदि बंधिय मुहुत्तअंतेण सुज्झमाणेण ।
इगिकंडएण घादे तम्हि य चरिमस्स फालिस्स ॥५९॥
चरिमणिसेओक्कड्डे जेट्ठमदित्थावणं इदं होदि ।
समयजुदंतोकोडाकोडि विणूक्कस्सकम्मठिदी ॥६०॥
अर्थ (गाथा 59 से 60): उत्कृष्टस्थितिको बाधकर अन्तर्मुहूर्तके द्वारा विशुद्ध होता हुआ, अंतःकोड़ाकोड़िसागरप्रमाण स्थितिके अतिरिक्त शेष सम्पूर्ण उत्कृष्टस्थितिका एककांडकघातके द्वारा घात करनेवालेके कांडककी चरिमफालिके चरमनिषेकके अपकर्षितद्रव्यकी उत्कृष्टअतिस्थापना समयाधिक अन्त कोड़ाकोड़िसागरसे हीन उत्कृष्टकर्मस्थिति होती है ।
सत्तगट्ठिदिबंधो आदित्थियुक्कड्ढणे जहण्णेण ।
आवलिअसंखभागं तेत्तियमेत्तेव णिक्खिवदि ॥६१॥
अर्थ: बन्ध होनेपर सत्त्वकर्मकी अग्रस्थिति ( अन्तिमस्थितिके द्रव्य ) का उत्कर्षण होता है उस उत्कर्षणकी अतिस्थापना ( आदिस्थिति ) जघन्यसे आवलिके असंख्यातवेभाग होती है और जघन्यनिक्षेप भी उतना ही होता है ।
तत्तोदित्थावणगं वड्ढदि जावावली तदुक्कस्सं ।
उवरीदो णिक्खेवो वरं तु बंधिय ट्ठिदि जेट्ठं ॥६२॥
बोलिय बंधावलियं ओक्कड्डिय उदयदो दु णिक्खिविय ।
उवरिमसमये विदियावलिपढमुक्कड्डणे जादे ॥६३॥
तक्कालवज्जमाणे वारट्ठिदीए अदित्थियाबाहं ।
समयजुदावलियाबाहूणो उक्कस्सठिदिबंधो ॥६४॥
अर्थ (गाथा 62 से 64): उसके पश्चात् अतिस्थापना एक-एक समय बढ़ते हुए आवलिप्रमाण उत्कृष्ट अतिस्थापना हो जाती है, इसके पश्चात् निक्षेपावलिके असंख्यातवेभ से उत्कृष्टनिक्षेप प्राप्त होनेतक बढता है । उत्कृष्टनिक्षेप-उत्कृष्टस्थितिको बाघकर बधावलि बीत जानेपर उस उत्कृष्टस्थितिके अन्तिमनिषेकसम्बन्धी द्रव्यका अपकर्षणकरके उदयादि निषेकोमे निक्षेपण किया अर्थात् दिया । अनन्तर अगले समयमे द्वितीयावलि के प्रथमनिषेकका उत्कर्षण करनेके लिये उस अनन्तरसमयमें उत्कृष्टस्थितिस हेत बंधनेवाले कर्मकी उत्कृष्ट आबाधाको अतिस्थापना कर प्रथमादि निषेकोमे निक्षेपण होता है, किन्तु अन्तके एक समयाधिक आवलिप्रमाण निपेकोमे निक्षेपण नही होता । अत एकसमयाधिक आवली और आबाधाकाल इन दोनोसे न्यून उत्कृष्टस्थितिप्रमाण उत्कृष्टनिक्षेप हैं ।
अहवावलिगदुवरठ्ठिदपढमणिसेगे वरस्स बंधस्स ।
विदियणिसेगप्पहुदिसु णिक्खित्ते जेट्ठणिक्खेवो ॥६५॥
अर्थ: अथवा, आवलि व्यतीत हो जानेपर उत्कृष्टस्थिति के प्रथमनिषेकका द्रव्य बंधनेवाली उत्कृष्टस्थितिके द्वितीयादि निषेकमे निक्षेपण करनेपर उत्कृष्टनिक्षेप होता है२ ।
उक्कस्सट्ठिदिबंधे आबाहागा ससमयमावलियं ।
ओदरियणिसेगेसुक्कड्डेसु अवरमावलियं ॥६६॥
अर्थ: उत्कृष्टस्थितिका बन्ध होनेपर उस कर्मबन्धके आबाधाकालसम्बन्धी चरमसमयसे एकसमयअधिक आवलिकाल पूर्वतक जो उदय आने योग्य सत्कर्मनिषेक हैं, उनके द्रव्यका उत्कर्षण होनेपर आवलिप्रमाण जघन्यअतिस्थापना होती है ।
ओदरिय तदो बिदीयावलिपढमुक्कड्ढणे वरं हेट्ठा ।
अइच्छाएणमाबाहा समयजुदावलियपरिहीणा ॥६७॥
अर्थ: वहासे उतरकर सत्कर्मसम्बन्धी द्वितीयावलिके प्रथमनिषेक ( जो वर्तमानसमयसे आवलिकालके बाद उदयमे आवेगा ) का उत्कर्षण होनेपर अधस्तन समयाधिकआवलिसे हीन आबाधाकालप्रमाण उत्कृष्ट-अतिस्थापना होती है ।
उदयाणामावलिम्हि य उभयाणं बाहिरम्मि खिवणाट्ठं ।
लोयाणमसंखेज्जो कमसो उक्कड्ढणो हारो ॥६८॥
ओक्कड्डिदइगिभागे पत्तासंखेण भाजिदे तत्थ ।
बहुभागमिदं दव्वं उव्वरिल्लठिदीसु णिक्खिवदि ॥६९॥
सेसगभागे भजिदे असंखलोगेण तत्थ बहुभागं ।
गुणसेढीए सिंचदि सेसेगं च उदयम्हि ॥७०॥
उदयावलिस्स दव्वं आवलिभजिदे दु होदि मज्झधणं ।
रूऊणद्धाणद्धेणूणेण णिसेयहारेण ॥७१॥
मज्झिमधणमवहरिदे चयं चयं णिसेयहारेण ।
गुणिदे आदिणिसेयं विसेसहीणे कमं तत्तो ॥७२॥
ओक्कड्डिद्म्हि देदि हु असंखसमयप्पबद्धमादिम्हि ।
संखातीदगुणाक्कममसंख्यहीणं विसेसहीणकमं ॥७३॥
अर्थ (गाथा 68 से 73): उदयवान प्रकृतियोका उदयावलिमे क्षेपण करनेके लिए तथा उदय व अनुदयरूप दोनो प्रकारकी प्रकृतियोका उदयावलिसे बाहर क्षेपण करनेके लिए भागहार क्रमश असंख्यातलोक व अपकर्षणभागहारप्रमाण है । एकभागप्रमाण अपकर्षितद्रव्य को पल्यके असंख्यातवेभागसे भाजित करनेपर बहुभाग उपरितन स्थितियोमे दिया जाता है । शेष एकभावको असंख्यातलोकसे भाजित करनेपर बहुभाग गुणश्रेणिमे दिया जाता है और शेष एकभाग उदयावलिमे दिया जाता है । उदयावलिमे दिये जाने वाले द्रव्यको आवलिसे भाजित करनेपर मध्यधन होता है । एककम अद्ध्वानके आधे को निषेकभागहारमे से घटानेपर जो शेष रहे उसका मध्यमधनमे भाग देनेपर चयका प्रमाण प्राप्त होता है । चयको निषेकभागहारसे गुणा करनेपर प्रथमनिषेक प्राप्त होता है, उससे ऊपरके निषेक चयहीन-चयहीन क्रमसे है । अपकर्षितद्रव्यमे से गुणश्रेणिके प्रथमनिषेकमे असंख्यातसमयप्रबद्धप्रमाण द्रव्य देता है आगे गुणश्रेणिशीर्षतक असंख्यातगुणित क्रमसे देता है, अनन्तर असंख्यातगुणे हीन और उससे आगे क्रमसे चयहीन द्रव्य देता है ।
पडिसमयमोक्कड्डदि असंखगुणिदक्कमेण सिंचदि य ।
इदि गुणसेढीकरणं आउगवज्जाण कम्माणं ॥७४॥
अर्थ: प्रतिसमय असंख्यातगुणित क्रमसे द्रव्यका अपकर्षण करके सिंचन करता है । आयुके बिना शेष कर्मोंकी इसप्रकार गुणश्रेणि करता है ।
पडिसमयमसंखगुणं दव्वं संकमदि अप्पसत्थाणं ।
बंधुज्झियपयडीणं बंधंतसजादिपयडीसु ॥७५॥
एवंविह संकमणं पढमकसायाण मिच्छमिस्साणं ।
संजोजणखवणाए इदरेसिं उभयसेढिम्मि ॥७६॥
अर्थ (गाथा 75 से 76): प्रतिसमय बन्धरहित अप्रशस्तप्रकृतियोका द्रव्य असंख्यातगुणित क्रमसे बध्यमान स्वजाति प्रकृतियोंमें संक्रमण करता है । प्रथमअनन्तानुबन्धीकषायका ऐसा गुणसंक्रमण विसंयोजनाके कालमे होता है । मिथ्यात्व व सम्यग्मिथ्यात्व का गुण-संक्रमण दर्शनमोहनीयकर्मकी क्षपणामे होता है । शेष अप्रशस्तप्रकृतियोंका गुणसंक्रमण उपशम व क्षपकश्रेणियोमे होता है ।
पढमं अवरवरट्ठिदिखंडं पल्लस्स संखभागं तु ।
सायरपुधत्तमेत्तं इदि संखसहस्सखंडाणि ॥७७॥
अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम स्थितिखण्ड आयामका प्रमाण जघन्यसे तो पल्यका संख्यातवाभाग और उत्कृष्टसे पृथक्त्वसागरप्रमाण है । अपूर्वकरणमे संख्यातहजार स्थितिखण्ड होते हैं ।
आउगवज्जाणं ठिदिघादो पढमं दु चरिमठिदिसत्तो ।
ठिदिबंधो य अपुव्वो होदि हु संखेज्जगुणहीणो ॥७८॥
अर्थ: आयुकर्मको छोड़कर शेषकमोंका स्थितिघात होता है । अपूर्वकरणके प्रथमसमयके स्थितिसत्त्व और स्थितिबन्धसे चरमसमयमे अपूर्व स्थितिसत्त्व तथा स्थितिबन्ध संख्यातगुणाहीन होता है ।
एक्केकट्ठिदिखंडयणिवडणठिदिबंधओसरणाकाले ।
संखेज्जसहस्साणि य णिवडंति रसस्स खंडाणि ॥७९॥
अर्थ: एक स्थितिकाण्डकके पतनकालमे अथवा एक स्थितिबन्धापसरणकालमे संख्यातहजार अनुभागकाण्डकोंका पतन होता है२ ।
असुहाणं पयडीणं अणंतभागा रसस्स खंडाणि ।
सुहपयडीणं णियमा णत्थि त्ति रसस्स खण्डाणि ॥८०॥
अर्थ: अप्रशस्त प्रकृतियोके अनन्तबहुभागका घात होता है। प्रशस्त प्रकृतियो के अनुभाग का घात नियम से नही होता ।
रसगदपदेसगुणाहाणिट्ठाणगफड्डयाणि थोवाणि ।
अइत्थावणणिक्खेवे रसखंडेणंतगुणिदकमा ॥८१॥
अर्थ: अनुभागसम्बन्धी एकप्रदेश गुणहानिस्थानान्तरमे स्पर्धक स्तोक है । उनसे अतिस्थापना अनन्तगुणी है, उससे निक्षेप अनन्तगुणा और उससे अनन्तगुणा अनुभागकाडक है ।
पढमापुव्वरसादो चरिमे समये पसत्थइँदराणं ।
रससत्तमणंतगुणं अणंतगुणहीणयं होदि ॥८२॥
अर्थ: अपूर्वकरणके प्रथम समय सम्बन्धी प्रशस्त-अप्रशस्त प्रकृतियो का जो अनुभाग सत्त्व है उससे अपूर्वकरण के चरम समय मे प्रशस्तप्रकृतियो का अनुभाग तो अनन्तगुणा बढता हुआ तथा अप्रशस्त प्रकृतियो का अनन्तगुणा हीन होता हुआ अनुभाग सत्त्व है ।
बिदियं व तदियकरणं पडिसमयं एक्क एक्क परिणामो ।
अण्णं ठिदिरसखंडे अण्णं ठिदिबंधमाणुवई ॥८३॥
अर्थ: दूसरे करण (अपूर्वकरण) के समान ही तृतीयकरण (अनिवृत्तिकरण) होता है, किन्तु प्रतिसमय एक-एक परिणाम होता है। अन्य स्थितिकाण्डक, अन्य अनुभागकाण्डक और अन्य स्थितिबन्ध को प्रारम्भ करता है ।
संखेज्जदिमे सेसे दंसणमोहस्स अंतरं कुणइ ।
अण्णं ठिदिरसखंडं अण्णं ठिदिबंधणं तत्थ ॥८४॥
अर्थ: (अनिवृत्तिकरणकाल का) संख्यातवाभाग शेष रह जाने पर दर्शनमोहनीयकर्मका अन्तर करता है। वहा पर अन्यस्थितिकाण्डक अन्य अनुभागकाण्डक और अन्य ही स्थितिबन्ध होता है ।
एयट्ठिदिखंडुक्कीरणकाले अंतरस्स णिप्पत्ती ।
अंतोमुहुत्तमेत्तं अंतरकरणस्स अद्धाणं ॥८५॥
अर्थ: एक स्थितिकाण्डकोत्कीरणकाल के द्वारा अन्तरकी निष्पत्ति होती है । अन्तरकरणका अध्वान अन्तर्मुहूर्त मात्र है ।
गुणसेढीए सीसं तत्तो संखगुणं उवरिमठिदिं च ।
हेट्ठुवरिम्हि य आबाहुज्झिय बंधम्हि संछुहदि ॥८६॥
अर्थ: गुणश्रेणी शीर्ष और उससे संख्यातगुणे उपरितन निषेको के मिथ्यात्व द्रव्य को ग्रहण कर नीचे प्रथम स्थिति मे और ऊपर उस समय बंधने वाले मिथ्यात्व-कर्म की आबाधा को उल्लंघ करके बंधने वाले कर्मों के निषेकों के साथ द्वितीय स्थिति मे देता है।
अंतरकदपढमादो पडिसमयमसंखगुणिदमुवसमदि ।
गुणसंकमेण दंसणमोहणियं जाव पढमठिदी ॥८७॥
अर्थ: अन्तर कर चुकने के पश्चात् प्रथम समय से प्रथमस्थिति के अन्त तकं प्रतिसमय गुणसक्रमण के द्वारा असंख्यातगुणे क्रमसे दर्शनमोह को उपशमाता है ।
पढमट्ठिदियावलिपडिआवलिसेससु णत्थि आगाला ।
पडिआगाला मिच्छत्तस्स य गुणसेढिकरणं पि ॥८८॥
अर्थ: प्रथम स्थिति मे आवली प्रत्यावली अर्थात् उदयावली और द्वितीयावली अवशेष रहने पर आगल-प्रत्यागाल तथा मिथ्यात्व की गुणश्रेणी नही होती है ।
अंतरपढमं पत्ते उवसमणामो हु तत्थ मिच्छत्तं ।
ठिदिरसखंडेण विणा उवट्टाइदूण कुणदि तिधा ॥८९॥
अर्थ: अन्तर के प्रथम समय को प्राप्त होने पर उपशम सम्यग्दृष्टिजीव वहां पर मिथ्यात्व को अपवर्तन करके स्थितिकांडकघात व अनुभागकाण्डकघात के बिना तीन प्रकार करता है ।
मिच्छत्तमिससम्मसरूवेण य तत्तिधा य दव्वादो ।
सत्तीदो य असंखाणंतेण य होंति भजियकमा ॥९०॥
अर्थ: मिथ्यात्व, मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व), सम्यक्त्व प्रकृतिरूप दर्शनमोहनीय कर्म तीन प्रकार होता है वह क्रमसे द्रव्य की अपेक्षा असंख्यातवा भाग मात्र और अनुभाग की अपेक्षा अनन्तवा भाग प्रमाण जानना२ ।
पढमादो गुणसंकमचरिमोत्ति य सम्ममिस्ससम्मित्ते ।
अहिगदिणाऽसंखगुणो विज्झादो संकमो तत्तो ॥९१॥
अर्थ: गुणसक्रम कालके प्रथम समय से अन्तिम समय पर्यन्त प्रतिसमय सर्प की गति के समान असंख्यातगुणे क्रम सहित मिथ्यात्वरूप द्रव्य है वह सम्यक्त्व और मिश्रप्रकृति रूप परिणमता है । इसके (गुणसंक्रमण के) पश्चात् विध्यात संक्रमण होता है ।
विदियकरणादिमादो गुणसंकमपूरणस्स कालोत्ति ।
वोच्छं रसखंडुक्कीरणकालादीणमप्प बहु ॥९२॥
अर्थ: अपूर्वकरण के प्रथम समय से गुणसक्रमणकाल के पूर्ण होने तक किये जाने वाले अनुभागकाण्डकोत्कीरणकालादि का अल्पबहुत्व कहेगे । (इस प्रकार प्रस्तुत गाथा मे आचार्यदेव ने आगे किये जाने वाले कथन की प्रतिज्ञा की है । )
अंतिमरसखंडुक्कीरणकालादो दु पढमओ अहियो ।
तत्तो संखेज्जगुणो चरिमट्ठिदिखंडहदिकालो ॥९३॥
अर्थ: अन्तिम अनुभागकाण्डकोत्कीरण काल से प्रथम अनुभाग काण्डकोत्कीरणकाल विशेषाधिक है । उससे अन्तिम स्थितिकाण्डक काल व स्थितिबन्धापसरणकाल सख्यातगुणा है ।
तत्तो पढमो अहिक्को पूरणगुणसेढिसीसपढमठिदी ।
संखेण य गुणियकमा उवसमगद्धा विसेसहिया ॥९४॥
अर्थ: चरम स्थितिकाण्डकोत्कीरण काल से प्रथमस्थितिकाण्डकोत्कीरण काल अधिक है। इससे सम्यक्त्वप्रकृति व सम्यग्मिथ्यात्व (मिश्र प्रकृति) के पूरण का काल सख्यात गुणा है। इससे गुणश्रेणीशीर्ष संख्यातगुणा है, इससे प्रथम स्थिति सख्यातगुणी है और इससे उपशम करने का काल विशेषाधिक है।
अणियट्टीसंखगुणो णियट्टिगुणसेढियायदं सिद्धं ।
उवसंतद्धा अंतर अवरवरावाह संखगुणियकमा ॥९५॥
अर्थ: अनिवृत्तिकरण का काल संख्यातगुणा है इससे अपूर्वकरण का काल, गुणश्रेणि का आयाम, उपशम सम्यक्त्वका काल, अन्तरायाम, जघन्य आबाधा और उत्कृष्ट आवाधा ये संख्यातगुणित क्रम से है ।
पढमापुव्वजहण्णट्ठिदिखंडमसंखसंगुणं तस्सं ।
अवरवरट्ठिदिबंधा तट्ठिदिसत्ता य संखगुण्णियकमा ॥९६॥
अर्थ: अपूर्वकरण के प्रथम समय मे जघन्य स्थितिखण्ड असंख्यातगुणा है; इससे संख्यातगुणा जघन्य स्थितिबन्ध है । इससे संख्यातगुणा उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है, इससे संख्यातगुणा जघन्य स्थितिसत्त्व तथा उससे संख्यातगुणा उत्कृष्ट स्थितिसत्त्व है । इसप्रकार संख्यात गुणित क्रम से स्थान जानना ।
अंतोकोडाकोडी जाहे संखेज्जसायरसहस्से ।
ऊणा कम्माण ठिदी ताहे उवसमगुणं गहइ ॥९७॥
अर्थ: जब संख्यात हजार सागर से हीन अन्त.कोडाकोडी प्रमाण स्थिति सत्त्व होता है उस समय मे उपशमसम्यक्त्व गुण को ग्रहण करता है ।
तट्ठाणे ठिदिसत्तो आदिमसम्मेण देससयलजमं ।
पडिवज्जमाणगस्स वि संखेज्जगुणेण हीणकमो ॥९८॥
अर्थ: उसी स्थान मे यदि देशसंयम सहित प्रथमोपशम सम्यक्त्व को ग्रहण करे तो उसके पूर्वोक्त स्थितिसत्त्व से संख्यातगुणा हीन स्थिति सत्त्व होता है और यदि सकलसंयम सहित प्रथमोपशमसम्यक्त्व को प्राप्त करे तो उसके उससे भी संख्यातगुणा हीन स्थिति सत्त्व होता है ।
उवसमसम्मत्तद्धा छावलिमित्ता दु समयमेत्तोत्ति ।
अवसिट्ठे आसाणो अणअण्णदरुदयदो होदि ॥१००॥
अर्थ: प्रथमोपशमसम्यक्त्वके काल मे उत्कृष्टकाल छह आवलि और जघन्यकाल एक समय मात्र अवशेष रह जाने पर अनन्तानुबन्धी क्रोध-मान-माया-लोभ इन चारों मे से किसी एक के उदय होने से सम्यक्त्व की आसादना ( विराधना ) होकर सासादन गुणस्थान होता है ।
'सायारे पट्ठवगो णिट्ठवगो मज्झिमो य भजिणिज्जो ।
जोगे अण्णदरम्हि दु जहण्णए तेउलेस्साए ॥१०१॥
अर्थ: दर्शनमोहके उपशमन का प्रस्थापक जीव साकार उपयोग मे विद्यमान होता है, किन्तु उसका निष्ठापक और मध्य अवस्थावर्ती जीव भजितव्य है । तीनो योगो मे से किसी एक योग मे विद्यमान तथा तेजोलेश्या के जघन्य अंश को प्राप्त वह जीव दर्शनमोह का उपशामक होता है ।
'अंतोमुहुत्तमद्धं सव्वोवसमेण होदि उवसंतो ।
तेण परं उदओ खलु तिण्णेक्कदरस्स कम्मस्स ॥१०२॥
अर्थ: अन्तर्मुहूर्त काल तक सर्वोपशमसे उपशान्त रहता है इसके पश्चात् नियम से तीन कर्म प्रकृतियो मे से किसी एक का उदय होता है ।
उवसमसम्मतुवरिं दंसणमोहं तुरंत पूरेदि ।
उदयिल्लस्सुदयादो सेसाणं उदयबाहिरदो ॥१०३॥
अर्थ: उपशम सम्यक्त्वकाल के ऊपर जो दर्शनमोह के अन्तरायाम का शेष भाग, उसको शीघ्र ही पूरता है । उदयवान प्रकृतिके द्रव्य को तो उदयस्थिति से देना प्रारम्भ करता है और शेष दो अनुदय प्रकृति के द्रव्य को उदयावलि से बाहर देता है ।
ओक्कट्टिदट्ठइगिभागं समपउट्टीए विसेसहीणकमं ।
सेसासंखाभागे विसेसहीणेण खिवदि सव्वत्थ ॥१०४॥
अर्थ: अपकृष्ट द्रव्यका एक भाग तो चय (विशेष) हीन क्रम से उदयावलि मे देना शेष असंख्यात बहुभाग सर्वत्र विशेष (चय) हीन क्रम से दिया जाता है । अपकृष्टावशिष्ट द्रव्य कहते है, उस द्रव्यमे से, अन्तर्रायामके निषेकोका अभाव था उन निषेकोका सद्भाव करने के लिये कितना एक (कुछ) द्रव्य दिया जाता है । उस देय द्रव्यका कितना प्रमाण है यह जाननेका विधान कहते है- नानागुणहानिमे स्थित सम्यक्त्वप्रकृतिकी द्वितीयस्थितिके द्रव्यको अपकर्षण भागहारका भाग देकर एक भाग पृथक् करके अवशिष्ट बहुभागप्रमाण द्रव्यमे “द्विवड्ढगुणहाणिभाजिदे पढमा”१ इस सूत्र द्वारा साधिक डेढ़गुणहानिप्रमाणका भाग देने पर उस द्वितीय स्थितिके प्रथम निषेकका प्रमाण प्राप्त होता है, सो इसके बराबर अतरायामके सर्व निषेकोको चय रहित स्थापित करके जोडनेसे आदिधनका प्रमाण प्राप्त होता है । ‘पवहतमुखमादिधन’२ इस करण सूत्रसे अन्तर्रायामप्रमाण गच्छसे उस प्रथम निषेकको गुणा करने पर अन्तर्रायामके निषेकोका आदिधन प्राप्त हुआ । तथा द्वितीय स्थितिके नीचे अन्तर्रायामके निषेक है इसलिये द्वितीयस्थितिके आदि निषेकसे चय वृद्धि (बढ़ते) क्रमसे अन्तर्रायामके निषेक है । चयका प्रमाण प्राप्त करने की विधि कहते है- द्वितीय स्थितिकी प्रथमगुणहानिके प्रथमनिषेक से अधस्तनवर्ती अन्तर्रायाम सम्बन्धी गुणहानिके प्रथम निषेकका द्रव्य दोगुना प्रमाण युक्त चय है । इसको दो गुणहानिका भाग देनेपर अन्तर्रायाममे चयका प्रमाण प्राप्त होता है । “सैकपदाहृतपददलचयहतमुत्तरधन”३ इस सूत्रसे यहा अन्तर्रायामप्रमाण गच्छ है, सो एक अधिक गच्छसे गच्छके आधेको गुणा करके पुन: चयसे गुणा करनेपर उत्तरधन प्राप्त होता है । इसप्रकार प्राप्त आदिधन और उत्तरधन (चयधन) को जोडनेपर जो प्रमाण प्राप्त हुआ उतना द्रव्य उक्त अपकृष्टावशिष्ट द्रव्य से ग्रहणकर अन्तर्रायाममे देना । द्वितीय
मिच्छाइट्ठी जीवो उवइट्ठं पवयणं ण सद्दहदि ।
सद्दहदि असब्भावं उवइट्ठं वा अणुवइट्ठं ॥१०६॥
अर्थ (गाथा 106 से 108): मिथ्यात्व का वेदन करनेवाला जीव विपरीत श्रद्धानवाला होता है । जैसे ज्वर से पीडित मनुष्य को मधुर रस नही रुचता है वैसे ही मिथ्यादृष्टि को धर्म नहीं रुचता । मिथ्यादृष्टिजीव नियम से उपदिष्ट प्रवचन का श्रद्धान नहीं करता, उपदिष्ट या अनुपदिष्ट असद्भाव का श्रद्धान करता है ।
प्रथमोपशमसम्यक्त्व चूलिका
सव्वेहिं द्विदिविसेसेहिं उवसंता होंति तिण्णि कम्मंसा ।
एक्कम्हि य अणुभागे णियमा सव्वे द्विदि विसेसा ॥१॥
अर्थ: दर्शनमोहनीय कर्म की तीनो प्रकृतिया सभी स्थिति विशेषो के साथ उपशान्त रहती हैं तथा सभी स्थिति विशेष नियमसे एक अनुभागमे अवस्थित रहते हैं ।
सम्मत्तपढमलंभो सव्वोवसमेण तह वियट्ठेण ।
भजियव्वो य अभिवक्खं सव्वोवसमेण देसेणं ॥२॥
अर्थ: सम्यक्त्व का प्रथम लाभ सर्वोपशम से ही होता है तथा विप्रकृष्ट जीव के द्वारा भी सम्यक्त्व का लाभ सर्वोपशम से ही होता है, किन्तु शीघ्र ही पुनः पुनः सम्यक्त्व को प्राप्त करने वाला जीव सर्वोपशम और देशोपशम से भजनीय है।
मिच्छत्तपच्चयओ खलु बंधो उवसामगस्स बोद्धव्वो ।
उवसंते आसाणे तेण परं होदि भजिदव्वो ॥२॥
अर्थ: दर्शनमोहनीयका उपशम करने वाले जीवके नियम से मिथ्यात्व निमित्तक बन्ध जानना चाहिए, किन्तु उसके उपशान्त रहते हुए मिथ्यात्वनिमित्तक बन्ध नही होता तथा उपशात अवस्था के समाप्त होने के पश्चात् मिथ्यात्व निमित्तक बन्ध भजनीय है ।
मिच्छत्तवेदणीय कम्म उवसामगस्स बोद्धव्व ।
उवसंते आसाणे तेण परं होदि भजिदव्वो ॥३॥
अर्थ: दर्शनमोहनीय का उपशम करने वाले जीव के मिथ्यात्वकर्म का उदय जानना चाहिए। दर्शनमोह की उपशान्त अवस्था मे मिथ्यात्वकर्म का उदय नही होता । उपशमसम्यक्त्व की आसादना के अनन्तर उसका ( मिथ्यात्वका) उदय भजनीय है।
सम्मत्तपढमलंभस्साणंतरं पच्छदो य मिच्छत्तं ।
लभस्स अपढमस्स दु भजिदव्वो पच्छदो होदि ॥५॥
अर्थ: सम्यक्त्व के प्रथम लाभ-(उपशमसम्यक्त्व) के अनन्तर ( पच्छदो ) पूर्व मिथ्यात्व ही होता है । अप्रथमलाभ (क्षयोपशम सम्यक्त्व) के ( पच्छदो ) पूर्व मिथ्यात्व भजनीय है’ ।
मिस्सुदये सम्मिस्सं दहिगुडमिस्सं व तच्चमियरेण ।
सदहदि एक्कसमये मरणे मिच्छो व अयदो वा ॥१०७॥
अर्थ: मिश्रप्रकृति के उदय मे दधि और गुड के मिश्रित स्वादके समान एक समयमे सम्यक्त्व व मिथ्यात्व मिश्रित तत्त्व का इतर जाति ( जात्यन्तर ) रूप श्रद्धान होता है । मरणकाल मे मिथ्यात्व या असंयत सम्यग्दृष्टि गुणस्थान होता है । जो नियम से मिथ्यादृष्टि जीव है वह नियम अर्थात् निश्चय से जिनेन्द्र द्वारा उपदिष्ट प्रवचन का श्रद्धान नही करता है ।
मिच्छत्तं वेदंतो जीवो विवरीयदंसणं होदि ।
ण य धम्मं रोचेदि हु मधुरं खु रसं जहा जुरिदो ॥१०८॥
अथ क्षायिकसम्यक्त्व प्ररूपणा अधिकार
दंसणमोहक्खवणापट्ठवगो कम्मभूमिजो मणुसो ।
तित्थयरपायमूले केवलिसुदकेवलीमूले ॥११०॥
अर्थ: कर्मभूमि मे उत्पन्न हुआ मनुष्य तीर्थङ्कर के या अन्यकेवली अथवा श्रुतकेवली के पादमूल मे दर्शनमोहकी क्षपणा का प्रस्थापक-प्रारम्भ करनेवाला होता है।
णिट्ठवगो तट्ठाणे विमाणभोगावणीसु धम्मे य ।
किदकरणिज्जो चदुसु वि गदीसु उप्पज्जदे जम्हा ॥१११॥
अर्थ: प्रारम्भक काल के अनन्तर समय से लगाकर क्षायिकसम्यक्त्व ग्रहण के समय से पहले तक निष्ठापक होता है । यह निष्ठापक जहा दर्शनमोह की क्षपणा का प्रारम्भ हुआ वहा ही या सौधर्मादिस्वर्गोमे या कल्पातीत विमानो मे या भोगभूमिज मनुष्य-तिर्यंचो मे अथवा प्रथम धर्मानरक मे होता है; अर्थात् निष्ठापक इतनी जगह हो सकता है, क्योकि बद्धायुष्क कृतकृत्य वेदक सम्यक्त्वी मरकर चारो गतियो मे उत्पन्न होता है ।
अणियट्टीअद्धाए अणस्स चत्तारि होंति पठवाणि ।
सायरलक्खपुधत्तं पल्लं दूरावकिट्ठि उच्छिट्ठं ॥११३॥
अर्थ: अनिवृत्तिकरणकाल में अनन्तानुबन्धीकषायके पृथक्त्वलखसागर, पल्यप्रमाण, दूरापकृष्टिप्रमाण और उच्छिष्टावलि प्रमाणरूप चार स्थितिसत्त्व होते है ।
पल्लस्स संखभागो संखा भागा असंखगा भागा ।
ठिदिखंडा होंति कमे अणस्स पठवादु पण्वोत्ति ॥११४॥
अर्थ: अनन्तानुबन्धीके स्थितिसत्त्वके प्रथम पर्वसे दूसरे पर्व पर्यन्त, दूसरे से तीसरे पर्व पर्यन्त और तीसरे से चौथे पर्व पर्यन्त जो स्थितिकाण्डक होते है उनका आयाम क्रम से पल्यका संख्यातवाभाग, पल्यका संख्यात बहुभाग और पल्यका असख्यात बहुभागमात्र है ।
अणियट्टीसंखेज्जा भागेसु गदेसु अणगठिदिसत्तो ।
उदधिसहस्सं तत्तो वियले य समं तु पल्लादी ॥११५॥
अर्थ: अनिवृत्तिकरणकालके संख्यात बहुभाग व्यतीत होने पर एक भाग अवशिष्ट रहनेपर अनन्तानुबन्धीका स्थितिसत्त्व एक हजारसागर प्रमाण, पश्चात् विकलेन्द्रियके बन्ध समान, पश्चात् पल्य और आदि शब्दसे दूरापकृष्ट और आवलिमात्र होता है ।
उवधिसहस्सं तु सयं पण्णं एगवीसमेक्कयं चेव ।
वियलचउक्के एगे मिच्छुक्कस्सट्ठिदी होदि ॥११६॥
अर्थ: दर्शनमोह की क्षपणाके पहले तीनकरण विधान द्वारा अनन्तानुबन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ की उदयावलिसे बाह्य की स्थितिका अनिवृत्तिकरणके अन्त समयमे नियमसे विसंयोजन करता है । विकल चतुष्क अर्थात् असञ्ज्ञी पचेन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रिय के मिथ्यात्व का उत्कृष्ट स्थितिबन्ध क्रमसे एकहजारसागर, सौ सागर, पचास सागर, पच्चीससागर और एक सागरप्रमाण होता है । इन्ही के समान अनन्तानुबन्धी का स्थितिसत्त्व होता है । इसका कथन पूर्व मे किया ही है ।
अंतोमुहुत्तकालं विस्समिय पुणोवि त्तिकरणं करिय ।
अणियट्टीए मिच्छं मिस्सं सम्मं कमेण णासेइ ॥११७॥
अर्थ: अनन्तानुबन्धीका विसयोजन करनेके पश्चात् अन्तर्मुहूर्त तक विश्राम करके फिर तीन करणोको करता है। अनिवृत्तिकरणकालमे मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति को नष्ट करता है ॥११७॥
अणियट्टीकरणपढमे दंसणमोहस्स सेसगाण ठिदी ।
सायरलक्खपुधत्तं कोडीलक्खपुधत्तं च ॥११८॥
अर्थ: अनिवृत्तिकरणके प्रथम समयमें दर्शनमोहकी स्थिति पृथक्त्व लक्षसागरप्रमाण है और शेष कर्मोंकी स्थिति पृथक्त्व लक्षकोटिसागर प्रमाण है ॥११८॥
असंठिदिसत्तादो पुधत्तमेत्ते पुधत्तमेत्ते य ।
ठिदिखंडे य हवंति हु चउ ति दु एक्क पल्लठिदी ॥११९॥
अर्थ: विसयोजना करता है । इन करणोका लक्षण दर्शनमोहकी उपशामनामे जिसप्रकार कहा गया है उसीप्रकार यहा जानना चाहिये, क्योकि कोई विशेषता नही है । अधप्रवृत्तकरणरूप विशुद्धि द्वारा अन्तर्मुहूर्त कालतक विशुद्ध होने वाले जीवके प्रतिसमय केवल अनन्तगुणी विशुद्धि से विशुद्ध होता जाता है । अध प्रवृत्तकरण मे स्थितिघात, अनुभागघात, गुणश्रेणि और गुणसक्रमण नही होता, क्योकि अध प्रवृत्तकरणरूप विशुद्धि स्थितिघात आदि का कारण नही है । हजारो स्थितिवन्धापसरण, अशुभकर्मों का प्रतिसमय अनन्तगुणीरूप से अनुभागबन्धापसरण और शुभ कर्मोंका अनन्तगुणी वृद्धिरूप से चतु स्थानीय अनुभागबन्ध यह अध प्रवृत्तकरण विशुद्धियोका फल जानना चाहिये ।
अपूर्वकरणमे स्थितिघात, अनुभागघात, गुणश्रेणि और गुणसंक्रमण है । यहा की गुणश्रेणि सम्यक्त्वकी उत्पत्ति, सयतासयत और सयतसम्बन्धी गुणश्रेणियोसे प्रदेशोकी अपेक्षा असख्यातगुणी है तथा उनके आयामसे सख्यातगुणी हीन है । परन्तु गुणसक्रम अनन्तानुबन्धियोका ही होता है, अन्य कर्मोंका नही होता ऐसा कहना चाहिए । इसप्रकार प्रत्येक हजारो अनुभागकाडकोके अविनाभावी ऐसे स्थितिवन्धापसरणोके साथ होनेवाले हजारो स्थितिकाण्डको के द्वारा अपूर्वकरणके कालको समाप्त करता है । अपूर्वकरणके प्रथमसमयमे जो स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्म होता है उससे उसके अन्तिम समयमे स्थितिबन्ध और स्थितिसत्कर्म सख्यातगुणा हीन होता है । तत्पश्चात् प्रथमसमयवर्ती अनिवृत्तिकरणवाला हो जाता है । तव अनन्तानुबन्धियोका स्थितसत्कर्म अन्त कोडाकोडीके भीतर लक्षपृथक्त्वसागरोपमप्रमाण होता है । शेष कर्मोंका अन्त:कोडाकोडीके भीतर होता है । फिर भी अनिवृत्तिकरणमे प्रविष्ट हुए जीवके भी इसीप्रकार स्थितिकाडक, अनुभागकाडक, स्थितिवन्धापसरण, गुणश्रेणिनिर्जरा और गुणसक्रम परिणाम व्यामोहके बिना जानना चाहिए ।
अनिवृत्तिकरण मे भी पूर्वोक्त स्थितिकाडकघात, अनुभागकाडकघात, गुणश्रेणि, गुणसक्रमण आदि कार्य होते है । दर्शनमोहकी उपशामना मे जिसप्रकार अनिवृत्तिकरणमे अन्तरकरण होता है, उसप्रकार यहा पर नही होता है, क्योकि दर्शनमोह- दर्शनमोहकी पृथक्त्व लक्षसागरप्रमाण स्थिति प्रथम समयमे सम्भव होती है उससे आगे सख्यातहजार काण्डक होने पर असंज्ञीके बन्धके समान एक हजारसागर स्थितिसत्त्व रहता है । उसके पश्चात् बहुत-बहुत स्थितिकाडक हो जाने पर क्रमसे चतुरिन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, द्वीन्द्रिय और एकेन्द्रियके स्थितिबन्धके समान सौ सागर, पचाससागर, पच्चीससागर और एकसागर स्थितिसत्त्व होता है । पश्चात् बहुत स्थितिखण्ड होने पर पल्यप्रमाण स्थितिसत्त्व होता है ॥११९॥ पल्यकी स्थितिसत्त्वके बाद संख्यात बहुभाग आयामवाले संख्यातहजार स्थितिघात होजाने पर नियमसे दूरापकृष्ट संज्ञावाला स्थितिसत्त्व होता है ॥१२०॥ दूरापकृष्ट नामक स्थितिसत्त्वका प्रमाण पल्यके संख्यातवे भागमात्र है । उससे आगे पल्यमे असंख्यातका भाग देनेपर उसमेसे बहुभागप्रमाण आयामवाले संख्यातहजार स्थितिकाण्डक होनेपर सम्यक्त्वप्रकृतिके द्रव्यका अपकर्षण किया उसमे असंख्यात समयप्रबद्धप्रमाण उदीरणारूप द्रव्यको उदयावलीमे देता है । इसके पश्चात् बहुत स्थितिखण्डों के द्वारा मिथ्यात्वकी उच्छिष्टावलि अर्थात् उदयावलि मात्र स्थिति रह जाती है ॥१२१-१२२॥ जिस अवसरमे असंख्यात समयप्रबद्धकी उदीरणा होती है उस समयसे उत्तरकालमें उदयावलीमे द्रव्य देने के लिए भागहार पल्यका असंख्यातवा भागमात्र है । पूर्ववत् असंख्यातलोक मात्र नही है ॥१२३॥ मिथ्यात्वकी उच्छिष्टावलि स्थितिके बाद पल्यके असंख्यात बहुभागवाले संख्यात स्थितिखण्ड व्यतीत हो जानेपर सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका नियमसे उच्छिष्टावलिमात्र स्थितिसत्त्व रहता है ॥१२४॥ जब मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) की उच्छिष्टावलि प्रमाण स्थिति रहती है उसी समयमे रहनेके समयसे सम्यक्त्वप्रकृतिके पल्यके असंख्यात बहुभाग आयामवाले संख्यात
पल्लट्ठिदिदो उवरिं संखेज्जसहस्समेत्तठिदिखंडे ।
दूरावकिट्ठसण्णिदं ठिदिसत्तं होदि णियमेण ॥१२०॥
पल्लस्स संखभागं तस्स पमाणं तदो असंखेज्जं ।
भागपमाणे खंडे संखेज्जसहस्सगेसु तीदेसु ॥१२१॥
सम्मस्स असंखाणं समयपबद्धाणुदीरणा होदि ।
तत्तो उवरिं तु पुणो बहुखंडे मिच्छउच्छिट्ठं ॥१२२॥
जत्थ असंखेज्जाणं समयपबद्धाणुदीरणा तत्तो ।
पल्लासंखेज्जदिमो हारो णासंखलोगमिदो ॥१२३॥
मिच्छुच्छिट्ठादुवरिं पल्लासंखेज्जभागिगे खंडे ।
संखेज्जे समतीदे मिस्सुच्छिट्ठं हवे णियमा ॥१२४॥
मिस्सुच्छिट्ठे समये पल्लासंखेज्जभागिगे खंडे ।
चरिमे पडिदे चेट्ठदि सम्मस्सदवस्सठिदिसत्तो ॥१२५॥
अर्थ: स्थितिघात व्यतीत होकर यहा प्रकृत समयमें होते है । अन्तिमकांडकके पतन होनेपर सम्यक्त्वकी आठवर्षमात्र स्थिति शेष रहती है ॥१२५॥
मिच्छस्स चरमफालिं मिस्से मिस्सस्स चरिमफालिं तु ।
संछुहदि हु सम्मत्ते ताहे तेसिं च वरदव्वं ॥१२६॥
अर्थ: मिथ्यात्वप्रकृतिके अन्तिमकाण्डककी चरमफालि जिस समय सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिमे सक्रमित होती है उस समयमे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका द्रव्य उत्कृष्ट होता है । तथा सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिकी अन्तिमकांडककी चरमफालिका द्रव्य जिससमय सम्यक्त्वप्रकृतिमे सक्रमित होता है उस समयमे सम्यक्त्वप्रकृतिका द्रव्य उत्कृष्ट होता है ॥१२६॥
जदि होदि गुणिदकम्मो दव्वमणुक्कस्स समएण्हा । तेसिं ।
अवरठिदी मिच्छदुगे उच्छिट्ठे समयदुगसेसे ॥१२७॥
अर्थ: मिश्रद्विक अर्थात् मिश्रमोहनीय (सम्यग्मिथ्यात्व) और सम्यक्त्वमोहनीय इन दोनो प्रकृतियोकी अपनी अपनी अन्तिमफालियोका द्रव्य कुछकम डेढगुणहानि गुणित समयप्रबद्धप्रमाण है । पूर्वोक्त प्रकार उन दोनो अन्तिमफालियोके द्रव्यमे पल्यके असंख्यातवेभागका भाग देने पर एक भाग गुणश्रेणी निक्षेपमे दिया जाता है । गुणश्रेणि आयामरूप अन्तर्मुहूर्तकाल कम आठवर्ष प्रमाण ऊपरकी स्थितियो मे चरमावलिपर्यन्त ? सदृश चय से हीन इस रचनारूप शेष बहुभाग द्रव्य दिया जाता है । सम्यक्त्वमोहनीय की आठ वर्ष स्थिति करनेके समयसे लेकर ऊपर सर्वत्र उदयादि अवस्थिति गुणश्रेणि आयाम है तथा सम्यक्त्वमोहनीयकी स्थितिमे स्थितिखंड का आयाम अन्तर्मुहूर्तप्रमाण है । इसके आगे एक-एक स्थितिकाण्डक द्वारा अन्तर्मुहूर्त-अन्तर्मुहूर्त स्थिति घटाता है ।
मिस्सदुगचरिमफाली किंचूणादिवड्डसमयपबद्धपमा।
गुणसेढि करिय तदो असंखभागेण पुव्वं व ॥१२८॥
सेसं विसेसहीणं अडवस्सुवरिमठिदीए संखुद्धे ।
चरमाउलिं व सरिसी रयणा संजायदे एत्तो ॥१२९॥
अडवस्सादो उवरिं उदयादिअवट्ठिदं च गुणसेढी ।
अंतोमुहुत्तियं ठिदिखंडं च य होदि सम्मस्स ॥१३०॥
अर्थ: पुनः इन्ही अन्तिम दो फालिके पतन समयमे-आठवर्षकी स्थिति करनेके समयमे अनन्तगुणा हीन होकर लताके समान एक स्थानीय अनुभाग हुआ । यहासे लेकर पूर्वमे जो अन्तर्मु हूर्त कालके द्वारा अनुभागकाडकघात होता था उसका अभाव हुआ और प्रतिसमय अनन्तगुणे हीन क्रमसे अनुभागका अपवर्तन होने लगा । वहा अनन्तरवर्ती आठवर्ष स्थिति करनेके समयसे पूर्व समयमे निषेकका जो अनुभाग सत्त्व था उससे अनन्तगुणाहीन आठवर्ष स्थिति करनेके समयमे उदयावलिके ऊपरवर्ती उपरितानावलीके प्रथम निषेकका अनुभागसत्त्व अवशिष्ट रहता है । अवशिष्ट अनन्त बहुभागरूप अनुभागका विशुद्धि-विशेषसे अपवर्तन हुआ-नाश हुआ । तथा उसी समयमे उदयावलिके अन्तिम निषेकका अनुभागसत्त्व अपनेसे ऊपरवर्ती उस उपरितानावलिके ( द्वितीयावलि के ) प्रथमनिषेक सम्बन्धी अनुभाग सत्त्वसे अनन्तगुणा हीन रहता है तथा अवशिष्टका नाश होता है । पुन उससे अनन्तगुणा हीन उदयावलिके प्रथम निषेका अनुभागसत्त्व रहता है, शेषका नाश होता है । उससे अनन्तगुणाहीन आठवर्ष स्थितिकरनेके समयसे लेकर अनन्तरवर्ती आगामी समयमे अनन्तगुणाहीन अनुभागसत्त्व होता है । इसप्रकार प्रतिसमय अनन्तगुणा हीन अनुक्रमसे उच्छिष्टावलिके अन्तिम समय पर्यन्त अनुभागका अपवर्तन जानना ।
विदियावलिस्स पढमे पढमस्संते य आदिमणिसेये ।
तिट्ठाणोऽणंतगुणेणूणकमोवट्टणं चरमे ॥१३१॥
अर्थ: द्वितीयावलिके प्रथम निषेक, प्रथमावलि (उदयावलि) के अन्तिम निषेक और उदयरूप प्रथमनिषेक, इन तीनस्थानो मे सम्यक्त्वकी आठवर्षकी स्थितिसे उच्छिष्टावलि पर्यन्त सम्यक्त्वप्रकृतिके अनुभागका प्रतिसमय अनन्तगुणे घटते क्रमसे अपवर्तनघात होता है ।
अडवस्से उवरिम्मि वि दुचरिमखंडस्स चरिमफालित्ति ।
संखातीदगुणक्कम विसेसहीणक्कमं देदि ॥१३२॥
अर्थ: आठवर्ष की स्थिति करनेके अनन्तर समयसे लेकर द्विचरमकाण्डककी अन्तिमफालिके पतन समयतक उदयादि अवस्थित गुणश्रेणिआयाममे असंख्यातगुणा क्रम लिये हुए तथा ऊपर अन्तर्मुहूर्तकम आठवर्षप्रमाण स्थितियोमे विशेषहीन अर्थात् चय घटता क्रम लिये निक्षेपण होता है अर्थात् दिया जाता है ।
अडवस्से संपहियं पुव्विल्लादो असंखसंगुणियं ।
उवरिं पुण संपहियं असंखसंखं च भागं तु ॥१३३॥
ठिदिखंडाणुक्कीरण दुचरिमसमओत्ति चरिमसमये च ।
ओक्कट्टिदफालिगददव्वाणि णिसिंचदे जम्हा ॥१३४॥
अर्थ (गाथा 133 से 134): सम्यक्त्वप्रकृति की आठ वर्ष स्थिति शेष रहने के समयसे मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) और सम्यक्त्व प्रकृति सम्बन्धी काण्डक की चरमफालियो का द्रव्य, पूर्व समय के सम्यक्त्वमोहनीय के सत्त्व द्रव्य से असंख्यातगुणा है । सम्यक्त्व मोहनीय के सत्त्व द्रव्यसे, स्थितिकाण्डकोत्कीर्णकालके द्विचरम समय पर्यन्त अपकर्षित फालिद्रव्य असंख्यातवे भाग है और अन्तिम समयमें अपकर्षित फालिद्रव्य संख्यातवे भाग है । यह द्रव्य निक्षेप किया जाता है ॥१३३-३४॥
अडवस्से संपहियं गुणसेढीसीसयं असंखगुणं ।
पुव्विल्लादो णियमा उवरि विसेसाहियं दिस्सं ॥१३५॥
अर्थ: सम्यक्त्वप्रकृति की आठ वर्ष स्थिति शेष रहने के समय गुणश्रेणीशीर्ष का द्रव्य अधस्तन गुणश्रेणीशीर्षके द्रव्यसे नियमत असंख्यातगुणा है । उपरिम गुणश्रेणि शीर्षो का दृश्यमान द्रव्य अपने अपने से पूर्व गुणश्रेणिशीर्ष के द्रव्यसे विशेषाधिक है ॥ १३५ ॥
अडवस्से य ठिदीदो चरिमेदर फालिपडिददव्वं खु ।
संखासंखगुणाणं तेणुँवरिमदिस्समाणमहियं सीसे ॥१३६॥
अर्थ: सम्यक्त्वप्रकृति की आठ वर्ष प्रमाण स्थिति शेष रहने पर समस्त स्थित द्रव्य से चरम फालि का द्रव्य संख्यातगुणा हीन है और अन्य फालियो का द्रव्य असंख्यातगुणा हीन है इसलिये उपरितन गुणश्रेणिशीर्षका द्रव्य विशेष अधिक है ॥१३६॥
जदि गोउच्छविसेसं रिणं हवे तोवि धणपमाणादो ।
जम्हा असंखगुणं ण गणिज्जदि तं तदो एत्थ ॥१३७॥
अर्थ: यद्यपि अधस्तन गुणश्रेणीशीर्ष से उपरितन गुणश्रेणीशीर्ष मे गोपुच्छ-चय ऋण है अर्थात् घटता है तो भी धन ( मिलाया जाने वाला द्रव्य ) के प्रमाणसे असंख्यातगुणा हीन है । इसलिये इस चयरूप ऋण को नही गिना अर्थात् द्रव्यप्रमाण लानेमे इसको दृष्टिसे ओझल कर घटाया नही गया ॥१३७॥
तत्तक्काले दिस्सं वज्जिय गुणसेडिसीसयं एक्कं ।
उवरिमठिदीसु वट्टदि विसेसहीणक्कमेणेव ॥१३८॥
अर्थ: उस समय गुणश्रेणिशीर्ष को छोडकर उपरिम स्थितियो मे दृश्यमान द्रव्य प्रत्येक निषेकमे विशेषहीन क्रमसे वर्तन करता है ॥१३८॥
गुणसेडिसंखभागं तत्तो संखगुणं उवरिमठिदीओ ।
सम्मत्तचरिमखंडो दुचरिमखंडादु संखगुणो ॥१३९॥
अर्थ: गुणश्रेणि के संख्यात बहुभाग को और उससे संख्यातगुणी उपरितन स्थितियोको घात के लिये ग्रहण करने वाला चरम स्थितिकाण्डक, द्विचरम स्थितिकाण्डक घात से संख्यातगुणा है ।
सम्मतचरिमखंडे दुच्चरिमफालित्ति तिण्णि पढवाओ ।
संपहियपुव्वगुणसेढीसीसे सीसे य चरिमम्हि ॥१४०॥
तत्थ असंखेज्जगुणं असंखगुणहीणयं विसेसूणं ।
संखातीदगुणं विसेसहीणं च दत्तिकमो ॥१४१॥
ओक्कट्टिद बहुभागे पढमे सेसेक्कभागबहुभागे ।
बिदिए पढवेवि सेसिगभागं तदिये जहा देदि ॥१४२॥
अर्थ (गाथा 140 से 142): सम्यक्त्व प्रकृतिके अन्तिम स्थितिकाण्डककी द्विचरमफालि तक दीयमान द्रव्यके तीन पर्व (श्रेणिया) है। वर्तमान इस समयकी गुणश्रेणिशीर्ष तक, प्राचीन गुणश्रणिशीर्ष तक, अन्तिम स्थिति काण्डक के अन्त तक। प्रथम पर्व मे अपकर्षित द्रव्यका असख्यात बहुभाग असख्यातगुणे क्रमसे दिया जाता है, उससे अनन्तर स्थितिमे असंख्यातगुणा हीन द्रव्य दिया जाता है । दूसरे पर्वमे शेष असंख्यातवे भागका असंख्यातबहुभाग द्रव्य विशेष हीन क्रमसे दिया जाता है, उससे अनन्तर स्थितिमे असंख्यातगुणा हीन द्रव्य दिया जाता है । तृतीय पर्व मे शेष एकभाग प्रमाण द्रव्य विशेष हीन क्रमसे दिया जाता है ।
उदयादिगलिदसेसा चरिमे खंडे हवेज्ज गुणसेढी ।
फाडेदि चरिमफालिं अणियट्टीकरणचरिमम्हि ॥१४३॥
चरिम फालिं देदि हु पढमे पब्वे असंखगुणिदकमा ।
अंतिमसमयम्हि पुणो पल्लासंखेज्जमूलाणि ॥१४४॥
अर्थ: अन्तिमकाण्डककी अन्तिमफालिका द्रव्य प्रथम पर्व (गलितावशेष गुणश्रेणि) मे असंख्यात- गुणित क्रमसे दिया जाता है। अन्तिम समयमे पल्यके असंख्यात प्रथम वर्गमूल प्रमाण द्रव्य दिया जाता है।
चरिमे फालि दिण्णे कदकरणिज्जेत्ति वेदगो होदि ।
सो वा मरणं पावइ चउगइगमणं च तद्भागे ॥१४५॥
देवेसु देवमणुए सुरणरतिरिए चउग्गईसुं पि ।
कदकरणिज्जुप्पत्ती कमेण अंतोमुहुत्तेण ॥१४६॥
अर्थ (गाथा 145 से 146): अन्तिमफालि द्रव्य के दिये जाने पर कृतकृत्यवेदक सम्यग्दृष्टि होता है । वहां मरण होवे तो चारो गतियोंमें जा सकता है । यदि अन्तर्मुहूर्तप्रमाण प्रथम भाग मे मरे तो देवगतिमे ही उत्पन्न होता है । तत्प्रमाण दूसरे भागमे मरण हो तो देव या मनुष्यो मे उत्पन्न होता है । तत्प्रमाण तृतीय भागमे मरण हो तो देव, मनुष्य या तिर्यंच (इन तीनो मे से किसी भी गति) मे उत्पन्न होता है । तत्प्रमाण चतुर्थभागमे मरण हो तो चारो गतियोमे उत्पन्न हो सकता है । सम्यक्त्वप्रकृतिके अन्तिम काण्डककी प्रथम फालिके पतन समयमे लेकर द्विचरमफालिके पतन समय पर्यन्त उदयादिगलितावशेष गुणश्रेणि आयाम जानना। अवशिष्ट अनिवृत्तिकरणकालके अन्तिम समयमे अन्तिम काण्डककी चरमफालिका पतन होता है।
करणपढमादु जावय किदुकिच्चुवरिं मुहुत्तअंतोत्ति ।
ण सुहाण परावत्ती सा धि कओदावरं तु वरिं ॥१४७॥
अर्थ: अध करण से लेकर कृतकृत्यवेदक के ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल तक शुभ लेश्या को बदलता नही अर्थात् शुभ लेश्यामे अवस्थित रहता है। अन्तर्मुहूर्त पश्चात् यदि अन्य लेश्या रूप परिणमता है तो जघन्य कापोतलेश्याका अतिक्रम नही करता है।
अणुसमओ वट्ठाणं कदकिज्जंतोत्ति पुव्वकिरियादो ।
वट्टदि उदीरणां वा असंखसमयप्पबद्धाणं ॥१४८॥
अर्थ: पूर्व प्रयोग वश कृतकृत्यवेदक कालके अन्त तक प्रतिसमय सम्यक्त्वके अनुभागका अनन्तगुणी हानिरूप से अपवर्तन होता है तथा कृतकृत्य वेदककालमें एक समय अधिक एक आवलिकाल शेष रहने तक असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा भी होती है ।
उदयवहिं ओक्कट्टिय असंखगुणमुदयआवलिम्हि खिवे ।
उवरिं विसेसहीणं कदकिज्जो जाव अट्ठठवणं ॥१४९॥
अर्थ: उदयावलिसे बाहरके द्रव्यको अपकर्षित करके उदयावलिमे असंख्यातगुणे क्रमसे दिया जाता है उससे ऊपर कृतकृत्यवेदककाल मे अतिस्थापना शेष रहने तक विशेषहीन क्रमसे द्रव्य दिया जाता है ॥१४९॥
जदि संकिलेसजुत्तो विसुद्धिसहिदो अतो वि पडिसमयं ।
दव्वमसंखेज्जगुणं ओक्कट्टदि णत्थि गुणसेढी ॥१५०॥
अर्थ: कृतकृत्य वेदक सम्यग्दृष्टि चाहे संक्लेशको प्राप्त हो चाहे विशुद्धिको तो भी उसके एक समय अधिक आवलिकाल शेष रहने तक प्रतिसमय असंख्यातगुणे द्रव्यका अपकर्षण होता है, किन्तु गुणश्रेणि नही होती ॥१५०॥
जदि वि असंखेज्जाणं समयपबद्धाणुदीरणा तोवि ।
उदयगुणसेढिठिदिए असंखभागो दु पडिसमयं ॥१५१॥
अर्थ: यद्यपि असंख्यात समयप्रबद्धोकी उदीरणा होती है तथापि प्रतिसमय उदय द्रव्यसे उत्कृष्ट उदीरणा द्रव्य असंख्यातवेंभाग मात्र है ॥१५१॥
विदियकरणादिमादो कदकरणिज्जस्स पढमसमओत्ति ।
वोच्छं रसखंडुक्कीरणकालादीणमप्पबहु ॥१५२॥
अर्थ: द्वितीय करण (अपूर्वकरण) के प्रथमसमय से लेकर कृतकृत्यवेदक के प्रथम समयपर्यन्त अनुभागकाण्डकोत्कीरण कालादिक के अल्पबहुत्वसम्बन्धी ३३ स्थानों का कथन आगे करेंगे ।
रसठिदिखंडुक्कीरणअद्धा अवरं वरं च अवरवरं ।
सव्वत्थोवं अहियं संखेज्जगुणं विसेसहियं ॥१५३॥
कद्दकरणसम्मखवणाणियट्टिअपुव्वद्ध संखगुणिदकमं ।
तत्तो गुणसेढिस्स य णिक्खेवो साहियो होदि ॥१५४॥
सम्मदुचरिमे चरिमे अडवस्सरूसादिमे य ठिदिखंडा ।
अवरवरावाहावि य अडवस्सं संखगुणिदकमा ॥१५५॥
अर्थ: उत्कृष्ट आबाधा संख्यातगुणी है, क्योंकि अपूर्वकरणके प्रथम समयमे होनेवाले संख्यातगुणे स्थितिबन्धकी आवाधाका ग्रहण है । ये सब अन्तर्मुहूर्त प्रमाण है ॥१४॥ उससे सम्यक्त्वप्रकृतिकी आठवर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा है, क्योंकि अन्तर्मुहूर्तकालसे आठवर्षप्रमाण स्थितिसत्कर्म संख्यातगुणा सिद्ध है ॥१५॥ (गाथा १५५)
सम्मे असंखवस्सिय चरिमट्ठिदिखंडओ असंखगुणो ।
मिस्से चरिमे खंडियमहियं अडवस्समेत्तेण ॥१५६॥
अर्थ: उससे सम्यक्त्वप्रकृतिका असंख्यातवर्षप्रमाण अन्तिम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योंकि वह पल्यके असंख्यातवेभागप्रमाण है ॥१६॥ उससे सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतिका असंख्यातवर्षप्रमाण अन्तिम स्थितिकाँडक विशेष अधिक है । एक आवलिकम आठवर्ष विशेषका प्रमाण है, इसका कारण सुगम है ॥१७॥ (गाथा १५६)
मिच्छे खवदे सम्मदुगाणं ताणं च मिच्छसत्तं हि ।
पढमंतमठिदिखंडा असंखगुणिदा हु दुट्ठाणे ॥१५७॥
अर्थ: उससे मिथ्यात्वका क्षय होनेपर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका प्रथम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योकि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिकाण्डकसे द्विचरम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है । इसप्रकार त्रिचरम और चतुश्चरम आदि क्रमसे सख्यातहजार स्थितिकाण्डक नीचे जाकर मिथ्यात्व का क्षय होने पर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका तत्सम्बन्धी यह प्रथम स्थितिकाण्डक है । इसलिये यह स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है ॥१८॥ उससे मिथ्यात्व सत्कर्मवालेके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका अन्तिम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योकि मिथ्यात्व सत्कर्मवालेके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका जो अन्तिम स्थितिकाण्डक है, वह पूर्वके स्थितिकाण्डकसे अनन्तर अधस्तनवर्ती होनेसे पूर्वके स्थितिकाण्डकसे असंख्यातगुणा है ॥ १६ ॥ ( गाथा १५७, )
मिच्छंतमठिदिखंडो पल्लासंखेज्जभागमेत्तेण ।
हेट्ठिमठिदिप्पमाणेणब्भहियो होदि णियमेण ॥१५८॥
अर्थ: उससे मिथ्यात्वका अन्तिम स्थितिकाण्डक विशेष अधिक है, क्योकि मिथ्यात्वके उदयावलि बाह्य समस्त स्थितिसत्कर्मका ग्रहण होता है, परन्तु सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उस समय अधस्तन-पल्योपमके असंख्यातवेभागप्रमाण स्थितियोंको छोड़कर उपरिम बहुभागप्रमाण स्थितियोंका ग्रहण होता है । इस कारण अधस्तन असंख्यातवेभाग मात्रका प्रवेश होकर मिथ्यात्वका अन्तिम स्थितिकाण्डक विशेष अधिक हो गया है ॥२०॥- (गाथा १५८) -
दूरावकिट्ठिपढमं ठिदिखंडं संखसंगुणं तिण्णं ।
दूरावकिट्ठहेट्ठिठिदिखंडं संखसंगुणियं ॥१५९॥
अर्थ: उससे मिथ्यात्व सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके असंख्यातगुण हानिवाले स्थितिकाण्डकों में से प्रथम स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणा है, क्योकि पूर्वके स्थितिकाण्डकसे सख्यातहजार स्थितिकाण्डक असंख्यातगुणे, क्रमसे नीचे उतरकर दूरापकृष्ट संज्ञक स्थितिके असंख्यात- बहुभागके द्वारा इस स्थितिकाण्डककी प्रवृत्ति होती है ॥२१॥ उससे
पलिदोवमसंतादो विदियो पल्लस्स हेदुगो जादु ।
अवरो अपुव्वपढमे ठिदिखंडो संखगुणिदकमा ॥१६०॥
पलिदोवमसंतादो पढमो ठिदिखंडओ दु संखगुणो ।
पलिदोवमठिदिसंतं होदि विसेसाहियं तत्तो ॥१६१॥
बिदियकरणस्स पढमे ठिदिखंडविसेसयं तु तदियस्स ।
करणस्स पढमसमये दंसणमोहस्स ठिदिसंतं ॥१६२॥