तर्ज : वन्दे जिनवरम्
जैनी वह कहलाता है,
जो त्रि-लक्षण अपनाता है।
जो न अपनाए उसको,
अजैनी श्रेणी जाता है।।
पहला जिन-दर्शन तू जान,
छने नीर का कर तू पान।
रात्रि-भुक्ति का हो त्याग,
निज चेतन का कर तू ध्यान।।
प्रथम दो पालन करते हैं,
तीजे डगमग जाते हैं।
इक भी छूटा इन सबसे तो,
जैनी न कहलाता है।।
रात्रि-भोजन से क्या हानि,
तुम भी सोचो, हे ज्ञानी।
बने चले तुम अहिंसावादी,
कह निज को महाध्यानी।।
एक दिन तो विवाह-प्रसंग था,
सब बाराती आए थे।
5 जैनियों का संघ था,
पकवान अनेक बनाए थे।।
सबने खाना आरम्भ किया,
पर जैनों ने न खाया।
सबने उन पर उपहास किया,
पर उनको दृढ़ता में पाया।।
उसी रात में उस भोजन में,
सर्प पड़ा था विषधारी।
विष फैला था जन-जन में,
वह खुशी बन गई सुखहारी।।
दयावान उन जैनियों ने,
अस्पताल में पहुँचाया।
महा हृदय रख जैनियों ने,
उनको साधर्मी भाया।।
अतः लोग बच पाते हैं,
पर वह भी उनके कारण से।
अगर वे जैनी भोजन करते,
वह भी उन सम मर जाते।।
इससे समझो रात्रि-भुक्ति
कितनी हानिकारक है।
बढ़े गृद्धता, रुकती मुक्ति,
इसका उपाय एक स्मारक है।।
स्व-शरीर की है हानि,
कितने जीवों की हिंसा है।
बुद्धिपूर्वक छोड़े ज्ञानी,
उसे छोड़ना अहिंसा है।।
ध्यानी बनने से पहले,
सच्चे जैनी बन जाओ।
रात्रि-भोजन त्यागो पहले,
सच्चे जैनी कहलाओ।।
रात्रि का जो अमूल्य समय है,
निज आत्म का ध्यान करूँ।
भजूँ आत्मा जो ध्रुवमय है,
जिनवाणी विद्या अर्जूँ।।
रचनाकार: प्रतिहार्य पंकजकुमार जैन (Pratiharya Pankajkumar Jain), औरंगाबाद
Instagram: @pratiharyaJain187